सविता - शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय Savita - Hindi book by - Sharat Chandra Chattopadhyay
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सविता

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :336
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1598
आईएसबीएन :81-85830-54-1

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प्रस्तुत है श्रेष्ठ उपन्यास... शरत् चन्द्र मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

Savita

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

तारकनाथ और राखाल केवल तीन महीने के ही साथ-संग से घनिष्ठ मित्र हो गए। जब तीन बज गए और तारक अभी तक नहीं आया तब राखाल के हृदय में घबराहट और बेचैनी पैदा होने लगी। भवानीपुर में आज स्त्रियों की एक सभा होने वाली है। वहां पर बहुत से शिक्षित परिवारों की लड़कियां इकट्ठी होंगी और इस समय राखाल वहां के लिए चल देने को बेचैन होता जा रहा था। जाने के सब इन्तजाम कर चुका था। सफेद कुर्ता, धोती और सिल्क का साफा पलंग पर तैयार रखे थे और पास ही ताजा पॉलिश किया हुआ जूता चमचमा रहा था।

स्टोव पर चाय का पानी जरूरत से ज्यादा गरम हो चुका था, लेकिन तारक अभी तक आया नहीं था। द्वार पर किसी के आने की आहट सुनने के लिए कान अधीर हो रहे थे। सभा में जाने की बेचैनी और मित्र का अभाव इन दोनों मायाचक्रों को बीच इस समय राखाल का हृदय चक्कर काट रहा था। ताला लगा कर जा भी नहीं सकता था।

कई बार द्वार तक गया, सड़क पर भी चप्पल पहनकर हो आया, फिर लौटा और अकेले ही चाय पीने लगा। सोचा- ‘सिर्फ इस प्याले के खत्म होने तक ही इन्तजार करता हूं, फिर चल पड़ूंगा। अब और ज्यादा भी इन्तजार भला क्या करूं ? कौन ऐसी राय लेनी है, अगर जरूरत होती तो साहब वक्त से पहले ही आ धमकते। न होगा तो कल उनके डेरे पर ही जाऊँगा।’ ऐसे विचार, चाय की प्याली होंठों तक पहुँचते-पहुँचते दिमाग में चक्कर काटने लगे।

राखाल अपने को संन्यासी कहता है, क्योंकि वह दुनिया में एकाकी है और वह ठीक तरह से यह अन्दाज भी नहीं लगा सकता कि उसका कुटुम्ब कैसा था और कब किस तरह उसका सम्बन्ध उससे टूट गया ? वह अपने कुटुम्ब के बारे में कुछ बतलाना ठीक नहीं समझता। पटल डांगा में एक किराये के मकान में वह एक कमरे में रहता है। कमरे में कुछ सील होते हुए भी हवा और प्रकाश आता है। राखाल शौकीन तबीयत का आदमी है इसलिए उसके कमरे में एक उम्दा पलंग, मेज, कुर्सी और दो अलमारियां है। पोशाक उसकी सुन्दर ही रहती है। बिजली का पंखा भी उसने अपने कमरे में लगा रक्खा है। गरज यह कि राखाल के पास शौकीनी की चीजों का अभाव नहीं है।

राखाल का काम एक वृद्ध दासी करती है और उसे वह नानी कहकर बुलाता है। वृद्धा उससे स्नेह करती है और बर्तन रगड़ने से लगाकर चीज-वस्तु लाने तक का काम उसी के जिम्मे है। वेतन के अलावा राखाल उसे अच्छा खासा इनाम देता है। सवेरे राखाल लड़कों को पढ़ाता है और बाकी समय सभाओं के लिए देता है। उसका स्थान राजनैतिक न होकर साहित्यिक है। राजनीति का अशान्त वातावरण उसे पसन्द नहीं। वह छोटे दर्जे के लड़कों को ही पढ़ाता है। नौकरी पाने के अपने प्रारम्भिक प्रयास के असफल हो जाने पर अब उसने उस सम्बन्ध में प्रयास करना छोड़ दिया है।
साहित्यिक तो वह है, लेकिन किसी पत्र-पत्रिका में उसका कोई लेख दिखाई नहीं पड़ता। रात-रातभर वह जागकर लिखता है, लेकिन फिर उसका वह क्या करता है, यह भेद कोई नहीं जानता

। वह किस दर्जे तक पढ़ा है, जब कोई आदमी इस तरह की जानकारी उससे लेना चाहता है तो उसका चेहरा इस तरह का बन जाता है कि मिडिल से लगाकर डॉक्टरेट तक किसी भी डिगरी का अधिकारी उसे समझा जा सकता है। उसकी अलमारियों में काव्य, साहित्य, दर्शन, विज्ञान सभी विषयों की पुस्तकें भरी पड़ी हैं। प्राचीन अथवा वर्तमान, डॉक्टरी हो या विज्ञान- सभी विषयों पर पूर्ण अधिकार के साथ बातें करता है। बड़े-बड़े ग्रन्थों और उनके लेखकों के नाम पूर्ण परिचय के साथ उसे कण्ठस्थ हैं। होमर, स्पेंसर और ड्रक ऑर्थर के काव्यों की तुलनात्मक समालोचना और भारतीय दर्शनों के सामने उनकी तुच्छता का वर्णन जब वह करता है तो तत्वों के स्पष्टीकरण में अपने पूर्ण पाण्डित्य का प्रदर्शन कर डालता है।

 बोर-युद्ध का कौन सेनापति था, आदि सब बातें उसके लिए खेल हैं। भारतीय गोलस्टैंडर्ड, रिवर्स कौंसिल और मुद्रा विषयक प्रश्नों पर वह अपनी गम्भीर सम्मति दे सकता है, और देता भी है। यही नहीं, न्यूटन के विचार किस दिन आइंस्टीन के विचारों से मेल खाकर एक हो जाएगें, यह भविष्यवाणी वह बड़े गर्व से करता है। उसकी बातें सुनकर कोई हंस देता है और कोई श्रद्धा से शिष्य हो जाता है। इतना जरूर है कि राखाल के परोपकारी होने में किसी को शक नहीं और यह सभी जानते हैं कि वह दूसरों की भरकस मदद करने में कभी पिछड़ता नहीं।

बहुत से घरों के दरवाजे राखाल के लिए चौबीसों घण्टे खुले रहते हैं। उसे बेगार करने में मजा आता है। बड़ी उम्र वाली स्त्रियां राखाल से विवाह करने के लिए नित्य ही आग्रह करती हैं, लेकिन राखाल इसके जवाब में कान पकड़कर सिर्फ इतना ही कह देता है- ‘‘कुछ और कहिए न ? ऐसी सम्मति मत दीजिए। मैं अपनी आज की हालत में बहुत सुखी हूं।’’ राखाल के हितैषी उसकी इस प्रवृत्ति से बहुत दुःखी हैं, लेकिन उसके इस पागलपन को छुड़ाने के लिए आज तक किसी हितैषी ने यह नहीं कहा- ‘‘भाई राखाल  हमने एक सुन्दर युवती तुम्हारे विवाह के लिए ठीक कर दी है। इस विवाह की सभी व्यवस्था हो चुकी है और तुम्हें शादी करनी ही पड़ेगी।’’

हितैषियों में इतना अधिकार कहां था और कोरी सहानुभूति पर राखाल पिघलता भी क्यों ? इसी तरह राखाल अपनी जीवन नौका को खे रहा था। राखाल अकेला है और भविष्य भी उसे इसी तरह दिखाई देता है। वह जानता है कि स्त्रियां उसकी इस कमी को सहानुभूति के साथ अनुभव करती हैं, इसी तरह वह उनके आग्रह को भी पूरी सहानुभूति के साथ स्वीकार करता है, और उनकी बेगारें करने में नहीं पिछड़ता।

चाय भी खत्म हो गई लेकिन तारक अभी तक आया नहीं। राखाल कपड़े पहनकर जैसे ही दरवाजे की तरफ बढ़ रहा था वैसे ही तारक सामने से आता हुआ दिखाई दिया। निकट आने पर राखाल ने कहा- ‘‘क्यों जी, इसी को जरूरी सलाह कहते हैं ?’’
‘‘क्या नहीं जाना है ?’’
‘‘जी नहीं मैं तो शाम तक यहीं बैठा रहूंगा।’’
‘‘लेकिन अभी शाम दूर है, बैठो न !’’

‘‘नहीं मित्र, अब कल सलाह होगी।’’ कहकर राखाल ने साफा गर्दन में डाल लिया।
तारक गम्भीर स्वर में बोला- ‘‘तब तो समझिए सलाह-मशविरा नहीं होगा कल तड़के मैं बहुत दूर चला जाउंगा। फिर कभी नहीं, ईश्वर ऐसा न करे, शायद बहुत दिनों तक मुलाकात न हो सके। ’’
‘‘क्या मतलब ?’’ राखाल ने विस्मति होकर कुर्सी पर बैठते हुए पूछा।
मतलब यह कि बर्दवान जिले में एक नये स्कूल की हेडमास्टरी मिल गई है। मुझे वहाँ नौकरी करने के लिए जाना पड़ेगा। ’’
‘‘किसी प्राइमरी स्कूल में ?’’

‘‘नहीं, हाई स्कूल में।’’
‘‘तनख्वाह क्या मिलेगी ?’’
नब्बे रूपये महीना और एक छोटा-मोटा घर।’’
‘‘हो ! हो !’’ करके राखाल हंस पड़ा और बोला-  

‘‘यह सब धोखा जान पड़ता है। वह रकम सौ से भी ज्यादा है। क्या दुनिया के और सब विद्वान मर गए जो तुम्हारे पास...’’
‘‘अवश्य मर गए होंगे। फिर गंवारू गांव है, कौन विद्वान जाने को राजी होगा।’’
राखाल हंस पड़ा और मुसकराते हुए बोला- ‘‘भाई, जाने को राजी क्यों नहीं होगा ? सौ रूपये पर तो आदमी यमराज के यहां भी जा सकता है, बर्दवान की तो बात ही क्या है ?’’ इतना कहकर घड़ी की ओर देखा। तीन बजकर दस मिनट हो गए थे। ‘‘यह सब पागलपन है मित्र ! कल सवेरे विचार करेंगे।

देखूंगा कि उन्होंने क्या लिखा है ? यह साफ धोखेबाजी है। अच्छा; अब तो मैं चलता हूं।’’ कहकर वह उठ खड़ा हुआ।
‘‘मित्र सिर्फ दस मिनट और ठहरो। उन्होंने झूठ लिखा या सच, लेकिन मैं आज रात की गाड़ी से जरूर जाऊंगा।’’
‘‘क्यों ? क्या मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा है ?’’
तारक ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया- ‘‘अगर किसी दिन तुमसे न मिलूं तो दिल अधीर हो जाता है। कुछ आदत सी बन गई है मेरी।’’ तारक ने गम्भीरता से कहा।
‘‘और शायद मेरी नहीं !’’ इतना कहकर राखाल चुप हो गया।

 ‘‘अगर जिन्दगी रही तो बड़े दिन की छुट्टियों में मुलाकात होगी।’’ बात का सिलसिला बदलते हुए तारक ने अपनी अंगूठी मेज के एक कोने पर रखकर धीरे से विनीत भाव से सिर झुकाकर कहा- ‘‘मुझे बीस रूपय की जरूरत है...।’’
‘‘यानी यह अंगूठी गिरवी रख रहे हो।’’ बीच में ही राखाल बोल उठा और अंगूठी उठाकर खिड़की के बाहर फेंकने ही वाला था कि तभी तारक फुर्ती से हाथ थामकर बोला- ‘‘गिरवी क्यों मित्र ! इसको बेचने पर भी क्या कोई दस रूपया दे सकेगा ? जाने से पूर्व यह अपना स्मृति-चिन्ह तुम्हारी अंगुली में पहनाऊंगा।’’ इतना कहकर अंगूठी अंगुली में पहना दी और फिर कहने लगा- ‘‘बस ! अब तुम जा सकते हो। मैंने दस मिनट के लिए कहा था और पन्द्रह मिनट ले लिए...।’’

राखाल के मस्तिष्क में महफिल के चित्रों के स्थान पर अब दूसरे ही विचार अंकित हो चुके थे। दोनों मित्रों की आकृति बड़े शीशे में साफ दिखाई दे रही थी। राखाल अपने मध्यम कद, गौर वर्ण, गोल कपोल और सरल स्वभाव से भला आदमी मालूम पड़ता है और तारक पतला, दुबला, कद लम्बा, श्याम वर्ण आदमी। देखने में बहुत शक्तिशाली है। उसके नेत्रों में एक विशेष प्रकार का आकर्षण है। आदमी विश्वासी है, सुख-दुख दोनों में विचलित न होने की योग्यता अपने में रखता है। उम्र लगभग अट्ठाइस साल की होगी- राखाल से दो-तीन साल कम।

‘‘तुम्हारा जाना गलत है।’’ राखाल ने कड़े स्वर में कहा।
‘‘क्यों ?’’ तारक गम्भीर मुद्रा किए खड़ा था।
‘‘क्यों क्या, हाई स्कूल के दसवें दर्जे को पढ़ाना क्या कोई आसान काम है ? इतनी योग्यता होनी चाहिए कि उन्हें उत्तीर्ण करा सको।

क्या...’’
‘‘उन लोगों ने योग्यता नहीं, कॉलिज की डिगरियां मांगी थीं। सो मैंने पेश कर दीं और कमेटी ने उसके आधार पर मुझे हेडमास्टरी के पद पर नियुक्त कर दिया। लड़कों को पढ़ाने का उत्तरदायित्व मुझ पर और पास कराने का उन पर रहेगा।’’
‘‘जी !’’ गम्भीरता से राखाल बोला-‘‘तुम मुझसे बराबर झूठ बोलते रहे कि तुम पढ़ते-लिखते ही नहीं हो ! भला ऐसा तुमने क्यों किया ?’’

तारक ने हंसकर कहा-‘‘यह तो मैं अब भी कहता हूं कि सिर्फ डिगरियां ही तो ले ली हैं। पढ़ाई खत्म करते ही नौकरी की खोज में लग गया। पढ़ने के लिए वक्त ही कहां मिला ? कलकत्ता में आकर तुम्हरी दया से दो वक्त भोजन का सहारा मिल गया। ’’

‘‘तारक ! देखना अगर फिर कभी तुमने...पूरी बात भी खत्म न होने पाई थी कि शीशे में एक तीसरा नारी का प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर हुआ। यह एक अपरिचित स्त्री थी जिसकी आयु यौवन को लांघकर आगे बढ़ चुकी थी, लेकिन यह पहचानना उतना सरल नहीं था जितना कि यह सत्य था। गौर वर्ण, शरीर कुछ दुबला, शरीर पर सुन्दर साड़ी, दो-चार गहने, माथे पर सिन्दूर बिन्दु- नारी और नारी का एक विचित्र आकर्षण उसमें झलकता था। क्षण भर के लिए दोनों मित्र मौन नवागन्तुक के मुख को देखते रहे और फिर अचानक राखाल कुर्सी छोड़कर बोला-

‘‘यह क्या ? मेरी नई मां !’’और महिला के पैरों पर सिर रखकर इस तरह लेट गया मानो कितने ही दिनों का भटका हुआ नमस्कार आज अपनी पूर्ण श्रद्धा को उंड़ेल देना चाहता है।
‘‘बेटा राजू !’’ महिला ने राखाल को ठोड़ी थामकर उठाते हुए कहा और खुद कुर्सी पर बैठ गई। राखाल और उसका मित्र दोनों सामने धरती पर बैठ गए।
‘‘तुरन्त नहीं पहचान सका मां !’’ राखाल ने कहा।
‘‘न पहचानने की तो उम्मीद ही थी बेटा।’’

‘‘मैं सोच ही रहा था कि वैसे ही आपका लम्बा केशजाल दिखलाई पड़ गया। रंगीन आंचल में से झलकते हुए केश आपके पैरों की एड़ियों को चूम रहे हैं। उन दिनों की याद कितनी स्पष्ट है कि जब वे लोग कहा करते थे- इन बालों में से थोड़े बाल लेकर देवी की मूर्ति को सजाना चाहिए। आप भूली न होंगी मां वह बात।’’
मां हसने लगी और बात बदलकर बोलीं-‘‘यही तुम्हारे मित्र हैं न राजू ? क्या नाम है इनका ?’’
‘‘तारक भट्टाचार्य।’’ राखाल बोला-‘‘लेकिन आप कैसे जान गईं कि यह मेरे मित्र हैं ?’’
उन्होंने इस प्रश्न को भी दबा रखा, कहा- ‘‘सुनती हूं, तुम लोगों में खूब प्रेम है।’’

‘‘हां !’’ राखाल ने कहा- ‘‘लेकिन यह आज भर का ही मेहमान है। बर्दवान जिले के किसी गांव में हेडमास्टर बनकर जा रहा है। मैं इसे समझाता हूं कि एम. ए. पास करके मास्टरी की क्या फिक्र करते हो, लेकिन इसे विश्वास नहीं हो रहा कि इतने बड़े कलकत्ता शहर में इसे कोई काम मिल जाएगा। कितनी खराब बात है मां ?’’
नई मां ने मुसकराकर कहा- ‘‘तुम्हारी बात पर विश्वास न करना कोई बुरी बात नहीं, क्या तारक बाबू आप सचमुच चले ही जाएंगे ?’’

‘‘लेकिन बात तो बुरी कुछ और ही हुई मां ! राखालराज का इतना लम्बा नाम तो आपने छोटे से राजू में बदल दिया और मेरे नाम के पहिले बाबू का पुछल्ला लगा दिया। मेरा नाम भी आपको छोटा करना होगा मां !’’ तारक ने विनीत भाव से कहा।

‘‘ऐसा ही होगा तारक।’’ नई मां ने मुसकराते हुए कहा। तारक खुश होकर कुछ कहना ही चाहता था कि उसकी वाणी मौन हो गई। उसी वक्त नई मां बोलीं- ‘‘कभी उस मकान की तरफ भी जाना होता है राजू ?’’
‘‘चला तो जाता हूं मां लेकिन दुनियाभर के झंझट चैन नहीं लेने देते। पन्द्रह-बीस दिन में कभी...’’
‘‘कुछ खबर है, रेणुका की शादी हो रही है।’’
‘‘किसने कहा आपसे ? मुझे तो कुछ भी खबर नहीं है।’’
‘हां, निश्चय ही हो रही है। सवेरे दस बजे उसके शरीर पर तेल और उबटन मला जा चुका, लेकिन तुम्हें शादी रोकनी होगी।’’
‘‘किसलिए मां ?’’

क्योंकि यह हो नहीं सकती, इसलिए की उसकी ससुराल में पागलपन का रोग है। बाबा, बुआ दोनों पागल हैं। पिताजी अभी-अभी अच्छे हुए हैं लेकिन कुछ पहले उन्हें भी-जंजीर में बांधकर रखा जा चुका है।’’
‘‘कैसी आफत है जी, क्या इन बातों पर गौर नहीं किया गया ?’’ राखाल बोला। लड़का सुन्दर और धनी है और अभी पढ़ रहा है और तुम जानते हो रेणुका के पिता को, सभी की बातों में आ जाते है, विश्वास कर बैठते हैं यदि यह रहस्य जान भी जाते तो क्या होता ? सब कुछ समझ-बूझ कर भी वह इसमें डर नहीं मानते।’’
‘‘बात तो यही है।’’ राखाल ने कष्टपूर्ण स्वर में कहा।

चुपचाप बैठे तारक के मन में राखाल के इस ‘बात तो यही है।’ निरूत्साही स्वर ने विचलन पैदा कर दी। राखाल को वह बिना फटकारे न रह सका कि आखिर किस प्रकार वह उस विवाह का होना सहन कर सकेगा।
‘‘परन्तु, भाई, क्या मेरे कहने मात्र से विवाह रुक सकेगा। तुम ऐसा समझते हो !’’ राखाल ने कहा ‘‘फिर अकेले रेणुका के पिता की ही बात नहीं है घर में दूसरे लोग भी तो हैं।’’
‘‘रूकेगा क्यों नहीं ? क्या लड़की के घर वाले भी लड़के के घर वालों की तरह पागल हैं ? क्या लड़की को आग में झोंकना है ?’’
परन्तु हल्दी तो चढ़ चुकी। ’’

‘‘तो क्या हुआ, लड़की के साथ अन्याय नहीं किया जा सकता।’’ महिला तारक की ओर बड़ी गम्भीरता से देख रही थी।
‘‘मैं एक अपरिचित व्यक्ति हूं। मुझे उस घर वालों की ऐसी कटु आलोचना करने का अधिकार भी नहीं था। परन्तु राखाल मेरा मन कहता है तुम्हें अपनी सम्पूर्ण शक्ति यह विवाह रोकने में लगा देनी चाहिए। मैं कहता हूं, उसे मत होने दो मित्र !’’
महिला ने कहा- ‘‘राजू ! और कौन है वहां ? केवल लड़की की सौतेली मां है, सो उसे इस मामले में बोलने का कोई अधिकार नहीं है।’’

राखाल चुप था। महिला ने फिर कहा- ‘‘अच्छा राजू, अब मुझे बाग बाजार जाना होगा। वहां जाकर लड़की के मामा को जो कि उधर के कर्ता-धर्ता हैं, उन्हें लड़की की मां की कहानी सुना देना होगा। हो सकता है कि काम पूरा हो जाए, परन्तु अगर न हुआ तो मुझे कुछ और प्रयत्न करना पड़ेगा। मैं रात में ग्यारह बजे के बाद आऊंगी, इस समय जाती हूं।’’ इतना कहकर वह जाने लगीं।

राखाल व्याकुल था, वह कहने लगा- ‘‘परन्तु इसके पश्चात् रेणुका का विवाह नहीं हो सकेगा मां। भेद खुल जाने पर ...’’
‘‘न सही बेटा !’’ दृढ़ होकर मां ने कहा। अधिक बात बढ़ाना राखाल ने उचित न समझा। चरण छूकर पूर्ववत् प्रणाम किया। तारक ने भी उसका अनुसरण किया। दरवाजे तक जाकर मां फिर अचानक घूम पड़ीं और तारक को सम्बोधित करके बोलीं- तारक ! अधिकार तो नहीं किन्तु राखाल के मित्र होने के नाते मैं अनुरोध करती हूं कि तुम अभी दो दिन यहीं और ठहरो।’’
तारक ने बड़े विस्मय के साथ यह शब्द सुने। अचानक कोई उत्तर न बन पड़ा और वह बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए ही बाहर चली गई। खिड़की से राखाल ने देखा वह पैदल ही जा रही थीं। गली के अन्त पर एक दरबान उनकी प्रतीक्षा में खड़ा था, वह उनके पीछे-पीछे चल दिया।

दो


राखाल ने कपड़े उतार दिए। तारक ने पूछा- ‘‘ क्या घूमने जाने का विचार है ?’’
‘‘और तुम ! क्या बर्दवान जरूर जाना है आज ही ?’’ राखाल पूछ बैठा। ‘‘नही मैं देखना चाहता हूं कि उस विषय में तुम क्या करने का विचार कर रहे हो ? यदि तुम अपने मन से कुछ न करोगे तो मुझे तुम्हारे साथ जबरदस्ती करनी पड़ेगी।’’ तारक ने उत्तर दिया। ‘‘चाय का बर्तन फिर अंगीठी पर चढ़ा देता हूं।’’
‘‘चढ़ा दो।’’
खाने के लिए कुछ मोल ले आऊं ?’’
‘‘ले आओ। तारक बोला।

‘‘तुम बर्तन आग पर रखो, मैं अभी दुकान से होकर आया।’’ आधी धोती ओढ़े पैरों में चप्पल डाले वह दुकान की ओर चल दिया। गली के नुक्कड़ पर हलवाई की दुकान है, उधार खाते में मिल जाता है, नगद नहीं देना पड़ता।
मेज पर चाय लेकर दोनों मित्र बैठ गए। सूर्य अस्त हो चुका था, इसलिए बिजली का बटन दबा दिया। घरेलू बातें चल पड़ीं। राखाल अतीत की स्मृतियां सुनने लगा- अपनी शैशवावस्था के दिनों की। तारक चुपचाप उन्हें सुनता गया। कभी-कभी बीच में बहस भी छिड़ जाती !
‘‘फिर उसके बाद ?’’ तारक ने कहा।

‘‘उस समय मैं लगभग ग्यारह या बारह वर्ष का था। बाबूजी चार-पांच दिन पूर्व हैजे के शिकार हुए होंगे। मैं निराश्रय था। सब ने मुझे जमींदार की मझली बेटी सविता के पास जाने की अनुमति दी जो कि दुर्गा-पूजा देखने के लिए पिता के घर आई हुई थीं। जमींदार का बूढ़ा कारिंदा मुझे उनके पास ले गया। वह सूप में रखकर तिल चुन रही थीं। कारिन्दा ने कहा- ‘‘मझली बिटिया ! यह एक दीन ब्राह्मण है। इसके मां-बाप दोनों स्वर्गवासी हो चुके हैं। तुम्हारा नाम सुनकर भिक्षा के लिए आया है। तीनों लोक में इसका कोई आधार नहीं है। कौन इसको भार, मुक्त करे।






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