लेन देन - शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय Len Den - Hindi book by - Sharat Chandra Chattopadhyay
लोगों की राय

पारिवारिक >> लेन देन

लेन देन

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :231
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1601
आईएसबीएन :81-85830-55-x

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

239 पाठक हैं

एक सामाजिक उपन्यास....

Len Den

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

लेन देन


चण्डीगढ़ की चण्डीजी बहुत प्राचीन देवी हैं।
कहते हैं कि राजा वीरबाहु के किसी पूर्व पुरुष ने किसी युद्ध में विजयी होकर बरुई नदी के तट पर इस मन्दिर की स्थापना की थी और बाद में केवल इसी के आश्रय से धीर-धीरे वह चण्डीगढ़ तैयार हो गया। शायद किसी दिन वास्तव में ही यह गांव देवोत्तर सम्पत्ति में ही गिना जाता था, किन्तु अब तो मन्दिर से सटी हुई केवल कुछ ही बीघे जमीन छोड़कर बाकी सारी मनुष्यों ने छीन ली है। इन दिनों यह गांव बीजगांव की जमींदारी में शामिल है। किस प्रकार और किस दुर्जेय रहस्यपूर्ण उपाय से अनाथ और असक्त की सम्पत्ति अर्थात् असहाय देवता का धन अन्त में जमींदार के उदर में आकर सुस्थिर बन गया, उसकी कहानी साधारण पाठकों के लिए निष्प्रयोजन है। मेरा वक्तव्य केवल यही है कि चण्डीगढ़ का अधिकांश भाग अब चण्डीगढ़ के हाथ से निकल चुका है। हो सकता है कि देवता का इससे कुछ भी नहीं बनता-बिगड़ता किन्तु जो लोग उनके सेवा-स्वत्वाधिकारी हैं उनके मन में क्षोभ आज तक भी दूर नहीं हुआ है; इसीलिए अब भी झगड़े-बखेड़े उठते ही रहते हैं और कभी तो बहुत ही उग्र रूप धारण कर लेते हैं।

बीज गांव के जमींदार वंश के लोग अत्याचारी समझे जाने से सदा से ही बदनाम हैं। किन्तु दो-एक ही साल पहले पुत्रहीन जमींदार की मृत्यु हो जाने से जिस दिन उनके भानजे जीवननन्द चौधरी को बादशाही मिल गई है, उसी दिन से छोटे-बड़े सभी प्रजाजनों का जीवन कष्टमय हो गया है। इस प्रकार की जनश्रुति प्रचलित हो चुकी है कि भूतपूर्व जमींदार कालीमोहन बाबू ने इस मनुष्य की उच्छृंखलता सहन न करने के कारण इसे त्याग करने का निश्चय कर लिया था, किन्तु अकस्मात मृत्यु हो जाने से उनकी उस इच्छा की पूर्ति न हो सकी।

वे ही जीवननन्द चौधरी आजकल इलाका देखने के बहाने चचण्डीगढ़ गांव में आकर उपस्थित हुए हैं।
इस गांव में सदा के ही एक मामूली अदालत ‘कचहरी बाड़ी’ के नाम से मौजूद है, किन्तु जिले के ऊबड़-खाबड़ पहाड़ से सटे हुए इस गांव के स्वास्थ्यकर जलवायु और विशेषकर बालू से भरी बरुई नदी का जल अत्यन्त रुचिकर समझकर इसी जीवनन्द के ही नाना राधामोहन बाबू ने गांव के छोर पर ‘शान्ति निकुंज’ नामक एक बंगला बनावाया था।
वे प्रायः ही बीच-बीच में आकर इसी में ठहरते थे। किन्तु उनके पुत्र कालीमोहन ने किसी दिन भी यहाँ पदार्पण नहीं किया। इस कारण किसी समय जिस गृह में सौन्दर्य था, ऐश्वर्य था, मर्यादा थी—चारों ओर का जो बगीचा दिन-रात सुन्दर फूल-फूलों से भरा रहता था, वही फिर किसी दिन दूसरे के हाथ में पड़ लापरवाही के कारण जीर्ण, मलिन और निकम्मे पौधों से भर उठा। यहां माली नहीं था। केवल बरुई के सूखे तट पर एक विशाल टूटा-फूटा मकान जंगल के मध्य में खड़ा रहकर अपमानित गौरव की भांति दिन-रात शून्य स्थल में उदासी फैला रहा था। कितने दिनों से यहां किसी ने प्रवेश नहीं किया, कितने दिनों से यहाँ की कचहरी का प्रधान कर्मचारी सदर मुकाम की झूठी कैफियतें भेजता आया है, इन सब का हिसाब लगाने वाला कोई नहीं है।

ऐसी ही अवस्था अकस्मात् एक दिन सन्ध्या समय केवल दो आदमियों को साथ लिए जमींदार गांव के कचहरी घर के सामने आकर उपस्थित हो गये। पालकी से उतरे भी नहीं, केवल गुमाश्ता एककौड़ी नन्दी को बुलाकर कह दिया कि मैं कुछ दिनों के लिए शांन्ति निकुंज में ठहरूंगा। और यह कहकर तुरन्त ही उक्त गन्तव्य मार्ग से चले गये। आशंका और उत्कण्ठा से एककौड़ी का मुंह विवर्ण हो गया। हो सकता है कि वहां बंगले तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है, हो सका है कि सभी खिड़कियों और किवाड़ों को चोर चुरा ले गये हैं, हो सकता है कि कमरे-कमरे में शोर-भालुओं के दल बस गये हैं, वहां क्या है और क्या नहीं है, इसकी कुछ भी जानकारी एककौड़ी को नहीं थी।

इस सन्ध्याकाल में कहाँ आदमी मिलेंगे, वहां किस तरह दीया-बत्ती का प्रबन्ध हो सकेगा, कहाँ खाने-पीने की तैयारी होगी—अचानक वह क्या करे, किसकी शरण में जाए, इस चिन्ता में पड़कर उसका समूचा शरीर भारी हो उठा और माथा ठनकने लगा। नौकरी तो चली ही गई—चली जाय; किन्तु इस दुर्दान्त नये मालिक के सम्बन्ध में जो बातें इस बीच उसने लोगों के मुंह से मालूम कर ली हैं, उनमें से किसी ने एक से भी उसे किसी तरह का चैन नहीं मिला। कुछ भी खबर नहीं, सूचना नहीं हठात् शुभागमन हो गया इसका लक्ष्य तो उसके प्रति है। तब अपने बाल-बच्चों को लेकर वह कहां भागकर चला जाय और आत्म-रक्षा कर सके कोई भी उपाय उसकी दृष्टि में नहीं दिखाई पड़ा।

मालिक को पहले कभी उसने नहीं देखा था। इसकी जरूरत भी नहीं पड़ी थी। आज भी साहस करके वह उनके प्रति दृष्टिपात न कर सका, किन्तु संकरे मार्ग के मोड़ पर कहारों के अदृश्य हो जाने के साथ ही पालकी के आन्धकाराछन्न भीतरी भाग से जिस मुख की छवि उसके मानस-नेत्र में अनुभव हुई, वह अत्यन्त भयंकर थी। उसकी अनेक गलतियों और अनेक चोरियों के अभियोग का इस बार खाली बैठक में कड़ा विचार होने लगेगा और उसके भी अंग का उत्तरदायित्व किसी दूसरे के कन्धे पर रखना सम्भव हो सकेगा या नहीं, इसी विषय पर जब वह सोचने की चेष्टा कर रहा था तभी कचहरी का बड़ा प्यादा दौड़ता हुआ आकर उपस्थित हो गया। वह बेचारा कहीं लगान वसूली के तकाजे में गया था; रास्ते में ही इस दुर्घटना की खबर मिल गई। हांफते-हांफते पूछा—‘नन्दीजी, सरकार आ गये हैं न !’

एककौड़ी ने आंखे ऊपर उठाकर केवल कहा—‘हूं !’
विश्वम्भर आश्चर्य में पड़कर क्षणभर तक एककौड़ी के पीले चेहरे की तरफ ताकता रहा, इसके बाद बोला—‘हूं का क्या अर्थ है नन्दीजी ? स्वयं सरकार तो आ गये हैं।’
एककौड़ी ने मन ही मन अपने को एक तरह पक्का कर लिया था। टूटे स्वर में उत्तर दिया—‘आ गये तो मैं क्या करूं ! कोई खबर नहीं, सूचना भी नहीं सरकार आ गये गये हैं ! सरकार हैं इसलिए सिर तो काटकर न ले जा सकेंगे !

इस आकस्मिक उत्तेजना का कोई अर्थ सहसा न समझ सकने के कारण विश्वम्भर क्षणकाल तक चुप ही रहा, किन्तु उनका दिमाग जितना साफ था, उतना ही ठण्डा  भी था और प्यादा होने पर भी गुमाश्ते के साथ उसका सम्बन्ध अत्यन्त घनिष्ठ था। एककौड़ी को भीतर ले जाकर शराब की बोतल, मांस और उसके साथ ही एक और चीज का गुप्त इशारा करके उसने बहुत ही थोड़े समय में सान्त्वना दे दी जबकि पुरुष के भाग्य की सीमा देवता भी निर्धारित नहीं कर सकते तब इतनी बड़ी आशा की वाणी सुनाने में भी हिचक नहीं प्रकट की कि सरकार की नजरों में पड़ जाने से नन्दीजी के भी भाग्य में किसी सदर महकमे का नायाबी पद न मिलेगा, ऐसी बात तो कोई भी जोर देकर न कह सकता।

थोड़े समय के भीतर ही जब एककौड़ी कुछ आदमी, दो-चार बत्तियां तथा मामूली कुछ फल-फूल जुटाकर विश्वम्भर को अपने साथ लिए शान्ति निकुंज के टूटे फाटक के सामने जा पहुंचा, तब सन्ध्या बीत चुकी थी। उसने वहां देखा कि इस बीच ही कुछ-कुछ डाल-पात तोड़कर, फेंककर रास्ता चलने योग्य बना दिया गया  है, तो भी इस जंगल से भरे अन्धेरे मार्ग से अन्दर जाने का साहस बड़ी देर तक किसी को भी नहीं हुआ और प्रवेश करके भी कदम बढ़ाते समय हर बार उसका शरीर झनझनाने लगा। दस बीघा जमीन छोड़कर यह जंगल विस्तृत है, इसलिए रास्ता भी छोटा नहीं है, उसको पार करने में कष्ट भी कम नहीं है। कहीं भी एक दीया नहीं। केवल आंगन के एक छोर पर जहाँ कहार पालकी उतार एक साथ बैठकर तम्बाकू पी रहे हैं, उसी के पास एक जलने वाली सूखी लकड़ी के आस-पास के कुछ स्थान में जरा उजाला हो रहा है। खबर मिले पर नौकर आया और एककौड़ी को एक बार कमरे में ले गया। समूचा कमरा शराब की गन्ध से भरा हुआ है, एक कोने में मोमबत्ती चिमटिमाती हुई जल रही है और दूसरे छोर पर एक टूटी चौकी पर बिस्तर बिछाकर बीजगांव के जमींदार जीवानन्द चौधरी बैठे हुए हैं। यह मनुष्य बहुत ही दुबला-पतला है। शरीर का रंग साफ है या नहीं इसका अन्दाजा लगाना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि उपद्रवों और अत्याचारों के कारण मुंह सूखकर मानो एकदम काठ की भांति सख्त हो उठा है। सामने शराब से भरा हुआ एक कांच का गिलास है और उसी के पास विचित्र आकार की एक शराब की बोतल है, जिसमें से शराब प्रायः खत्म हो चुकी है। तकिए के बीच से एक नेपाली भुजाली का कुछ हिस्सा दिखाई पर रहा है और उसी के पास एक खुले बक्स में एक जोड़ी पिस्तौल रखी हुई है।

एककौड़ी तक झुककर प्रणाम करके हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसके मालिक ने पूछा—‘तुम्हारा नाम एककौड़ी नन्दी है ? तुम्ही यहां के गुमाश्ता हो ?’
भय के मारे एककौड़ी का हत्-पिण्ड हिल रहा था, अस्पष्ट कम्पित कण्ठ से सिर हिलाकर उसने कहा—जी हुजूर !’
वह सोच चुका था कि अब तो इस मकान की चर्चा छिड़ेगी, किन्तु जीवानन्द ने उसका कुछ भी उल्लेख नहीं किया, केवल प्रश्न किया—‘तुम्हारी कचहरी के हल्के की तहसील कितनी है।’
एककौड़ी ने कहा—‘सरकार, प्रायः पांच हजार की तहसील है।’
‘पांच हजार ? बहुत अच्छा, मैं सात-आठ दिन यहां ठहरूंगा, इसके अन्दर मुझे दस हजार रुपये चाहिए।’
एककौड़ी ने कहा—जैसी आज्ञा।’

उसके मालिक ने कहा—‘कल सबेरे तुम्हारी कचहरी में जाकर बैठूंगा दिन में दस-ग्यारह बजे तक पहुंचूंगा—इसके पहले मेरी नींद नहीं टूटती। असामियों को खबर भेज देना।’
एककौड़ी ने आनन्द के साथ सिर हिलाकर कहा—‘‘जैसी आज्ञा।’
यह बताना व्यर्थ है कि लगान ही बकाया रकम वसूली का भारी बोझ उठाने में एककौड़ी ने अपने को विपत्तिग्रस्त या जिम्मेदार नहीं समझा। उसने प्रसन्नचित्त से कहा—‘मैं आज रात को ही चारों तरफ आदमी भेज दूंगा, जिससे कोई यह न कह सके कि मुझे पहले से खबर ही नहीं दी गई।’



अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book