हेमचन्द्र विक्रमादित्य - शत्रुघ्न प्रसाद Hemchandra Vikramaditya - Hindi book by - Shatrughn Prasad
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हेमचन्द्र विक्रमादित्य

शत्रुघ्न प्रसाद

प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1989
पृष्ठ :366
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1604
आईएसबीएन :00000

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विक्रमादित्य के जीवन पर आधारित उपन्यास।

Hemchandra Vikramaditya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘सिद्धियों क खण्डहर’ और ‘क्षिप्रा साक्षी है’ के बाद हेमचन्द्र विक्रमादित्य’ के साथ ऐतिहासिक उपन्यासों की डॉ. शत्रुघ्न की त्रयी यहाँ पूरी होती है।
गत्यात्मक ऐतिहासिक चेतना को अतीत के फलक पर प्रक्षेपित करने का डा. शत्रुघ्न का अपना अलग औपन्यासिक अन्दाज है। सर्वहारा हेमू वक्काल का महिमामण्डित हेमचन्द्र विक्रमादित्य में रूपांतर जितना अद्भुत-अपूर्व था, अतीत के रूखे ठट्ठर में प्राण-प्रतिष्ठा कर उसका यह अभिनव चरित्राँकन उतना ही मार्मिक-मनोरम है।

हेमचन्द्र विक्रमादित्य इतिहास-सत्य का इतिहास रस में रूपांतरण है। वर्तमान के इतिहास-बोध के कारण सोलहवीं सदी के यथार्थ ने उपन्यास का रूप धारणकर लिया है। उस सदी में स्फुरित मधुर भक्ति-भावना के साथ सूफी इश्क हकीकी की समरसता आ रही थी। धर्म परिवर्तन के साथ नये सामाजिक-सांस्कृतिक संयोजन का द्वन्द्व उभर रहा था। उदार अफगान शासन के समय दूसरे मुगल आक्रमण की हलचल शुरु हो गयी थी। हेमू के विकासोन्मुख व्यक्तित्व का अन्तद्वर्न्द्व कुछ करने को आकुल-व्याकुल था।

पानीपत के स्वातंत्र्य-युद्ध में संगठन का नूतन समीकरण दीख पड़ा। अफगान मुसलमान और हिन्दू एक साथ हेमू के नेतृत्व में खड़े हो गये थे। परन्तु विजय-पथ पर अग्रसर हेमचन्द्र विक्रमादित्य की शहादत अन्तहीन पीड़ा दे गयी। इतिहास से उपेक्षित वह पीड़ा शहर-दर-शहर भटक रही है।
निश्चय ही पाठकों में स्वातंत्र्य-संघर्ष की त्रासदी का अहसास कराने में यह उपन्यास समर्थ होगा।

हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी

अपनी बात


ऐतिहासिक उपन्यास लिखना तलवार की धार पर चलना है। उपन्यास इतिहास नहीं बन जाय, यह सावधानी उपन्यासकार को शब्द-दर-शब्द बरतनी होती है। अतीत रस में खो जाना तो प्रमाद माना जाएगा और सामंतवाद की चकाचौंध में अटकना कुंठा का परिचायक। यह अवश्य है कि इतिहास सतत गतिशील मानव जीवन के यथार्थ के एक बड़े अंश को प्रस्तुत करता है। इससे आज का जीवन सीधा जुड़ा हुआ है। आज का यथार्थ आने वाले कल की भूमिका होता है। इस भूमिका पर टिककर रचनाकार ऐतिहासिक यथार्थ के सहारे सृजन करता है। ऐतिहासिक यथार्थ की औपन्यासिक रचना के लिए प्रगतिशील जीवन-दर्शन की अपेक्षा है क्योंकि हम उपन्यास में जीवन्त मानव और उसकी समस्याओं को समझना चाहते हैं। परन्तु अपने राष्ट्रजीवन को समझने के लिए कोई आग्रह प्रबल न हो, यह भी एक शर्त है।

‘सिद्धियों के खण्डहर’ और ‘शिप्रा साक्षी है’ में मैंने कोशिश की है कि ऐतिहासिक यथार्थ प्रगतिशील, रष्ट्रीय दृष्टि से प्रस्तुत हो। समीक्षकों ने तटस्थ होकर इन्हें समुचित माना है। इसीलिए प्रगतिशील सृजनात्मक दृष्टि  की तीसरी रचना ‘हेमचन्द्र विक्रमादित्य’ को पाठकों के सामने रखने का साहस किया है।

‘हेमचन्द्र विक्रमादित्य’ हिन्दी के ऐतिहासिक उपन्यास साहित्य में एक नया कदम है, नया तेवर है जिसकी एक झलक ‘सिद्धियों के खण्डहर’ से मिलने लगी थी। युगीन यथार्थ की सम्पूर्णता, सन्तुलित दृष्टि और वर्तमान से जुड़ने का स्वाभाविक प्रयास ऐतिहासिक औपन्यासिक रचना के लिए आवश्यक है। मेरे इस तीसरे उपन्यास में ऐतिहासिक यथार्थ अपनी मार्मिकता के कारण बेधक सत्य के रूप में आकार पर गया है।

‘हेमचन्द्र विक्रमादित्य’ में 16 वीं सदी का पूर्वार्द्ध अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक सन्दर्भ के साथ चिह्नित हुआ है। सामाजिक जीवन में विषमता के स्थानपर समता की आवाज उठने लगी थी। सांस्कृतिक नवोत्थान भक्ति आन्दोलन के रूप में उभर रहा था। कबीर पंथी, सूफी शायर और कृष्णभक्त कवि सामाजिक परिवर्तन की चेतना के साथ नयी उदात्त मनोरचना कर रहे थे, नयी आस्था जगा रहे थे। राजनीति के क्षेत्र में शेरशाह और उनके वंशजों के शासन काल में प्रजा का त्रास कुछ कम हुआ था।

परन्तु राजनीतिक उथल-पुथल कम नहीं थी। अफगान कमजोर पड़ रहे थे। मुगलों के पुनराक्रमण की आशंका बढ़ रही थी। इसी परिवेश में सर्वहारा हेमचन्द्र (हेमू) अपने दर्द और द्वन्द्व के साथ भटकता हुआ आगरा पहुंचकर कुछ सोचने लगा था। अवसर की अनुकूलता से एक शरणार्थी के व्यक्तित्व का विकास होने लगा था। एक नयी राजनीति की चर्चा इसी व्यक्तित्व से उभरी थी। उसने हिन्दू, हिन्दी, मुसलमान और अफगानों को जोड़ने की बात की और कोशिश भी की जिससे बहिरागत मुगलों के आक्रमण की आशंका का निवारण हो सके। परिस्थितियों के कारण उसे स्वयं सबको लेकर मुगलों से लड़ना पड़ा, स्वाधीनता एवं स्वतन्त्रता के लिए रक्त देना पड़ा। उसकी असफलता पर ही मुगल राज्य कायम हो सका।

इतिहास का यह सत्य अभी तक उपेक्षित रहा है। अपने सम्पूर्ण द्वन्द्वों और सीमाओं के साथ यह सत्य इस उपन्यास में साकार हुआ है। इस सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता, सहमति-असहमति पर चर्चा हो सकती है। सुधी समीक्षकों के प्रत्येक शब्द को सुनना-समझना चाहूंगा। लिखना है तो सुनना-सझना भी है।

शत्रुघ्न प्रसाद

एक



रेवाड़ी के पास का गांव। पूरब में सूरज का गोला झलक उठा। पश्चिम में चाँद पीला पड़ गया। अँधेरा उजाले में घुलने लगा। सारा गाँव जाग उठा। उत्तर में नाथपंथी मठ खड़ा था। उधर से श्रृंगी की ध्वनि आयी। गांव के युवक उधर ही चल पड़े। इन युवकों में एक हेमचन्द्र भी था, जिसे सभी हेमू कहते थे।

नाथपंथी योगी शिवनाथ ने श्रृंगी बजाना बन्द कर दिया। हाथ में त्रिशूल लेकर युवकों का अभिनन्दन किया गया। युवकों ने ‘जय गुरु गोरखनाथ’ का स्वर उच्चारा। योगी ने अशीष दी। सबके शीश झुके।
योगी बोल उठे—‘इस संसार के जीवन को जीना हो या साधक बनना हो तो शरीर और मन को बलवान् बनाओ। हाथों में शूल और त्रिशूल हों। नहीं तो, सब उजड़ जाएगा। केवल रोना रह जाएगा। जीवन रोना नहीं, हंसना है जैसे आकाश में सूरज हंसता रहता है।’

सबके हाथों के दण्ड और शूल ऊपर उठ गए। इन सबके ऊपर योगी का त्रिशूल था। त्रिशूल और शूल की नोकों पर लाल किरणें झिलमिलाने लगीं। योगी ने एक बार सबको देखा। मन सन्तुष्ट हुआ। क्षण भर के बाद गम्भीर स्वर सुनाई पड़ा—‘पहले आसन और प्राणायाम का अभ्यास हो।’

मठ के मैदान में पच्चीस युवक आसन का अभ्यास करने लगे। हेमू अपने प्रिय साथियों—धर्मपाल और खेमराज—के साथ अपने अभ्यास में आगे बढ़ रहा था। योगी प्रसन्न थे। आसन के बाद प्राणायाम करते समय हेमू का मन टिक नहीं सका। बार-बार श्मशान में चिता की लपट को देखने लगता। लपटों के बीच पारो का मुख झलक उठता। वह अशान्त हो उठा। उसने किसी प्रकार प्राणायाम की क्रिया को पूरा कर लेना चाहा। मन कहता कि लपटों में पारो को देख लो। राख होती जा रही पारो की अन्तिम झलक ले ही लो।

योगी निकट आ गए थे। उन्होंने हेमू की चंचलता का अनुमान कर लिया। स्नेह से थोड़ा डांटा, थोड़ा समझाया। फिर शूल के अभ्यास के लिए आदेश दे दिया।

श्रृंगी का स्वर गूंजा। सभी उठकर खड़े हो गए। सबके हाथों में शूल चमकने लगे। योगी के आदेश के अनुसार शूल का अभ्यास होने लगा। हेमू का मन फिर भटकने लगा उसे लगा कि खवास खां का सिपहसालार पारो की पीठ में तलवार की नोक चुभा रहा है। वह आवेश में आ गया। शूल लेकर उछलना चाहा। योगी दिखाई पड़ गए। वह सम्भल गया। मन का भटकना रोक दिया।

गांव के कुछ अधेड़ और बूढ़े टहलते-टहलते मठ के पास आ गए। गांव के युवकों के शस्त्राभ्यास को देखने की उत्कंठा से खड़े हो गए। कुछ को अच्छा लगा। कुछ को अद्भुत लगा। एकाध बुदबुदा उठे कि यह नाथपंथी योगी विचित्र हैं। सबको योग और शास्त्र की शिक्षा दे रहे हैं । सभी तो अधिकारी नहीं हैं। शास्त्र की उपेक्षा कर रहे हैं। वर्ण और जाति का ध्यान नहीं रखते।

ऐसे लोग उजड़े हुए गांव को देखकर शास्त्र की बात बोल नहीं सके। खुलकर विरोध नहीं कर सके। बुदबुदा कर रह गए। युवकों का अभ्यास चलता रहा।

आध घंटा के बाद शंख बजने लगा। आज का अभ्यास पूरा हुआ। सभी योगी को प्रणाम कर लौटने लगे। हेमू धर्मपाल और खेमराज के साथ लौट रहा था।—उसने कहा जब-तब मन भटक जाता है। क्या करूँ ?’
धर्मपाल ने समझाया—‘धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा, हेमू! योगी जी के त्रिशूल की नोक पर मन को टिकाने का यत्न करो।’
खेमराज ने बताया—‘मन तो चंचल होता ही है। इसमें घबराना क्या !...धीरे-धीरे ही वश में आएगा।’
हेमू ने सिर हिलाया।
खेमराज ने स्मरण दिलाया कि आज उसे रेवाड़ी जाना है। हेमू ने उत्तर दिया—‘वह धर्मपाल के साथ रेवाड़ी जाएगा। वहां से ‘पृथ्वीरज रासो’ के दो खंड लायेगा। उसे याद है।’

देवली गांव की धरती पर रात उतरने लगी। संध्या में हेमू धर्मपाल के साथ रेवाड़ी से लौट आया था। ‘रासो’ के दो खंड मिल गए थे। अंधकार में गांव का स्वरूप छिपने लगा। उधर आकाश में तारों के चेहरे चमकने लगे। गांव में द्वार-द्वार दीप जलने लगे किसी-किसी घर की खिड़की से प्रकाश का तार खिंचा चला आता था। जब-तब कुत्ते भौंकने लगते। खेमराज हेमू के घर जा पहुँचा। धर्मपाल वहीं था। हेमू दीपक के प्रकाश में रासो के छंद पढ़ने लगा। दोनों साथियों का आंखों में एक चमक थी। हेमू बड़े उत्साह से ओजस्वी स्वर में पाठ कर रहा था-


हिन्दुवान-थान उत्तम सुदेश। तहं उदिग द्रुग्ग दिल्ली सुदेश।।
संभरि-नरेस चहुआन थान। पृथिराज तहां राजंत भान।।
संभरि नरेस सोमेस पूत। देवत्त रूप अवतार धूत।।


‘लड़ाई की कथा सुनाओ हेमू !...पृथिराज और सुल्तान की लड़ाई।’ खेमराज ने अनुरोध किया।
‘जैसे कल मैंने गोरा-बादल की वीरता का गीत सुनाया था।’ धर्मपाल ने संकेत कर दिया।
‘जब हम भोर और सांझ में शूल का अभ्यास कर रहे हैं तो युद्ध की कथा सुनना भी सही है।’ हेमू ने समर्थन किया।
‘वैसे भी हम हर बरस इस धरती पर लड़ाई ही देख रहे हैं। खेमराज ने कहा।

‘पृथ्वीराज के बाद से तो लड़ाई चल ही रही है। हम चाहकर भी लड़ाई के दमामे-नगाड़े और गरजन-तरजन से दूर रह नहीं पाते। खेत की फसल सिहरती है। बूढ़े-बच्चे सहमे-सहमे रहते हैं। स्त्रियां घर में दुबकी रहती हैं।’ धर्मपाल के शब्दों में पीड़ा थी।


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