दीप देहरी द्वार - लक्ष्मीकान्त वर्मा Deep Dehari Dwar - Hindi book by - Laxmikant Verma
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दीप देहरी द्वार

लक्ष्मीकान्त वर्मा

प्रकाशक : हिन्दुस्तानी एकेडमी प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 16029
आईएसबीएन :000000000

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वर्मा जी की 100 कवितायें

अपनी बात ...

श्री लक्ष्मीकांत वर्मा जी का प्रस्तुत काव्य संकलन 'दीप देहरी द्वार' उनकी एक लम्बी, बीहड़, अतुकान्त कविता-यात्रा का लगभग अन्तिम पड़ाव है। लक्ष्मीकांत जी एक ऐसे कवि के रूप में जाने और माने जाते हैं जिन्होंने अपनी काव्य-संवेदना का सम्पूर्ण तत्व अपने जीवन-संघर्षों से अर्जित किया है। उनका जीवन बहुत अव्यवस्थित, बहुत असुरक्षित और बहुत संघर्षपूर्ण रहा है। किन्तु उनका कवि-मन अत्यन्त कोमल और संवेदनशील है। हर प्रकार की अनिश्चितताओं के बीच भी वह सदा सर्जना के नये द्वार खटखटाता रहा है। उनकी सृजनोन्मुखता उस बीज के अंकुरण जैसी है, जिसे हजार प्रकार के कंकड़ पत्थर के बीच दबा दिया गया है फिर भी उन्हीं के बीच के अन्तराल में से अंकुर फूटता, पल्लवित और पुष्पित होता रहा।

लक्ष्मीकांत जी का सर्जनात्मक व्यक्तित्व एक बहुआयामी व्यक्तित्व रहा है। वे उन विरल लेखकों में रहे जिनकी लेखनी ने अपने लिये कभी कोई विश्राम नहीं चाहा, उन्होंने उच्च स्तरीय समीक्षात्मक लेखन किया और 'नयी कविता के प्रतिमान' जैसे स्तरीय समीक्षा ग्रन्थ का प्रणयन किया। दूसरी ओर उनका नाम एक उपन्यासकार के रूप में उतना ही चर्चित रहा। उनके उपन्यास 'खाली कुर्सी की आत्मा', 'टेराकोटा' और अब भी लेखन की प्रक्रिया में चल रहा 'मुंशी रायजादा' उनके औपन्यासिक रचनाओं में प्रमुख है। लक्ष्मीकांत जी ने नाटक भी लिखे हैं और रंगमंच पर नाटकों का निर्देशन भी किया है। इसके अतिरिक्त वे लगातार पत्र-पत्रिकाओं में सामायिक प्रश्नों पर चिन्तनपूर्ण लेख लिखते रहे हैं। पारिवारिक जीवन जितना भी कठिनाईयों से भरा हो सकता है, लक्ष्मीकांत जी का रहा है।

इस सबके बीच और इनके साथ लक्ष्मीकांत जी ने निरन्तर कवितायें लिखी। कविता लिखते समय वे एक अद्भुत सौम्यता का धरातल अर्जित कर लेते हैं। जब उनकी कविताओं में बहुत आक्रोश और एक उत्पीड़ित मन की झलक मिलती थी तब भी उनमें कडुवाहट और संकुचित मन को देख पाना कठिन था। 'अतुकान्त' 'तीसरा पक्ष' 'धुंए की लकीरें' जैसे संकलनों में जो कविताएं उनके अभाव और आक्रोश को व्यंजित करती हैं वहाँ भी उनका अन्तर्मन निर्मल और शान्त है। धीरे-धीरे लक्ष्मीकांत जी का कवि-मानस आध्यात्मिकता की ओर मुड़ता है। फिर वे पौराणिक आख्यानों से जड़ते नजर आते हैं। 'कंचन मृग' उसी जमीन की रचना है। किन्तु प्रस्तुत संकलन की कविताएं उनके कवि-मन की चरम परिणति हैं। किसी से कोई गिला, शिकवा नही। भीतर और बाहर एक दिव्य प्रकाश का अहसास। इसीलिए उन्होंने इस संकलन का नाम 'दीप देहरी द्वार' रखा है। जैसा गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है जब दीया चौखट पर रखा जाता है तो उसकी रोशनी कमरे के भीतर भी उजास पैदा करती है और बाहर भी। लक्ष्मीकांत जी की छोटी-छोटी कविताएं जिनमें शायद ही कोई एक पृष्ठ से बड़ी हो तो उनके अन्तश्चेतना में कौंधती एक नयी सहजानुभूति की अलग-अलग झंकृतियाँ हैं। ईर्ष्या, द्वेष, असन्तोष और आक्रोश के धरातलों से उनका कवि पार निकल आया है और वहाँ विचरण कर रहा है। जहाँ उनकी कला और उनका अध्यात्म एक रस हो गये हैं।

हमें इस बात की प्रसन्नता है कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी को उनकी इन ऋजु और अनाविल कविताओं को प्रकाशित करने का अवसर मिला है। इसके लिए एकेडेमी उनके प्रति आभारी है।

- रामकमल राय

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    अनुक्रम

  1. अपनी बात
  2. पूर्वा
  3. अनुक्रमणिका

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