आग और फूस - आनंद प्रकाश जैन Aag Aur Phoos - Hindi book by - Anand Prakash Jain
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आग और फूस

आनंद प्रकाश जैन

प्रकाशक : ग्रंथ अकादमी प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :164
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1594
आईएसबीएन :81-88267-10-4

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एक समकालिक उपन्यास...

Aag Aur Phoos

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नर और नारी के बीच अवैध संबंधों के विरुद्ध जो प्रतिबंध हमारे सामाजिक विधि-विधान ने लागू किए हैं उनका इतनी अधिक सतर्कता से पालन किया जाता है कि घूरकर देखते-देखते समाज की आँखों में मोतियाबिंद पड़ गया है। उसके शरीर में वासना का कोढ़ फूट निकला है । जो लोग अपनी निर्दोषिता पर गर्व करते हैं वे ही उसके हाथ जल्दी आते हैं क्योंकि निर्भय होकर विचरना ही उनका सबसे बड़ा दोष होता है।

एक

सादे गले का कुरता पहने, सिर पर गांधी टोपी लगाए, पैरों में सफेद लट्ठे का चूड़ीदार पाजामा और कपड़े के सफेद जूते धारण किए और औसत दर्जे का युवक, ऊपर लगे साइनबोर्डों पर नजर डालता हुआ, व्यस्त भाव से चला आ रहा था। जुलाई के आरंभिक दिन थे। वह दिल्ली का चहल-पहल से भरा, लंबा-चौड़ा एक बाजार था और दिल्ली के बाजारों में मनुष्य के जीवन धारण से लेकर त्याग देने तक के प्रायः सभी संस्कारों के सम्पन्न होने की सुविधाएँ मिल जाती हैं।
और अंत में उस युवक की दृष्टि एक गली के ऊपर अर्द्धगोलाकार लगे एक साइनबोर्ड पर टिक गई, जिसपर उपर्युक्त नाम के शब्द प्रायः मिट चले थे। उसने चैन की एक साँस ली और गली के भीतर चला गया।

हवेली जैसे एक मकान के फाटक के सामने उसी तरह का एक दूसरा साइनबोर्ड मिला। बाहर एक स्टूल डाले एक वृद्ध पुरुष बैठा था। सिर पर सफेद रंग का दुपट्टा, तन पर खादी का कुरता था और पैरों में चमरौधे थे। युवक जब उसके पास पहुँचा तो वह चूने और तंबाकू के मिश्रण को हथेली पर फटकारकर निचले होंठ के नीचे दबा रहा था।
‘‘यही सीताचरण कन्या महाविद्यालय है ?’’ युवक ने पूछा।
‘‘हूँ।’’ वृद्ध ने उत्तर दिया।
‘‘इस समय प्रिंसिपल साहब मिल सकते हैं ?’’
‘‘हूँ।’’ वृद्ध का उत्तर था।
‘‘तो उनसे मिलवा दो, भैया।’’
‘‘क्यों ?’’ मुँह ऊपर करके खैनी को होंठों से बाहर न निकलने देने का सफल प्रयास करते हुए वृद्ध ने पूछा।
‘‘उन्होंने एक अध्यापक के लिए समाचार-पत्र में विज्ञापन दिया था। उसी के सिलसिले में मुझसे उनसे मिलना है।’’
बिना कुछ बोले ही वृद्ध खड़ा हो गया। उस समय उस युवक ने देखा कि उसका शरीर डीलडौल में उससे तिगुना नहीं तो दोगुना जरूर है और उसमें जान भी कम नहीं है। एक बार तेज नजरों से युवक को घूरकर वह भीतर चला गया और युवक ने एक मिनट के लगभग इंतजार किया। फिर वह घुटनों तक खादी की धोती हिलाता हुआ आता दिखाई दिया।
‘‘चलो, ’’उसने दूर से ही कहा, ‘‘घंटे भर में तीन बेर खैनी फटकार चुका हूँ, मगर मुँह में रखते ही कोई-न-कोई आ टपकता है। अध्यापक बनेंगे। खैनी का सारा मजा किरकिरा हो जाता है। चलो!’’

युवक को बड़ा संकोच हुआ। बिना कुछ बोले वह वृद्ध के पीछे-पीछे उस हवेलीनुमा महाविद्यालय की इमारत में घुस गया।
बीच में पत्थर का लंबा-चौडा़ चौक था, जिसके चारों ओर कमरे थे और उन कमरों में से लड़कियों के हँसने-खिलखिलाने, उच्च स्वर से पढ़ने या बातचीत करने की आवाजें आ रही थीं। चौक के बीचोबीच एक तिपाया घंटा लटक रहा था। उसे बजाते हुए युवक ने दूसरी मंजिल पर निगाह डाली। वहाँ भी कमरे थे और उन कमरों में भी छोटी-बड़ी हर तरह की लड़कियाँ उस तुमुल कोलाहल में विद्या-लाभ कर रही थीं।
एक कोने से दूसरी ओर निकल जानेवाले गलियारे में से होकर वृद्ध दरबान उसे दूसरे चौक में ले गया, जिसके कोने पर ही प्रिंसिपल साहब का कमरा था। दरवाजे पर चिक पड़ी थी। एक ओर नाम की प्लेट लगी थी, जिस पर साफ अक्षरों में खुदा था-‘धीरेंद्र सिंह--प्रिंसिपल’।
नाम पढ़कर ही युवक को कुछ ऐसा लगा कि काम नहीं होगा। बड़ा अक्खड़ सा लगा वह नाम। इंद्र और सिंह के साथ जितने भी नाम आते हैं उन्हें धारण करनेवाले व्यक्तियों के साथ कुल मिलाकर उसका अनुभव कुछ अच्छा नहीं था। फिर भी हिम्मत करके, भीतर से ‘भेजो’ की भारी पुकार के साथ ही चिक हटाकर अंदर घुस गया।

सामने ही मोटा-ताजा व्यक्ति बैठा था। कानों के ऊपर के कुछ हिस्से को छोड़कर खोपड़ी बिलकुल खल्वाट थी। आँखों पर अंडाकार शीशों का चश्मा लगा था। नाक काफी भारी थी और नथनों के दोनों ओर से दो गहरी लकीरें सिलवटों के रूप में, मोटे होंठों के दोनों ओर नीचे तक चली गई थीं। रंग किसी कदर साँवला था। बदन पर कुरता था। जो हाथ मेज पर सामने रखा था उसपर बाल घने नजर आ रहे थे। एक ही नजर में ये सब बातें देखकर युवक ने आज्ञाकारी लड़के की भाँति दोनों हाथ जोड़ दिए। प्रिंसिपल ने आलस भाव से एक ओर हाथ करके उसे बैठने का संकेत किया। फिर एक हाथ अपनी खल्वाट खोपड़ी पर फेरा और उसकी ओर कुछ देर तक स्थिर दृष्टि से देखा। युवक को इससे बेचैनी अनुभव हुई।
‘‘कहिए, क्या नाम है आपका ? कहाँ से आ रहे हैं आप ?’’ रुखाई से प्रिंसिपल ने पूछा।
‘‘जी, मेरा नाम रजनीकांत है और मैं अभी तो दिल्ली से ही आ रहा हूँ, मगर कल मेरठ से आया था।’’
‘‘हूँऽऽ’’, कुछ विचारते हुए से प्रिंसिपल महोदय ने ‘हूँ’ पर लंबा जोर दिया और बोले, ‘‘तो आपका नाम रजनीकांत है !’’
मन-ही-मन युवक घबरा गया। यह प्रश्न इस तरह पूछा गया था मानो रजनीकांत किसी छँटे हुए अपराधी का नाम हो। फिर भी उसने हर प्रश्न का उत्तर देना ही उचित समझा और बोला, ‘‘जी।’’

प्रिंसिपल को गंभीर मुद्रा में देखकर युवक ने फिर कहा, ‘‘जी, एक अध्यापक के लिए जो आवश्यकता महाविद्यालय की ओर परसों के समाचार-पत्रों में निकली थी, उसके लिए मैं अपनी सेवाएँ प्रस्तुत करने के लिए आया हूँ।’’
‘‘हूँ...तो अध्यापक बनना चाहते हैं आप ?’’
रजनीकांत नाम का वह बेचारा युवक ऊपर से नीचे तक सिहर गया। कुछ क्रोध भी आया। मुँह गरम हो गया। कुछ समझ में नहीं आया कि आखिर किस तरह के आदमी से उसका वास्ता पड़ा है ! हर बात को दोहराकर पूछता है।
‘‘क्या पास किया है आपने ?’’ उसकी चिंतनतंद्रा को भंग करते हुए प्रिंसिपल साहब ने पूछा।
‘‘जी, मैंने केवल बी.ए., साहित्यरत्न किया है।’’
‘‘हूँ...केवल बी.ए., साहित्यरत्न किया है?’’
‘‘जी।’’
‘‘हूँ ! आपको मालूम है कि परसों से अब तक यहाँ छब्बीस आदमी यह स्थान प्राप्त करने के लिए आ चुके हैं और आप सत्ताईसवें हैं?’’
‘‘जी नहीं,’’ युवक ने सफलता की आशा छोड़कर तनिक पक्के शब्दों में कहा, ‘‘मगर मुझे प्रसन्नता है कि उन छब्बीस व्यक्तियों की अपेक्षा मेरी संख्या उस व्यक्ति के अधिक निकट है, जिसे आप यह स्थान देने का सौभाग्य प्रदान करेंगे।’’
‘‘हूँ ! और आपको मालूम है कि मैं चालीस साल से लड़कियों को पढ़ाने का काम करता चला आ रहा हूँ, सात साल से यहाँ प्रिंसिपल के पद पर हूँ और आज तक किसी ने मेरा कान पकड़कर यहाँ से निकाल-बाहर नहीं किया?’’
‘‘जी नहीं, यह भी मालूम नहीं है।’’ युवक ने कहा, ‘‘मगर इसके लिए मैं आपको बधाई अवश्य देता हूँ।’’
‘‘हूँ ! बधाई देते हैं आप ! आप जानते हैं कि उन छब्बीस आदमियों से मैंने सीधे क्षमा माँग ली है कि मैं उन्हें अपने यहाँ अध्यापक के पद पर नियुक्त नहीं कर सका ? उनमें एम.ए. साहित्यरत्न, साहित्याचार्य, शास्त्री आदि अनेक डिग्रियाँ प्राप्त लोग भी थे। आखिर क्यों ? क्या वे आदमी नहीं थे ? क्या उन्होंने पढ़ने-लिखने के स्थान पर घास काटी थी?’’
‘‘जी।’’

क्या मतलब ? क्या आप यह कहना चाहते हैं कि उन्होंने घास काटी थी?’’ तमककर प्रिंसिपल साहब ने पूछा।
‘‘जी, अवश्य काटी होगी, तभी तो आप उन्हें अपने यहाँ अध्यापक के पद पर नियुक्त नहीं कर सके।’’ रजनीकांत ने कहा।
‘‘क्यों जी, आप में ऐसी क्या खूबी है कि आपको इस सीताचरण कन्या महाविद्यालय में अध्यापक के पद पर नियुक्त किया ही जाना चाहिए?’’ प्रिंसिपल साहब ने सदे हुए शब्दों में पूछा।
‘‘मुझमें ?’’ युवक कुछ घबराकर बोला, ‘‘जी, मुझमें कोई खास खूबी नहीं है, प्रिंसिपल साहब। अगर होती तो आपकी कुरसी पर मैं होता। अपने बारे में अगर कुछ कहा जा सकता है तो यही कि मैंने यह बी.ए. साहित्यरत्न लड़कियों को पढ़ा-पढ़ाकर ही पास किया है। तरह-तरह की लड़कियों से मेरा वास्ता पड़ा है और शायद मैं औरों की बनिस्बत ज्यादा अच्छी तरह समझ सकता हूँ कि लड़कियों को किस तरह पढ़ाया जाता है ?’’
प्रिंसिपल साहब आँखें फाड़े, गरदन आगे किए युवक की बातों को सुनते रहे। उसकी बात खत्म होते ही उन्होंने पूछा, ‘‘कैसी-कैसी लड़कियों से आपका वास्ता पड़ा है ?’’
‘‘हूँ !’’ अब युवक ने प्रिंसिपल साहब का लहजा अपनाते हुए कहा, ‘‘कैसी-कैसी लड़कियों से मेरा वास्ता पड़ा है ? तो समझ लीजिए कि प्रभाकर की एक छात्रा को अपने ट्यूटर के गालों पर चपत लगाने की आदत थी।’’
‘‘ऐं !’’ प्रिंसिपल साहब सीधे हो गए, ‘‘अध्यापक के गालों पर चपत लगाने की आदत थी ! क्या मतलब?’’
‘‘मतलब यह कि बिलकुल मार ही न देती थी, बल्कि मुँह से कहा करती थी : ‘‘चाँटा लगा दूँगी’। और यह बात वह इस विचित्र मुद्रा से कहती थी कि आप उस पर क्रोध नहीं कर सकते थे। घर के सब बच्चे उससे छोटे थे और वे उसे प्यार से ‘दीदी’ कहा करते थे। माँ सीधी थी, तो पिता जरूरत से ज्यादा भोले थे। वह सब पर स्नेहपूर्ण शासन करती थी और बच्चों ने अपनी शैतानियों से ही उसे यह कहने की आदत डाल दी थी। पहले दिन तो कुछ नहीं, मगर उससे अगले दिन से ऐसा लगा मानो कोई बात ही नहीं हुई थी। पर उठते-उठते मैंने उसकी पुस्तकों में सबसे नीचे रखी एक पुस्तक को निकालकर देखना चाहा तो उसने उनपर हाथ रखकर मुझे रोक दिया और फिर वही बात कही। कहते ही उसके हाथ ढीले पड़ गए। पुस्तक मैंने देखी। वह एक उपन्यास था: शरत् बाबू का ‘देवदास’ और ‘बड़ी बहन’। मैं हँस पड़ा और चला आया।’’

‘‘ऐंऽऽ ! हँस पड़े और चले आए ! आपने उसके मुँह पर एक तमाचा रसीद नहीं किया ?’’
‘‘क्यों ? किसलिए ?’’ युवक ने पूछा।
‘‘इसलिए कि उसने ऐसी नामाकूल बात कही, जो...जो एक अध्यापक से कभी भी कहनी उचित नहीं---ऐं ?’’
‘‘जी नहीं,’’ युवक ने कहा, ‘‘मुझे यह जानना बाकी था न कि उस लड़की की जबान पर यह बात क्यों चढ़ गई है, और धीरे-धीरे यह बात मैंने जान ली। दो साल से वह लड़की फेल होती आ रही थी, जबकि एक-न-एक ट्यूटर उसके लिए लगा रहता था। मुझे अनुभव हुआ कि इस लड़की को बड़ा भाई नहीं, बल्कि बेटा बनकर पढ़ाने की जरूरत है।’’
‘‘बेटा बनकर ! क्या मतलब ?’’ प्रिंसिपल साहब ने फिर चौंककर पूछा।
युवक हँस पड़ा, फिर बोला, ‘‘यह जो हमारा देश है, प्रिंसिपल साहब, इसमें अविवाहित लड़कियों के भीतर भी असीम मातृत्व का भाव उत्पन्न हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उन माताओं को यदि आप बेटा बनकर न पढ़ाएँ तो फिर नहीं पढ़ा सकते।’’
‘‘ओह ! नहीं पढ़ा सकते ? सचमुच नहीं पढ़ा सकते ! अपने चालीस वर्षों में मैंने किसी ऐसी माँ को नहीं पढ़ाया। हो सकता है, ऐसी कोई छात्रा मुझे पढ़ाने को मिली हो, मगर...मगर मैं नहीं पहचान सका। बहुत सुंदर! मास्टरजी, बहुत सुंदर !’’ और इसके साथ ही उन्होंने चिक की तरफ मुँह करके एक गुजरते हुए सज्जन को पुकारा, ‘‘अरे, भई त्यागीजी, जरा सुनिए तो !’’

चिक हटाकर कोट-पतलून पहने एक सज्जन ने भीतर प्रवेश किया। आँखों पर चश्मा नहीं था, मगर वे कुछ मिची-मिची थीं। रंग पक्का, मुँह पर एक मुस्कान, इकहरा बदन, कपड़े अनफिट से, भीतर घुसते ही बोले, ‘‘आपने बुलाया, प्रिंसिपल साहब ?’’
‘‘जी हाँ, मैंने ही बुलाया है, जनाब। इनसे मिलिए, आप हैं रजनीकांत बाबू, महाविद्यालय के नए अध्यापक।’’
रजनीकांत बाबू ने चौंककर प्रिंसिपल साहब को देखा। विश्वास नहीं हुआ कि यह आदमी इतनी जल्दी परास्त हो जाएगा।
त्यागीजी ने सिर से लेकर पैर तक नवीन अध्यापक का निरीक्षण किया और हँसकर बोले, ‘‘ओह ! नंबर सत्ताइस !’’
‘‘क्यों ?’’ रजनीकांत ने कहा, ‘‘इसमें अचरज क्या है ? मालूम होता है, इस विद्यालय में इससे अधिक नंबर किसी अध्यापक को नहीं मिले।’’
‘‘हा...हा...हा...हा !’’ प्रिंसिपल साहब ठहाका मारकर हँसे। ‘‘आपने देखा, त्यागीजी, एक खास तरह की हाजिरजवाबी इन रजनीबाबू में है। पहले-पहल जब ऑफिस में इन्होंने कदम रखा था, तो ऐसा मालूम होता था कि हाल में कॉलेज से निकला कोई छोकरा है। मैंने भी आते ही वह आड़े हाथों लिया कि एक बार तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई इनकी; मगर इन्होंने मुझे कायल कर दिया। जिन सवालों के आगे छब्बीस में से एक भी आदमी नहीं टिक सका, उनके सामने यह ऐसे जमे कि उखाड़े न उखड़े। हा...हा...हा त्यागीजी, इनके साथ आपकी ऐसी पटेगी कि आप भी क्या याद करेंगे!’’
‘‘तो फिर मैं यह समझ लूँ कि आपने मुझे वह स्थान दे दिया है, जिसका विज्ञापन....?’’
रजनी बाबू की बात पूरी होते-न-होते प्रिंसिपल साहब ने कहा, ‘‘अजी साहब, समझना कैसा, आप नियुक्त हो गए हैं। कमेटी से मैं अपने आप सुलझ लूँगा।’’

‘‘तो फिर क्षमा कीजिए,’’ रजनीकांत ने कहा, ‘‘मैं यह जानना चाहूँगा कि मेरे इन सहयोगी में क्या खूबी है?’’
‘‘ओह ! ओह ! आप इस प्रश्न को अभी तक नहीं भूले?’’ प्रिंसिपल साहब ने हँसते हुए कहा, ‘‘त्यागीजी की खूबी न पूछिए। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आप कवि हैं। इतनी सुंदर कविता रचते हैं कि यह गाए जाएँ और आप सुनते जाएँ। प्रभाकर से लेकर रत्न तक का सारा कोर्स आपकी जबान पर है। छह साल से अध्यापन कार्य करते हैं और हमारे विद्यालय के ऊँचे दरजे की छात्राओं को आपके पढ़ाने का तरीका इतना ज्यादा पसंद है कि कई बार चाहते हुए भी हम आपको अपने विद्यालय से अलग नहीं कर पाए।’’
‘‘यह आप मेरी प्रशंसा कर रहे हैं!’’ त्यागीजी ने बनावटी आश्चर्य की मुद्रा में पूछा, ‘‘आप मुझे विद्यालय से अलग करना चाहें और मैं आपकी आज्ञा का पालन न करूँ, ऐसा कभी हुआ है?’’
‘‘यही तो, यही तो,’’ प्रिंसिपल साहब ने फिर हुँसते हुए कहा, ‘‘ऐसा कभी नहीं हुआ है, यही मेरे कहने का मतलब था।’’
‘‘अच्छा, तो अब मुझे आज्ञा दीजिए’’, त्यागीजी ने कहा, ‘‘यह सातवाँ घंटा व्यर्थ ही आधा चला गया है।’’
‘‘अच्छा, आप जाइए, पढ़ाइए।’’ प्रिंसिपल साहब ने कहा।
त्यागीजी तुरंत पीठ मोड़कर बाहर निकल गए, मानो उन्हें बहुत जल्दी हो। उनके लोप हो जाने के बाद प्रिंसिपल साहब एकदम गंभीर हो गए और संयत वाणी में बोले, ‘‘मिस्टर रजनीकांत, मैं आपको अपने यहाँ अध्यापक नियुक्त करता हूँ और आप मेरे वचन को पत्थर की लकीर समझ सकते हैं।’’

‘‘लेकिन यह बात तो आप पहले कह चुके हैं !’’ रजनीकांत ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा।
‘‘हाँ, कह चुका हूँ, ‘‘प्रिंसिपल साहब बोले, ‘‘मगर विद्यालय के मामलों में मैं कभी भी हँसी में कोई बात कहूँ तो उसे आप आगे भी कोई महत्त्व न दें। काम के मामले में मैं हँसी पसंद नहीं करता।’’
रजनीकांत ने और भी आश्चर्य से इस विचित्र मनुष्य की ओर देखा, जो अब उसी भाँति गंभीर नजर आ रहा था, जैसा ऑफिस में घुसते समय उसने देखा था। वह भी अपनी स्वभावगत गंभीरता धारण करते हुए बोला, ‘‘इस सूचना के लिए धन्यवाद ! मैं सदा इस बात का समुचित ध्यान रखूँगा।’’
‘‘आप जानते हैं कि मेरी उम्र आपके पिता के बराबर होनी चाहिए, रजनी बाबू ?’’
‘‘जरूर होनी चाहिए।’’ रजनीकांत ने कहा।
‘‘मैं अपने यहाँ नियुक्त अध्यापकों को अपने बेटों की तरह प्यार करता हूँ, और यह भी जान लीजिए, कभी-कभी इतना प्यार करता हूँ कि वे उसे ढो नहीं पाते। समझ रहे हैं आप ?’’
‘‘जी, कोशिश कर रहा हूँ।’’
‘‘कभी-कभी मैं बहुत सख्त हो जाता हूँ। कोई अवांछित घटना होने पर मैं अपने अध्यापक को कमचियों से पीट भी सकता हूँ।’’

‘‘अच्छा हुआ, आपने बता दिया,’’ रजनी बाबू ने भौंह ऊँची करके ध्यान से प्रिंसिपल साहब की गंभीर मुद्रा को देखते हुए पूछा, ‘‘पर आपकी वे कमचियाँ कहाँ हैं?’’
‘‘वे कमचियाँ कहाँ हैं यह अभी से आपको जानने की जरूरत नहीं,’’ प्रिंसिपल साहब ने कहा, ‘‘यह समझ लीजिए कि इस विद्यालय में इस समय पाँच सौ से ऊपर छोटी-बड़ी आयु की छात्राएँ पढ़ती हैं। इनमें ग्यारह अध्यापक पढ़ाते हैं। इस केंद्र में अ-आ से लेकर साहित्यरत्न तक की परीक्षाएँ आयोजित होती हैं। यह मेरी तेज नजर का प्रभाव है कि यहाँ सात साल से ऐसी कोई घटना नहीं घटी है, जिससे किसी को विद्यालय का नाम लेते लज्जा आए। जिस दिन ऐसी घटना घट जाएगी, उस दिन मैं अपराधी की हत्या तक कर सकता हूँ।’’
‘‘जी।’’ शांत भाव से रजनीकांत ने कहा।
‘‘अब सातवें घंटे के बाद आज की पढ़ाई समाप्त हो जाएगी। आप कल सुबह ठीक सात बजे कमरा नंबर 27, दूसरी मंजिल पर प्रभाकर की कक्षा को पढ़ाएँगे और मुझे कल ही कल में मालूम हो जाएगा कि आप कैसा पढ़ाते हैं। पहले महीने आपको डेढ़ सौ रुपए वेतन मिलेगा। यदि विद्यालय को यह लगा कि आप स्थायी रूप से रखे जा सकते हैं, तो अगले महीने से दो सौ रुपए वेतन हो जाएगा और तीन महीने बाद आपको इसी वेतन पर स्थायी रूप से नियुक्त समझा जाएगा।’’
‘‘जी।’’
‘‘आप कहाँ ठहरे हैं ?’’ एकदम बात बदलकर प्रिंसिपल साहब ने पूछा।
‘‘जी !’’
‘‘ऐं ! मैं पूछ रहा हूँ कि आप कहाँ ठहरे हैं ? मगर शायद आपने मेरी एक भी बात नहीं सुनी ! क्या मतलब है इसका ?’’
‘‘जी,’’ चौंककर रजनीकांत ने कहा, ‘‘आपकी बातें ध्यान से सुन रहा था, इसीलिए डूब गया था। आपने पूछा है, कहाँ ठहरा हूँ। यहाँ मेरे एक रिश्ते के चाचा बाबू मथुराप्रसाद हैं। वह किसी समाचार-पत्र में प्रूफरीडर हैं। उन्होंने मुझे अपने मकान से कुछ ही दूरी पर एक मकान में एक कमरा दिलवा दिया है। मेरा इरादा सिर्फ ट्यूशन करके गुजारा करने का था, इसीलिए दिल्ली आ गया था। मगर अब मुझे इस विद्यालय की सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हो गया है तो अधिक चिंता नहीं रहेगी।’’

‘‘आपका विवाह हो गया है ?’’ प्रिंसिपल साहब ने पूछा।
‘‘जी अगर इससे विद्यालय की सेवा में कोई अंतर पड़ता है तो ‘हाँ’ अन्यथा ‘नहीं’।’’
‘‘हूँ ! यानी नहीं हुआ। खैर, हमें इससे कोई मतलब नहीं है। मगर आपको यह वचन देना होगा कि प्राइवेट ट्यूशन या तो आप करेंगे नहीं, और करेंगे तो अपने निवास-स्थान पर किसी लड़की को नहीं बुलाएँगे।’’
‘‘प्रिंसिपल साहब,’’ रजनीकांत ने सहसा स्वर को तीखा करते हुए कहा, ‘‘आपका संकेत जिस तरफ है वह आपने मुझे काफी समझा दिया है। आप मुझसे मेरे चरित्र की गारंटी चाहते हैं। आप मेरे पिता की आयु के हैं यह आपने अभी कुछ देर पहले मुझे बताया था। यही मानते हुए मेरा निवेदन है, किसी व्यक्ति से उसके चरित्र की गारंटी माँगना और उसे झूठ बोलने के लिए मजबूर करना एक ही बात है। आप जिस महत्त्वपूर्ण पद पर हैं, और गुरु-कार्य आपके कंधों पर है, उसके विचार से आपको कभी किसी के चरित्र और वचनों पर आँखें मूँदकर विश्वास नहीं करना चाहिए। जिस दिन आपकी किसी अध्यापिका या छात्रा को अपना चरित्र नष्ट करना होगा, उस दिन उसमें से कोई आपके पास सूचना देने नहीं आएगी, और यह भी आवश्यक नहीं कि वह अपराध दिन के प्रकाश में ही हो। क्या आप विश्वासपूर्वक यह कह सकते हैं कि आपको अपने सभी अध्यापक-अध्यापिकाओं तथा छात्राओं की प्रत्येक गतिविधियों पर पूरा भरोसा है ?’’
‘‘तुम भाषण बहुत अच्छा देते हो,’’ प्रिंसिपल साहब ने आवेग में कहा, ‘‘अब आप जा सकते हैं।’’
रजनीकांत उठ खड़ा हुआ। उसी समय एक लड़की मुसकराती हुई भीतर घुसी और रजनीकांत की ओर न देखते हुए उसने सीधे प्रिंसिपल साहब से कहा, ‘‘चलिए, पिताजी।’’

‘‘इंद्रा बेटी,’’ प्रिंसिपल साहब ने उठते हुए कहा, ‘‘यह तुम्हारे नए अध्यापक हैं, बाबू रजनीकांत। यह कल से तुम्हें पढ़ाएँगे। इन्हें प्रणाम करो।’’
रजनीकांत की ओर देखकर प्रिंसिपल साहब की बेटी ने हाथ जोड़े, ‘‘नमस्कार मास्टरजी !’’
रजनीकांत ने नस्कार का उत्तर देते हुए उस लड़की की तरफ उड़ती हुई नजर डाली। एक सीधी-सादी, मुसकराती हुई, साधारण नवयुवती; गोरा रंग, बड़ी-बड़ी आँखें, अच्छे नक्श, पतले होंठ और ढंग से सँवारकर ओढ़ा हुआ उलटा पल्ला। एक हाथ में पुस्तकें सँभाले हुए। यह कन्या महाविद्यालय है और यहाँ इंद्रा जैसी लड़कियों से ही रजनीकांत को नित्यप्रति नया संपर्क बनाना है।


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