अहिल्याबाई, उदयकिरण - वृंदावनलाल वर्मा Ahilyabai, UdayKiran - Hindi book by - Vrindavanlal Verma
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अहिल्याबाई, उदयकिरण

वृंदावनलाल वर्मा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1667
आईएसबीएन :81-7315-190-3

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महारानी अहिल्याबाई के जीवन पर आधारित एक ऐतिहासिक उपन्यास...

Ahilyabai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

चारों ओर घोर अराजकता,शासन व्यवस्था के नाम पर घोर अत्याचार,प्रजानन दीन-हीन अवस्था में, धर्म अंधविश्वासों, भय-त्रासों और रूढ़ियों की जकड़ में कसा हुआ,न्याय में न शक्ति रही थी, न विश्वास। ऐसे काल की उन विकट परिस्थितियों में अहिल्याबाई ने जो कुछ किया-और बहुत किया-वह चिरस्मरणीय है। महारानी अहिल्याबाई के जीवन पर आधारित यह ऐतिहासिक उपन्यास एक श्रेष्ठ कृति है।

 

परिचय

‘अहिल्याबाई’ के परिचय के लिए अहिल्याबाई नाम ही पर्याप्त होता; परंतु जब मुझे एक समाचार-पत्र में प्रकाशित बात की याद आई तब अहिल्याबाई का भी परिचय देना पड़ा। समाचार-पत्र में छपा था कि परीक्षक ने किसी विद्यार्थी से पूछा, ‘कुलू, जहाँ से सेब इत्यादि बढिया फल आते हैं, कहाँ है ?’ तो विद्यार्थी ने उत्तर दिया, ‘फ्रांस के दक्षिण में !’ कई शिक्षितों’ के उत्तर अपने ही देश के महान् व्यक्तियों और इतिहास-प्रसिद्ध स्थानों के संबंध में विलक्षण होते हैं, इसलिए सोचा कि इस उपन्यास में जो कुछ आया है, उसका थोड़ा-सा परिचय दे दूँ।

अहिल्याबाई इतिहास-प्रसिद्ध सूबेदार मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव की पत्नी थीं। जन्म इनका सन् 1725 में हुआ था और देहांत 13-8-1795 को; तिथि उस दिन भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी थी।
अहिल्याबाई किसी बड़े भारी राज्य की रानी नहीं थीं। उनका कार्यक्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित था। फिर भी उन्होंने जो कुछ किया, उससे आश्चर्य होता है।
चारों ओर गड़बड़ मची हुई थी। शासन और व्यवस्था के नाम पर घोर अत्याचार हो रहे थे। प्रजाजन-साधारण गृहस्थ, किसान मजदूर-अत्यंत हीन अवस्था में सिसक रहे थे। उनका एकमात्र सहारा-धर्म-अंधविश्वासों, भय त्रासों और रूढि़यों की जकड़ में कसा जा रहा था। न्याय में न शक्ति रही थी, न विश्वास। ऐसे काल की उन विकट परिस्थितियों में अहिल्याबाई ने जो कुछ किया-और बहुत किया !-वह चिरस्मरणीय है।

दस-बारह वर्ष की आयु में उनका विवाह हुआ। उनतीस वर्ष की अवस्था में विधवा हो गईं। पति का स्वभाव चंचल और उग्र था। वह सब उन्होंने सहा। फिर जब बयालीस-तैंतालीस वर्ष की थीं, पुत्र मालेराव का देहांत हो गया। जब अहिल्याबाई की आयु बासठ वर्ष के लगभग थी, दौहित्र नत्थू चल बसा। चार वर्ष पीछे दामाद यशवंतराव फणसे न रहा और इनकी पुत्री मुक्ताबाई सती हो गई ! दूर के संबंधी तुकोजीराव के पुत्र मल्हारराव पर उनका स्नेह था; सोचती थीं कि आगे चलकर यही शासन, व्यवस्था, न्याय औऱ प्रजारंजन की डोर सँभालेगा; पर वह अंत-अंत तक उन्हें दुःख देता रहा; जिसका, अपेक्षाकृत थोड़ा-सा, वर्णन उपन्यास में आया है।

अहिल्याबाई ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भारत-भर के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर बनवाए, घाट बँधवाए, कुओं और बावड़ियों का निर्माण किया, मार्ग बनवाए-सुधरवाए, भूखों के लिए अन्नसत्र (अन्यक्षेत्र) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाईं, मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन हेतु की। और, आत्म-प्रतिष्ठा के झूठे मोह का त्याग करके सदा न्याय करने का प्रयत्न करती रहीं-मरते दम तक ! ये उसी परंपरा में थीं जिसमें उनके समकालीन पूना के न्यायाधीश रामशास्त्री थे और उनके पीछे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हुई।
अपने जीवनकाल में ही इन्हें जनता ‘देवी’ समझने और कहने लगी थी ! इतना बड़ा व्यक्तित्व जनता ने अपनी आँखों देखा ही कहाँ था!!
इंदौर में प्रति वर्ष भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी के दिन अहिल्योत्सव होता चला आता है। 1951 के उत्सव का उद्घाटन करने के लिए अहिल्योत्सव समिति ने कृपापूर्वक मुझे आमंत्रित किया। मैंने उस अवसर पर वचन दिया था कि अहिल्याबाई पर कुछ लिखूँगा।

ऐतिहासिक उपन्यास में तत्कालीन वातावरण की अवधारणा लेखक के लिए अनिवार्य है। दूसरी कठिनाई है-आज और आनेवाले कल के लिए भी तो उसमें कुछ हो। केवल ऐतिहासिक वर्णन या मनोरंजन मात्र अभीष्ट नहीं है। जीवन-चरित की प्रणाली से काम बनता न दिखा तो मैंने उपन्यास लिखने की सोची।
Grant Duff की ‘History of the Marathas’, श्री जी.एस. सरदेसाई की ‘New History of the Marathas’, डॉक्टर यदुनाथ सरकार की ‘Fall of the Mug Hal Empire’, Irvine की ‘Later Moguls’ इत्यादि अंग्रेजी पुस्तकों का अध्ययन किया; परंतु उनमें अहिल्याबाई की शासन-योग्यता और धर्मपरायणता की भूरि-भूरि प्रशंसा के अतिरिक्त और सामग्री कम मिली। मुझे विश्वास था कि मराठी में प्रचुर सामग्री अवश्य होगी। जब उस सामग्री के संग्रह में असफल हुआ तब मैंने मध्यभारत के मुख्यमंत्री श्री मिश्रीलालजी गंगावाल को लिखा। उन्होंने शीघ्र ही सारी सामग्री इकट्ठी करके भिजवा दी। मैं उनका बहुत कृतज्ञ हूँ। उन पुस्तकों के लेखकों और संपादकों को अनेक धन्यवाद, जिनकी सामग्री के आधार पर इस उपन्यास की मैंने रचना की है।

अहिल्याबाई देवी से भी बढ़कर मानव थीं। कौन-सा देवता कष्ट सहकर भी अपने देवत्व पर अटल रह सका होगा ? किस देवता ने अपने आँसुओं में से इतनी किरणें फैलाई होंगी ?
उन्होंने छुटपन में जितना पढ़ा, बड़ी होने पर जितना देखा और सुना, जिस वातावरण से वह घिरी हुई थीं, जिन पूर्वग्रहों में वह बँधी हुई थीं, उनके ऊपर बहुधा इतना उठती रहीं ! यही एक बड़े विस्मय की बात है।

उनके मंदिर-निर्माण और अन्य धर्म-कार्यों के महत्त्व के विषय में मतभेद है। श्री सरदेसाई ने अपने ग्रंथ ‘New History of the Marathas’, Vol. ।।।, p. 211 पर लिखा है कि इन कार्यों में अहिल्याबाई ने अंधाधुंध खर्च किया, और सेना नए ढंग पर संगठित नहीं की। तुकोजी होलकर की सेना को उत्तरी अभियानों में अर्थसंकट सहना पड़ा, कहीं-कहीं यह आरोप भी है श्री सरदेसाई ने अपनी नवीनतम पुस्तक ‘The main Currents of Maratha History’ में इन मंदिरों को Out-Posts of Hindu religion ( हिंदू धर्म की बाहरी चौंकियाँ) बतलाया है ! V.V. Thakur की ‘Life & Life-Work of Shri Devi Ahilya Bai Holkar’, p. 155 पर सप्रमाण लिखा है कि तुकोजीराव होलकर के पास बारह लाख रुपए थे जब वह अहिल्याबाई से रुपए की माँग पर माँग कर रहा था और संसार को दिखलाता था कि रुपए-पैसे से तंग हूँ! फिर इसमें अहिल्याबाई का दोष क्या था ? इतिहास लेखकों का कहना है कि Religion has been the greatest motive power for the Hindus (हिंदुओं के लिए धर्म की भावना सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति रही है); अहिल्याबाई ने उसी का उपयोग किया।
तत्कालीन अंधविश्वासों और रुढ़ियों का वर्णन उपन्यास में आया है। इनमें से एक विश्वास था मांधता के निकट नर्मदा तीर स्थित खडी पहाड़ी से कूदकर मोक्ष-प्राप्ति के लिए प्राणत्याग-आत्महत्या कर डालना। देखिए पं. रामगोपाल मिश्र कृत ‘तपोभूमि’, पृष्ठ 306 ।

दूसरा था उज्जैन स्थित सिद्धवट पर मनोरथ की सिद्धि के लिए बलि चढ़ाना। देखिए मराठी पुस्तक ‘श्री क्षेत्र अवंतिका’, पृ. 170 और मुक्ताबाई का पत्र अहिल्याबाई को क्र. 230, ता. 16-4-1789; जिसमें लिखा गया है कि आपके आदेशानुसार अवंतिका जाकर सिद्धवट पर बलि चढ़ा दी-‘इतिहासाचीं साधनें’, भाग 1 ।

अहिल्याबाई मोक्ष-प्राप्ति की उस प्रथा को बंद न कर सकीं। असंभव था। इसे तो अंग्रेजों ने कहीं 1824 में बंद कर पाया ! सिद्धवट पर बलि चढ़ाने की प्रथा का उपयोग आरोग्य-लाभ के लिए उनके दामाद और पुत्री ने किया था। जब वह किसी प्रकार की बीमारी से छुटकारा न पा सका तब बलिदान का प्रयोग किया-कराया गया ! उस घोर अंधकार के युग में भी अहिल्याबाई के भीतर उतना प्रकाशपुंज था, यही बहुत बड़ी बात है।

उपन्यास में जिस स्थानों का वर्णन किया गया है, वे आज भी हैं। अनेक घटनाएँ ऐतिहासिक हैं, कुछ काल्पनिक। सिंदूरी, आनंदी और भोपत के नाम-भर बदल दिए हैं, वैसे वास्तविक हैं। अन्य चरित्र ऐतिहासिक हैं, नाम भी उनके वे ही हैं।
अहिल्याबाई के नाम पर कुछ समय तक विवाद चला-सही नाम अहिल्याबाई है अथवा अहिल्याबाई ? इंदौर की अहिल्योत्सव समिति के मंत्री डॉक्टर उदयभानुजी से मैं सहमत हूँ कि सही नाम ‘अहिल्याबाई’ है. उसके लिए मैं कृतज्ञ हूँ।
‘अहिल्याबाई’ संबंधी स्थानों का भ्रमण करने में मेरे मित्र श्री श्यामलाल पांडवीय, मंत्री, जनकार्य विभाग ने मेरी बड़ी सहायता की। उन्हें उसके लिए अनेक धन्यवाद।

उपन्यास अहिल्याबाई के जीवन से संबंध रखनेवाली सच्ची घटनाओं पर आधारित है। संदर्भ नीचे दिए जाते हैं-
मल्हार (तुकोजी का पुत्र) विषयक घटनाओं के आधार-
‘इतिहासाचीं साधनें’ में, पत्र क्र. 260, ता. 8-12-1789
तुकोजी का पत्र अहिल्याबाई को क्र. 168, ता. 3-2-1790
रुक्माबाई का पत्र अहिल्याबाई को, क्र. 268, ता. 3-2-1790
अहिल्याबाई का पत्र तुकोजी को, क्र. 273, ता. 1-4-1790
[जिसमें उन्होंने मल्हार के अत्याचारों का वर्णन किया है।]
यशवंतराव गंगाधर का पत्र अहिल्याबाई को, ता. 2-4-1790
रुक्मबाई का पत्र अहिल्याबाई को, क्र. 277, ता. 16-4-1790
मल्हार का पत्र अहिल्याबाई को, क्र. 279, ता. 5-5-1790 तथा पत्र क्र. 295, 301, 303, 315, 317, 332, 339, 347, 391, 399, 402, 403 इत्यादि और सरदेसाई की ‘New History of the Marathas’, Vol.।।। का सातवाँ और आठवाँ परिच्छेद; जहाँ नाना फडनीस का महादजी सिंधिया के प्रति वैर और मल्हार इत्यादि के चरित्रों का पूरा वर्णन है। मल्हार कहाँ और कैसे पकड़ा गया, इसका वर्णन यशवंतराव गंगाधर के पत्र में मिलेगा; जो होलकर सरकार पुस्तकमाला की 16वीं पुस्तक के पृ. 158-159 पर छपा है। पत्र मराठी में है।

लखेरी का युद्ध 1-6-1793 के दिन हुआ था। दूसरे दिन भोर, मल्हार एक तालाब किनारे शराब पिए अचेत पड़ा पाया गया!-सरदेसाई की ‘New History of the Marathas’, Vol. lll, P.248।
अहिल्याबाई का न्याय, शासन-व्यवस्था, दानशीलता और उनकी विनयशीलता इत्यादि का आधार है-‘इतिहासाचीं साधनें’, पहला भाग के पत्र! ‘महेश्वर दरबारचीं वातमीं पत्रें’; इंदौर गजीटियर; ‘होलकर शाहीचा इतिहास’; V.V. Thakur कृत ‘Life and Life-work of Shri Ahilya Bai’; डॉक्टर उदयभानु कृत ‘देवी अहिल्याबाई’, (हिंदी); ‘देवी श्री अहिल्याबाई होलकर’ (मराठी), ‘पुण्यश्लोक देवी श्री अहिल्याबाई’ (मराठी), ‘होलकरांची कैफियक’; सरदेसाई कृत ‘New History of the Marathas’, Vol. ।।। और ‘The Main currents of Maratha History’। अंतिम पुस्तक में रुढ़िगत विश्वासों की आलोचना भी मिलेगी।

गौतमापुर में अपराधियों को छोड़ छुट्टी-
इंदौर गजीटियर,पृ. 275
गनपतराव और जामघाट पर भवन-निर्माण गजीटियर, पृ. 285 मराठी पुस्तक ‘देवी श्री अहिल्याबाई होलकर’ इत्यादि।
उस समय के अंधविश्वास, और खरगोन के चबूतरे, खंबे और फरसे की पूजा, ‘नव दुर्गामाता’ के मंदिर में जीभ का बलिदान, राजा बल्लाल की ‘ऊन’ वाली कहानी इत्यादि-
इंदौर गजीटियर इत्यादि
अहिल्याबाई, तुकोजीराव होलकर-
ऊपर लिखी सभी पुस्तकों में वृत्तांत मिलेगा।
अहिल्याबाई और महादजी सिंधिया तथा उत्तरी क्षेत्र के प्रसंग-‘New History of the Marathas’, Vol. ।।।; इसी पुस्तक के पृ. 213 पर अहिल्याबाई का क्षुब्ध होना और महादजी को शाप देना लिखा है।

भारमल दादा होलकर-

इसका जन्म 1730 में हुआ था और देहांत अठानवें वर्ष की आयु में। सर जॉन मालकम इत्यादि अंग्रेजों ने अहिल्याबाई पर जो कुछ लिखा है वह अधिकांश भारमल दादा का ही बतलाया हुआ था। देखिए V.V. Thakur कृत ऊपर बतलाई हुई पुस्तक, ‘होलकर शाहीचा इतिहास’ (मराठी)।
रामपुरा-भानपुरा के राजपूतों का विद्रोह और विद्रोह का दमन-सरदेसाई की अंग्रेजी पुस्तक।
अंत में अहिल्याबाई को रामपुरा-भानपुरा के राजपूतों पर बहुत क्रोध आ गया था। उनका क्रोध एक पत्र में पूरी तरह प्रकट है-(देखिए होलकर कैफियत, पृ. सं. 62)।

उस युग में एक प्रदेशवाला दूसरे प्रदेशवाले को हेय समझता था। देखिए पत्र क्र. 354, ता. 30-10-1789 और पत्र क्रम 256, ता. 19-11-1789। तत्कालीन संस्कृत कवि खुशालीराम और मराठी भाषा के विख्यात कवि मोरोपंत ने अहिल्याबाई के संबंध में जो कविताएँ लिखी हैं वे तथ्यमूलक हैं। अनंतफंदी भी ऐतिहासिक व्यक्ति है, उसकी कविता डेढ़ सौ वर्ष पहले की ‘खड़ीबोली’ का विचित्र नमूना है। यशवंतराव होलकर पर उसने 1805 के लगभग जो हिंदी कविता लिखी थी, वह पृ. 153 पर ‘होलकर शाहीचा इतिहास’, भाग 2 में प्रकाशित हुई है।

सर जॉन मालकम ने, जो अहिल्याबाई का समकालीन था, लिखा है-‘It is an extraordinary picture, a female without vanity, a bigot without intolerance, a mind imbued with the deepest superstition yet receiving no impression what promoted the happiness of those under its impression; a being excercising in the most active and able manner despotic power not merely sincere humility but under severest moral restrain that a strict conscience could impose on human action; and all this combined with the greatest indulgence for the weakness and faults of others.’
अहिल्याबाई के संबंध में दो प्रकार की विचारधाराएँ रही हैं। एक में उनको देवी के अवतार की पदवी दी गई है, दूसरी में उनके अति उत्कृष्ट गुणों के साथ अंधविश्वासों और रूढ़ियों के प्रति श्रद्धा को भी प्रकट किया है। मैं उन्हें उस अँधेरे की प्रकाश-किरण मानता हूँ, जिसे अँधेरा बार-बार ग्रसने की चेष्टा करता रहा। बाकी कहानी में, जिसका कलेवर जान-बूझकर बड़ा नहीं होने दिया।

अहिल्याबाई

महेश्वर से दूर, नर्मदा के दक्षिण में बहुत दूर अंबाड परगने के बाडलापुरा गाँव में दिनदहाड़े जो कुछ हो रहा था उसको इस कहावत में कह दिया जाय-‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’।

गाँव के पंचों की न चली और उसने भेड़-बकरी, चूल्हा-चक्की, नकदी-गहने, यहाँ तक कि तलवार भी अपने अधिकार में समेट ली। केवल कुछ कपड़े-लत्ते रह गए थे। यह सामान एक ऐसे का था जो मरने के पीछे कोई बाल-बच्चा नहीं छोड़ गया था। पंचों ने समझाया कि मरे का चचेरा भाई संसार में है। पर संसार है बहुत फैला हुआ। न जाने चचेरा भाई कहाँ हो, कभी गाँव के आवेग भी या नहीं ! इसलिए उस जबरदस्त ने मरे हुए का भी हड़प जाना ठीक समझा। मरे का एक संबंध इससे अवश्य था-वह इसका मित्र था ! और उसने श्मशान में उसका दाह-कर्म किया था !!
तो कुछ दावेदार खड़े हो गए-क्योंकि कुछ कपड़े-लत्ते जहाँ के तहाँ रखे थे।

एक ने कहा, ‘मैं उसे ताड़ी पिलाया करता था।’
दूसरा बोला, ‘वाह ! मेरा खेत उसके खेत से मिला हुआ है, रात में गपशप होती थी। मैं कभी-कभी उसके खेत की रखवाली किया करता था।’
‘यह भी कोई बात हुई ?’ एक ने टोका।
एक बुढ़िया न मानी, ‘वह मुझे काकी-काकी कहते न थकता था।’
‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाले ने बुढ़िया के दावे पर पानी फेर दिया, ‘और जब वह कहते-कहते थक गया तब भगवान् के घर चला गया, दाह के समय न काम आया कोई !’
निदान मरे के कपड़े-लत्ते भी उसने हथिया लिये। यह अपहरणकर्ता अकेला न था, और उसकी पीठ पर उस इलाके का देशमुख जो था।

संध्या समय मृत व्यक्ति का चचेरा भाई आ गया। उसने उत्तराधिकारी होने का पूरा विवाद किया, परंतु वह जीत न सका।
पराजित चचेरे भाई ने देशमुख से फरियाद करना व्यर्थ समझा। वह अहिल्याबाई के पास उतनी दूर महेश्वर जा नहीं सकता था, इसलिए अंबाड के कमाविसदार के पास पहुँचा।
कमाविसदार ने पूछा, ‘मरे का क्रिया-कर्म करने के समय क्यों नहीं पहुँचे तुम ?’
उस दुखिया ने उत्तर दिया, ‘भाई की बीमारी का समाचार सुनते ही गाँव से चल पड़ा था। गैल मे रात हो गई। भीलों ने पकड़ लिया और तब थोड़ा जब घर से छुटौती के पैसे मँगवाकर उन्हें दिए। इसलिए भाई की क्रिया-कर्म नहीं कर पाया।’
कमाविसदार को देशमुख के पक्षपात का पता लग गया। भीलों की बटमारी के दमन का प्रयास जितना बनता था, करता ही रहता था; देशमुख का वैर कौन बिसाए, इसलिए फरियादी को टाल दिया।
अन्याय-पीड़ित व्यक्ति को भरोसा हो गया कि अहिल्याबाई के हाथों ही उसे न्याय मिलेगा-वहाँ लाठीवाले की नहीं चलेगी। वह महेश्वर चला गया और उसने अहिल्याबाई को अपनी फरियाद सुना दी।

(2)

पंचमी का चंद्रमा पश्चिम के ऊँचे पहाड़ों के पीछे छिप जाने के लिए सरकता चला जा रहा था। एक व्यक्ति नर्मदा किनारे पर ख़ड़ी पहा़ड़ी के ऊपर धीरे-धीरे चढ़ रहा था। पहाड़, जंगल, नदीं के विस्तृत पाट और मांधाता टापू पर छाई हुई रात चारों दिशाओं से अँधेरे को समेटने में लगी हुई थी। जाते हुए चंद्रमा और आते हुए अँधेरे के बीच बड़े-बड़े तारे हँस उठे थे और छोटे-छोटे तारों की मुसकान फैलने-सिकुड़ने लगी थी। उस स्तब्ध खडी पहाड़ी से सटकर बहनेवाली नर्मदा वक्र चंद्रमा की उदासी, तारों की मुसकान और सिमट-सिमट आनेवाली अँधेरी को समान भाव से अपने अंचल में भरती चली जा रही थी।

वह खड़ी पहाड़ी पर हाँफ साधते हुए धीरे-धीरे चढ़ता चला जा रहा था। चढ़ाई लगभग सीधी थी। बड़े-बड़े ढोंके, छोटी-मोटी चट्टानें, बीच-बीच में छोटे-मझोले पेड़। मार्ग का ऊबड़-खाबड़पन रुक-रुककर चढ़नेवाले का एक सहारा भी था। पहाड़ी की चोटी थोड़ी-सी ही दूर रह गई थी, पर वहाँ पहुँचने में साँस साथ नहीं दे रही थी। वह एक चट्टान से टिककर खड़ा हो गया। साँस सध गई तो बड़बड़ाने लगा-
‘यहाँ से गिरके नर्मदा में डूबकर मरनेवाले तर जाते हैं। अपने मन का कुछ भी नहीं कर पाता। बल-पौरुष में किसी से कम नहीं। बड़ों-बड़ों के दाँत खट्टे कर दिए, फिर भी मेरा कोई मूल नहीं। मुझे कोई नहीं चाहता-न बाप न माँ। तो चलूँ ऊपर की चोटी पर, और वहाँ से नीचे-’
उसने एक-दो डग ही थे कि चट्टान के पीछे से किसी का स्वर सुनाई पड़ा-
‘ठहरिए।’
चढ़नेवाला थम गया; पर सकपकाया नहीं।

चट्टान के पीछे से एक व्यक्ति निकलकर उसके पास जा खड़ा हुआ।
हाथ जोड़कर बोला, ‘श्रीमंत ! यह क्या कर रहे हैं ? घर लौट चलिए।’
कुछ क्षण उपरांत उसने कहा, ‘‘अरे ! दादा हैं क्या ? ध्वनि में आश्चर्य था, परंतु ढलते हुए चंद्रमा के क्षीण प्रकाश में आगंतुक ने लक्ष्य नहीं कर पाया कि उसके चेहरे पर अचंभे का कोई चिह्न नहीं था।
‘हाँ, मैं ही हूँ। चलिए घर। मातुश्री चिंतित हैं।’
‘उनको कैसे मालूम कि मैं यहाँ इस काम के लिए आया हूँ।’
‘यह काम है ! मातुश्री बहुत पल्ले का सुनती हैं और बहुत दूर का देखती हैं। चलिए, नहीं तो हम सब घोर संकट में पड़ जावेंगे।’
‘मेरे पीछे कुछ भी हो, मैं ऐसे नहीं जाने का; मरने के लिए आया हूँ।’ उसने चोटी की ओर चढ़ने के लिए पैर उठाए। आगंतुक ने कंधा पकड़ लिया। वह रुक गया।

बोला, ‘भारमल दादा, मातुश्री देवी न तो पिताजी को समझाती हैं और न बड़े भाई को। पिताजी उत्तर हिंदुस्थान फतेह करने गए और साथ के लिए काशीराव को बुला भेजा है। मैंने अपने लिए कहा तो आनाकानी कर दी !’
‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं। किसी-न-किसी दिन बुलावेंगे। अब की बार मातुश्री कहेंगी।’
वह थोड़ी देर चुप रहा; जैसे कुछ सोच रहा हो।
जिसे भारमल दादा संबोधित किया गया था, उसने प्यार और विनय के साथ उसकी पीठ पर हाथ फेरा और कहा, ‘मैं उनकी सेवा में सदा रहता हूँ, अवसर आने पर याद दिलाऊँगा। यहाँ से चलिए।’
‘तो आप जानें, दादा। मैं किसी से कम नहीं। सारे हिंदुस्थान को विजय करने का दम रखता हूँ।’

भारमल ने उसे कंधे से लगाकर घीरे से छोड़ दिया-उसके मुँह से शराब की बू आ रही थी।
‘किनारे पर सवारी तैयार खड़ी है। महेश्वर चलिए,’ भारमल का स्वर स्नेह-प्रचुर था।
‘नीलगढ़ गाँव में मेरा घोड़ा है, नौकर-चाकर भी हैं। अभी महेश्वर नहीं जाऊँगा।
वे दोनों धीरे-धीरे उतरकर नीचे आ गए।

चंद्रमा डूब चुका था। तारे झिलमिल करते हुए नर्मदा की जलराशि पर उतरा-से रहे थे। नर्मदा अपने दोनों ऊँचे किनारों को निर्द्वंद्व स्वर में आशीर्वाद देती चली जा रही थी। सिद्धेश्वर महादेव के मंदिर से शंख, झालर और घंटे की ध्वनि उस आशीर्वाद का साथ दे रही थी। मंदिर का शिखर जैसे तारों की झिलमिल को दूर से पुचकार रहा हो।
किनारे पर एक घोड़े को साईस थामे खड़ा था। उससे थोड़ी दूर कुछ घुड़सवार अपने-अपने घोड़े सँभाले थे। उन सबने भारमल के साथवाले को विनम्र प्रणाम किया।

स्नेह के साथ भारमल ने कहा, ‘‘भैया मल्हारराव, महेश्वर ही चले चलो। नीलगढ़ बहुत छोटा-सा गाँव है, कष्ट होगा।’
मल्हारराव ने नाहीं की, ‘नहीं दादा, नीलगढ़ ही ठीक रहेगा। कल चोली पहुँचा जाऊँगा और यदि मन में आ गया तो रात में ही चल पड़ूँगा।’
‘रात में! चोली गाँव नीलगढ़ से ग्यारह-बारह कोस बैठेगा। तिस पर मार्ग बहुत बीहड़ ! ऐसा न करो। विनती करता हूँ।’
मल्हार ने पिघलने का लक्षण दिखलाया, ‘चलकर देख लीजिए न, आराम का सब सामान है नीलगढ़ में।’
भारमल को उसके साथ जाना पड़ा। मल्हार को एक घोड़े पर बिठला दिया गया। गाँव निकट ही था। वे सब शीघ्र पहुँच गए।


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