लगन, कुंडलीचक्र - वृंदावनलाल वर्मा Lagan, Kundlichakra - Hindi book by - Vrindavanlal Verma
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लगन, कुंडलीचक्र

वृंदावनलाल वर्मा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :246
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1617
आईएसबीएन :81-7315-157-1

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एक श्रेष्ठ उपन्यास...

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प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

देवसिंह उसके उत्तर में कुछ कहना चाहता था; परंतु गले को जैसे किसी ने पकड़ लिया हो-कुछ न बोल सका।
खिड़की में से उसने कहा, "मैं रामा हूँ। कोई और नहीं। डरिए मत।
देवसिंह बोला, "मैं किसी से नहीं डरता, केवल अपने भाग्य से डरता हूँ। सुना है कि मेरे जीते जी दूसरे की होने वाली हैं।
रामा ने कोई उत्तर नहीं दिया।
देवसिंह उत्तेजित होकर बोला, "इसी बात को निश्चयपूर्वक जानने के लिए बहुत दिनों से सिर पटकता हुआ घूम रहा हूँ।
उत्तर दे दीजिए तो फिर जो मार्ग जहाँ के लिए मिलेगा, तुरंत चला जाऊँगा।"
‘असंभव,’ रामा ने उत्तर दिया।
देवसिंह गद्गद हो गया। चुप रहा।
रामा बोली, ‘आप भीग गए हैं। खिड़की की राह यहाँ चले आइए। एक क्षण ठहरकर फिर जाइएगा।’ गला काँप रहा था। ऐसा कि पानी की रिमझिम में स्वर समा गया। कहा, ‘आप चढ़ सकेंगे ?’ और उसने बिना किसी उत्तर की अपेक्षा के ही एक मोटी धोती खिड़की में से नीचे लटका दी।

इसी पुस्तक से

परिचय


किसी के चरित नायक देवसिंह का असली नाम नंदलाल था। यह बड़ा शक्तिशाली पुरुष था। अस्सी वर्ष की अवस्था में उसको दमरू नामक लोधी ने देखा है, जो सुल्तानपुरा में (चिरगाँव से डेढ़ मील उत्तर) रहता है। इसकी आयु इस समय नब्बे वर्ष की है। वह नंदलाल के बल की बहुत-सी आँखों देखी घटनाएँ बतलाता है। नंदलाल का भीषण पराक्रम जिसका कहानी में वर्णन किया गया है। सच्ची घटना है। किंवदंती के रूप में अब भी आसपास के देहात में वह प्रसिद्ध है। कुछ घटनाएँ कल्पनामूलक हैं।
बजटा ग्राम के उजड़ जाने पर नंदलाल के वंशज निकटवर्ती घुसगवाँ ग्राम में जा बसे हैं; परंतु उन्हें नंदलाल का ठीक-ठीक वृत्तांत ज्ञान नहीं है।

वृंदावनलाल वर्मा

लगन
1


यदि बादल चौधरी ने सौ भैंसें दहेज में देने का करार करके वायदा खिलाफी न की होती, तो बरौल और बजटा ग्राम का इतिहास किसी को भी कभी मालूम हो पाता या नहीं, इसमें संदेह है।
चिरगाँव से ठीक पूर्व में लगभग पाँच मील बजटा नाम का एक छोटा-सा गाँव बेतवा नदी के तट पर था। अब उसके थोड़े से चिह्न हनुमानजी की प्राचीन समय की भग्नप्राय एक मूर्ति और सती की शिला है। बरौल अभी हरी-हरी अवस्था में है और चिरगाँव से उतर पूर्व के कोने में बेतवा के उस पार की ढी पर करीब सात मील है। बजटा से बरौल किनारे किनारे, और देदर नामक गाँव से नदी पार करके, पाँच छः मील पड़ता है; परंतु यदि कोई नदी को तैरता-तैरता बरौल जाना चाहे तो ढाई-तीन मील से अधिक फासला नहीं है। बेतवा का तैरना। जिस नदी ने पहाड़ और टौरियों को तोड़- फोड़कर मार्ग बनाया है और अनेक धाराओं में होकर बहती है, उसको बरसात में तैरकर पार करना दुष्कर कार्य है; तिसपर बजटा से बरौल नदी-नदी जाना करीब-करीब असंभव।

बात उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ की है। बुंदेलखंड के राज्य अंग्रेज की संधियों में अपने अस्तित्व को स्थापित कर चुके थे। चिरगाँव की जागीर कुछ मरहठों और कुछ अंग्रेजों के प्रभाव में थी; परंतु बजटा और बरौल अपने वृत्त में किसी विशेष प्रभाव का अनुभव न करते थे।
बजटा का शिबू माते और बरौल का बादल चौधरी समकक्ष के धनी थे।
तीन-तीन, चार-चार सौ गाय भैंसें दोनों के पास थीं, और दोनों एक-दूसरे को लखपती समझते थे; परंतु स्वभावतः ठीक-ठीक अनुमान एक की संपत्ति का दूसरे को न था।
शिबू के इकलौते लड़के का नाम देवसिंह था। इसके माँ न थी, इसलिए बाप ने बड़े लाड़-दुलार से पाला था।
बादल का कुटुंब बड़ा था। लड़के थे, बहुएँ थीं; परंतु लड़की एक ही थी। नाम उसका रामा था।

शिबू को अपना लड़का बड़े घर में ब्याहने की साध थी, इसलिए आयु बढ़ जाने पर भी कहीं संबंध नहीं किया। उधर बादल चौधरी की कामना अपने से बड़े घर में रामा को देने की थी, इसलिए लड़कों के विवाह संबंध पहले कर लिये। दोनों धनियों की निगाह बहुत दिनों तक एक-दूसरे पर नहीं जमी, क्योंकि शिबू अपने तीन-चार सौ ढोरों से संतुष्ट न था, काफी दहेज लड़के के लिए चाहता था, और यह बात जरा प्रसिद्ध थी कि बादल चौधरी अपने पशुओं की गिनती बढ़ाने में तत्पर है न कि उनकी संख्या कम कर डालने का आकांक्षी।
परंतु दूर-दूर दृष्टि फेंकते रहने पर भी यथेष्ट बड़ा घराना बादल चौधरी को न मिला। अंत में शिबू के लड़के देवसिंह के साथ ही संबंध न निश्चित हुआ और सौ भैंसें दहेज में देने का वचन भी शिबू माते ने बादल से खसोट लिया। यह बात उस काल के चलन के अनुकूल न थी। ऐसा नहीं होता था कि बिना लिये विवाह न हो, परंतु शिबू अपनी आकांक्षा में मौलिक था; और बादल चौधरी को जमाना गुजरते देखकर देवसिंह के साथ रामा को ब्याहने के लिए सौ भैंसों के दहेज देने के वचन पर तैयार होना ही पड़ा।

जाति के कुछ लोगों ने, बादल से संकेत पाकर, शिबू को समझाया भी कि लेन-देन की ऐसी प्रथा निकालना अच्छा नहीं है, परंतु जैसे शिबू आकांक्षा में मौलिक था, वैसे हठ में भी एक ही था।
पहले-पहले दहेज की बातचीत अकेले में तय हुई थी, और शिबू की कल्पना थी कि सौ भैंसे चुपचाप बरौल से बजटा आ जाएँगी; परंतु जाति के उक्त व्यक्तियों के संकेत से उसको मालूम हो गया कि बात फैल गई है। इस पर उसका हठ कम न हुआ, और दृढ़ हो गया। उधर बादल चौधरी सहज ही अपनी सौ भैंसों को तिलांजलि देने वाला व्यक्ति न था। शिबू को कहीं से इशारा मिला कि दहेज में भैंसे न मिलेगी।
यदि शिबू के पास यह संकेत बारात सजने के पहले पहुँच जाता तो शायद वह कोई-न-कोई बहाना करके संबंध को तोड़ देता; पर यह समाचार भाँवर पड़ने के पश्चात् मिला।

कुढ़ गया। बहुत क्षुब्ध हो गया। मन में और खुल्लमखुल्ला बादल चौधरी को उसी के गाँव में सैकड़ों गालियाँ दीं।
बारातियों से बोला, "अब कोई दावत-पंगत ग्रहण न की जावेगी। चलो, बहू की बिदा न करावेंगे। भैया का दूसरा ब्याह होगा। उसका अंग-अंग ब्याहा जा सकता है। लड़कियों की संसार में कोई टूट नहीं है।’
बारातियों के पुरुषार्थ की मात्रा ऐसे अवसरों पर बहुत अधिक बढ़ जाती है। सब सहमत हो गए एक ने तो यहाँ तक कहा कि बरौल में आग लगा दो।

इस नेक सलाह को यद्यपि किसी ने नहीं माना, तथापि फल उसका वही हुआ। बिना लगाए आग-सी लग गई। बादल ने अपने समधी की और बारातियों की सदिच्छा को विविध लोगों से अनेक रूपों में सुना। लड़की वाले को साधारण तौर पर इस तरह की गाली-गलौज सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ करता है; परंतु उसने अपने लड़के ब्याहकर केवल गालियाँ दी थीं खाई न थीं। स्वाभिमान को कड़ी चोट पहुँची। गाँव में आग लगवाने के प्रस्ताव का समाचार सुनकर उसका कोप प्रचंड हो गया। आग के बचाव का प्रबंध कर दिया और भैंसों ढोरों की रक्षा के लिए अपने आदमी नियुक्त कर दिए। किसी ने उससे कहा था कि शिबू का दल भैंसें भी चुरा ले जाने की चिंता में है।

प्रत्येक युग में और स्थान पर एक-न-एक समझदार पुरुष मिल जाता है। बादल के मिहमानों में भी एक था। उसने कहा, ‘ये सब सुनी बातें ही हैं। किसी खास आदमी को बारात में भेजकर पता तो लगाओ कि असली बात क्या है।’
बादल स्वयं नहीं गया। अपने बड़े लड़के को भेजा। इसका नाम बेताली था। इसको जनवासे में पाकर शिबू को पुरानी गालियों की ही आवृत्ति न करनी पड़ी। बल्कि कुछ नई-नई भी गढ़कर सुनाई, और अंत में इस तरह उसको शांति प्रदान की, "मै देखूँगा, सब घमंण्ड चूर कर दूँगा बड़ा धनी बना फिरता है। नाक न कटवा दी तो बात क्या रही ! जा यहाँ से। कह दे उस नकटे से कि अपनी लड़की को चाहे जहाँ बिठला देवे। हमारे घर से उसका कोई संबंध न रहेगा। और यदि अब कोई संवाद लेकर यहाँ आया तो जूतों से सिर तुड़वा दूँगा।’

लड़के ने घर जाकर सब कथा ज्यों-की-त्यों सुना दी। और कहा, जी चाहता है कि मर जाऊँ और मार डालूँ। यदि आपने जूता लगवाकर इन बदमाशों को गाँव से न निकाला, तो हमारे जीवन पर धिक्कार है।
इस पर बादलजू भी पूरी एक घड़ी तक गालियों की वर्षा, शिबू इत्यादि पर करता रहा और वह सब मधुर वचनावलि, अर्थ-अनर्थ और टीका-टिप्पणी के साथ शीघ्र ही बारात में पहुँच गई। किसी ने बारात में जाकर यह भी कह दिया कि जूता लगाकार निकालनेवाले आ रहे हैं।
जूता लगवाकर तो बारात नहीं निकाली गई; लेकिन बारात को पानी देना बंद कर दिया गया, और भी सत्कार गायब हो गया। बरौल में एक भी कुआँ नहीं है। उस गाँव के लोग नदी से भरवाकर जल पीते हैं। इसलिए बारातियों को कष्ट बहुत हुआ।

परंतु उनका कष्ट शीघ्र समाप्त हो गया। दोनों ओर के इने-गिने समझदारों की एक न चली, और शिबू बारात लेकर उसी समय पलोथर पहाड़ के नीचे-नीचे जंगल के रास्ते होकर अपने गाँव चला आया। वह मार्ग कुछ अधिक लंबा था, परंतु बरौल के नीचे नदी का चौड़ा पाट अगम-अथाह पानी से बैसाख में भी भरा रहता है। बारात को पार उतारने के लिए बरौल का कोई डोंगी या नाव वाला तैयार न होता, इसलिए इस मार्ग से जाकर बजटा की सीध में शिबू ने नदी को पार किया और रामराम करके सब लोग घर आए।
सब कष्टों पर विजय पाकर शिबू ने घर आकर कहा ‘बादलवा को खूब छकाया। अब धरे रहे छाती पर अपनी लड़की को, चाहे कहीं बिठला दे।
देवसिंह ने चुपचाप वह सब देखा था और चुपचाप ही यह भी सुन लिया।


:2:



देवसिंह दृढ़ शरीर का युवक था। उसने चिरगाँव में एक लालाजी से शिक्षा पाई थी। ढोरों की देखभाल का काम देवसिंह के स्वभाव को कल्पनामय बना चुका था। पिता की उस पर आरंभ से ही कोई विशेष निगरानी नहीं रही थी, इसलिए स्वच्छंद तबीयत का हो गया था; परंतु पिता के गाढ स्नेह ने उसके स्वाभाविक संकोच को कभी नहीं घटा पाया। लोगों के समुदाय में बैठने का अवसर आने पर बोलता कम था, और अकेले में खूब गाता था।
नदी के किनारे पिता के थोड़े से खेत थे, जिनसे साल भर खाने लायक अनाज मिल जाता था। दूध घी की कमी न थी। घी इतना होता था कि चिरगाँव के राव साहब को समय पर लगान चुकता कर दिया जाता था और घर में गाड़ने को धन बच रहता था।

जब ढोर गाँव के बेड़े में बंद हो जाते थे तब देवसिंह का दिन भर का कार्य समाप्त हो जाता था, क्योंकि दूध दुहाने के लिए, और देखभाल के लिए भी नौकर, थे। देवसिंह कुछ कर्तव्यवश और कुछ रुचिविवश पशुपालन का कार्य किया करता था।
उसकी बारात बैसाख में जाकर लौट आई थी। जेठ का आरंभ था। संध्या हो चुकी थी। देवसिंह नदी के तट पर, एक जगह, जो घर से पाँव मील थी, गया। आजकल यह स्थान भरौंल घाट कहलाता है। नदी के उस पार एक कोस पर भरौंल नाम का गाँव है, इसलिए इस नाम से यह तट विख्यात है।

नदी के उस पार पहाड़ियों के खिरबिर्रे लंबे-लंबे समूह बढ़ते हुए अंधकार में एक लंबी-तिरछी अस्पष्ट रेखा की भाँति भासित हो रहे थे। सघन वन के ऊपर पल्लवहीन करधई की क्षीण लालिमा और रेंवजा तथा करौंदी की गहरी हरियाली की धुँधली चादर सी तन गई थी। नदी में टिटहरी बोल रही थीं। किनारे के वृक्षों पर श्यामा चिड़िया चहक उठी। नदी में मछली उछलकर शोर करने लगीं और मकर खुले स्थान से सरककर पानी में समा गया। संध्या हो गई।
देवसिंह एक स्वच्छ स्थान पर बैठकर कुछ गाने लगा। परंतु एकाध क्षण गाकर तुरंत रुक गया।





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