दीक्षा - मनु शर्मा Deeksha - Hindi book by - Manu Sharma
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दीक्षा

मनु शर्मा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1615
आईएसबीएन :81-7315-447-3

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दीक्षा

Dahshat Main Duniya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


‘‘मैंने आपसे अपने शिष्य को दीक्षा देने का अनुरोध किया था।’’
‘किसको दीक्षा ?’’
‘‘जिसको आपने शिक्षा दी है, एकलव्य को।’’
‘‘उसको मैंने शिक्षा नहीं दी है।’’ आचार्य ने बड़ी रुक्षता से कहा, ‘‘उसे तो मेरी मूर्ति ने शिक्षा दी है। एकलव्य को यदि दीक्षा लेनी है तो उसी मूर्ति से ले।’’

अब तो हिरण्यधनु के रक्त में उबाल आ गया। वह भभक पड़ा, ‘‘आपने शिक्षा नहीं दी थी तो आप गुरुदक्षिणा लेनेवाले कौन थे ?’’ उसने बड़े आवेश में एकलव्य का दाहिना हाथ उठाकर दिखाते हुए पूछा, ‘‘इस अँगूठे को किसने कटवाया था ?’’
‘‘बड़े दुर्विनीत मामूल होते हो जी। तुम हस्तिनापुर के आचार्य से जबान लड़ाते हो ! तुम्हें लज्जा नहीं आती ?’’
‘‘लज्जा तो उस आचार्य को आनी चाहिए थी जिसने गुरुदक्षिणा ले ली, पर दीक्षा देने से मुकर गया।’’ अब हिरण्यधनु पूरे आवेश में था, ‘‘क्या यही उसकी नैतिकता है ? क्या यही आचार्य-धर्म है ?’’
‘‘अब बहुत हो चुका, हिरण्यधनु ! अपनी जिह्वा पर नियंत्रण करो। मैं तुम्हें दुर्विनीत ही समझता था, पर तुम दुर्मुख भी हो।’’

‘‘सत्य दुर्मुख नहीं होता, आचार्य, कटु भले ही हो। पर आप उस भविष्य की ओर देखिए जो आप जैसे आचार्य की करनी के फलस्वरूप अपने संतप्त उत्तरीय में हस्तिनापुर का महाविनाश छिपाए है। आपकी ‘करनी’ का ही परिणाम है कि आप सब एक ज्वालामुखी पर खड़े हैं !’’ वनराज के इतना कहते-कहते ही एकलव्य ने अपने पिता के मुख पर हाथ रखा और उन्हें बलात् बाहर की ओर ले चला।
इसी पुस्तक से

ऐतिहासिक कल्पना क्यों ?


इस संग्रह की चारों कहानियाँ ऐतिहासिक कल्पनाओं पर आधृत हैं। इनकी ऐतिहासिकता की प्रामाणिकता न होते हुए भी इनमें ऐतिहासिक संदर्भ हैं।
प्रश्न यह है कि ऐतिहासिक कथा साहित्य और ऐतिहासिक कल्पनाओं पर आधृत कथा साहित्य के बीच कोई विभाजन रेखा हो सकती है ? यदि ऐसी रेखा न हो सकती तो यशपाल अपनी यशस्वी कृति ‘दिव्या’ को ऐतिहासिक कल्पना क्यों कहते !
जब तक हम इतिहास और उसकी हदों को पहचानते नहीं तब तक हम इस प्रश्न का सही उत्तर पा सकते। वस्तुतः इतिहास उन परिवर्तनों, घटनाओं-दुर्घटनाओं का क्रमवार जिक्र है, जिनका दस्तावेजी प्रमाण मिलता है, जिनकी विचार परिधि में शासन प्रशासन की चर्चा है। यही कारण है कि इतिहास आज तक राजवंशों तक सीमित रहा, उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व का वर्णन ही उसकी मुख्य उद्देश्य बना। इतिहास की प्रकृति ही सत्तोन्मुखी रही। उसने सिर्फ सत्ता की ओर देखा, समाज की ओर देखने का उसे अवकाश ही नहीं रहा। उसने जनता का दुःख दर्द नहीं जाना, उसकी व्यथा-कथा नहीं लिखी वहाँ तक उसकी पहुँच ही नहीं।

इतिहास की प्रकृति भी कुछ विचित्र रही। वह अपनी समझ के अनुसार यही लिखता रहा है कि अकबर के समय में तुलसी दास हुए थे। वह यह लिख ही नहीं सकता कि तुलसीदास के समय में अकबर हुआ था। जबकि भारतीय समाज में जो प्रभाव तुलसी का है, वह अकबर का नहीं है।
यह तो पूर्णरूप से नहीं कहा जा सकता कि इतिहास ने सदा समाज की उपेक्षा की, पर उसकी दृष्टि एकांगी अवश्य रही। शायद इसीलिए प्रसिद्ध रोमन इतिहासकार गिबन को कहना पड़ा, ‘‘इतिहास मानव के अपराधों, मूर्खताओं और दुर्भाग्यों के रजिस्टर के सिवा कुछ नहीं है। समाज और उसके विकास की समग्रता का दस्तावेज वह नहीं बन सका, बदलते जीवन-मूल्यों को वह नहीं टाँक सका। उन मूल्यों की थाह लगाती हैं रचनाकार की कल्पनाएँ।’

इस संदर्भ में इस संग्रह की चारों कहानियों को देखिए। पहली कहानी ‘दीक्षा’ और दूसरी ‘एक माँ मरी है’ महाभारत काल की हैं। कथानक का आधार महाभारत का युग है, उसकी मनःस्थिति है; पर घटना का विस्तार ‘महाभारत’ में नहीं है।
कोई भी शिक्षा तब तक पूरी नहीं होती जब तक आचार्य उसकी दीक्षा नहीं देता। ऐसी परंपरा थी और आज भी यह किसी-न-किसी रूप में है। दीक्षा शिक्षा का समावर्तन है। आचार्य द्रोण ने एकलव्य को कभी शिक्षा नहीं दी, पर उससे उन्होंने गुरुदक्षिणा ले ली। दीक्षा देने का तो कहीं उल्लेख ही नहीं है।...और बिना दीक्षा के शिक्षा पूरी भले ही हो जाए, पर वह फलवती नहीं होती। पहली कहानी की कथा-वस्तु इसी संदर्भ पर आधृत है।

दूसरी कहानी की विषय-वस्तु का निर्माण भी काल्पनिक है। इस सत्य पर आधृत है कि कंस के हत्यारे मन को जब बाल कृष्ण का कहीं पता नहीं चला तब वह व्यग्र हो उठा। उसकी व्यग्रता यहाँ तक बढ़ी कि उसने योजना बनाई कि देवकी के पुत्र की वय के जितने बालक मेरे राज्य की सीमा में हों, उनकी हत्या कर दी जाए। यह काम तथाकथित पूतना को सौंपा गया।
मथुरा और वृंदावन में बाल-हत्या का ज्वालामुखी फूट पड़ा। बाल कृष्ण के वय के शिशु उसमें भस्म होने लगे। हर माँ उसमें झुलसने लगी। पर इस तथ्य को कैसे भुलाया जा सकता है कि आखिर पूतना भी एक माँ थी। उसने भी माँ की ममता से भरा हृदय पाया था। दूसरी कहानी इसी स्थिति को उजागर करती है।

तीसरी कहानी है-‘लक्ष्मण रेखा’। इसके कथानक का रेखांकन ईसा से लगभग 350 वर्ष पूर्व नंद वंश काल की भित्ति पर किया गया है, जब चाणक्य नंद वंश को उखाड़ फेंकने के लिए संकल्पबद्ध होता है। वह इसके लिए मौर्य वंश के बालक चंद्रगुप्त को तैयार करता है, तरह-तरह की चालें चलता है।
कहते हैं, कौटिल्य की कुटिलता ‘विष-कन्याओं’ तक की सृष्टि करती है, यद्यपि ‘विष-कन्याओं’ के बारे में अभी तक कोई प्रामाणिक साक्ष्य नहीं है। विष-कन्याओं का यथार्थ आज तक विवादित है।
यह कहानी एक विष-कन्या के चरित्र पर आधृत है। वे विष-कन्याएँ परम सुंदरी होती थीं। वे सबकुछ कर सकती थीं, पर प्रेम नहीं कर सकती थीं। नारी मन का स्वाभाविक आकर्षण उनका कितना लाचार था ! बहुत हुआ तो वे किसी प्रेमी के आलिंगनपाश तक जा सकती थीं। इसके आगे तो उनके लिए ‘लक्ष्मण रेखा’ खिंची थी।

इस संग्रह की चौथी कहानी ‘आश्रव्य चीखें’ तकनीक की दृष्टि से विचित्र है। इसकी आधी संरचना सामाजिक और आधी ऐतिहासिक है।
637 ई. में प्रसिद्ध चीनी यात्री युवान च्वांग (ह्वेन सांग) भारत आया था। उसने अपना अधिकांश समय नालंदा विश्वविद्यालय में बिताया था। यह विश्वविद्यालय अपने समय का विश्वविख्यात ज्ञानपीठ था। इसका पुस्तकालय भी संसार का सबसे संपन्न पुस्तकालय था। वस्तुतः युवान च्वांग की ज्ञान-पिपासा ही उसे इस विश्वविद्यालय में खींच लाई थी।

यहाँ उसने कई वर्षों तक अध्ययन किया था। कहते हैं, यहाँ वह कुछ दिनों तक शिक्षक भी था। यहाँ के अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की उसने प्रतिलिपि भी कराई थी। उसकी योग्यता और ज्ञान-गरिमा से प्रभावित होकर यहाँ उसे ‘मोक्षदेव’ की उपाधि से विभूषित भी किया गया था।
यहाँ से वह ग्रंथों का एक विशाल संग्रह ले गया था। उनको कुछ दूर तक पहुँचाने गए एक छात्र ने उन ग्रंथों की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति तक दी थी-यह ऐतिहासिक अंश इस कहानी का उत्तरार्ध है।
चारों कहानियों में इतिहास की प्रामाणिकता भले ही न हो, पर उस युग की मानसिकता की प्रामाणिकता अवश्य है। शायद यही वह स्थिति है, जिसके कारण इन्हें ‘ऐतिहासिक’ न कहकर ‘ऐतिहासिक कल्पना’ कहा गया।

मनु शर्मा

दीक्षा


गंगा तट के लोगों ने काले घोड़ों पर सवार दो अश्वारोहियों को हस्तिनापुर की ओर जाते देखा। उनके पीछे कोई बड़ी सेना तो नहीं थी, पर कुछ लोग धनुष-बाण से युक्त अवश्य चल रहे थे। उनके शरीर लौहवर्णी थे। देखने में भील, निषाद या व्याध जान पड़ते थे।
उनकी वेशभूषा भी विचित्र थी। केवल अधो अंग ताल के कोमल पत्तों से आच्छादित था। कटि में मूँज की मेखला थी, जिससे ये पत्ते लटक रहे थे, जिनके भीतर से इनकी कौपीन बीच बीच में झाँकती दिखाई देती थी। नंगे पैरों की छितराई हुई उँगलियाँ उनकी चाल की क्षिप्रता की छाप गंगा-तट पर स्पष्ट छोड़ रही थीं, जिन्हें पढ़कर कोई भी जान सकता था कि ये तेज चलने में अभ्यस्त लोगों की पदचापें हैं।
आकाश में मेष का सूर्य काफी चढ़ आया था, पर अभी मध्याह्न के करीब नहीं पहुँचा था, किंतु धूप तेज हो गई थी। अश्वारोहियों की लौहवर्णी काया धूप की तिलमिलाहट में ताम्रवर्णी लग रही थीं। मार्ग के किसी व्यक्ति ने पहले अश्वारोही को सलाह दी, ‘‘आप पसीने से लथपथ हैं, किसी वृक्ष की शरण में चले जाइए।’’

‘‘पुष्पवटी (आज के बुलंदशहर के पास का क्षेत्र) के अरण्य का अधिपति लक्ष्य सिद्ध करने के समय कभी किसी की शरणागत नहीं होता, भले ही वह किसी वृक्ष की छाया ही क्यों न हो !’’ अश्वारोही हँसा और आगे बढ़ गया।
उसकी प्रगल्भ हँसी बड़ी देर तक उस राही पर छाई रही। वह चुपचाप उन्हें जाते देखता रहा और समझ गया कि ये अरण्यवासी हैं और आरण्यक जीवन जीते हैं। इन्हें कभी भी वर्षा, ग्रीष्म शीत अपनी भयावहता से आक्रांत नहीं कर पाते।
उस राही को उन अश्वारोहियों का वेश भी विचित्र लगा। रजत-मेखला से फँसा हुआ उनका अरुणाभा लिये मटमैला अधोवस्त्र कुछ विचित्र ढंग से चमक रहा था। सिर पर सीपियों और घोंघों से बने मुकुट में मोती-मूँगे और घुमची की झालरें लगी थीं, जो उनके अरण्यराज होने का प्रमाण दे रही थीं।

अपने वेग से चलते हुए वे घड़ी भर में ही हस्तिनापुर के दक्षिणी नगर द्वार पर पहुँचे। उनके साथ लगे हुए बहुत से जंगली कुत्ते भी चले आए थे, जो द्वारपालों को देखकर भौंकने लगे।
द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया। ऐसा अद्भुत था राजा और अद्भुत थी उसकी सैन्य टुकड़ी। उन लोगों ने ऐसा कभी देखा नहीं था। पूरी सुरक्षा सेना ही उन्हें घेर कर खड़ी हो गई। भीतर से कुछ नगरवासी भी चले आए।
‘‘आपके आने का प्रयोजन ?’’ प्रधान द्वारपाल ने पूछा।
‘‘हमें हस्तिनापुर के राजकीय आचार्य से मिलना है।’’ वनराज की कड़कती आवाज अहम् में डूबी थी।
‘‘राजकीय आचार्य !’’ उसकी बात द्वारपालों की समझ में नहीं आई। लोगों ने यह भी अनुभव किया कि उसके बोलने का ढंग नगरीय सभ्यता से बहुत दूर है।

‘‘आप लोग रास्ता छोड़ दीजिए और हमें जाने दीजिए।’’ वनराज ने पुनः कहा।
‘‘नियमानुसार हमें आपके आने की सूचना प्रासाद में भेजनी होगी।’’ प्रधान द्वारपाल ने कहा, ‘‘इसके लिए हमें आपका पूरा परिचय चाहिए।’’
‘‘अरे परिचय क्या ! ये सब जंगली लुटेरे हैं !’’ भीड़ से एक आवाज पत्थर की तरह मारी गई।
इतना सुनना था कि वनवासियों की त्योरियाँ चढ़ गईं।
‘‘कौन है यह अभद्र ? हम तुम्हें जंगली लुटेरे दिखाई देते हैं ?’’ दूसरा अश्वारोही भभक पड़ा। वह दाहिने हाथ में अंगुलित्राण पहने था और वनराज का पुत्र ही जान पड़ता था, क्योंकि उसकी आकृति बहुत कुछ उससे मिलती थी। उसने ललकारा, ‘‘यदि साहस हो तो वह व्यक्ति सामने आए। चोरों की तरह भीड़ में मुँह छिपाने की चेष्टा न करे।’’ उसने फिर ललकारा, ‘‘सामने आओ, मैं अभी तुम्हारा मुँह बंद कर दूँगा।’’
वनराज ने उस दूसरे अश्वारोही को डाँटते हुए पीछे किया। आवेश में वह आगे बढ़ आया था, ‘‘तुम्हें क्या प्रतिज्ञा कराकर साथ लाया हूँ कि तुम कहीं पर भी एक शब्द नहीं बोलोगे !’’
धधकते अंगारे पर जैसे पानी पड़ा। वह एकदम बुझ गया।

भीड़ से फिर एक दूसरी आवाज उछली, ‘‘पहले इन कुत्तों का भौंकना बंद करो, जो लगातार तुम्हारा बहिष्कार कर रहे हैं, फिर हमारे मुँह को बंद करने की सोचना।’’
इतना सुनते ही वनराज जोर से हँस पड़ा, ‘‘सारी झंझट तो ऐसे ही संदर्भ से शुरु हुई थी कि इसने कुत्ते का भौंकना बंद कर दिया था और रक्त की एक बूँद भी मुँह से नहीं निकली थी।’’ वह अब भी हँस रहा था। बड़ी रहस्यमय थी उसकी हँसी।
कोई कुछ समझ नहीं पाया। पिछला संदर्भ भी कोई नहीं जानता था। किसी ने कुछ पूछा भी नहीं, पर इतना सब समझ गए कि यह एक विलक्षण व्यक्ति है।
द्वारपाल भी एक-दूसरे का मुँह देखते रह गए। फिर भी प्रधान द्वारपाल ने कहा, ‘‘आखिर हम महाराज को क्या सूचना भेजें ?’’

‘‘कह दो कि पुष्पवटी के अरण्यराज आए हैं।’’
‘‘क्षमा कीजिएगा।’’ बड़ी विनम्रता से उसने करबद्ध निवेदन किया, ‘‘आप किसी क्षेत्र के राजा तो नहीं ज्ञात होते !’’
‘‘मैं राजा नहीं मालूम होता !’’ वह फिर हँसने लगा, ‘‘तो मैं क्या दस्यु लगता हूँ ?’’
‘‘नहीं महाराज, मेरे कहने का यह तात्पर्य नहीं है।’’ द्वारपाल बोला, ‘‘मैं देख रहा हूँ कि आपकी कोई पताका नहीं है। राजा-महाराजाओं का जब कहीं प्रयाण होता है तब उनके राज्य की पताका सबसे आगे चलती है।’’
‘‘पर अरण्यराज की कोई पताका नहीं होती।’’
‘‘क्या आपके प्रासाद पर कोई पताका नहीं है ?’’

‘‘हम लोगों का कोई राजप्रसाद नहीं होता।’’ वनराज ने कहा, ‘‘हम प्रकृति-पुत्र हैं। पूरा जंगल हमारा प्रसाद है। हम जहाँ चाहते हैं वहाँ रहते हैं, जहाँ चाहते हैं वहाँ विचरते हैं। हमारी जीवन-शैली तुम लोगों से बहुत भिन्न है। हमारे मिट्टी और पत्थर की प्राचीरें बहुत महत्त्व नहीं रखतीं, क्योंकि हमारी प्रजा केवल मनुष्य ही नहीं हैं, पशु-पक्षी भी हैं, जंगल के पेड़–पल्लव भी। सबकी देखभाल का हमपर दायित्व है।’’

केवल द्वारपालों को ही नहीं, वरन् वहाँ उपस्थित नगर के संरक्षकों को भी वनराज की बातें बड़ी विलक्षण लग रही थीं और रहस्यमय भी। वे अपने ढंग से उन्हें पहचानने की चेष्टा कर रहे थे। ये आदिवासी लोग हैं, संकल्प के धनी। इन लोगों की इच्छा शक्ति चट्टान की तरह दृढ़ होती है। वे यह भी सोच रहे थे कि इनके अहम् के हिमालय से टकराना उचित नहीं।
उसने पुनः सविनय निवेदन किया, ‘‘पर आपके आने का प्रयोजन तो राजभवन में भेजना ही होगा। वहाँ से अनुमति मिलने पर ही हम आप लोगों को नगर में जाने दे सकते हैं।’’
‘‘मान लीजिए, यदि अनुमति नहीं आई तो ?’’
‘‘तब तो हम विवश होंगे आपके लिए यह नगर द्वार बंद कर देने को।’’

‘‘अच्छा !’’ विस्मय के साथ वनराज फिर अट्टहास कर बैठा, ‘‘तुम्हें शायद मालूम नहीं है, हम विशाल वृक्षों पर गिलहरियों की तरह फुदकते हुए चढ़ जाते हैं। ऊँचे-ऊँचे शिखरों को बादलों की तरह पार करते हैं, फिर नगर द्वार के ये कपाट ! ये तुम्हारे लिए विशाल हैं, हमारे लिए इन्हें लाँघना बच्चों का खेल है।’’

‘‘फिर आप ही समझिए हम तो अपने कर्तव्य बोध से बँधे हैं।’’ इस बार प्रधान द्वारपाल की आवाज भी काफी दबी थी।
‘‘अच्छा, अब तुम्हीं बताओ,’’ वनराज ने उलटा उन्हीं से प्रश्न किया, ‘‘तुम जब हमारे राज्य में आते हो तो क्या किसी की अनुमति लेनी होती है ? किसी के पास सूचना भेजनी होती है ?...या आने का प्रयोजन बताना होता है ? जबकि हम जानते हैं कि तुम्हारे आने का प्रयोजन क्या है ! वृक्षों पर बैठे पक्षी तुम्हें देखते ही डर के मारे फरफराकर उड़ पड़ते हैं और अरण्य-गर्भ में छिप जाते हैं। स्वतंत्र विचरण करनेवाले पशु भी गहन गह्वर की ओर लपक पड़ते हैं और हम वनवासियों की प्रत्यंचाएँ चढ़ जाती हैं। हम समझ जाते हैं कि लुटेरे आए हैं। या तो ये आखेट के नाम पर हमारे पशु-पक्षियों के प्राणों पर डाका डालेंगे अथवा ये हमारे उत्पाद-मधु कंद-मूल अथवा वनौषधियाँ लूटकर ले जाएँगे। और यदि कुछ नहीं कर पाए तो वृक्षों को काटकर उनकी लकड़ियां ही उठा ले जाएँगे-भागते भूत की लँगोटी ही सही।’’

इतना कहने के बाद भी वनराज चुप नहीं हुआ, वरन् वह थोड़े आवेश में आया, ‘‘वस्तुतः लुटेरे तुम लोग हो। तुम्हारी लूट से संत्रस्त हम हैं। फिर भी हम तुम्हारी गायों की रक्षा करते हैं। हमारे साम्राज्य में आकर वे पोषित होती हैं। हम तुम्हारे गोधन के संरक्षक हैं। तुम्हें हमारा कृतज्ञ होना चाहिए और हमें तुमसे घृणा करनी चाहिए। फिर भी हम पूरे सम्मान के साथ तुम्हारे नियमों का पालन करते हुए पुनः आग्रह करते हैं कि हमें राजकीय आचार्य से मिलने दिया जाय।’’ उसने बड़े नाटकीय ढंग से मुसकराते हुए कहा।

‘‘यह तो मारता भी है और सहलाता भी है। बड़ा होशियार मालूम होता है।’’ भीड़ में एक बुदबुदाहट रेंग गई।
‘‘आप थोड़ी और प्रतीक्षा करें। हमने एक चर राजभवन में भेज दिया है। वह आता ही होगा।’’ प्रधान द्वारपाल ने कहा, ‘‘वस्तुतः हमारे सामने एक संकट है। हमारे पंजीकृत पत्रों में ऐसी कोई सूचना भी नहीं है, कि इससे पहले आप यहाँ कभी किसी काम से भी आए थे। यदि यहाँ आते-जाते रहते तो हमें आपको जाने देने में कोई कठिनाई न होती और आप भी परेशान न होते।’’
‘‘इसलिए कि हम व्यर्थ कहीं नहीं जाते, बिना प्रयोजन के जंगल नहीं छोड़ते।’’

इस बार द्वारपाल हँसा, ‘‘वही प्रयोजन तो हम जानना चाहते थे।’’
इसी बीच राजभवन से सूचना आ गई कि यदि अरण्यराज केवल आचार्यजी से मिलना चाहते हैं तो उन्हें आचार्य प्रासाद की ओर भेज दिया जाए; पर वे नगर में प्रवेश न कर पाएँ। बाहर-बाहर, नगर की सीमा प्राचीर के समानांतर जो मार्ग जाता है, उसी से।

अब द्वारपाल ने उन्हें अनुमति दी और मार्ग बताया, ‘‘आप इस प्राचीर की बगल से चले जाइए। लगभग एक योजन आगे बढ़ने के बाद दाहिनी ओर एक मार्ग इसी मार्ग से फूटेगा। वह इससे प्रशस्त भी है। वह सीधे आचार्य प्रासाद की ओर जाता है।’’
किसी औपचारिकता का निर्वाह किए बिना वे लोग उसी ओर को बढ़ चले। पीछे-पीछे वे भौंकते कुत्ते भी चले, जो उनके साथ जंगल से ही आए थे।

नगर द्वार के पहरेदार उन कुत्तों को मारकर भगाने लगे, तब वनराज बोला, ‘‘भाई, इन कुत्तों को मत मारो। हम वनवासी इन कुत्तों से बड़ा प्यार करते हैं।’’
‘‘पर ये तो आप लोगों को ही देखकर अनवरत भौंक रहे हैं।’’
‘‘इन्हें नगरीय हवा लग गई है। अल्प समय में ही इन्होंने आप लोगों से बहुत कुछ ग्रहण भी कर लिया है। ये भौंकेंगे किसी और को देखकर तथा काटेंगे किसी और को।’’
सभी हँस पड़े।
आचार्य प्रासाद के समक्ष आकर वनराज चुपचाप खड़ा हो गया। उसके पीछे उसके सब अनुचर भी पंक्तिबद्ध हुए। उसने इतना प्रशस्त और इतना वैभव-संपन्न प्रासाद इसके पूर्व कभी देखा नहीं था। तब तक आचार्य प्रासाद के द्वारपाल बाहर निकले।

‘‘आप कौन हैं और आपके पधारने का प्रयोजन क्या है ?’’ पहले जैसा प्रश्न और पहले ही जैसी मुद्रा।
‘‘अभी आप हमसे कोई प्रश्न न करें। हमारी मानसिकता उत्तर देने की स्थिति में नहीं है।’’ वनराज ने कहा, ‘‘हमें लगता है कि हम किसी गलत स्थान पर आ गए हैं।’’
‘‘आप जाना कहाँ चाहते हैं ?’’
‘‘मैं आचार्य द्रोण से मिलना चाहता हूँ।’’
‘‘आचार्य द्रोण का प्रासाद यही है।’’

‘‘आचार्य द्रोण का प्रासाद !’’ वह जैसे अवाक् हो गया। उसकी चेतना का आकाश विस्मय के बादलों से आच्छादित हो गया। उसने मुड़कर अपने पुत्र की ओर देखा। वह भी मौन था और उसके साथ आए सारे वन्य सैनिक जड़ हो गए थे।
‘‘ठीक कहते हो न ?’’ उसने फिर पूछा, ‘‘यह उन्हीं आचार्य का आवास या विलास महल है, जिनके पुत्र को कभी पीने के लिए दूध भी नहीं मिलता था और जब वह रोता था तो उसकी माँ उसे तंतुल का धोवन पिलाकर बहला देती थीं ?’’
द्वारपालों ने मुसकराकर स्वीकारात्मक ढंग से सिर हिलाया।
‘‘तो मैं आचार्यजी से मिल सकता हूँ ?’’ विस्मय-विभोर होते हुए भी वनराज ने अपन प्रश्न दोहराया। ‘‘पहले यह बताइए, आप हैं कौन ?’’
‘‘मैं हस्तिनापुर के दाक्षिणात्य अरण्य का अधिपति हूँ-हिरण्यधनु।’’
‘‘मिलने का प्रयोजन जान सकता हूँ ?’’

‘‘क्यों ? मिलना स्वयं में एक प्रयोजन नहीं हो सकता !’’
द्वारपाल सुनते ही स्तब्ध हो गया। उसे विश्वास नहीं था कि अरण्यवासी भी इतने बुद्धिमान् हो सकते हैं। उसके मन में आरण्यकों की छवि जंगली-गँवारों की थी। उसे शायद ज्ञात नहीं था कि इसी अरण्य में वैदिक संस्कृति जनमी है, वेद उपनिषद् इत्यादि इन्हीं अरण्यों में लिखे गए हैं।
वह स्वयं भवन में गया और काफी देर बाद यह संदेश लेकर लौटा कि अपराह्न जब आचार्यजी राजभवन के लिए प्रस्थान करेंगे तो वह उनके दर्शन कर लेगा।

वनराज यह सुनकर आगबबूला हो गया, ‘‘क्या मैं सामान्य वनवासी हूँ ? अरे मैं वनराज हूँ और मुझे प्रतीक्षा में खड़ा कर दिया जाए यह मेरा साक्षात् अपमान है !’’ उसके चेहरे पर लालिमा उभर आई। स्पष्ट लगा कि उसकी नसों में खून दौड़ने लगा। फिर भी वह कुछ बोला नहीं, क्योंकि आचार्य के द्वार पर खड़ा था। उसके मन ने कहा कि आचार्य की अपनी एक गरिमा है। वह समाज की बौद्धिक चेतना का अधिपति है। राजा या सम्राट् तो केवल भूखंडों का स्वामी मात्र होता है। राष्ट्र की मनीषा का अधिष्ठता है आचार्य। उसके द्वार पर तुम्हारा कितना भी अपमान क्यों न हो, पर उसके सामने तुम्हें नतमस्तक ही रहना होगा।
वह चुपचाप खड़ा था। उसने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई-कहीं कोई नहीं। मानुष को कौन कहे, चिड़िया का पूत भी नहीं। सूर्य पश्चिम में ढुलकने लगा था। उसे बहुत देर से प्यास लगी थी।

‘अजीब है यह नगरीय सभ्यता। यहाँ कोई आगंतुक को पानी को भी नहीं पूछता हमारे यहाँ तो प्रकृति स्वयं पानी लिये खड़ी रहती है।’ वनराज सोचता रहा।
उसने दूर दक्षिणी छोर पर एक बड़ी पुष्करिणी देखी। वह चुपचाप उसकी ओर बढ़ा।
‘‘किधर जा रहे हैं, सरदार ?’’ पुत्र ने पूछा। पुत्र भी अपने पिता को ‘सरदार’ कहता था। वस्तुतः जंगल में सभी वनराज को ‘सरदार’ कहते थे। यही उसने जन्म से सुना था और यही उसके लिए पिता का पर्याय हो गया।
‘‘पानी पीने जा रहा हूँ।’’
‘‘मैं भी चलूँगा।’’
वनराज को अब पता चला कि मेरी तरह बेटा भी प्यासा है। दोनों आगे पीछे हो लिये। बेटे का दाहिना हाथ कंधे से लटकते उत्तरीय से जैसे पहले छिपा था वैसे अब भी छिपा रहा।



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