आसमान अपना आँगन - अभिमन्यु अनत Aasman Apna Aangan - Hindi book by - Abhimanyu Anat
लोगों की राय

प्रवासी लेखक >> आसमान अपना आँगन

आसमान अपना आँगन

अभिमन्यु अनत

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :424
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1673
आईएसबीएन :81-7315-332-9

Like this Hindi book 10 पाठकों को प्रिय

200 पाठक हैं

प्रस्तुत है श्रेष्ठ उपन्यास....

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

आसमान अपना आँगन धरती को आकाश तक ले जानेवाली यात्रा से कहीं अधिक आकाश को धरती तक ले जाने की यात्रा है। यह यात्रा जहाँ आदमी के रिश्ते के यथार्थ की कहानी है वहीं आदमी के भीतर स्पंदित बेहतर संबंधों का वह स्वप्नचित्र भी है जहाँ यथार्थ से आगे के यथार्थ का वातायन खुलता है। आसमान अपना आँगन आसमान छूने का तकाजा नहीं करता, पर हाँ आसमान को आत्मकथा करके आज के युग के टूटते-बिखरते संबंधों को फिर से बनाने का आग्रह अवश्य करता है। जीवंत इतिहास और फैन्टैसी के इस संगम के लिए उपन्यासकार के लाइसेंस का स्वच्छंद उपयोग अनिवार्य था।

 

रेने मेरवील की डायरी

क्या मैं इसलिए मान लूँ कि शांति मर गई, क्योंकि उस दिन, आज से सात दिन पहले—होली के दिन— मैं उसकी चिता को आग दे आया ? अगर वह सचमुच मर गई होती तो आँखें मूँदे जिसे मैं देख लिया करता हूँ, वह कौन है ? जिसकी आवाज को पुरवाई और समंदर की लहरें मुझ तक ले आती हैं, वह आवाज शांति की नहीं तो किसकी हो सकती है ?
हाँ, यह सही है कि पहले की तरह मैं उसके कोमल हाथों को अपने हाथों में नहीं ले पाता; उसके माथे पर के फीके पड़ रहे लाल टीके को फिर से नई चमक नहीं दे पाता; पर सुबह पूजा के बाद वह प्रसाद के साथ मुझे सफेद गुलाब नहीं भेंट कर पाती; फिर भी वह आज भी ‘मेजों इव्र’ की चारदीवारी के भीतर इस प्रांगण के चप्पे-चप्पे पर छाई हुई है। मैं उसे आकाश के तारों के बीच ढूँढ़ता रहता हूँ; पर एक-न-एक दिन वह मुझे मिलेगी जरूर; यहाँ न सही उन बिखरे तारों के बीच के किसी एक तारे पर ही सही, पर मिलेगी जरूर।
कल मैं अपनी उस अनंत यात्रा पर निकल भी गया, तो भी उसकी उपस्थिति का एहसास और उसकी स्वर-लहरी, उसकी गूँज यहाँ ‘मेजों इव्र’ के चप्पे-चप्पे पर बनी रहेंगी। वह एक समंदर से दूसरे समंदर के हर राही, एक आसमान से दूसरे आसमान के हर यात्री का पथ-प्रदर्शन करती रहेगी। मैं रहूं या न रहूँ, मेरे प्यार की वह सुगंध यहाँ बनी रहेगी। कल ‘मेजों इव्र’ जिसका भी बसेरा होगा उस पर शांति की छाया बनी रहेगी। आज से बीस वर्ष पहले, इस बँगलेमें जब शोभा का आगमन हुआ था....
मैं रेने मेरवील शक्कर कोठी के उस बड़े धनपति का बेटा होकर भी कुछ नहीं था और...
25 मार्च, 1980
मेजों इव्र, ग्राँ-बे

 

एक

 

वह रोज देखता था उन उफनती, दहाड़ती लहरों को।
वह रोज देखता था उन शांत, अडिग काली चट्टानों को।
कभी वह अपने को उन लहरों की तरह महसूसता और कभी उसे ऐसा एहसास होता कि वह भी चट्टान ही तो था। लहरों के अपने संकल्प थे, चट्टानों के अपने प्रण थे और उसमें तो उन दोनों के वे प्रण और संकल्प—दोनों मौजूद थे। ठीक लहरों की तरह वह भी जीवन भर यही चाहता था कि अपने सामने की हर दीवार पर वह प्रहार करता रहे—करता रहे जब तक कि वे सारी दीवारें चकनाचूर होकर उसका रास्ता न छोड़ दें। चट्टानों की तरह उसने हमेशा अपने को अडिग और अखंडित बनाए रखने की चेष्टा की थी। लेकिन जिस तरह लहरें चट्टानों से टकरा-टकरा फेनिल टुकड़ों में या तो बिखर जाती थीं या फिर लौट जाती थीं मझधार को, ठीक उसी तरह नए सिरे से शक्ति अर्जित करके वह भी कई बार टूटा और कई बार जहाँ से यात्रा शुरू की थी वहीं लौटता भी रहा था। चट्टानों की ही तरह वह ज्वार-भाटों से अपने को जहाँ खंडित होने से बचाता रहा वहीं लहरों के प्रण को तोड़ने की असफलता का भी एहसास करता था।
इधर स्थायी रूप से वह समुद्र किनारे के इस बँगले में रह रहा था जिसका नाम उसने पहले तो ‘नशेमन’ रखा था, पर बाद में बदलकर ‘आशियाना’ कर दिया था। अर्थ भले एक ही था, पर उसे लगा था कि ‘नशेमन’ को ‘आशियाना’ में बदल देने से घर का—और उसके आँगन का पूरा नक्शा ही बदल गया था। बँगले का इन दोनों नामों से पहले भी एक नाम था—उस पहले मालिक का दिया हुआ, जिसने उसे बनाया था और वह नाम फ्रेंच में था—‘मेजों इव्र’—नशीला घर। उसने उस नाम पट्ट को बँगले के आगे से उस समय हटाया जब उसे अपना स्थायी निवास तय कर लिया था। वह दस महीनों से अधिक ‘मेजों इव्र’ में नहीं रहा था और उससे आधी अवधि ही ‘नशेमन’ में रहा था। अब तो कोई चार वर्ष होने को थे, जब से वह ‘आशियाना’ में रह रहा था। पाँच वर्षों से अधिक समय से वह हर शाम पश्चिमी क्षितिज पर सूरज को अस्त होते देखता आ रहा था। बँगला द्वीप के जिस इलाके में था वहाँ सूर्योदय देख पाना तो असंभव था; पर उसने तो जब भी सूरज को डूबते हुए देखा था तो इस भावना के साथ कि वह कल उगने वाले सूरज को ओझल होते देख रहा था। कुछ ही दूरी पर मुनमुन अपने छोटे पगों से बालू पर के जहाँ-तहाँ के पत्थरों पर उछल-कूद कर रही थी।
हंस का जन्म अंग्रेजों के राज्य में हुआ था; इसलिए उसके जन्मपत्र पर उसका जो नाम लिखा हुआ था उसे उसने अपना नाम कभी माना ही नहीं था। उसे बताया गया था कि उसकी माँ ने हिंदी के किसी कवि के नाम पर उसका नाम लिखवाया था; पर ब्रिटिश साम्राज्य के सिविल स्टेट्स क्लर्क ने उसका नाम ‘हरिवंश’ न लिख कर ‘हरा बाँस’ लिख डाला था। उसने अपनी बड़ी बहन से यह सुन रखा था कि उन दिनों लोग अपने बच्चों को असली नाम से नहीं पुकारते थे। डरते थे कि कहीं कोई डायन या ओझा उस असली नाम पर जादू-टोना न चला दे। इसलिए सभी लोग उसे उसी नाम से पुकारते थे जिस नाम से उसे उसकी माँ पुकरती थी। वह अपनी फ्रेंच रचनाएँ भी ‘हंस’ नाम से ही लिखता था। वह केवल उसका पिता था जिसने उसे हमेशा ‘हरिवंश’ कहकर पुकारा था। अपनी पहली कविता उसने ‘हंस’ नाम से लिखी थी और अपनी पहली पेंटिंग पर भी उसने यही हस्ताक्षर रखा था। वह अपने पहले कविता-संग्रह की अंतिम कविता को पूरा करने में लगा हुआ था, जब नंदिनी की पहली चिट्ठी उसे मिली थी। वह उसके अपने पाँचवें पत्र का पहला उत्तर था और पत्र के अंतिम वाक्य को हंस ने अपने पहले संग्रह का नाम दे दिया था। उसकी अपनी लिखी छह पुस्तकों के बीच ‘वह पहली और अंतिम चिट्ठी’ आज भी दीवार के तख्ते पर सबसे पहले स्थान पर थी।
आज कोई दो घंटे पहले शोभा के द्वारा परोसे खाने को खा चुकने के बाद जब वह अपने नए चित्र को अधूरा छोड़कर पहले से अधूरी छूटी कविता को पूरा करने बैठा था कि तभी नंदिनी का फोन आ गया था—कई साल बाद। नंदिनी का पहला फोन।
उसे विश्वास नहीं हुआ था। उसका अपना नंबर डायरेक्टरी में नहीं था, इसलिए उसे हैरानी भी हुई थी और वह पूछ बैठा था, ‘‘तुम्हें मेरा फोन नंबर किसने दिया ?’
उत्तर में उधर से प्रश्न आया था, ‘क्या बताना जरूरी है ?’
इस समय समुद्र के सामने चट्टानों पर खड़ा वह खुद चट्टान की सी स्थिरता के साथ दो घँटे पहले की पाँच-सात मिनटों की फोन पर की उस बात के बारे में सोचे जा रहा था। वह चट्टानों के बाच की एक चौड़ी-चपटी चट्टान पर खड़ा था। आगे कोई तीस फीट तक जो चट्टानें थीं उनसे टकरा-टकराकर लहरें कराहती हुई छितरा रही थीं। वह सूर्यास्त को निरखने के लिए खड़ा नहीं था; क्योंकि क्षितिज पर लालिमा फैलने में दो-ढाई घंटे बाकी थे। सामने—कुछ भीतर, समंदर जहाँ शांत था वहाँ—पानी की हरियाली विविधता लिये हुए थी। उसके बाद जहाँ प्रवाल रेखा थी वहाँ के ज्वार-भाटे उसके अपने पास की लहरों से कई गुना अधिक विद्रोही थे। एक अकेली नाव बादबान (पाल) ताने दक्षिण की ओर कोई मील भर के रेतीले तट की ओर तेजी से लपक रही थी। उसकी नजर सामने अपने बँगले की बालकनी पर पहुँची, जहाँ शोभा अपनी सफेद साड़ी में अटारी की सफाई करती दिखाई पड़ी क्षण भर के लिए उसे नंदिनी की याद जाती रही और वह सोभा के बारे में सोचने लगा।
हंस के कानों में लहरों की आवाज और हवा की जोरदार साँय-साँय के साथ नंदिनी की आवाज की अनुगूँज फिर से आ गई। वह कहाँ से बोली थी, इसकी भी जानकारी उसने नहीं दी थी और न ही अपनी उस घबराहट का कारण हंस को बता सकी थी। अगर मुनमुन बालू पर दौड़ती हुई उसके आगे न आ जाती तो हंस खयालों में खोया रह जाता।
कल रात शोभा के घर लौटने से पहले ही हंस ने उससे कह दिया था सुबह वह उसे आते ही जगा दे, जिसका मतलब था—सुबह छह से पहले। यही कारण था कि सोभा रोजाना की अपेक्षा पंद्रह मिनट पहले ही बँगले पर पहुँच आई थी। अपने पास की दोहरी चाभी से उसने मुख्य दरवाजा खोला। अपने साथ लाए दूध के पात्र को हाथ में थामे वह सीधे रसोई में पहुँचने की आदी थी; पर इस बार वह दूध को सामने मेज पर रख कर सीधे ऊपर पहुँची। गलियारे की बत्ती जलाई और हंस के कमरे के सामने पहुँचकर उसने दरवाजे पर दस्तक दी।
एक बार, दो बार, तीसरी बार पर जाकर भीतर से उनींदी आवाज आई, ‘‘व्ही किसानला सा ?’’
‘‘मैं हूँ। छह बजने को हैं।’’
‘‘ठीक है। मैं नहाकर सिर्फ चाय ही पीयूँगा, नाश्ता मत तैयार करना। साढ़े छह बजे मुझे घर से निकल जाना है।’’
शोभा रसोई में आ गई। उसने पहले चाय बनाई और जल्दी-जल्दी आलू के पकौड़े तैयार करने में लगी हुई थी कि हंस अपनी कमीज के ऊपरी बटन को लगाते हुए भीतर आ गया।
पकौड़े की गंध पाकर वह बोला, ‘‘नहीं, मैं पकौड़े नहीं लूँगा, मुझे केवल चाय दे दो।’’
तब तक शोभा पकौड़े को कड़ाही से निकाल कर प्लेट में रख चुकी थी। मेज पर रखते हुए वह बोली, ‘‘पता नहीं, आप कब तक बाहर रहें। पेट में कुछ तो होना चाहिए। चाय तैयार होते-होते आप खा लेंगे।’’ यह कहकर शोभा ने केतली से कप में चाय उड़ेली, फिर दूध के बाद शक्कर मिलाने लगी।
हंस ने प्लेट से एक पकौड़ा उठाया और उसका एक टुकड़ा मुँह में पहुँचाने के बाद कहा, ‘‘दो सप्ताह हो गए, मैं ‘प्रीतिराज’ नहीं गया। वैसे भी आज वहाँ दो नई परिचारिकाओं की भरती होनी है। कल शाम मैनेजर ने फोन पर कहा था कि मेरा वहाँ होना बहुत जरूरी है।’’
हंस के सामने चाय रखने के बाद शोभा ने धीमें स्वर में पूछा, ‘‘प्रीतिराज’ ?’’
हंस ने अपने मुँह के टुकड़े को भीतर पहुँचाने के बाद उस छोटे से प्रश्न का उत्तर दिया, ‘‘अरे हाँ, तुम्हें नर्सिंग होम का नाम नहीं बताया। बात यह है कि मेरी माँ कि इच्छा थी कि मेरे पिता विकलांग बच्चों के लिए एक नर्सिंग होम बनवाएँ। मैंने अपनी माँ की इच्छा पूरी करने के लिए अपने दो घरों में एक घर को ही नर्सिंग होम में परिवर्तित कर दिया। मेरी माँ का नाम प्रीतिदेवी लछमन था और पिता का नाम राजवंत रामटहल। मैंने अपनी माँ के पहले नाम से ‘प्रीति’ लिया और पिता के नाम से पहले ‘राज’—इस तरह नर्सिंग होम का नाम ‘प्रीतिराज’ हो गया। किसी दिन तुम्हें दिखाने ले चलूँगा।’’
‘‘मुनमुन बता रही थी कि बहुत बच्चे हैं वहाँ।’’
‘‘पिछले साल नब्बे बच्चे थे। इनमें न देख पानेवाले और कुछ बच्चे शारीरिक एवं मानसिक कमजोरी लिए हुए भी हैं। इस समय मैं सोचता हूँ, संख्या सौ से ज्यादा हो गई होगी।’’
‘‘तब तो बहुत खर्च आता होगा।’’
‘‘जिनके पैसे ये हैं, वे तो खर्च करने के लिए रहे ही नहीं। उनके नाम पर खर्च करके यह सोच लेता हूँ कि वे लोग मेरे साथ हैं।’’
हंस ने एक दीर्घ श्वास लिया और एक पकौड़े को उठाकर उसे प्लेट में ही इधर उधर करते हुए शोभा को बिना देखे कहा, ‘‘खासकर जब मैं उस घर के विस्तृत प्रांगण में होता हूँ, जहाँ हम एक साथ रहे, तो अब उनकी उपस्थिति का एहसास मुझे जीनेका बल देता है।’’
शोभा की आँखें एकाएक सजल हो गईं थीं; पर वह उन डबडबा आए आँसुओं को बहने से रोके रही। बाकी पकौड़ों को प्लेट में ही छोड़कर हंस चाय का कप हाथ में लिये खड़ा हो गया।
चाय गरम थी, फिर भी उसने दो लम्बी चुस्कियाँ लीं। चाय का कप उठाने के पहले से ही सूझ आई बात को उसने शोभा के सामने रखना चाहा, ‘शोभा, मैं...मैं तुम्हारी तश्वीर बनाना चाहता हूँ। ऐसी तस्वीर जिसमें कोई अपनी आँखों के छलछला आए आँसुओं को छलकने से रोक कर मुस्कराती रहे।’ पर चाह कर भी नहीं रख पाया।
शोभा ने जल्दी से जूठी प्लेट को उठाकर वॉश-बेसिन में रख दिया। हंस को एक मिनट से ज्यादा लगा कप को खाली करने में। उसके हाथ से खाली कप लेते समय शोभा ने उसके कंधे पर से एक बाल को चुटकी से पकड़ कर खिड़की से बाहर फेंक दिया।
रामोतार सुबह का अखबार लिये आ गया। हंस ने उसके हाथ से अखबार लेकर जल्दी-जल्दी सुर्खियां देखीं और मेज पर रख दिया।
यह ‘आशियाना’ में शोभा और मुनमुन के प्रवेश के चंद दिन पहले बीती घटना थी।
लाल सूरज अपनी किरणों को समेटकर नीले आसमान और अधभूरे-अधसफेदी लिये बादलों के टुकड़ों पर सिंदूरी और गुलाबी छाप को छोड़े जा रहा प्रतीत हो रहा था हंस इधर जब से ‘आशियाना’ को अपना बसेरा बनाए हुए था, हर शाम सूरज को विभिन्न रंग-सज्जा में धरती के इस हिंद महासागर-भाग से विदाई लेते देखता आ रहा था। उसने बहुत कम अवसरों पर सूर्योदय देखा था। ग्राँ-बे के जिस स्थान पर उसका अपना बँगला था वहाँ से पश्चिमी क्षितिज पर डूबता सूरज तो वह देख पाता था, पर सुबह के सूरज को वह तब ही देख पाता था जब वह पेड़ों और इमारतों के ऊपर पहुंच जाता था। उसे अपना सूरज उस पूर्वी सूरज से हमेशा अधिक प्रिय लगा था।
‘आशियाना’ के सामने की काली चट्टानों पर बॉबी उसकी बगल में बैठा हुआ था। कभी-कभी अपनी जगह से उठकर तितलियों और चिड़ियों को फुदकती पाकर वह उन तक दौड़ जाता था और फिर लौट आता था अपने मालिक के पास। हंस कभी-कभार उसे इस तरह देखता रहता, गोया वह उसकी उन बातों के एक-एक शब्द को समझ लेता था। हंस ने सूरज को ओझल हो जाने दिया, उसके बाद बॉबी की ओर देखा और बोला था, ‘‘बॉबी, मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया न कि मैं एक फरार आदमी हूँ। मुझे जिस चारदीवारी के भीतर होना चाहिए था, मैं वहाँ न होकर इधर भाग आया हूँ। जिन पिछले सारे लोगों से मैं जुड़ा हुआ था उन सभी से अपने को रिहा करके मैं इस इलाके में आ गया था। उस कैद से भागकर चाहा था कि अपने सारे अतीत को भुला दूँ और यहाँ के एकांत में आगे के जीवन को बसर करूँ; पर कितना कठिन होता है बीते हुए कैदी जीवन को भुलाना !’
बॉबी उसे देखता रह गया था। कभी पूंछ हिला जाता और कभी हंस के हाथ पर जीभ फेर जाता। हंस को लगता कि उसके जिस एकाकीपन को कोई नहीं समझ पाया, उसे उसका यह प्यारा कुत्ता समझता था। उसकी पूरी-की-पूरी खुली मिलाकर हंस ने आगे कहा था, ‘उस अतीत से मुक्त होकर भी मैं अब इधर अपने आपको जैसे कैद में पाने लगा हूँ। और यह कैद तो कभी-कभी उस पहली कैद से भी अधिक कष्टदायी लगती है। मैं यह तो नहीं जान पाया कभी कि कोई गुनाह करने के बाद सलाखों के पीछे की वह कैद की यातना कैसी होती है, पर मुझे नहीं लगता कि मानसिक तौर पर वह मेरी कैद से अधिक पीड़ा लिये हो सकती है। हाँ, बॉबी, एक बात जरूर है। मेरी उस कल की जिंदगी और आज की इस जिंदगी में एक अंतर अवश्य है। कल मैं स्वयं अपना ही कैदी था और आज एक फरार जीव हूँ, जो अपने में कैदी होने के एहसास को बहुत अधिक कम हुए नहीं पा रहा। कल तक मेरी सारी धन-दौलत, जमीन-जायदाद मुझे एक बोझ सी प्रतीत होती रही थी, आज कम-से-कम उस अकुलाहट से अपनो को बचा तो पाया हूँ।’
बॉबी ने अपने सिर को ऊपर-नीचे हिला दिया था। हंस ने उसके सिर पर हाथ फेर कर उसे बताया था कि एक वही तो है जो उसको समझ लेता है।
‘बॉबी, अगर अनवर चाचा प्रीतिराज नर्सिंग होम के लिए मेरे हौसले नहीं बढ़ाते तो मैं आज भी धन को व्यवसाय का साधन माने उसके बोझ से दबा रहता। ‘प्रीतिराज नर्सिंग होम ने मुझे यह सिखा दिया कि जमीन-जायदाद से प्राप्त धन को जरूरतमंदों के हित में लगाकर सही सुख, सही आनंद की अनुभूति की जा सकती है। आज मैं कुछ करके खुश तो जरूर हूँ, लेकिन यह खुशी कई बार अधूरी सी लगती है। तुम मेरे अकेलेपन की कड़वाहट को थोड़ा-बहुत कम कर जाते हो, लेकिन...’ वह सोच उठा कि इससे आगे वह बॉबी को और क्या बताए। उसने बस कह दिया था, ‘कुछ ऐसी बाते हैं जो तुम नहीं समझ पाओगे, बॉबी।’
बॉबी ने जैसेकि बात समझ ली हो—सिर हिलाकर हामी भर दी थी।
देखते-ही-देखते सूरज डूब गया था।
और यही वह दृश्य था जिससे हंस के अपने भीतर का विश्वास कभी डूबा नहीं। वह अपने से कहता, ‘और तब तक उसकी आस्था बनी रहेगी जब तक सूरज डूबकर उगता रहेगा।’
कुछ ही देर में धुँधलके के बाद अँधेरा छाने लगा था। बॉबी ने ‘आशियाना’ की ओर देखा था, फिर हंस की ओर—और भौंक पड़ा था। उस संकेत को समझकर हंस ने ‘आशियाना’ की ओर देखा था, जो अँधेरे में डूब रहा था। वह उठा और बॉबी के साथ घर में रोशनी लाने के लिए आगे बढ़ गया था।

दो

 

बँगले में हंस का वह तीसरा दिन था, जब उसने वह आवाज पहली बार सुनी थी। वह बँगले के आगे खड़ा उसके पूरे प्रांगण को देख रहा था और उसमें परिवर्तन लाने की सोच रहा था। रंगीन ज्वालामुखी-पत्थरों की दीवार पर वह बँगले के उस नाम को बदलकर कोई दूसरा नाम रखना चाहता था; पर दो-तीन नामों में से वह सही नाम चुन नहीं पा रहा था। वह इसी उधेड़बुन में था कि उस आवाज को उसने पहली बार सुना। पहले तो उसे ऐसा लगा कि वह उसकी अपनी ही आवाज थी जो उसे बँगले का नाम बदलने से रोक रही थी; लेकिन अधिक गौर करने पर उसे लगा कि वह तो एक जनाना आवाज थी—एक सुरीला स्वर था, जो कि लहरों की ‘कल-कल’ ध्वनि को अपने साथ लिए उसके कानों में पहुँचा था, ‘नाम तो अच्छा है, उसे क्यों बदलना चाहते हो ?’
सुबह का वक्त था, इसलिए उसने यह मान लिया था कि रात में जो अधिक पी रखी थी शायद उसीका हेंग—ओवर था, जिसके कारण उसे किसी औरत की आवाज सुने जाने का भ्रम हुआ था। लेकिन जिस दिन वह दीवार पर से ‘मेजों इव्र’ की प्लेट उतारकर ‘नशेमन’ का नामपट्ट लगा रहा था, तभी उसके कानों में वही सुरीली गुनगुनाहट हुई थी। इस बार स्वर में हल्की हँसी का भी मिश्रण था, ‘देखना, कुछ दिनों में यह नाम भी तुम्हें नहीं जँचेगा। इसे भी बदलकर रहोगे।’
उस दिन वह रात के नशे की खुमारी लिये हुए नहीं था। शाम का समय था। दिन में कभी-कभार उसे ठंडी बियर ले लेने की आदत थी; लेकिन उस दिन तो उसने बीयर भी नहीं ली थी। नामपट्ट बदल चुकने के बाद काफी देर तक वह अपने से यही पूछता रह गया था कि कहीं वह उसीकी आंतरिक आवाज तो नहीं थी ? पर अगर सचमुच वह उसका आंतरिक स्वर ही था तो वह नारी स्वर कैसे हो सकता है ? जब उसकी माँ का देहांत हुआ था तो कई दिनों तक वह उसकी आवाज को सुनता रहा था उसकी माँ उसके हौंसले को बढ़ाती हुई उससे कहती, ‘तुम इतने उदास मत रहा करो।’ अपनी माँ की आवाज को तो वह भलीभाँति पहचानता था, यह नई आवाज उसकी माँ की आवाज नहीं हो सकती। तो फिर किसकी थी ? वह आवाज तो, लग रहा था कि, किसी दूर स्थित रेडियो स्टेशन से आ रही थी। किसकी थी वह आवाज ?
और फिर उस दिन जब सचमुच उसने ‘नशेमन’ नाम को बदलकर बँगले का नाम ‘आशियाना’ रखा तो वह आवाज फिर उसके कानों में गूँजी थी। इस बार केवल हँसी के रूप में। उस तरह की हँसी, जब केले के छिलके पर किसीके फिसलकर गिर जाने पर कोई बच्चा हँस पड़ता है। उसने यह बात जब अपने मित्र रेशाद के सामने रखी तो वह हँस पड़ा था।
‘तुम अपनी ही आवाज को सुनते हो।’
‘मेरी आवाज जनाना कैसे हो सकती है ?’
‘उन नाटकों का नॉस्टेल्जिया हो सकता है।’
‘क्या मतलब ?’
‘तुम लड़कियों की भूमिका निभाते थे।’
‘तुम बचपन की बात करने लगे; पर वह तो तुम भी करते थे। तुम्हें वह आवाज क्यों नहीं सुनाई पड़ती ?’
अंत में रेशाद ने एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात कही थी, ‘यह आवाज चाहे तुम्हारी हो या किसी और की, एक बात तो साफ है।’
‘वह क्या ?’
‘कि यह आवाज या तो तुम्हें आगाही देती है या आगे की बात बता जाती है।’
‘यह तो ठीक है, यार, लेकिन यह आवाज किसकी है ? मेरी, मेरी माँ की या...’
‘मैं तुम्हें अपने एक डॉक्टर दोस्त से मिलाना चाहता हूँ। वह मानसिक रोगों का विशेषज्ञ तो है ही, साथ-ही-साथ मनोवैज्ञानिक भी है। हो सकता है कि तुम्हारे भीतर एक दोहरे व्यक्तित्व का...’
‘समझने वाली भाषा में बात करो न !’
‘हो सकता है, यह एक मानसिक रोग हो।’
‘मुझे फिर से पागल खाने में भरती करवाना चाहते हो क्या ?’
अपने इस प्रश्न से हंस ने अपने भीतर के उस सोए हुए भाग को अचानक झकझोरकर जगा दिया।
आठ साल पहले...
आठ साल पहले के वे दो महीने....
आठ साल पहले के उन दो महीनों के घटाटोप दिन ! वे गुंजलक भरी रातें...
अपने बेटे राहुल के चेहरे पर फुंसियां उभर आयी देख पहले तो नंदिनी चिंतित हो उठी थी, पर उसकी माँ ने जब उसे बताया कि गरमी के कारण वैसा हुआ था, तो उसके जी में जी आया। सप्ताह भर पहले जब उसने पेरिस छोड़ा था तो उस समय वहाँ कड़ाके की ठंड के साथ बर्फ की भी शुरुआत हो चुकी थी। नंदिनी की माँ ने सही कहा था कि बच्चा यहाँ की इस तरह की गरमी का अभ्यस्त नहीं था, इसलिए चेहरे और बदन पर भी भयानक फुंसियाँ उभरी थीं। नंदिनी को अपना बचपन याद आ गया था—उसे जब इस तरह की फुंसियाँ हुई थीं तो उसकी माँ घबरा गई थी। घर के सभी लोगों से कहा था कि नंदिनी को माता उग आई थीं। उसका बाहर जाना और सहेलियों के साथ खेलना बंद कर दिया गया था जब तक कि देवी माँ को चने और पूड़ियाँ नहीं चढ़ाई गई थीं और नंदिनी के चेहरे व बदन से सभी फुंसियाँ मिट नहीं गई थीं।
नंदिनी की बड़ी बहन अस्पताल में नर्स थी। दूसरे दिन वह उन फुंसियों पर लगाने के लिए दवा ले आई थी। नंदिनी अपने पाँच वर्ष के बच्चे के चेहरे पर और बदन पर दवा लगा रही थी तथा साथ ही उसे भोजपुरी एवं क्रिओली की शब्दावली भी सिखा रही थी। राहुल को तो केवल फ्रेंच बोलनी आती थी, जिसके कारण वह परिवार और पड़ोस के बच्चों के साथ अच्छी तरह घुल-मिल नहीं पा रहा था। पड़ोस के कुछ बच्चे उसे ‘ची फ्रांसे’ कहकर छेड़ जाते थे। जाहिर था कि इस लफ्ज को उन्होंने घर के किसी बड़े से पहले सुना होगा। राहुल एकदम अपने पिता पर गया था। उसकी आँखें एकदम मिसेल की आँखों की तरह नीली थीं। उसका अपना रंग भी उसीकी तरह एकदम गोरा था; जबकि उसकी माँ का रंग गोरा होते हुए गेहुँआपन लिये हुए था। राहुल जब अपनी माँ के पेट में था, तभी से माँ नंदिनी और पिता मिसेल के बीच उसके लिए एक सही नाम की खोज शुरू हो गई थी।
मिशेल चाहता था कि बेटे का नाम फ्रांसीसी हो, ताकि आगे चलकर फ्रांसीसी समाज में उसे किसी तरह की परेशानी न झेलनी पड़े। जबकि नंदिनी ने उसके लिए बहुत पहले से ’मुकेश’ नाम चुन रखा था। हमेशा से मुकेश उसका सबसे प्रिय गायक था। मॉरीशस छोड़ते समय भी, वह अपने साथ मुकेश के गानों के कई कैसेट लेना नहीं भूली थी। एक बार उसने मिशेल से कहा था कि यदि बेटा हुआ तो उसका नाम मुकेश रखेगी और अगर बेटी हुई तो लता।
इसपर मिशेल बोल उठा था, ‘केल द्रोल दे नों। सा सोन बिजार।’
उसे वे दोनों नाम अजीबोगरीब प्रतीत हुए थे। बच्चे के जनमने में दो दिन बाकी रह गए थे और जब उन्हें पता चल गया था कि लड़का ही होगा तो दोनों के बीच एक समझौता हो गया था। खुद मिशेल ने कहा था, ‘देखो हम अपने बेटे का ऐसा नाम रखें जिससे वह अपनी फ्रांसीसी और मॉरीशसीय—दोनों पहचानों को बरकरार रख सके।’
बहुत सोचने के बाद अंत में नंदिनी का प्रस्ताव था, ‘हम उसका नाम रऊल रखेंगे।’
‘राउल ! पर यह तो एकदम फ्रेंच नाम है।’
‘तुम्हारे लिए वह राऊल होगा और मेरे लिए राहुल।’
‘राहुल !’
‘हाँ यह नाम भगवान् बुद्ध के बेटे का था।’
और दोनों ही तरफ से इस नाम पर स्वीकृति की मुहर लग गई थी।
यह राहुल नाम उसके दिमाग में हंस की याद आ जाने पर एकाएक कौंध आया था। हंस जहाँ भारतीय नाम था वहीं ‘हांस’ होकर पाश्चात्य नाम भी हो चला था। उसके फ्रेंच पाठक उसे ‘हांस’ ही पुकारते थे। स्वयं नंदिनी ने उसे इसी नाम से जाना था।
राहुल के पूरे बदन और चेहरे पर दवा लगा चुकने के बाद नंदिनी ने उसे अब तक के सिखाए क्रियोली वाक्यों की पुनरावृत्ति करते हुए पूछा, ‘‘इल फे त्रे शो ! इसे बच्चों के बीच कैसे बोलोगे ?’’
राहुल ने झट कहा, ‘‘ली पे फेर त्रो शो।’’
‘‘और अगर नानी से बात करोगे तो क्या कहोगे ?’’
‘‘नानी बाहुत गाराम।’’
‘‘चलेगा।’’
राहुल को पड़ोस के बच्चों के बीच भेजकर नंदिनी एक बार फिर से फोन पर हुई उन बातों के बारे में सोच उठी जो सुबह दिनेश ने उससे की थीं।    
          
        
       


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book