माटी मेरे देश की - वी. एस. नायपॉल Mati Mere Desh ki - Hindi book by - V. S. Naipaul
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माटी मेरे देश की

वी. एस. नायपॉल

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :235
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1663
आईएसबीएन :81-7315-562-3

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प्रस्तुत है magic seeds का हिंदी अनुवाद...

Mati mere desh ki

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सर वी.एस. नायपॉल का मनुष्य के संघर्ष कामनाओं के स्फुटन आदर्श की आकांक्षा पहचान के संकट, अर्थ की तलाश और आदर्शवाद तथा व्यक्ति के वैशिष्ट्य के द्वंद्व की रचनात्मक एवं विध्वंसक क्षमताओं का आभास कराता नवीनतम उपन्यास।

दक्षिण भारत का विली चंद्रन लंदन और अफ्रीका में लंबा समय व्यतीत करने के बाद अपनी बहन सरोजिनी के पास बर्लिन पहुँचता है। वह चौथे दशक के आरंभिक वर्षों में है। अपनी बहन की प्रेरणा और जीवन में किसी अर्थ की तलाश की लालसा उसे भारत पहुँचा देती है। वह उग्रवाद के भूमिगत आंदोलन में सक्रिय हो जाता है। नगरों की गंदी बस्तियों, दूरस्थ गाँवों और घने जंगलों में छापामार आंदोलन में उसकी सक्रियता उसे आदर्श के सम्मोहक स्वप्नों की छाया में पलती हिंसा-प्रतिहिंसा के विविध पहलुओं से रू-बरू कराती है। वह अनुभव करता है कि कैसे एक क्रांतिकारी आंदोलन भटकाव का शिकार हो जाता है। छापामारों के बीच बिताए सात वर्षों के अनुभव उस क्रांति से उसके मोहभंग का कारण बनते हैं।

 अनेक वर्ष उसे जेल में व्यतीत करने पड़ते हैं, जहाँ का अपना विशिष्ट अनुभव-संसार है। वह महसूस करता है कि जिस क्रांति के सम्मोहन में पड़कर वह भूमिगत आन्दोलन से जुड़ा था वह स्वयं भटकाव का शिकार हो चुका है। जिन गाँवों तथा ग्रामीणों की तकदीर बदलने के लक्ष्य को लेकर क्रांतिकारी आंदोलन शुरू हुआ था उसमें प्रवंचक राजनीति का भी हस्तक्षेप हो गया है। लंदन के अपने अतीत में लिखी एक पुस्तक उसके लिए मुक्ति का एक द्वार खोलती है। एक पुराने मित्र के प्रयासों से वह उसके पास लंदन पहुँच तो जाता है, परंतु यहाँ भी उसको शारीरिक और मनोवैज्ञानिक भटकाव का ही एहसास होता है। उसका साक्षात्कार एक अलग प्रकार की सामाजिक क्रांति से होता है। अनेक वर्जनाओं से मुक्त कहे जानेवाले इस संसार में भी वह अपने आपको एक अंतहीन कारा में पड़ा हुआ पाता है फिर प्राप्त होता है मुक्ति का तत्त्वबोध।

पश्चिमी साहित्य जगत में अपनी अनूठी कथावस्तु, दृष्टि की स्पष्टता, अद्भुत व्यक्ति चित्रण और अभिभूत कर देनेवाली भाषा-शैली के लिए भरपूर सराहे गए ‘नोबेल पुरस्कार’ से सम्मानित सर वी. एस. नायपॉल के उपन्यास ‘मैजिक सीड्स’ का यह हिन्दी रुपांतर निश्चय ही सराहा जाएगा।

आमुख


फिर शाल वन में, वहाँ के प्रथम शिविर में, जब रात की पाली के संतरी के रूप में उसकी पहली बार ड्यूटी लगी तो (रात भर) रह-रहकर उसका मन केवल रो पड़ने का होता रहा, अब जो पौ फटने पर राहत का अनुभव हुआ तो उसके साथ कहीं दूर से उसे किसी मोर का विस्मयकारी स्वर सुनाई दिया। मोर सुबह-सबेरे मन के किसी जल स्रोत्र से पहली बार पानी पीने के बाद (इसी प्रकार) आवाज देता है- इस भर्राई, तीखी आवाज से एक पुनरुज्जीवित और फिर से ताजा हो उठे संसार का संदेश मिलना चाहिए; परन्तु प्रदीर्घ दु:स्वप्न की भाँति बीती रात के पश्चात् वह (आवाज) केवल सर्वस्व समाप्त हो जाने की मुनादी करती प्रतीत हुई थी-सबकुछ- मनुष्य, पक्षी, वन, संपूर्ण संसार के नष्ट हो जाने का संदेश देती; और फिर (वे स्मृतियाँ) जब शिविर में एकरसता का साम्राज्य था, छापामारी में व्यतीत वे वर्ष- वन, गाँव, कस्बों में चलना, चलते जाना। जब छद्म वेश में यात्राएँ करना अपने आप में लक्ष्य हो जाता था, दिन के अधिकांश हिस्से में यह भी भूल जाना कि वेश बदलने का वस्तुत: उद्देश्य क्या था; जब उसने अपना बौद्धिक क्षण अनुभव किया, उसे लगा कि उसका व्यक्तित्व टुकड़े-टुकड़े होकर खंडित हो रहा है, और फिर जेल में पहुँचना, वहाँ की एक निश्चित व्यवस्था, निर्धारित दिनचर्या, रक्षा कवच-सा देते उसके नियम एक नए सिलसिले की शुरूआत (जिसके द्वारा) संभव हो पाया उन सोपानों का निर्धारण, जिसके माध्यम से यथार्थ के भ्रम और अवास्तविकताओं की आँख-मिचौली के बीच से एक राह बनी- इस राह की यात्रा कुछ ऐसी थी जैसे रुह का एक मुहरबंद कोठरी से दूसरी में जाना।


एक
गुलाब-विक्रेता



विली चंद्रन अपनी बहन सरोजिनी के साथ बर्लिन में रह रहा था। अठारह वर्ष अफ्रीका में व्यतीत करने के बाद बर्लिन का प्रवास उसके लिए सुखदाय था; परन्तु यह स्थायी नहीं था। इसे समाप्त होना था। एक दिन सरोजिनी ने उसे कह ही दिया, ‘यहाँ रहते तुम्हें छह महीने हो गए हैं। तुम्हारा वीजा आगे बढ़वा पाना शायद मेरे लिए संभव न हो पाए। क्या तुमने आगे के बारे में कुछ सोचा है ?’
विली ने कहा, ‘मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ ?’

‘तुमने कभी सोचा ही नहीं कि जीवन में तुम्हें क्या करना है। तुमने कभी समझा ही नहीं कि प्रत्येक मनुष्य को अपना संसार स्वयं रचना होता है। हाथ-पर-हाथ रखे बैठे रहने से बातें नहीं बना करतीं।’
‘तुम कहती तो ठीक हो, पर बातों को इस प्रकार उलझा देती हो कि उससे मेरा कोई भला नहीं होता। तुम जानती हो, हालात किस तरह मेरे काबू से बाहर रहे। तुम्हीं बताओ, भारत में मैं क्या कर सकता था ? सन् 1957-58 में इंग्लैंड में और फिर अठारह वर्षों तक अफ्रीका में क्या कर पाना संभव था ?’

‘जिन्हें कुछ करना होता है, जिन्हें जीवन में कोई लक्ष्य प्राप्त करना होता है, वे हर स्थिति में कुछ कर ही लेते हैं। अफ्रीका में तुम अठारह वर्ष रहे। वहाँ तुमने एक स्त्री से विवाह भी किया। उस अर्धश्वेत स्त्री के साथ घर में पड़े रहे। उन दिनों वहाँ अश्वेतों का महान् स्वतंत्रता संघर्ष चल रहा था। छापामार युद्ध चल रहा था, और तुम तकिए में मुँह छिपाए घर तक सीमित रहे।’

‘ऐसा नहीं था, सरोजिनी। संघर्षरत अफ्रीकियों के प्रति मेरी पूरी सहानुभूति थी: परन्तु मेरे सामने कोई युद्ध नहीं था, जिसमें मैं कूद पड़ता।’
‘यदि प्रत्येक व्यक्ति ऐसा ही सोचता तो विश्व में कभी कहीं कोई क्रांति ही न होती। पर निर्णायक दौर में हर जगह पर कोई-न-कोई हर समय उपस्थित रहता है।’
वे एक कैफे में थे। एक तमिल युवक लाल गुलाब बेचता हुआ कैफे के भीतर पहुँचा। सरोजिनी ने इशारे से उसे अपने पास बुलाया। उस युवक ने लंबी शाखाओं वाले गुलाब उनके सामने कर दिए, पर बोला कुछ नहीं। उसने उनके साथ कोई अपनत्व भी नहीं दिखाया। उनसे नजर नहीं मिलाई। वह अपने आप में खोया हुआ था।

विली की मुलाकात कुछ सप्ताह पूर्व ऐसे ही एक अन्य व्यक्ति से एक दक्षिण भारतीय रेस्त्राँ के पास हुई थी। वह विली से भारत में एक महान् छापामार युद्ध के बारे में बात करने लगा। विली को उसकी बातें रुचिकर लग रही थीं। वह आसन्न छापामार युद्ध के बारे में बता रहा था, जो विली को बड़ा विस्मयकारी लग रहा था, फिर वह व्यक्ति उस आसन्न युद्ध के लिए धन की आवश्यकता की बात करने लगा। स्पष्ट है कि वह विली से भी आर्थिक योगदान की अपेक्षा कर रहा था। विली को कुछ चिंता हुई। भय का भाव भी उत्पन्न हुआ। वह उस व्यक्ति से कतरा गया। उस व्यक्ति के होंठों पर मुसकान तो यथावत् बनी रही, परन्तु उसके मुँह से तमिल में एक लंबा श्राप निकला। उस प्रदीर्घ पारंपरिक श्राप में उसने अपनी संपूर्ण आस्था को उड़ेल दिया था।

सरोजिनी ने एक गुलाब खरीदकर अपनी प्लेट के पास रख लिया। गुलाब-विक्रेता टेबलों के बीच से गुजरता हुआ बाहर निकल रहा था, तो उसकी ओर इशारा करते हुए सरोजिनी ने विली से कहा, ‘मुझे नहीं मालूम, तुम उस व्यक्ति के बारे में क्या सोचते हो; परन्तु मैं समझती हूँ कि उसका जीवन तुमसे कहीं अधिक अर्थपूर्ण है। वह इसलिए कि उसने अपना युद्ध तलाश लिया है। बर्लिन में बहुत पापड़ बेलकर पहुँचा होगा। वह भी अन्य लोगों की तरह रुपए कमाने और अच्छा जीवन बिताने की सोच सकता था। वह यहाँ की संपन्नता में रम सकता था; परन्तु उसने जीवन में एक लक्ष्य तलाशा, अपना एक युद्ध तय किया। तुमने देखा कि वह जब हमारे पास आया तो यह जानते हुए भी कि हम उसके करीबी हैं, उसने हमारी ओर देखा तक नहीं, बल्कि हमारे प्रति उसकी आँखों में तिरस्कार का भाव था।’

विली ने कहा, ‘संभव है, वह अपनों के बीच स्वयं को लज्जित अनुभव कर रहा हो।’
‘नहीं, उसकी भाव-भंगिमा एक ऐसे व्यक्ति की थी जिसने अपना लक्ष्य तलाश लिया है। इस प्रकार के व्यक्ति तुमने अफ्रीका में देखे होंगे, बशर्तें उन्हें देख पाने की दृष्टि तुम्हारे पास रही हो। यह व्यक्ति यहाँ गुलाब बेच रहा है, परंतु ये गुलाब कहीं दूर, बहुत दूर बंदूकों में बदले जा रहे हैं। क्रांतियाँ इस प्रकार उत्पन्न की जाती हैं। मैं उन लोगों के शिविरों में जा चुकी हूँ। वुल्फ और मैं उन पर आधारित एक फिल्म में काम कर रहे हैं। मैं तुम्हें बताती हूँ कि ऐसे अनुशासित छापामार विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं हैं। यदि तुम स्वयं अपने इतिहास के बारे में कुछ जानते तो तुम्हें अनुभव होता कि यह कितना बड़ा चमत्कार है !’
एक और दिन चिड़ियाघर में टहलते समय उसने विली से कहा, ‘मैं इतिहास के बारे में तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ। अपने जिस इतिहास को हम जितना भी जानते हैं वह भारत में उन्नीसवीं सदी में एक ब्रिटिश स्कूल इंस्पेक्टर द्वारा लिखी गई इतिहास की पुस्तक के माध्यम से ही जानते हैं। रोपेर लेथब्रिज नाम के स्कूल इंस्पेक्टर ने यह पुस्तक भारतीय स्कूलों के पाठ्यक्रम के लिए तैयार की थी, जिसे सन् 1880 के दशक में ब्रिटिश फर्म मैकमिलन ने प्रकाशित किया था।

इसका प्रकाशन उस समय के दो-ढाई दशक बाद हुआ था, जिसे ‘विप्लव’ के नाम से जाना गया था। उस पुस्तक के अन्य संस्करण प्रकाशित हुए। उसने जो अनेक विचार प्रतिपादित किए इनमें एक बड़ी धारणा यह दी गई कि भारत में मुख्य रूप से दो प्रकार की नस्लें थी- एक तुच्छ और नीच जातियाँ, जो केवल दासता के लिए उत्पन्न हुई थीं और दूसरी शौर्यवान् लड़ाकू जातियाँ। तुच्छ और नीच नस्लों को पामर जातियाँ कहा गया और लड़ाकू नस्लों को मार्शल रेस। तुम और मैं अर्ध पामर जातियों से हैं। बर्लिन में गुलाब बेचनेवाले वे लोग भी इस अवधारणा के अनुसार पामर जातियों से हैं। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी ने नस्लों का निर्धारण अपनी सुविधा और अपनी दृष्टि से किया, जो पूरी तरह गलत था।

 उत्तर भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में ऊँची जातियों के हिंदुओं का प्रभुत्व था। उस सेना ने ब्रिटिश साम्राज्य की सीमाओं को लगभग अफगानिस्तान तक विस्तार दिया था। परंतु 1857 के महान् विप्लव के बाद उस वीर सेना की अवमानना की गई। उन्हें सामरिक अवसरों से वंचित करके पामर जातियों की श्रेणी में ढकेल दिया गया और फ्रंटियर के जिन लोगों को उन्होंने युद्ध में परास्त किया था, उन्हें लड़ाकू जातियों का दर्जा दे दिया गया। इस इतिहास का उल्लेख मैं इसलिए कर रही हूँ कि जिन तमिलों को ब्रिटिश व्यवस्था ने मलिन और पामर बना दिया था, उन्हें इन गुलाब बेचनेवालों ने वास्तविक रूप में लड़ाकू बना दिया है। इन्होंने इतिहास और प्रचार-तंत्र का बहुत-सा बोझ झकझोर अलग फेंक दिया है। विली, तुम्हें इनका सम्मान करना चाहिए।’

विली सबकुछ सुनता रहा। उसने सरोजिनी की किसी बात पर कोई टिप्पणी नहीं कि और किसी बात को खारिज भी नहीं किया। पिछले बीस वर्षों में वह दूसरी बार अपनी बहन के साथ रहा था। उसने सरोजिनी में इस बीच एक परिवर्तन अनुभव किया। यद्यपि वह अन्याय और क्रूरता के प्रतिकार, क्रांति की आवश्यकता और पाँच महाद्वीपों में रक्तपात तथा भूख की बातें करती नहीं थकती थी, फिर भी वह बहुत ही विस्मयकारी ढंग से शांत प्रतीत होती थी। उसमें जो आक्रामकता हुआ करती थी, वह तिरोहित हो चुकी थी। पहले जैसी चिंता और व्यग्रता उसमें नहीं रह गई थी। जिस प्रकार सर्द मुल्कों में वहाँ की ऋतुओं के अनुरूप उसने कपड़े बदलना सीख लिया था, वैसे ही नए परिवेश के अनुरूप ढलना भी। पश्चिम जर्मनी में अपने फोटग्राफर साथी वुल्फ के साथ वह स्वयं किसी सहकारी एजेंसी की सहायता पर जी रही थी, परन्तु क्रांति और छापामार युद्ध की वकालत भी करती थी।

वह बहुत पहले से मानता रहा था सरोजिनी सदैव दो संसारों के बारे में बात करती रही है- एक विश्व वह, जो अपने सारे युद्ध लड़कर व्यवस्थित हो चुका, जहाँ स्थिरता आ चुकी है। इस विश्व के लोगों के जीवन का सरलीकरण हो चुका है। वे टी.वी. देखते हैं, खाते-पीते हैं, जो जैसा उसे यथावत् स्वीकार करते हैं और पैसा बनाते हैं उन्होंने अपना समाज पा लिया है। पर दूसरा विश्व ऐसा नहीं है। उसमें बेचैनी है। वे एक सरल तथा व्यवस्थित संसार चाहते हैं, परंतु प्राचीन इतिहास के अवशेषों ने उन्हें जकड़ रखा है। सैकड़ों छोटे-छोटे युद्धों ने उनमें घृणा भर दी है। दोनों विश्व साथ-साथ रह रहे हैं। दोनों संसारों में से वह किस दुनिया का व्यक्ति था, इसे लेकर उसका दिमाग बिलकुल साफ था।



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