कचनार - वृंदावनलाल वर्मा Kachanar - Hindi book by - Vrindavanlal Verma
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ऐतिहासिक >> कचनार

कचनार

वृंदावनलाल वर्मा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :272
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1626
आईएसबीएन :81-7315-049-4

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‘कचनार’ मेरी अमरकंटक यात्रा का प्रतिबिंब और उस आशा का प्रतीक है।...

Kachnar

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

परिचय

धामोनी और सागर मेरे घर से कुछ दूर हैं-धामोनी झाँसी जिले कि दक्षिण सीमा के निकट है-पर सागर और धामोनी दोनों, मेरे हृदय के बहुत निकट हैं। जब मैंने सागर गजेटियर, बुंदेलखंड का इतिहास और लालकविरचित ‘छत्र-प्रकाश’ पढ़े और उन स्थानों की श्री को देखा, तब मन में एक लालसा उत्पन्न हुई।

सन् 1935 में, और फिर 1936 में, मुझको अमरकंटक पर्वत के पठारों पर भ्रमण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अमरकंटक के जिस पठार से कूदकर नर्मदा मेखलश्रेणी को चीरती-फाड़ती अपने दोनों कूलों की विशाल हरी-भरी कुंजों को मंजुल-मंगल बाँटती हुई चली गई है, वहाँ एक कुटी के सामने कुछ क्षण के लिए, तपस्या की एक मूर्ति देखी। अद्भुत सौंदर्य की प्रत्यक्ष कल्पना। प्रताप के नीचे नीबू का एक झाड़ था। फलों से लदा हुआ। निकट ही हरसिंगार के पेड़ लाल डंडी और मोती सदृश सफेद पंखुडियोंवाले छोटे-छोटे फूलों से लदे हुए थे। ये फूल टपक-टपककर नर्मदा के साथ कलोलें करते हुए बहते चले जाते थे। और कहीं से, न जाने कहाँ से, निवारी के फूलों की सुंगध के झोंके-पर-झोंके आकर हरसिंगार के सौरभ को मद-सा दे रहे थे।
मैं उस अनुभव को कभी नहीं भूला। स्मृति में एक गुदगुदी-सी बनी ही रही।
भवाल संन्यासी का मुकद्दमा कलकत्ता हाईकोर्ट से तय हुआ। उस मुकद्दमे का संक्षिप्त विवरण एक पुस्तक में छपा। पढ़ने पर अमरकंटक के स्मरण ने उसकी एक रूपरेखा दे दी। परंतु ‘झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई’ को पूरा करने के पहले और कुछ हाथ में लेने का संकल्प नहीं कर सकता था।

अकस्मात् सन् 1946 के आरंभ में एक पुस्तक मेरे हाथ लगी। इंग्लैंड में सन् 1805 में छपी थी। लगभग वैसी ही भद्दी छपाई जैसी चालीस-पचास वर्ष पहले हिंदी में ‘किस्सा तोता-मैंना’ की होती थी। नाम था ‘नोट्स ऑन दि ट्रांजेक्शंस ऑफ दि मरहठा एम्पायर’। पुस्तक के विषय को तत्कालीन गवर्नर जनरल ने तैयार किया था। सन् 1772 से 1803 ई. तक की उन सब महत्त्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन उसमें था जिनका संबंध ईस्ट इंडिया कंपनी से था। गवर्नर जनरल ने जो खरीते इन घटनाओं पर बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के पास भेजे थे, वे सब इसमें थे। लड़ाइयों के नक्शे भी। उसी समय श्री अलविन की ‘फॉकसोंग्स् ऑव दि मेखल रेंज’ और नागपुर से सरकार द्वारा प्रकाशित ‘दि राजगोंड्स्’ पुस्तकें भी हाथ आ गईं। सर यदुनाथ सरकार का ग्रंथ ‘फाल ऑव दि मुगल एम्पायर’ तो हाथ में था ही। धामोनी गोंडो-राजगोंडों-का था। मुगलों, मराठों और बुंदेलों की जकड़ों में से गोंडों ने हटते-हटते भी इसको खोया और पाया। यह क्रम कई बार घटित हुआ।

आजकल के भारतीय राजनीतिक विकास में गोंड कोई विशेष भाग लेते हुए नहीं जान पड़ते; यद्यपि मध्यभाग में उनके कई राज्य हैं। परंतु एक समय वे अपने सहज, सरल, स्वाभाविक और प्रमोदयमय जीवन द्वारा भारतीय संस्कृति को अपने दृढ़ और पुष्ट हाथों की अंजलियाँ भेंट किया करते थे। वे क्या फिर ऐसा नहीं कर सकते ? मुझको तो आशा है।
‘कचनार’ मेरी अमरकंटक यात्रा का प्रतिबिंब और उस आशा का प्रतीक है। ‘लक्ष्मीबाई’ को पूरा करने पर मैंने ‘कचनार’ का लिखना आरंभ कर दिया।

‘कचनार’ में भवाल संन्यासी के मुकद्दमे की एक घटना का सहारा लिया गया है; परंतु भवाल संन्यासी का, विस्मृत घटनाओं के फिर स्मरण करने के विषय पर, उस मुकद्दमे में ही मतभेद था। मुकद्दमे के उभयपक्ष की ओर से अनेक बड़े-बड़े डॉक्टर अपनी अपनी बात का समर्थन करने के लिए पेश किए गए थे। एक पक्ष के डॉक्टरों का मत था कि जहर से मनुष्य की स्मरणशक्ति नष्ट नहीं की जा सकती; नष्ट हो जाए तो वह फिर लौटकर नहीं आ सकती, और, त्रिशंक बनकर वह टँगी तो रह ही नहीं सकती। दूसरे पक्ष के डॉक्टरों का मत इससे बिलकुल विपरीत था। हाईकोर्ट ने इस विपरीत मत को मानकर निर्णय किया।

परंतु संसार के डॉक्टरों में इस विषय पर मतभेद बना रहा, और है।
तैंतीस-चौंतीस साल हुए जब मैंने ‘सरस्वती’ मासिक पत्रिका में घोड़े से गिरने की एक दुर्घटना का वर्णन पढ़ा था। घोड़े से गिरनेवाला एम.ए. पास था। घोड़े से गिरने पर वह अचेत हो गया। चेत आने पर उसको अक्षरों तक का बोध न रहा ! उसको धीरे-धीरे फिर अभ्यास कराया गया। यह नहीं मालूम कि उसको कौन-सी दवा दी गई थी, दवा ने क्या प्रभाव किया और उसके आगे के जीवन-क्रम पर उस चोट का क्या चिह्न रहा। झाँसी के रेलवे सर्जन डॉ. एन.जे. बखरू एक नामी डॉक्टर हैं। उन्होंने हिंदुस्तान में और बाहर ऑस्ट्रिया इत्यादि में, बरसों डॉक्टरी विषय का अध्ययन किया है। मेरे मित्र हैं। मैंने अपनी समस्या को उनके सामने पेश किया। उनका भी मत है कि जहर से बचे हुए मनुष्य की स्मरणशक्ति लुप्त नहीं होती, और टँगी तो वह रह ही नहीं सकती। स्मरणशक्ति पर चोटों के प्रभाव की बात छेड़ने पर उन्होंने कहा कि इससे स्मरणशक्ति टँगी रह सकती है; चोट लगने से पहले की संपूर्ण घटनाओं को मनुष्य भूल सकता है।

‘कब तक भूला रहेगा वह ?’ मैंने उनसे पूछा। डॉक्टर बखरू ने उत्तर दिया, ‘जब तक उसको फिर वैसी ही चोट न लगे कि जिससे भेजे की हटी हुई गाँठ या गुत्थी फिर अपने स्थान पर आ जाए।’
‘यदि दूसरी चोट के लगने में काफी समय लग जाए या कभी लगे ही नहीं, तो क्या भेजे में कोई दूसरी कोठरी बन जाएगी जो चोट खाए हुए मनुष्य के नित्य के अनुभवों का अकंन करती रहे और नई स्मरणशक्ति का सृजन कर दे ?’
‘यह संभव है। परंतु चोट खाया हुआ मनुष्य कुछ समय तक भूले–बिसरेगा, फिर क्रमशः स्मरणशक्ति बढ़ती जाएँगी; परंतु चोट खाने की बाद की भी सब बातों को वह याद न रख सकेगा, और जैसे-जैसे कालांतर होता जाएगा, वह पिछली बातों को भूलता जाएगा, नई को याद रखता जाएगा, फिर स्मरण-क्षेत्र का समय दीर्घ होता जाएगा; परंतु चोट लगने से पहले की वह किसी घटना का स्मरण नहीं कर सकेगा।’

मैंने पूछा, ‘डॉक्टर, यदि दूसरी चोट से ऐसे मनुष्य के दिमाग की गाँठ फिर अपने स्थान पर आ जाए जो पहली चोट से हट गई थी, तो दोनों चोटों के बीच के जमाने की बातें उसको याद रहेंगी या नहीं ? यदि याद रहेंगी तो कितने समय तक की ?’
मैंने और भी कई प्रश्न किए। डॉक्टर बखरू का अध्ययन गहरा है। वह जितने बड़े डॉक्टर हैं, उतने बड़े सज्जन भी हैं।
उन्होंने हँसकर उत्तर दिया, ‘आपने तो डॉक्टरी संसार के लिए एक समस्या खड़ी कर दी है। परीक्षा और विवेचना के योग्य है। अपने कहानी-जगत् में से कोई हल निकालो, हम लोग विचार करेंगे।’

मैंने कहा, ‘मैं एन्थ्रापॉलोजी (नर शास्त्र) का विद्यार्थी रहा हूँ। उस प्रकार की चोट खाए हुए मनुष्य का विकास, चेत में आने के उपरांत, क्या बालक या बर्बर की ही तरह न होगा ?-क्योंकि बालक और बर्बर के विकास में समानता है।’
उनके उत्तर पर मनोविज्ञान और विश्लेषण (साइकोएनालिसिस) के कुछ अंगों पर चर्चा हुई। परंतु उसका सार भी यहाँ देना अभीष्ट नहीं है।
एक बात और उठी।
‘यदि दो मरे हुए आदमियों में से एक का भेजा दूसरे के भेजे की जगह रख दिया जाए और उनमें से एक जीवित हो जाए तो बदला हुआ भेजा इस मनुष्य के जीवन को बदल न देगा ?’
वह हँसे और फिर भौंह तानकर बोले, ‘बिलकुल फेंटेस्टिक है-शेखचिल्ली जैसा-करके देखो, अर्थात् ऐसे भ्रम पर कोई कहानी लिखो, डॉक्टरों को उपन्यास पढ़ने का अवकाश नहीं। साधारण पाठक शायद समझ नहीं पाएँगे, कोई बेतुका सिनेमावाला कहानी को उड़ाकर एक भद्दा चित्रपट बनाकर खड़ा कर देगा !’

और जो कुछ उन्होंने कहा, वह मेरे और उनके बीच की बात है।
इतना ही कहना चाहता हूँ कि मेरे इस उपन्यास में यदि डॉक्टरों को वैद्यक शास्त्र के अनुकूल बातें मिलें तो उसका श्रेय डॉक्टर बखरू को है और यदि वैद्यक-मत के विपरीत हों या गलत हों तो उसका दोष मेरा है।

‘कचानार’ के ऐतिहासिक पहलू के संबंध में मुझको उतना संकोच नहीं है। उपन्यास में वर्णित सब घटनाएँ सच्ची हैं। केवल समय और स्थान का फेर है। उदाहरण के लिए, डरू की घटना, जो उसके भाई के वध से संबंध रखती है, धामोनी की नहीं है; बल्कि ओरछा राज्य स्थित उबोरा ग्राम से संबंध रखती है, डरू का नाम भी उबोरा से ही लिया गया है। बाकी घटनाएँ-डरू का कर्नल हो जाना, पिंडारियों द्वारा सागर की लूट में भाग लेना और अंत में साहस के साथ अपने वध का सामना करना-सब ऐतिहासिक हैं। जनरल मालकम ने अपने ‘मिमायर्स ऑव सेंट्रल इंडिया’ में उनमें से कई का वर्णन किया है। परंतु असली डरु जल्लाद के हाथों मारा गया था-जब सिपाहियों ने गोली मारने से इनकार किया। परंतु मुझको डरू के मरवा देने की आवश्यकता नहीं जान पड़ी।

महंत अचलपुरी और उनका अखाड़ा एक वास्तविकता है। उस समय में गुसाईं सैनिकों के समूह पराक्रम-विकास और धनोपार्जन की लालसा से देश के मध्य भाग में घूमा करते थे। ऐसे एक समूह ने तो राज्य ही स्थापित कर लिया जो अब तक चला आ रहा है।

अचलपुरी में एक विशेषता थी जो उस कर्कश काल के कई समूहनायकों में पाई जाती थी। मालकम ने अपने मिमायर्स में सही लिखा है कि वह समय, भारत के इतिहास में, मनुष्य की नीची-से-नीची और ऊँची-से-ऊँची वृत्तियों की पराकाष्ठा का था।
मैंने ‘कचनार’ के लिखने में, अपने अभ्यास के अनुसार, इतिहास और परंपरा, दोनों का उपयोग किया है।
परदेसियों के तोड़-मरोड़कर लिखे हुए इतिहास पटकें खाए हुए चमकते हुए टीन के उस कनस्तर के समान हैं जिसमें सुंदर-से-सुंदर चेहरा अपने को कुरुप और विकृत पाता है। परंतु परंपरा अतिशयता की गोद में खेलती हुई भी सत्य की ओर संकेत करती है, इसलिए मुझको परंपरा इतिहास से भी अधिक आकर्षक जान पड़ती है।

धामोनी एक उजाड़ बीहड़ है; परंतु इतिहास और परंपरा का एक चमत्कार उसको घेरे हुए हैं। गोंड़ों का सहज-सुंदर जीवन उसके अदृश्य पटों पर लिखा हुआ है। लोमड़ी से लेकर नाहर तक धामोनी में मजे के साथ विचरण करते हैं। गोंड और सहारिया (शवर) सावधानी के साथ जंगल की उपज धामोनी के भीतर से इकट्ठी करते रहते हैं। कभी-कभी अपने को फूलों से सजाकर वे वहाँ नाच और गा भी लेते हैं। ‘कचनार’ भी शायद उस प्रमोद को कहीं से देख-सुन लेती हो !
इतिहास लेखकों के लिए धामोनी में एक बड़ा आकर्षण है-कुछ लोग कहते हैं कि अकबर के मंत्री फैजी का, धामोनी, जन्म-स्थान है; बहुत से लोग इस बात को नहीं मानते। परंतु फैजी यहाँ बहुत दिन रहा और उसके गुरु बालजीतशाह की कबर यहाँ बनी हुई है जिसके लिए औरंगजेब ने 2 गाँव जागीर में लगाए थे और जो वक्फ में लगे चले आते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।

औरंगजेब दक्षिण के आक्रमणों के लिए धामोनी को अपना पहला बड़ा शिविर बनाना चाहता था, यह बात इतिहास में प्रसिद्ध है।
लेकिन पटकें खाए हुए चमकते हुए टीन के कनस्तर के समान धामोनी के गढ़, पत्थर, जंगल और बीहड़ पर टूटे-फूटे-या तो-मरोड़े हुए-इतिहास का विकृत प्रतिबिंब नहीं देखना है। इसलिए वह किसी बडे मुगल मंत्री का जन्म-स्थान रहा हो तो, अथवा किसी बड़े मुगल सम्राट् का शिविर, तो भी हम जनसाधारण के लिए कोई बड़ा महत्त्व नहीं रखता।
उससे ऊपर, परंतु वहीं, एक सहज, स्वाभाविक और स्वच्छ चहल-पहल थी, गोंड़ों का एक जन राज्य था जिसको सामंतीय ढाँचे ने कुछ ढाल अवश्य दिया था, परंतु बिलकुल परिवर्तित नहीं कर पाया था; उसको देखना है, और वही हमारे लिए कुछ महत्त्व रखता है।

परंतु ‘कचनार’ में केवल इसी के दिग्दर्शन का प्रयत्न नहीं है। मैं पाठकों से और क्या कह सकता हूँ ?
झाँसी 15-7-1947

-वृंदावनलाल वर्मा

कचनार

1

‘दिन डूबने में अभी-से-कम तीन घंटे की देर है’, मानसिंह ने कहा।
डरू ने प्रस्ताव किया, ‘एक घंटा और आराम कर लो। धामोनी कोस-डेढ़ कोस के ऊपर नहीं है। दिन डूबने से पहले पहुँच जाएँगे।’
सोनेसाह ने प्रतिवाद किया, ‘तैयार होते-होते तो यों एक घंटा लग जाएगा। तुम लोगों का तो वह हाल है कि जहाँ मिली दो, वहीं रहे सो।’
मानसिंह को यह प्रतिवाद अच्छा नहीं लगा। बोला, ‘दिन-भर धूप में सिके तब पानी और छाया से भेंट हुई। दुलैयाजू रात-भर की जागी हैं और दोपहर की धूप खायी हुई हैं।
उनको थोड़ा-सा विश्राम अब मिला है। थोड़ी देर में चलते हैं।’’

सोनेसाह ने तीव्र स्वर में कहा, ‘रावसाहब बाट जोह रहे होंगे। स्त्रियाँ अपने नेगचारों के लिए उतावली हो रही होंगी। यहाँ तुम लोगों को ऐसा क्या मिल रहा है जिसके लिए पैर फैलाए पड़े हो ?’
मानसिंह ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘‘तुम्हें कुछ नहीं मिल रहा होगा काकाजू, सो तुम चिड़चिड़ा रहे हो। लड़कीवाले के घर बरात में तुमने चैन न मिलने दिया, अब यहाँ पीछे पड़ गए।’
सोनेसाह खिसियाकर बोला, ‘हमें क्या करना है, रात-भर पड़े रहो। कहने भर का बस है। जब रावसाहब रोष करेंगे तब तुम्हीं सामने जाना। देखते नहीं हो, समय कितना है। मार्ग बहुत पथरीला और भरकोंवाला। ढीमरों को पालकी ले चलने में मुश्किल पड़ती है। थम-थमकर चल पाते हैं। न जाने सोच-विचार से काम क्यों नहीं लेते। अक्कल पर ऐसे पत्थर पड़ गए हैं कि कहते नहीं बनता।’

मानसिंह ने पेड़ों से टिके हथियारों पर दृष्टि डाली। फिर उसकी आँख लहरों की तरह उठते हुए ऊँचे-नीचे पहाड़ों और नीचे बहनेवाली धसान नदी की ओर गई। वह पेड़ों की छाया में बिस्तर पर पड़ा हुआ था। उसके साथी बाराती छाया में लेटे हुए थे, कुछ से रहे थे, कुछ जाग रहे थे। सोनेसाह एक पेड़ से टिका हुआ था। उसने कहा, ‘काकाजू तो जरा-सी बात पर गरम हो पड़ते हैं। मैं पालकी के पास जाकर देखता हूँ, दुलैयाजू सो रही हैं या जाग गई हैं। जलपान की पुछवाए लेता हूँ।’’
मानसिंह ने खड़े होकर अँगड़ाई ली और पास की झुरमुट की छाया में, जहाँ पालकी रखी थी, गया।

वधू की विदा चौदह-पंद्रह मील दूर से करवाकर बारात धामोनी लौट रही थी। धामोनी का किला इस समय राव दलीपसिंह राजगोंड के हाथ में था। ब्याह के लिए बारात पत्थरगाँव को गई थी। राव दलीपसिंह अस्वस्थ था, इस कारण भाँवर उसकी कटार के साथ पड़ी। जिनके यहाँ बारात गई थी वे लोग खटोलिया गोंड थे। राव दलीपसिंह के पास दो-तीन सौ सिपाहियों की सेना के अतिरिक्त और धन-संपत्ति थी। वधू का पिता दरिद्र था। अतएव राव दलीपसिंह की कटार के साथ भाँवर पड़वाने के लिए सहज ही राजी हो गया था। वैसे भी राजगोंडों में वर की अशक्यता की अवस्था में वर की कटार के साथ भाँवर पड़ने की रीति थी, इसलिए विवाह में विशेष बाधा नहीं पड़ी।

मानसिंह राव दलीपसिंह से आयु में छोटा था और दूर के रिश्ते में भाई होता था। सोनेसाह भी राजगोंड था और वह दूर के नाते में इन लोगों का काका होता था। बारात का कार्यभार सोनेसाह के हाथ में था।
वह स्वभाव का गरम था, इसलिए बारात का नेतृत्व सब बारातियों को खटका, खासतौर पर मानसिंह को, जो नाते में वर का छोटा भाई होने के कारण अपने वर से कम नहीं समझता था। वधू के घर पर मानसिंह ने वर के सब नेग-दस्तूर निभाए थे। मूक कटार इस विषय में असमर्थ थी। विवाह के अवसरों पर, अनेक बार उसने अपने को सचमुच वर समझ लिया था।

पालकी के चारों ओर कनात लगी थी। कनात के भीतर वधू की दो सहेलियाँ थीं। वे वधू के साथ दहेज में आई थीं। वधू पालकी में लेटी हुई जाग रही थी। पाल की का परदा उठा हुआ था। दोनों सहेलियाँ पालकी के सहारे झुकी हुई उससे बातें कर रही थीं।

मानसिंह कनात का परदा हटाकर घुस गया। दुलहिन घूँघट खोले थी। रंग गेहुँए से जरा ज्यादा गौर, आँखें बड़ी, बरौनियाँ लंबी, नाक सीधी, चेहरा गोल। देखते ही उसने मुसकराकर घूँघट डाल लिया। दोनों सहेलियों ने माथा जरा ढक लिया। एक सहेली खरे गोरे रंग की और बहुत सुंदर। दूसरी जरा साँवले रंग की, आँखें बड़ी; परंतु नाक कुछ चपटी, नथुने फूले हुए। दोनों खटोलिया गोंड।

गोरे रंगवाली सहेली ने जरा रुखाई के साथ कहा, ‘लाला साहब, आप बिना कुछ कहे ही धड़धड़ा पड़े।’
मानसिंह हँसकर बोला, ‘मैं तो देवर हूँ। भावज रानी का मुझसे क्या परदा।’
साँवले रंगवाली सहेली ने मुसकराकर मानसिंह की ओर देखा। फिर कनखियों अपनी सहेली से कहा, ‘कचनार, उनसे पूछो तो, काहे के लिए आए हैं।’
दुलहिन नीचा सिर किए हुए घूँघट में हँसी।
मानसिंह उत्साहित होकर बोला, ‘आप लोगों ने सो पाया था या नहीं ?’
गोरे रंगवाली-कचनार-ने उत्तर दिया, ‘थोड़ा-सा सोई हैं।’ उसके स्वर में रुखाई न थी।
मानसिंह ने पूछा, ‘सुराही में जल न हो तो नदी में से ठंडा मँगवाऊँ ?’
कचनार ने उत्तर दिया, ‘अभी तो रखा है।’

मानसिंह ने अनुरोध किया, ‘भौजी और आप लोग थोड़ा-सा जलपान कर लें। मीठा और नमकीन दोनों ताजा हैं।’
साँवले रंगवाली ने इनकार किया, ‘थोड़ी देर पहले तो खाया ही है। भूख नहीं है।’
‘यह लीजिए,’ मानसिंह ने हँसकर कहा, ‘आप तो सबकी तरफ से मुनीम बन गईं। भावज को तो पूछिए।’
दुलहिन ने और सिर झुकाया और हिलाकर नाहीं की।

कचनार बोली, ‘बहूरानी बोलो। कुँवर साहब तुम्हारा उत्तर सुने बिना नहीं मानेंगे।’
दुलहिन ने सिर उठाया। दो उँगलियों से घूँघट उठाकर मानसिंह की ओर देखा। मुसकरांई और फिर नीचा कर लिया। साँवले रंगवाली सखी को संकेत से पास बुलाकर धीरे से बोली, ‘कुँवर साहब से कह दो ललिता, इतना खा गई हूँ कि दो दिन भूख नहीं लगती।’

मानसिंह ने कनात के दरवाजे की ओर पीठ फेरी। दुलहिन ने घूँघट हटाकर मुँह उघाड़ा। मानसिंह ने कनात का परदा हटाते-हटाते मुड़कर उसकी ओर देखा। वह मुसकरा रही थी। मानसिंह बाहर चला गया।
दुलहिन ने ललिता के कंधे पकड़कर झकझोरा। कहा, ‘तुम आयु में कचनार से कुछ बड़ी हो, सो बड़ी मुनीम साहब और कचनार तुमसे कुछ छोटी है, सो छोटी मुनीम साहब।’ और खिलखिलाकर हँसी। कनात के बाहर से मानसिंह ने सुन लिया। पैर थमे। जी चाहात कि किसी बहाने फिर कनात में चला जाए। परंतु कुछ दूर सामने सोनेसाह को खड़ा देखकर सहम गया।

सोनेसाह ने वहीं से चिल्लाकर प्रश्न किया, ‘क्यों भाई, कुछ खाना-पीना होगा या नहीं ? न हो तो तुंरत चल पड़ने की तैयारी की जाए।’
मानसिंह ने उत्तर दिया, ‘पानी की तो पूछ ली थी। खाने की पूछना भूल गया। अभी बतलाता हूँ।’
वह लौटकर फिर कनात के भीतर गया। उसके प्रवेश के समय दुलहिन का चेहरा खुला था। मंजुल मुसकान के साथ घूँघट डाल लिया और बहुत धीमे स्वर में स्वर में अपनी सखियों से कहा, ‘बतला तो दिया था।’
मानसिंह ने हँसकर कहा, ‘सोनेसाह काका को चिढ़ाने में मुझको आनंद आता है।’
ललिता बोली, ‘और हम लोगों को हैरान करने में ?’

कचनार ने कहा, ‘अभी-अभी तो बतला दिया था कि कुछ नहीं खाना है। कुछ और पूछना बाकी है ?’
मानसिंह ने उत्तर दिया, ‘हैरान अभी कहाँ किया है ? हैरान तो धामोनी में करूँगा जब नेगों के लिए अडूँगा।’
कचनार बोली, ‘आपको नेग तो बहुत थोड़े हैं। आपको जितना अड़ना था, हमारे यहाँ अड़ लिए। धामोनी में तो हम लोगों की बारी आएगी।’
मानसिंह ने कहा, ‘आपने अपने घर हमारी कोई सहायता नहीं की, पर मैं अपने घर आप लोगों की नेगों के समय बहुत-बहुत सहायता करूँगा।’
‘देखूँगी।’ दुलहिन धीरे से बोली।
बाहर से सोनेसाह चिल्लाया, ‘पूछ लिया हो तो जल्दी आओ। डेरा उठाएँ।’
मानसिंह ने धीरे से कहा, ‘क्या नाहर की तरह दहाड़ते हैं।’
वे तीनों हँसीं।

मानसिंह ने कचनार की ओर देखा। उसकी आँखों में मादकता न थी, यद्यपि ओठों पर हँसी अब भी खेल रही थी। फिर जाते-जाते उसने दुलहिन की ओर देखा। वह दो उँगलियों में होकर घूँघट की ओट से उसकी ओर देख रही थी।
मानसिंह के चले जाने पर दुलहिन ने मुँह उधाड़ दिया। बोली, ‘कुँवर साहब का स्वभाव अच्छा है।’
कचनार-‘ऐसा ही बना रहे तब है।’
ललिता-‘मुझको विश्वास है। राव साहब का स्वभाव देखें कैसा है।’
दुलहिन ने मुँह फेर लिया।
कचनार-‘उमर के कुँवर साहब से थोडे़ ही बड़े हैं।’

ललिता-‘तुमने देखा है !’
कचनार-‘सुना तो है।’
ललिता-‘वह ब्याहने आए होते तो नेगों पर इतने न अड़ते।’
दुलहिन-‘ऊँट पर चढ़ते ही सब मलकने लगते हैं।’
ललिता-‘तुम भी अड़ोगी दुलहिन ?’

दुलहिन-‘तुम मुझसे दुलहिन कहती हो !’
ललिता-‘दुलैयाजू सही। ठाकुरों में दुलैयाजू कहते हैं।’
दुलहिन-‘मायके में जो कुछ कहती थीं, वही कहो। तुम लोगों के मुँह से दुलहिन या दुलैयाजू अच्छा नहीं लगता।’
कचनार-‘न जाने घर कब लौंटेंगे ?’

ललिता-‘आज सवेरे विदा होकर आई हैं, आज की साँझ को घर लौट चलो।’
कचनार-‘देखें लिवौआ कब तक आते हैं।’
दुलहिन-‘पहले धामोनी ते देख लो।’

ललिता-‘सुनते हैं बहुत बड़ा किला है। उसमें हजारों आदमी रह सकते हैं !’
कचनार-‘कबरें बहुत हैं। भूतखाने हैं। पानी की कमी है।’
दुलहिन-‘सुनते हैं झील से पानी आता है। आधकोस दूर है।’
ललिता-‘रावसाहब के पिता ने लड़ाई में जीतकर थोड़े ही दिन भोग पाया कि परलोकवासी हो गए, नहीं तो पानी का सुभीता कर लेते।’



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