प्रेमात्रयी - त्रिवेणी प्रसाद त्रिपाठी Prematryee - Hindi book by - Triveni Prasad Tripathi
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प्रेमात्रयी

त्रिवेणी प्रसाद त्रिपाठी

प्रकाशक : साहित्य मीडिया पब्लिशिंग प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :106
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 16007
आईएसबीएन :9788194721987

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प्रेमात्रयी

दो शब्द

 
मित्रों इस पुस्तक का नाम 'प्रेमात्रयी' इसलिये दिया गया है क्योंकि इस पुस्तक में तीन छोटी-छोटी कविताओं का संकलन हुआ है। जो क्रमशः इस प्रकार हैं-

पहली रचना 'एक बूंद आँसू' - इस कविता में श्री उद्धव जी के ज्ञान के गर्व को भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा मर्दन किये जाने की कथा है। श्री उद्धव जी को ईश्वर की प्राप्ति का सबसे उपयुक्त साधन ज्ञान में ही दिखाई देता था। इसीलिए जब गुरुआश्रम से विद्या ग्रहण करने के पश्चात् उद्धव जी मथुरा आये तो गुरू के आदेशानुसार वे श्रीकृष्ण से मिलने गये, क्योंकि, गुरुजी ने उन्हें बताया था कि श्रीकृष्ण स्वयं ब्रम्ह के अवतार हैं। पर, उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण निर्विकारी होकर भी रुआंसी अवस्था में खड़े हैं। उसी समय श्री उद्धव जी वहाँ पहुँच जाते हैं और अपनी गदेली पर उन आँसुओं को रोक लेते हैं ताकि वे आँसू भूमि पर न पड़ें, नहीं तो प्रलय हो जायेगी। आँसुओं को गदेली पर रोकने के पश्चात् उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया कि प्रभु यह क्या? क्या आप यह नहीं जानते कि आपके आँसू भूमि पर गिरने से इस श्रृष्टि में प्रलय मच जायेगी? माधव ने उत्तर दिया, भैया क्या करूँ, मुझे जब भी ब्रज और गोपियों की याद आती है तो हृदय विह्वल हो उठता है और बरवस ही मेरी आँखों से आँसू निकलने लगते हैं।
श्री उद्धव जी ने कहा-आप तो स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं, फिर आपको मोह कैसे हो जाता है? प्रभु ने कहा, भैया, गोपियाँ मुझसे अत्यधिक प्रेम करती हैं और ब्रज से मुझे स्वयं बहुत प्रेम है, इसलिए यह दोनों बातें जब इकट्ठी हो जाती हैं तो मैं अपने को सम्हाल नहीं पाता, और मेरी यही स्थिति हो जाती है। इसपर श्री उद्धव जी ने कहा, प्रभु आप तो ज्ञान के सागर हैं, आते समय उन्हें समझा कर आना चाहिए था, पर शायद यही काम आपने नहीं किया। और रही ब्रज से प्रेम की बात तो आप तो माया-मोह से रहित हैं, फिर भी इस बंधन में बंधते हैं, क्यों? प्रभु ने कहा-भैया, बिना प्रेम के ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है, इसीलिए मैं उन्हें अत्यधिक प्रेम करता हूँ, क्योंकि वे सभी मुझे हृदय से चाहती हैं। फिर भी जब श्री उद्धव जी को विश्वास नहीं हुआ कि ज्ञान प्रेम के बिना भक्ति का साधक न होकर, बाधक ही रहता है। भगवान ने कहा- भैया, मैं तो उन्हें समझा नहीं सका, यदि आप जाकर उन्हें समझा दें तो शायद वे समझ जायें। और इसी कथानक पर ‘एक बूँद आँसू' कविता का ताना-बाना बुना गया है।

दूसरी त्रयी: - मित्रों इस पुस्तक की दूसरी त्रयी के रूप में 'पुनर्दत्त की मुक्ति' कथा आई है। पुनर्दत्त सांदीपनि ऋषि के पुत्र थे। एक बार ऋषि अपनी पत्नी और पुत्र के साथ प्रभास क्षेत्र स्नान करने गए थे। वहाँ उनका पुत्र जैसे ही स्नान के लिए जल में घुसा, पता नहीं उसे कौन खींच ले गया। ऋषि ने उसकी बहुत खोज की, परंतु उनका पुत्र नहीं मिला और वे और उनकी पत्नी दुःख और निराशा के साथ अवन्ती लौट आए। तब से वे पति-पत्नी पुत्र के वियोग का दुःख झेल रहे थे।

ऋषि सांदीपनि ने शिष्यों को पढ़ाने की व्यवस्था अपने आश्रम में ही कर रखी थी। भगवान श्रीकृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम को भी विद्या -अध्ययन के लिए वहाँ भेजा गया। वे दोनों भाई चौसठ दिनों में ही चौसठ कलाओं का अध्ययन कर लिये और गुरु के सामने खड़े होकर गुरु-दक्षिणा माँगने का अनुरोध किये। प्रभु के इस तरह के चमत्कार से ऋषि आश्चर्यचकित हो गये और चिंता करने लगे कि कोई साधारण बालक यह अद्भुत कार्य नहीं कर सकते। निश्चय ही यह कोई दिव्य बालक हैं जो चौसठ दिनों में ही चौसठ कलायें सीख लिए। फिर प्रत्यक्ष में गुरु ने कहा-वत्स मैं तो किसी से कुछ माँगता नहीं, तुम्हें जो देना हो दे दो। प्रभु ने कहा गुरुदेव, आप जो कहेंगे हम वहीं लाकर आपको देगें, अतः आप बताइए। गुरु ने तब अपनी पत्नी की ओर देखा और कहा-भाग्यवान तुम्हीं कुछ माँग लो। गुरु पत्नी ने प्रभु की ओर देखा और उनकी आँखों में आँसू आ गये। प्रभु ने जब इसका कारण जानना चाहा तो गुरु माता ने बताया कि हम सब स्नान करने के लिए प्रभास क्षेत्र गये थे, वहीं पर मेरा पुत्र स्नान करते समय अचानक जल में खो गया और आज तक लौट कर नहीं आया। यह कह कर गुरु पत्नी विह्वल होकर रोने लगी। प्रभु ने कहा-ठीक है माता, मैं आपके पुत्र को लाकर दूंगा। माता ने कहा-वत्स मेरे द्वारा तुम पर कोई दबाव नहीं है, यदि ना ला सको तो दबाव में आकर लाने की बात मत कहो। पर, प्रभु ने कहा-माता मैं जो कुछ कहता हूँ, उसको पूर्ण करता हूँ। अतः मैं निश्चय ही आपके पुत्र को लाकर आपको दूंगा। और प्रभु ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए पुनर्दत्त की मुक्ति करायी।

तीसरी त्रयीः - मित्रों, इस त्रयी का शीर्षक है, 'उर्मिला का ताप'। उर्मिला अयोध्या के राजकुमार लक्ष्मण की पत्नी हैं। जैसा कि आप सभी जानते हैं उर्मिला राजा जनक और रानी सुनयना की पुत्री थीं। वे जन्म से ही कम बोलने वाली, बाहरी दुनिया से अनभिज्ञ अपनी ही धुन में मस्त रहती थीं। वे चार बहनें थीं। सबसे बड़ी सीता थीं। जब सीता का स्वयंवर रचा गया और भगवान राम के द्वारा धनुष का खण्डन हुआ, सीता का विवाह प्रभु श्री राम के साथ सम्पन्न हुआ और उसी समय महाराज जनक ने अपनी अन्य तीनों पुत्रियों का पाणिग्रहण भी अयोध्या के बाकी अन्य तीनों राजकुमारों के साथ कर दिया। उर्मिला लक्ष्मण की पत्नी थीं। महाराज दशरथ पुत्रों के साथ चारों बहुओं को लेकर अयोध्या आये तथा आनन्द से दिन गुजारने लगे। कुछ समयोपरांत एक दिन महाराज दशरथ दर्पण में अपना मुख देख रहे थे। उन्हें अपनी कनपटी पर सफेद बाल दिखे तो वे अपने बुढ़ापे का अनुमान लगाने लगे और राज्य का भार अपने ज्येष्ठ पुत्र को सौंप कर वानप्रस्थी जीवन व्यतीत करने का निर्णय लिया। दूसरे दिन दरबार में महाराज ने यह प्रस्ताव रखा और सर्व सम्मति से श्री राम का राजतिलक करने की तिथि निश्चित कर दी गई। उस समय श्री राम और लक्ष्मण अयोध्या में थे, परन्तु भरत और शत्रुन अपनी ननिहाल में थे। राम राज्याभिषेक का समाचार जब नगर में प्रसारित हुआ, कैकयी की दासी मंथरा यह समाचार सुनकर दौड़ी-दौड़ी रानी के पास गयी और उसे भड़का कर महाराज से श्री राम के बदले भरत को अयोध्या का राज्य और राम को चौदह वर्ष का वनवास माँग लिया। श्री राम जब माता जानकी के साथ वन जाने लगे तो लक्ष्मण भी भाई की सेवा करने के लिए पीछे-पीछे हो लिए और तभी से उर्मिला के जीवन में दुःखों का अम्बार लग गया, यहाँ तक कि लक्ष्मण के वन से वापस आने पर भी उर्मिला खुशी मन से अपने स्वामी का स्वागत नहीं कर सकीं।

कह नहीं सकता कि ये तीनों कविताएँ पाठकों को कितनी पसंद आयेंगी, पर गोस्वामी तुलसीदासजी के शब्दों में 'निज कवित्त केहिं लाग न नीका', की उक्ति अनुसार मेरी आत्मीय हैं।

मित्रों, तीन कथाओं की समाविष्टि की वजह से इस पुस्तक का नामकरण मेरी सोच में आ ही नहीं रहा था। अतः, इसके लिए मैंने अपने अनुज श्री राजकुमार तिवारी जो डीएवी स्कूल, पटना, (बिहार) में अंग्रेजी भाषा के व्याख्याता हैं, से अनुरोध किया। उन्होंने कई पुस्तकों के शीर्षकों की खोजबीन करके 'प्रेमात्रयी' नाम सुझाया, जो मुझे भी उपयुक्त लगा और इस प्रकार इस पुस्तक का नाम प्रेमात्रयी हुआ। उनके इस प्रयास और सहयोग के लिए मैं उनका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"

- त्रिवेणी प्रसाद त्रिपाठी

 

अनुक्रमणिका


1. एक बूंद ओस्...
2. पुनर्दत्त की मुक्ति
3. उर्मिला का ताप.

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  1. दो शब्द

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