प्रत्यागत - वृंदावनलाल वर्मा Pratyagat - Hindi book by - Vrindavanlal Verma
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प्रत्यागत

वृंदावनलाल वर्मा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :228
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1621
आईएसबीएन :81-7315-248-9

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वृंदावनलाल वर्मा का एक और सामाजिक उपन्यास...

Pratyagat

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नवलबिहारी ने वहीं खड़े-खड़े कहा, ‘इन पाजी लौंडों की यह हिम्मत! धर्म को गारत किया, अब अपने बड़े-बूढ़ों के अपमान पर कमर कसी है।’
पंचपात्र छीनने के लिए नवलबिहारी मंगल के पास ऐसे स्थान पर आए जहाँ सोमवती या फूलरानी से उनकी मुठभेड़ नहीं हो सकती थी। मंगल से बोले, ‘अपना नाश किया था, सो उसका तुमको यह प्रायश्चित्त करना पड़ा; अब सारे समाज का नाश करके कौन सा प्रायश्चित्त करोगे ?’

मंगल ने कहा, ‘तुम्हारे सरीखे संसार डुबोइयों की अकल अगर मैंने ठीक कर दी तो हमारे समाज का बेड़ा पार है।’
एक युवक ने बड़ी बेतकल्लुफी के साथ कहा, ‘पंडितजी, क्यों चाँय-चाँय मचाए हुए हो ? भाई के हाथ का चरणामृत बँट चुका, अब जरा अपनी बहिन के हाथ का भी पी लेने दो।’
नवलबिहारी की आँखों में खून आ गया। उनकी सहज सरल मुसकराहट तो जान पड़ता था मानो दीर्घकाल से लुप्त हो गई हो। आकृति बहुत भयानक हो उठी।
लखपत ने उसको पकड़कर कहा, ‘पंडितजी, यहाँ से चलिए। ये लोग बलवा करने के लिए आमादा हैं। मंदिर अपवित्र हो गया है। कल इसको शुद्ध करावेंगे।’

एक लड़का ठहाका मारकर बोला, ‘वाह रे भैया खूसट !’
पं. नवलबिहारी आग उगलनेवाली दृष्टि से इन सब पूजकों की ओर देखते जाते थे और उनको लखपत समेत उनके दो तीन इष्ट मित्र बाहर घसीटे लिये जाते थे।

इसी पुस्तक से

परिचय


इस कहानी में वर्णित मूर्ति के लौट डालने की घटना सन् 1927 के अंत या 1928 के आरंभ की है। उसका जो कुछ निर्णय पंचायत में हुआ था, वह सच्ची घटना है। प्रायश्चित्त से और मंदिर में देव-दर्शन के समय फसाद से संबंध रखनेवाली बातें भी सच्ची हैं। मलाबार की जो कथा इस उपन्यास में कही गई है, वह काल्पनिक है। जिन व्यक्तियों के कारण वे घटनाएँ घटित हुई थीं, उनका नाम और स्थान इस समय नहीं बतलाया जा सकता।

वृंदावनलाल वर्मा

प्रत्यागत


‘ब्राह्मण का लड़का होकर तू खिलाफत-विलाफत के झगड़ों में क्यों पड़ता है ?’
‘देशहित के बाधकों का उससे संवरण होगा, केवल इसीलिए; वैसे तो मैं इस शब्द का ठीक-ठीक अर्थ भी नहीं जानता।’
प्रश्नकर्ता अधेड़ अवस्था के वृद्ध शरीर पुरुष थे और उत्तर देनेवाला अठारह-उन्नीस वर्ष का एक युवा।
वृद्ध पुरुष बाँदा के रहनेवाले धर्मभीरु, शांत स्वभाव टीकाराम शर्मा थे और युवा उनका आत्मज मंगलदास चंचल वृत्ति, सहसाप्रवर्ती लाड़-दुलार का बिगड़ा हुआ बालक। देश की आन पर प्राण न्योछावर कर डालने की बात वह अपने मुँह से अनेक बार कह चुका था। इसलिए टीकाराम को अपने लड़के पर प्यार के अलावा अभिमान भी था। उस हलके शरीर के सुंदर-मुख युवक पर टीकाराम शायद ही कभी नाराज हुए हों- किसी पर भी टीकामराम शायद ही कभी नाराज हुए थे। परंतु उनकी ढली हुई आँख जब तिरछी गरदन के साथ नीची हो जाती थी तब लोगों को मालूम होने लगता था कि बिना किसी तूफान के यह जो कुछ हठ करेंगे, उसका निवारण संसार के सिवाय उनके लड़के मंगलदास के और कोई न कर सकेगा।

टीकाराम ने अपने जमाने में फलित ज्योतिष की बारीकियों से इतना रुपया कमाया था कि उनको मंगलदास के भविष्य की अधिक चिंता न रही थी। ज्योतिष या और किसी भी शास्त्र की ओर लड़के की बहुत रुचि न देखकर और उसकी चपलता में किसी भावी विद्वान् की छाया परखकर कई बरस अँगरेजी पढ़ाई। जब बहुत दिनों स्कूल में तालीम पाई तो अँगरेजी जरूर उसने बहुत सीख ली होगी; परंतु जहाँ तक लोगों को मालूम है, मंगलदास ने कोई विशेष परीक्षा पास नहीं की, वितंडाशास्त्र पर अवश्य ही उसका पूरा अधिकार हो गया था। एक दिन देशप्रेम की, या मन की, लहर ने उसको स्कूल से बिदा लेने पर मजबूर कर दिया।

टीकाराम और सबकुछ सह सकते थे, परंतु धर्म और धर्म-रूढ़ियों के मार्ग से विचलित होता हुआ वह अपने दुलारे लड़के को भी नहीं सहन कर सकते थे। अपने विश्वासों के खिलाफ बातें करने और सोचनेवालों से टीकाराम अपने विश्वास-विरोधियों को खोटी सुनाने से भी न चुकते थे। यद्यपि वह शास्त्रार्थ करने के बखेड़ों से दूर रहते थे, परंतु अकेले में ‘नास्तिक’ से भी कहीं अधिक कठोरतर शब्द के व्यवहार से उनको कौन रोक सकता था !

मंगलदास भी शास्त्रार्थ को व्यर्थ विनाश के सिवा और कुछ नहीं समझता था; परंतु मनोरंजकता के लिए वितंडावाद करने में अरुचि न थी। हँसी-मजाक उसके अनुकूल था और वह किसी पुरुष या विश्वास की दिल्लगी उड़ाने से न चूकता था-केवल अपने पिता के धार्मिक विश्वासों को छोड़ देता था। धर्म के संबंध में उसने सुना बहुत था, परंतु मनन कभी नहीं किया था।
खिलाफत कमेटियों की जिस समय में गरम हवा चल रही थी, उस समय किसी धर्म के नाते नहीं, किंतु अपने राजनीतिक संतोष के लिए मंगलदास ने खिलाफत आंदोलन में खूब भाग लिया। वैसे मंगलदास पर टीकाराम कोई विशेष निगरानी नहीं रखते थे-चाहे जो किया करता था, परंतु सभा-समाजों में जिनके व्याख्यानों पर करतल ध्वनि होती है उनको लोग कोशिश करने पर भी विख्यात होने से नहीं रोक सकते। इसीलिए टीकाराम के कानों में भी उसकी यह कीर्ति पहुँची।
मंगलदास के कारण बाँदा जिले में खिलाफत आंदोलन को खासा जोर मिला और वह स्कूल छोड़ने के बाद अंत में खिलाफत कमेटी का संयुक्त मंत्री भी हो गया-यह बात टीकाराम को एक दिन भजन-पूजन की समाप्ति पर मालूम हो गई। लड़के की कीर्ति से बाप का पुलकिल हो जाना स्वाभाविक है, परंतु मंगलदास की यह कीर्ति सुनकर टीकाराम को न मालूम क्यों कुछ संकोच-सा मालूम हुआ।

भोजन के उपरांत पान चबाते-चबाते बाप ने बेटे से उक्त प्रश्न किया-‘ब्राह्मण का लड़का होकर तू खिलाफत-विलाफत के झगड़ों में क्यों पड़ता है ?
मंगलदास का उत्तर पाने पर टीकाराम ने कहा, ‘देश का इससे क्या उपकार होगा रे ?’
मंगलदास बोला, ‘‘दादाजी, जिन-जिन बातों से अँगरेज परेशान हों, उन-उन सब बातों से देश को लाभ होगा।’
‘यह सब वाहियात है-अरे, और यह खिलाफत है क्या ?’
‘ठीक-ठीक यह क्या है, सो तो मुसलमान भी नहीं बतला सकते, परंतु इसमें संदेह नहीं कि हिंदू-मुसलमानों में उसके कारण बहुत मेल जोल पैदा हुआ है। देश के लिए यह काम कल्याणकारक नहीं है।’
‘आखिर यह लड़ाई है किस बात की ?’
‘इस बात की कि मुसलमानों के एक बड़े भारी पुरुष को, जो टर्की में रहते हैं, अँगरेजों ने अपमानित किया है और उनका राज्य छीन लिया है। उन्हीं की मदद के लिए सब हिंदू-मुसलमान अपना पूरा बल लगा रहे हैं।’
‘टर्की क्या है रे ?’

‘इतना सब सवाल, दादाजी, बेकार है। संसार के नक्शे में यहाँ से दो तीन हजार मील दूर मुसलमानों का एक बड़ा राज्य है।’
विश्रांति की साँस लेकर टीकाराम हँसकर बोले, ‘जरा सी बात के लिए इतनी खलबली करते हो जी तुम लोग ! परंतु तू अब उस सभा का संयुक्त मंत्री होकर क्या अरबी पढ़ेगा ?’
मंगलदास हँसने लगा। बोला, ‘दादाजी, गले को एक साथ ही संकुचित और विस्तृत करने से थोड़े से ही समय में जो विभिन्न शब्द-समूह उच्चरित हो, वही मेरे लिए अरबी भाषा हो जावेगी; परंतु ऐसी क्लिष्ट चेष्टाओं के लिए खिलाफत कमेटी की स्थापना नहीं हुई है।’
‘है तो अच्छा।’ टीकाराम ने अपनी आधी सफेद और आधी काली दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘इससे यदि हिंदू-मुसलमानो का स्थायी मेल-जोल स्थापित हो जाय तो अच्छा होगा; परंतु क्यों जी, इस खिलाफत के खतम होने पर फिर कौन सा उपद्रव करोगे ?’
मंगलदास ने हँसते हुए कहा, ‘कुछ-न-कुछ तलाश कर लेंगे।’


:2:



मंगलदास का विवाह छुटपन में हो गया था और गौना इत्यादि भी। उसकी माँ-पौत्र-प्राप्ति की अभिलाषा में महीने में कई व्रत रखा करती थी और पुत्र व वधू के बहुत कहने सुनने तथा मनाने पर भी अपने शरीर की छीज को रोकने का कोई उपाय नहीं करती थी। उस पर सदा हाथ भर का घूँघट डाले रहने के कारण मंगलदास की पत्नी को सवा हाथ का डाले रखना पड़ता था। परंतु वह नित्य-नैमित्तिक पूजा-अर्चा अपनी सास से अधिक करती थी और चूल्हे-चौके के कार्य में भी कभी त्रुटि नहीं आने देती थी।
मंगलदास हैरान था कि इतना सब काम घर भर के लिए काफी होने पर भी पौत्र की इच्छा मां को क्यों परेशान किए रहती है।

टीकाराम वैष्णव थे। इसलिए वैसे भी जप और पाठ में बहुत समय बिताते थे; किंतु कुछ दिनों से रामायण के सुंदरकांड का पाठ विशेष रूप से करने लगे थे। बस्ती में कई जगह बहुत से लोग मिलकर गा बजाकर प्रति मंगल और शनिवार को रामायण का पाठ किया करते थे। एक स्थान पर टीकाराम भी नियमपूर्वक जाते थे और रामायण में श्रद्धा के साथ भाग लेते थे। मंगलदास भी कभी-कभी शरीक हो जाता था। कंठ मधुर होने के कारण उसको रामायण-गायन में बहुत आनंद प्राप्त होता था। परंतु एक ही प्रकार के आनंद में बहुत काल तक संलग्न रहना मंगल की प्रकृति में न था, इसलिए उसके बहुत से नागे भी हो जाते थे। बड़े-बड़े त्योहारों पर रामायण-पाठ विशेष समारोह और सजावट के साथ होता था।

जिस रामायण वादिनी सभा में टीकाराम और मंगलदास जाते थे उसके सभापति दफ्तर के एक बाबू नवलबिहारी शर्मा थे। चढ़ती अवस्था के एक हट्टे-कट्टे व्यक्ति थे। आँखों में प्रभुता और चेहरे पर मुसकराहट खेला करती थी। उन्होंने अनेक शास्त्रों को तो न मथा था, परंतु अँगरेजी गए जमाने के एंट्रैंस तक पढ़ी थी और अपने धर्म का जितना रूप उन्होंने देखा और सुना था, उसमें उनका कट्टर विश्वास था। दफ्तर में अपने साहब के सिवाय वह और किसी से बिलकुल न डरते थे। दफ्तर में या बाहर जो कोई उनसे ‘पंडितजी पालागन’ कहता, उसको वह इतने कृपालु भाव के साथ आशीर्वाद देते कि मानो जागीरें लगा रहे हैं। उन्होंने अपने मन में करीब-करीब सभी बातों के पैमाने बना रखे थे। उन पैमानों पर जो ठीक न उतरता उसकी, और नहीं तो, उनके जी में खैर न थी।

बाँदा में कई दर्जन रामायण सभाएँ थी। उन सब पर पं. नवलबिहारी की कारगुजारी और धर्मारुढ़ता की छाप थी।
कंठ उनका सामूहिक गायन-वादन के भी लायक न था; परंतु इससे नवलबिहारी कभी हतोत्साहित नहीं हुए। सबसे ऊँचा मेरा कंठ बोले, इस धुन में जब वह रामायण कहते थे तब उनको यह नहीं मालूम पड़ता था कि साथ के गानेवाले सबके सब उनके स्वर के पैमाने से बेसुरे हो रहे हैं। प्रति मंगल और शनिवार को रामायण-पूजन के बाद फूलों की सभापतित्वसूचक एक बड़ी सी माला उनके गले में डाली जाया करती थी-बड़े त्योहारों पर खासतौर पर जो बड़ी और रंग-बिंरगी पुष्पमाला उनके गले में डाली जाती थी, उससे उनके नेत्रों की प्रभुता की श्री और भी बढ़ जाती थी। उस समय वह आदि से अंत तक सतर्कता के साथ यह देखा करते थे कि कोई रामायण-पाठ में कसर तो नहीं करता।
उस दिन रामनवमी का विशेष उत्सव था और खास सजधज तथा सजावट के साथ मंदिर में, जो नवलबिहारी ही का था, रामायण के पाठ की तैयारी हुई थी। मूर्ति की भी अनोखी सजावट की गई थी। स्त्रियाँ भी पाठ सुनने और देव-दर्शन के लिए आईं। मंगल की माँ और पत्नी सोमवती भी उनमें थीं। मंगल के पिता उस दिन विशेष भक्ति और तन्मयता के साथ रामयश-गान में लीन हुए।

परंतु मंगलदास की चपल प्रकृति में देर तक गंभीर रहना असंभव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य था।
उस दिन फूलों के कई बड़े-बड़े गजरे डाले हुए पं. नवलबिहारी ने विशेष झूम-झूमकर गायन-वादन शुरू किया। आवाज की ऊँचाई में भी कुछ अधिक उन्नति जान पड़ती थी।
मंगलदास भी कीर्तन में भाग ले रहा था, परंतु उसके जी में बड़ी देर से जो बात उठ रही थी उसके सुनाने के लिए वह सुपात्र श्रोता की तलाश में पागल-सा हो उठा। अधिक समय तक उस वृत्ति का नियंत्रण न कर सकने पर कुछ दूरी पर गाते हुए अपने से कुछ कम उम्र के एक लड़के के पास जा बैठा। इस हरकत को देखकर सभापतिजी ने आँखें तरेरीं। टीकाराम भी देखकर जरा व्यथित हुए; परंतु कीर्तन में कोई खास रुकावट नहीं पड़ी।

जब और सब लोग गा रहे थे तब मंगलदास ने उस लड़के के कान में कहा, ‘पंडितजी गजरों के भार से टूटे जा रहे हैं।’
लड़के ने गौर के साथ पंडितजी की ओर देखा और पंडितजी तो देख ही रहे थे। लड़के ने दूसरी ओर दृष्टि फेर ली। पंडितजी समझ गए, मेरे विषय में ही कुछ कहा है।
मंगलदास ने देखा कि लड़के के मन में चुलबुली पैदा नहीं हुई, तब चुटकी लेकर बोला, ‘‘जरा सुनो जी, सब लोग गा रहे हैं, अकेले हमारे तुम्हारे गले बंद रहने से उत्सव फीका न पड़ेगा।’
लड़के ने डरते-डरते नीची निगाहों पंडितजी की ओर ताककर कहा, ‘‘कहो न जल्दी, क्या कहते हो !  पंडितजी हम लोगों की ओर घूर रहे हैं।’

लड़के ने एक अनूठी बात कहने का प्रयत्न किया था। तुरंत मंगलदास ने कान में बड़ी गंभीरता के साथ कहा, ‘‘कैसा भैंसे की तरह रेंकता है !’ अनूठी बात कहने के प्रयत्न ने इस ठिठोली के लिए उस लड़के के मन में बेकाबू जगह कर दी थी। भैंसा और रेंकना ! खिलखिलाकर हँस पड़ा। मंगलदास को भी अपने ही शब्द-चातुर्य पर हँसी आ गई। दोनों ने ओठ काटकर हँसी को रोकना चाहा। न रुकी। तब कपड़ा मुँह में दबाया। फिर भी हँसी का तूफान न रुका। रामायण का पाठ बंद हो गया। सबकी त्योरियों पर बल आ गए। पंडितजी ने गरजकर कहा, ‘क्यों रे अहमको, क्या यही स्थान तुमको ठिलठिलाने के लिए लिया ?’

एक क्षण के लिए दोनों की हँसी बंद हो गई, परंतु भैंसे के रेंकने का चमत्कार स्मरण करके फिर दुगुने वेग के साथ दोनों हँस पड़े। टीकाराम दाँत पीसकर चुप रहे। नीची आँख और तिरछी गरदन करके कुछ सोचने लगे। नवलबिहारी ने कहा, ‘मैं जानता हूँ। यह सब आरिया समाज की हवा का नतीजा है। तुम्हीं सरीखे कपूत हिंदू समाज को गड्ढे की ओर लिये जा रहे हैं।’
इस आक्षेप को सुनकर दोनों अप्रतिभ हो गए। बिलकुल गंभीर। हँसी ऐसी बिदा हुई कि अपनी एक रेखा भी न छोड़ गई। मंगलदास का साथी परिताप में डूबने-उतराने लगा।
टीकाराम ने आँख उठाकर कहा, ‘क्यों जी, क्या बात थी ? कथा के बीच में यह तूफान क्यों उठाया ?’’
‘कुछ भी तो नहीं।’ कहकर मंगलदास दूसरी ओर देखने लगा।
तब नवलबिहारी ने संपूर्ण गुत्थी को उसी समय सुलझा डालने के निश्चय से प्रखर स्वर में मंगल के समदोषी साथी से पूछा, ‘‘क्यों रें बाबूराम, क्या बात थी ? ठीक-ठीक बतला, नहीं तो अभी तेरा नाम सभा के सदस्यों की सूची से काटकर अलहदा कर दूंगा और कभी यहाँ न झखने दूँगा।’
बाबूराम ने संकोच के साथ कहा, ‘यह कहते थे....’ फिर आगे कुछ न बोला गया। मंगलदास ने उसकी ओर तीव्र दृष्टिपात करके निवारण किया।

नवलबिहारी डपटकर बोले, ‘खबरदार जो कोई इशारा किया ! बतला रे बाबूराम, ठीक-ठीक बात।’
बाबूराम बोला, ‘कुछ नहीं, पंडितजी।’
पंडितजी ने कड़ककर कहा, ‘नहीं बतलावेगा ?’
‘यह कहते थे,’ उस लड़के ने मंगलदास की ओर बिना देखे हुए कहा, ‘यह कहते थे कि पंडितजी भैंसे की तरह रेंकते हैं।’
लड़के ने दूसरे वाचकों की ओर चंचलदृष्टि के साथ देखा। दो एक रोकने पर भी मुसकराहट को न रोक सके थे। तब भैंसा और उसके रेंकने के विचित्र चित्र की कल्पना करके बाबूराम फिर हँस पड़ा; परंतु तुरंत उठकर वहाँ से भाग गया। मंगलदास हँस नहीं रहा था। किसी से भी निगाह न मिलाकर इधर-उधर देख रहा था। अधिकांश वाचर अत्यंत कोप के साथ मंगलदास की ओर देख रहे थे। टीकाराम की ढली हुई आँखों में एक विचित्र चमक दिखलाई पड़ रही थी। कुछ सदस्य इधर-उधर मुँह चुराकर मुसकरा रहे थे। इनमें से एक रायसहाय वैद्य भी थे। वह बोले, ‘कथा आरंभ करो। इस बात को फिर सोचा समझा जावेगा।’

‘नहीं, यह कोई साधारण घटना नहीं है।’ नवलबिहारी ने कहा, ‘आज यहीं समाप्त करके आरती उतारो। इन शठों को कुछ दंड दिए बिना यह सभा नहीं चल सकेगी।’ और अपने साथियों की सहमति का इंतजार किए बिना ही पंडितजी ने फटे हुए गले से दोहा समाप्त करके, रामायण की आरती उतारकर सभा विसर्जित कर दी। अंत में बोले, ‘टीकारामजी, आप सरीखे विद्वान् और सज्जन के घर ऐसा खराब लड़का नाम डुबोने के ही लिए पैदा हुआ है। क्या यह कोई रोजगार-धंधा नहीं करता है ?’
‘कुछ भी नहीं,’ टीकाराम ने बडे करुण कंठ से कहा, ‘परंतु अब इसको कोई-न-कोई काम अवश्य करना होगा, नहीं तो सचमुच किसी दिन इसके कारण हम लोगों की दुर्दशा होगी। लेकिन एक बात का मैं विश्वास दिलाता हूँ। यह किसी समाज अमाज से कोई संबंध नहीं रखता।’
मंगल के पास से दुःखी नवलबिहारी को उसके बाप के उस आश्वासन से संतोष नहीं हुआ। बोले, ‘देखा जाएगा। मैं यदि इस सभा का सभापति रहा और यदि इस धर्मकार्य का भार मेरे ही कंधों पर आप लोग डाले रहे तो इन लौंडों को कभी इस स्थान पर नहीं आने दूँगा। इस तरह की बदनामी से मेरा नहीं, किंतु व्यास गद्दी का अपमान होता है।’
उस दिन अपनी स्त्री और बहू को साथ लिये हुए टीकाराम घर पर बहुत दुःखी आए।


:3:



कीर्तन-स्थान में अपने परिहास पर मंगलदास को जितना परितोष हुआ था उसके फल पर उसको उतनी खिन्नता नहीं हुई। टीकाराम की ग्लानि ने भोजन की अस्वीकृति का रूप धारण किया। मंगल की मां उनको मनाने लगी। टीकाराम को खाने-पीने की जल्दी नहीं मालूम होती थी। बोले, ‘न मालूम यह लड़का हमारे पुरखों की कीर्ति किस क्षण खाक कर देगा। तुम लोग अपना घर-बार सँभालो, मैं तो कल सवेरे ही तीर्थयात्रा को जाऊँगा।’
लड़के को बहुत भला-बुरा कहकर मां बोली, ‘तुम एक दिन दो थप्पड़ उसके मुँह पर दो थप्पड़ जमा तो अकल ठीक हो जाएगी।’

टीकाराम ने कहा, ‘अजी, अब क्या वह काबू का है ? उसपर हाथ उठाते ही कहीं मेरे ऊपर वज्र न टूटे। अब तो उसी को घर-गिरस्ती का मालिक बनाओ, मुझसे कोई सरोकार नहीं।’
मंगल भी इस प्रस्ताव को सुन रहा था। छिपने की उसमें वैसे भी आदत न थी। सामने आकर हाथ जोड़कर बोला, ‘‘दादाजी, मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ, पैर छूता हूँ और अपने कान पकड़ता हूँ। आगे कभी ऐसा नहीं करूँगा। अब की माफ कर दीजिए।’

‘अरे भाई, तू अब नेता बन गया है, किसी दिन हम लोगों के प्राणों पर बनेगी।’ टीकाराम ने घटते हुए स्वर में कहा, ‘अब तो इसका सत्यानास ही समझो धर्म-कर्म सब विलीन हो जाने को हैं।’
मंगलदास ने हार नहीं मानी। शब्दों की सहायता से काम होता हुआ न देखकर उसने टीकाराम के पैर पकड़ लिये। टीकाराम ने कुछ नहीं कहा। भोजन के लिए उठ खड़े हुए। मंगल ने सोचा कि बात की बात में पिता का कोप शांत कर लिया। बाप बेटे दोनों एक ही थाली पर जा बैठे। टीकाराम किसी विचार में निमग्न चुपचाप खाना खा रहे थे और मंगल मन की एक बात कहने का उपयुक्त अवसर ढूँढ़ने में लगा हुआ था। कोई उपाय न देखकर बोला, ‘‘दादाजी, गुस्सा तो न करोगे ?’

‘क्या बेटा ?’ टीकाराम ने इस तरह से पूछा जैसे कोई सोते से जाग पड़े।
पिता के स्वर में कठोरता का आभास न पाकर मंगल ने अधिक उत्साह के साथ कहा, ‘पंडित नवलबिहारी ने हम लोगों को आर्यसमाजी कैसे कहा ? आप तो जानते हैं कि यह सब बात झूठ है।’
‘क्या मालूम !’ टीकाराम ने शांति के साथ उत्तर दिया, ‘संसार में न मालूम किस वेश में क्या-क्या हो रहा है।’
मंगलदास के मन में यह नोक नहीं चुभी। बेधड़क बोला, ‘आपको मालूम है, दादाजी, मैं कविता भी करता हूँ।
चकित दृष्टि से उसकी ओर देखकर टीकाराम बोले, ‘निठल्लो को कविता और खिलाफत के सिवाय और सूझ ही क्या सकता है ! क्यों रे, संसार में क्या तुझसे कुछ भी न बन पड़ेगा ?’

किसी उठते हुए तूफान की आशंका से पास बैठी हुई मंगल की माँ ने कहा, ‘क्यों मंगल, क्या तू उनको अच्छी तरह भोजन भी न करने देगा ?’ और जरूरी न होने पर भी उसने थाली में और भी पकवान डाल दिया।
दूसरी ओर मनोवृत्ति को आकर्षित कर ले जाने का उस बिचारी का उद्देश्य मंगल की विचारधारा में बाधा न डाल सका। वह अप्रतिहत होकर बोला, ‘कमबख्त आर्यसमाजियों की तो मुझको एक भी बात पसंद नहीं। महज बकवाद।’



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