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कोरोना एक अदृश्य विश्वयुद्ध

अशोक कुमार बाजपेयी

प्रकाशक : आराधना ब्रदर्स प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 16018
आईएसबीएन :9789385012000

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कोरोनाकाल में लॉकडाउन समय की कविताएँ

आत्मकथ्य

कोई आगंतुक है या कोरोनाः

कालबेल किसने बजाई! दिन बीतते जा रहे थे। मन बहुत अन्यमनस्क रह रहा था। कोरोना सता रहा था। चारों ओर डर ही डर। कुछ समझ नहीं आ रहा था। तमाम टी.वी. चैनल्स एवं समाचार पत्रों के माध्यम से नित नयी ऐसी-ऐसी सूचनायें, जानकारियां मिल रही थीं जिन्हें न इसके पहले सुना था न ही इन पर कभी कोई चर्चा, विमर्श बौद्धिकों या चिकित्सकों द्वारा किया गया था।

हाँ, इनको सुन-सुन कर मन में बैठा डर और बढ़ता जा रहा था। ऊपर से यह कि जिस गति से कोरोना बढ रहा था, इसके मरीज बढ़ रहे थे उस हिसाब से न तो अस्पतालों में बेड बढ रहे थे, न वेंटिलेटर जैसे अतिआवश्यक उपकरण। अतः उचित इलाज भी नहीं हो पा रहा था चिंता की बात ये भी थी कि इस बीमारी की कोई दवा ही नहीं। बस सुकून देने वाली बात ये रही कि डाक्टर, स्वास्थ्यकर्मी, पुलिस, शासन, प्रशासन अपने-अपने स्तर पर जी जान से जुटे थे। जो भी सीमित साधन उपलब्ध थे उनसे ही इस विभीषिका से जूझ रहे थे, आम जनता की जीवनरक्षा के लिए खुद की परवाह किये बिना लगे थे। साक्षात् भगवान रूप दिख रहे थे सब।

लॉकडाउन लग चुका था। प्रधानमंत्री जी के आवाहन पर ताली, थाली बजाने जैसे साधारण से दिखते कार्य से असाधारण ढंग से आमजन में जाग्रति पैदा की जा चुकी थी। कुछ ने मजाक उड़ाया पर अधिकाँश ने इसे गंभीरता से लिया। अब नयी स्थिति में घर में कोई काम नहीं, बाहर बिना बहुत जरूरी हुए जाना नहीं। स्थिति ये हो गयी कि घर का मुख्य द्वार खोलने में ऐसा लगता कि आगंतुक के साथ कहीं दरवाजे पर कोरोना ही न खड़ा हो। बार-बार साबुन से हाथ धोना, दूर-दूर बैठना खुद भी और दूसरों को भी ध्यान दिलाते रहना, पूछना कि मास्क क्यों नहीं लगाया।

इसी सब के बीच एक दिन पता चला कि निकट पडोसी को कोरोना हो गया है। अक्सर ही उनसे मिलना होता है। अब उनके उधर की दिशा 'अछूत' सी लगने लगी। बिना देरी पुलिस प्रशासन सहित मेडिकल टीम आयी और पूरी सतर्कता के साथ उनको एम्बुलेंस में ले गयी। पुलिस का पहरा बैठा दिया गया। मोहल्ले की बैरीकेडिंग कर दी गयी। गजब की पेशबंदी और मुस्तैदी से कोरोना का डर आस-पास के लोगों में और कई घरों में हो गया। सभी अपने-अपने घरों में सहमे-सहमे से रहने लगे।

वे कोरोना के लिए बनाए गए एक अस्पताल में भर्ती कर दिए गए थे। वहां की व्यवस्थाएं केवल सुनने में आती थीं। कुछ अफवाहें भी उड़तीं जैसे कि लोग खुद ही देख कर आये हों। जब कि सच तो ये था कि घर के लोग भी नहीं मिल पा रहे थे। आँखों के आगे केवल अदृश्य कोरोना साक्षात् खड़ा दिखाई देता था। मन, मस्तिक पर डर भरा कब्जा जमाता चला जा रहा था पर समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे में क्या करें, क्या न करें। हर किसी की तरह मेरा भी संसार एक कमरे में ही सिमटकर रह गया था।

पहले तो घर में कुछ दिन नए-नए व्यंजन बन रहे थे, पर वो भी कब तक! आखिर डर को कितने दिन झुठलाया जा सकता था।

कवि मन को खटका हुआ। आस-पास ही से कुछ आवाजें आने लगीं, ”उठाओ कलम, कागज सामने है, समय की सुनो, इसे ही अपनी कविता के साथ जिओ, इसका साक्षात्कार है करो। डरने से क्या होगा! कोरोना से कविता में संवाद करो। याद है न बाबा नागार्जुन ने 'अकाल और उसके बाद' के समय को अपनी कविता में ही तो जिया था। एक दिन 'चमक उठी थीं घर भर की आँखें'।

आज ये विभीषिका दूसरे ढंग से आयी है। यह नए तरीके से परेशान कर रही है। तुम इसे अपनी कविता में  निहत्था कर दो, पस्तहाल कर दो। लोगों का डर दूर भगाओ।

- अशोक

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