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अंधकार

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 16148
आईएसबीएन :000000000

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गुरुदत्त का सामाजिक उपन्यास

: 5 :

 

जब प्रकाशचन्द्र ने कमला को सूरदास के तिलक लगाते देखा तो कुछ अटपटा अनुभव किया। वह इससे चिन्तित भी हुआ, परन्तु कमला तो इतना कह चल दी कि सुन्दरदास को तिलक लगाने का ढंग नहीं आता, इस कारण वह स्मबं लगाने चली आयी है। सुन्दरदास के स्पष्टीकरण से असन्तुष्ट हो प्रकाशचन्द्र ने राम से बात करनी उचित समझी। उसने सुन्दरदास को कहा, "जाओ तुम भी चाय-पानी ले लो। तदुपरान्त राम भैया को कीर्तने के लिये ले जाना होगा।"

सुंदरदास चला गया तो प्रकाशचन्द्र ने चाय का बना प्याला सूरदास के हाथ में देते हुए कहा, "राम! कमला को यहीं, मत आने दिया करें।"

"भैया! मैं किसी को भी रोकने में असमर्थ हूँ। मुझे तो पता भी नहीं चलता कि कौन कब यहाँ आता है। तुम कमला को ही कह दो कि अब वह बड़ी हो गई है और उसे यहां नहीं आना चाहिये।

"कहूंगा, परन्तु तुमको भी चाहिये कि जब वह आये तो उसे कह

दिया करो कि अपनी मां अथवा अध्यापिका के साथ ही आया करे।" 

"कह दूँगा।"

इसके उपरान्त प्रकाशचन्द्र ने कहा, "देखो राम! पिताजी के गुण का लाभ तो मैं मुंशी कर्तानारायण के द्वारा उठाने का प्रबन्ध कर रहा हूं। मेरा अभिप्राय है कि पिताजी के धन का उपयोग मेरे पक्ष में मुँशी कर्तानारायरण करेगा और उनके दया, धर्म कें गुण का प्रयोग तुम करोगे।"

''भैया! बता दो कैसे करना है?"

''मैं अपने क्षेत्र में भ्रमण करूंगा। तुम्हें मेरे साथ चलना होगा और राम नाम के गुणों का गान तुम करोगे। देखो, हिन्दू नाम नहीं लेना; परंतु धर्म और कर्म की महिमा और उसके प्रचार तथा विस्तार के लिये ही हमारे परिवार का जीवन है। इसी का तुम गान करना। बस पिताजी के इस सद्गुण का भी मुझे लाभ होगा।"

सूरदास ने उसी दिन से ही अपना कार्य आरम्भ कर दिया। कीर्तन हुआ, राम कथा हुई और फिर सूरदास ने कह दिया, "मुझे यह घोषणा करते हुए हर्ष हो रहा है कि श्री प्रकाशचन्द्र जी अग्रवाल इस क्षेत्र से भारत संसद की लोक सभा के लिये खड़े हो रहे हैं। सेठजी जैसे धर्म मूर्ति के सुपुत्र संसद में जायेंगे तो वास्तव मैं गांधीजी के रामराज्य को साकार करने में अपना पूर्ण यत्न करेंगे।''

इस कीर्तन में एक सहस्त्र से ऊपर लोग एकत्रित थे और सब सूरदास के प्रवचनों पर मुग्ध थे। अत: सूरदास की इस घोषणा पर सभा में सब ओर हर्ष ध्वनि हुई और लाला प्रकाशचन्द्र की "जय हो" का जयघोष करा दिया गया। इस जयघोष को ओरम्म करने वाला मुंशी कर्तानारायण ही था। यह सब प्रकाशचन्द्र द्वारा कीर्तन में सम्मिलित होने से पहले ही नियोजित कर लिया गया था।

कथा से लौटे तो परिवार के सब लोग प्रथम घोषणा के स्वागत किये जाने पर हर्ष से भरे थे।

आते हुए सूरदास ने कहा, "पिता जी! मैंने कार्य आरम्भ कर दिया है।" वह सेठ जी का हाथ पकड़ हुए आ रहा था।

"हां। और बहुत अच्छा आरम्भ हुआ है।"

''आप भगवान् से प्रार्थना करिये कि इसका अन्त भी अच्छा हो।"

"प्रकाश ने बताया है कि वह इस कार्य में बीस लाख तक व्यय करने का वचन दे आया है। मुँशी कहता है कि यह अनुमान बहुत अधिक है और पूर्ण क्षेत्र में दस लाख रुपये से अधिक व्यय नहीं होगा।"

"तो आपने क्या विचार किया है।" सूरदास ने सेठजी से पूछ लिया।

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    अनुक्रम

  1. प्रथम परिच्छेद
  2. : 2 :
  3. : 3 :
  4. : 4 :
  5. : 5 :
  6. : 6 :
  7. : 7 :
  8. : 8 :
  9. : 9 :
  10. : 10 :
  11. : 11 :
  12. द्वितीय परिच्छेद
  13. : 2 :
  14. : 3 :
  15. : 4 :
  16. : 5 :
  17. : 6 :
  18. : 7 :
  19. : 8 :
  20. : 9 :
  21. : 10 :
  22. तृतीय परिच्छेद
  23. : 2 :
  24. : 3 :
  25. : 4 :
  26. : 5 :
  27. : 6 :
  28. : 7 :
  29. : 8 :
  30. : 9 :
  31. : 10 :
  32. चतुर्थ परिच्छेद
  33. : 2 :
  34. : 3 :
  35. : 4 :
  36. : 5 :
  37. : 6 :
  38. : 7 :
  39. : 8 :
  40. : 9 :
  41. : 10 :

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