लोगों की राय

पर्यावरण एवं विज्ञान >> आधुनिक जीवन और पर्यावरण

आधुनिक जीवन और पर्यावरण

दामोदर शर्मा व हरिशचंद्र व्यास

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :368
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1685
आईएसबीएन :81-7315-082-6

Like this Hindi book 1 पाठकों को प्रिय

18 पाठक हैं

प्रस्तुत पुस्तक गीता-पुराण की भाँति पर्यावरण धर्म का संदेश देती है...

Aadunik Jivan Aur Prayavaran a hindi book by Damodar Sharma, Harish Chandra Vyas - आधुनिक जीवन और पर्यावरण - दामोदर शर्मा व हरिशचंद्र व्यास

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत पुस्तक स्वयं में बहुआयामी है परंतु इसकी सार्थकता तभी है जबकि पाठक इसमें उठाए गए बिदुओं से मन से जुड़ जाएँ। यदि पर्यावरण हमारे चिंतन के केंद्रबिंदु है तब यह पुस्तक गीता-कुरान की भाँति पर्यावरण धर्म की संदेश वाहि का समझी जायगी। हमारा विनीत प्रयास यही है कि पाठक आनेवाली शताब्दी की पदचाप को पूर्व सुन सकें और रास्ते के काँटों को हटाकर संपूर्ण जीवन-जगत् के जीवन को तारतम्य और गति प्रदान कर सकें।

आरंभिका

विकास और विनाश की धाराएँ एक साथ चलें-कभी समानांतर और कभी एक-दूसरे को काटती हुई-तो भला किसको आश्चर्य नहीं होगा ? लेकिन यह आश्चर्य आज का सत्य है। आप इसे बीसवीं शताब्दी का परम सत्य भी कह सकते हैं। एक ऐसा भयानक सत्य है यह जो आगे आनेवाली शताब्दियों के सामने दो विराम चिह्न रखता है, एक प्रश्नवाचक और दूसरा पूर्ण विराम। विज्ञान की ताबड़तोड़ भाग-दौड़, मनुष्य का अपरिचित-असंतुष्ट लालच, तेजी से क्षत-विक्षत होनेवाले प्राकृतिक संसाधन, और प्रदूषण से भरा-पूरा संसार उजड़ता हुआ-ये सब आखिर कैसा चित्र उभारते हैं ? जितनी तेजी गति से विकास की ओर बढ़ रहे हैं क्या उतनी ही तेज गति से विनाश हमारी ओर बढ़ रहा है ? तो फिर नतीजा क्या होगा ? मानवता के सामने यह एक विराट् प्रश्नचिह्न है। यदि इसका सही समाधान कर लिया गया तो ठीक, नहीं तो संपूर्ण जीव-जगत् एक पूर्ण विराम की स्थिति में आकर खड़ा हो जाएगा। प्रश्नवाचक या पूर्ण विराम !!-कौन-सा विकल्प चुनेंगे हम ?
प्रस्तुत पुस्तक में इन्हीं दो प्रश्नों को सामने रखकर हमने अपने पाठकों से सीधा संवाद करने की चेष्टा की है। पुस्तक में आठ खंड हैं जो एक-दूसरे से पृथक होते हुए भी आपस में जुड़े हुए हैं। शताब्दी के सभी समकालीन लोगों की तरह हमारी भी इच्छा है कि मानव की बढ़ती हुई आकांक्षाओं और आवश्यकताओं के अनुरूप उसका विकास हो; लेकिन विकास की यह पटकथा विनाश से धरातल पर न लिखी जाए। इस विश्वव्यापी चिंता का कारण है पर्यावरण प्रदूषण। पुस्तक के प्रथम खंड में इसी का विवेचन किया गया है। शीर्षक है-पर्यावरण शिक्षा और प्रदूषण के प्रकार।
इसके पश्चात् आता है प्रदूषण का महामायाजाल। दूसरा खंड इसी पर आधारित है। हमारे चारों ओर प्रदूषण का एक ऐसा वितान फैला है, जिससे मुक्ति पाना असंभव-सा लगने लगा है। लेकिन इस भस्मासुर की सृष्टि आखिर किस शंकर ने की ? हमने ही तो ! वायु और जल, धरती और आकाश, और यहाँ तक कि अंतरिक्ष भी प्रदूषण की चपेट में आ चुके हैं।
प्रदूषण ने आज मानव के सामने जो चुनौतियाँ खड़ी की हैं, वे सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती ही जा रही हैं। तृतीत खंड में इन्हीं का उल्लेख किया गया है।
शीर्षक है-प्रदूषण का कुफल।
चौथे खंड में इस दानव से छुटकारा पाने के कुछ सुझाव वर्णित हैं। शीर्षक है-भविष्य के लिए शुद्ध पर्यावरण कैसे ?
आज पर्यावरण स्थानीय संदर्भ की नहीं, विश्व संदर्भ की बात है। पंचम खंड इसी वैश्विक चेतना का परिचायक है। ब्रह्मांड एवं अंतरिक्ष की चेतना को सँजोते हुए इतिहास के गलियारों में से निकलकर हमने उन सभी अंतरराष्ट्रीय प्रयासों (संधियों, सम्मेलनों, घोषणा-पत्रों) को सामने रखने का प्रयास किया है जो पर्यावरण चेतना को एक विश्वछबि दे सकते हैं। ‘ओजोन परत’ की क्षति और पृथ्वी की निरतंर गरम होने की विभीषिका हमारे सामने है। यही वह समय है जब आत्मनिर्भरता को युग का सत्य समझकर मानव एक-दूसरे के त्राण और भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए तैयार हो जाए।
खंड छः भारतीय मनीषा की भावभूमि को लेकर है। नाम है-भारतीय संदर्भ में पर्यावरण। पर्यावरण को हमने किस दृष्टि से देखा, उसके साथ कैसे एकाकार हुए, उसके संरक्षण के लिए हमने क्या-क्या प्रयत्न किए-ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो पर्यावरण चेतना को भारतीय भावभूमि से जोड़ते हैं। एक प्रकार से यह खंड अतीत से लेकर वर्तमान तक की भारतीय मनीषा का एक इतिवृत्तात्मक, सिलसिलेवार आख्यान है।
‘राजस्थान के संदर्भ में पर्यावरण’- यह नाम है खंड सात का। इसमें रेगिस्तान में पर्यावरण संतुलन और विश्नाई समाज द्वारा पर्यावरण सुरक्षा के प्रयासों का विशेष उल्लेख किया गया है।
अंतिम खंड समाज एवं समुदाय के दायित्व-बोध का है। जागृति का निनाद उन्हें गहरी नींद से जगाकर इस बात के लिए उद्बोधित करता है कि जागो, अभी समय है। इस हेतु आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति पर्यावरण के प्रति जागरूक हो। और बाल्यावस्था से ही बच्चों को इस ओर प्रेरित किया जाए।
प्रस्तुत पुस्तक अपने आपमें बहुआयामी है। इसकी या इस जैसी अनेक अन्य पुस्तकों की सार्थकता तभी सिद्ध हो सकती है, जब पाठक इनमें उठाए गए बिंदुओं के साथ मन से जुड़ जाए।
पर्यावरण जैसे विस्तृत विषय को संक्षिप्त में प्रस्तुत करना कठिन कार्य है। अतः पुस्तक के कलेवर का विचार कर प्रमुख लेकिन महत्त्वपूर्ण प्रसंगों का ही वर्णन इसमें किया गया है। आशा है, यह पुस्तक पाठकों को सोच का नया संस्कार दे सकेगी।

पारिस्थितिकी-तंत्र

पर्यावरण

पर्यावरण दो शब्दों परि+आवरण से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है परि- चारों तरफ, आवरण- घेरा यानी प्रकृति में जो भी हमारे चारों ओर परिलक्षित होता है-वायु, जल, मृदा पेड़-पौधे, प्राणी आदि-सभी पर्यावरण के अंग हैं और इन्हीं से पर्यावरण की रचना होती है। सभी प्रकार के जीव और भौतिक तत्त्व अपनी क्रियाओं से एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। आदि मानव अपने भोजन के लिए शिकार और तन ढँकने के लिए पत्तों का उपयोग करता था। कालांतर में खेती, सहकारी उद्योग-धंधों, कुनबों और समाज के निर्माण से स्पष्ट है कि आदि-काल से ही मानव अंतर-आश्रित जीव रहा है। आज के प्रगतिशील युग में भी मानव पग-पग पर अन्य समुदाय, समाज एवं दूसरे राष्ट्रों पर अंतरनिर्भर है। परंतु प्रकृति के साथ विध्वंसात्मक कार्यवाही जो व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु हो रही है, जिससे पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है-इससे हमारा स्थायी विकास होना तो दूर, हम स्थायी रूप से मानसिक संतुलन खोते जा रहे हैं।
बढ़ती जनसंख्या व औद्योगीकरण के कारण तकनीकी सभ्यता के द्वारा वैभव और ऐश्वर्य प्राप्त अपने में चाहे अस्थायी रूप से हम सफल क्यों न हो जाएँ; परंतु हमारा स्थायी विकास संदिग्ध है, क्योंकि पारिस्थितिकी-व्यवस्था में असंतुलन द्रुत गति से हो रहा है। हमारी जल्दबाजी और उतावले ढंग से पर्यावरण पर विजय पाने की लालसा ने प्रकृति द्वारा निर्मित पारिस्थितिकी-तंत्र पर प्रतिकूल असर डाला है जो किसी समाज या राष्ट्र तक सीमित न रहकर अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संतुलन बिगाड़ रहा है। मानव और प्रकृति की परस्पर अंतरनिर्भरता एवं सद्भावनाओं को समाप्त करने से हमारा पारिस्थितिकी-तंत्र डगमगा रहा है। कालांतर में भी यदि मानव की यही अभिवृत्ति बनी रही तो प्रकृति द्वारा करोड़ों वर्षों की यात्रा के उपरांत बना प्राकृतिक पर्यावरण नष्ट हो जाएगा। मैंन मेड ईको सिस्टम’ में मानव अपने अस्तित्व को उस समय खतरे में डाल देगा, जब तीव्र गति से हो रहे जल, नभ, थल, वायु, ध्वनि आदि के प्रदूषण बढ़ते-बढ़ते ऐसी स्थिति पैदा हो जाएगी कि मानव के स्वयं घुटकर मृतप्राय हो जाने की प्रबल संभावनाएँ स्पष्ट नजर आने लगेंगी। अतः समय रहते पारिस्थितिकी-तंत्र मानव समाज, जो एक-दूसरे पर आश्रित रहा है, उसे बनाए रखना होगा और प्रकृति का अत्यधिक दोहन न करने की चेतना का विकास करने हेतु विश्वव्यापी अभियान छेड़ना होगा, जिससे प्रकृति एवं जीवधारी अपना कार्य संतुलित ढंग से करते रहें और एक-दूसरे के सहसंबंध निरंतर अग्रसर हो सकें। मानव मात्र को चाहिए कि वे पारिस्थितिकी नियमों का अपने हित में पालन सोच-विचारकर करें। प्रगति के नाम पर प्रकृति पर नियंत्रण करने की हठधर्मी में ढील देते हुए अपन आपको प्रकृति का अभिन्न अंग समझने का प्रयास करना होगा, ताकि पारिस्थितिकी-तंत्र एवं समाज के बीच परस्पर संतुलन बना रह सके।
कोई भी जीव सर्वथा एकल जीवन व्यतीत नहीं कर सकता। किसी भी स्थान पर निवास करनेवाले जीव की दूसरे जीव के साथ सहवासिता अनिवार्य है, अर्थात् भौतिक एवं जैविक घटकों के मध्य गहरा संबंध है। प्रत्येक जीव को उसका भौतिक पर्यावरण प्रभावित करता है। प्रत्येक प्राणी भोजन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पौधों पर निर्भर है; उदाहरणार्थ शेर का भोजन मांस है और वह प्रत्यक्ष रूप से पेड़-पौधों पर निर्भर नहीं है, लेकिन शेर का भोजन हिरण है और उसका भोजन पेड़-पौधे हैं; तो हम कह सकते हैं कि शेर अप्रत्यक्ष रूप से वनस्पति पर ही निर्भर है। प्रकृति अपना कार्य संतुलित ढंग से तब ही कर पाती है, जब भौतिक तथा जैविक अंशों का उचित मात्रा में अस्तित्व विद्यमान रहता है। जब दोनों में से किसी एक की आवश्यकता से अधिकता या कमी होती है, अर्थात् पारिस्थितिकी-तंत्र विफल होता है तो इससे पर्यावरण प्रभावित होता है। वनस्पति को भोजन-निर्माण के लिए सूर्य की ऊर्जा तथा अन्य वातावरणीय कारक-कार्बन डाई-ऑक्साइड, जल आदि लेकर प्रकाश-संश्लेषण करना होता है। इस प्रकार भौतिक तथा जैविक कारकों में आपसी सहसंबंध होता है।
पर्यावरण शब्द जीवों की अनुक्रिया को प्रभावित करनेवाली समस्त भौतिक तथा जैवीय परिस्थितियों का योग है। दूसरे शब्दों में, हम इसे जीव मण्डल भी कह सकते हैं, जो जल-मंडल के विभिन्न भागों के संबंध में कहा जा सकता है कि वायु, जल, नभ, थल आदि में अनेक प्रकार के प्राणी तथा पादप प्रद्रव्य विचरण करते रहते हैं; यद्यपि वायुमंडल का कोई निश्चित अभिलक्षण तथा स्थायी निवास नहीं होता। जल-मंडल में लवणीय तथा अलवणीय-दो जैविक चक्र तथा स्थल-मंडल में केवल एक जैविक चक्र होता है।
जीवों के आवास के आधार पर संपूर्ण जैव-मंडल को तीन भागों में बाँटा जा सकता है-
(1)    अलवणीय जल-पर्यावरण;
(2) लवणीय जल-पर्यावरण;
(3) स्थलीय पर्यावरण।

1.अलवणीय जल-पर्यावरण


इस प्रकार के जलीय पर्यावरण में स्थिर जल तथा बहते जल के आवासों को सम्मिलित किया गया है। इसमे यदि जलीय वातावरण के सूर्य का प्रकाश, कार्बन डाइ-ऑक्साइड, ऑक्सीजन, नाइट्रेट आदि पर्याप्त मात्रा में मिलते रहें तो अलवणीय जल के वातावरण में कई प्रकार के प्राणी और वनस्पति निवास कर सकते हैं। अलवणीय जल के आवास में झील, तालाब, नदियाँ झरने आदि आते हैं।
अलवणीय जल-आवास की निम्न विशेषताएँ हैं-
(1) ये कम गहराईवाले जलीय क्षेत्र होते हैं।
(2) इस वातावरण में तापक्रम, वायु और लवणों की मात्रा परिवर्तनशील होती है
(3) ऑक्सीजन, कार्बन डाइ-ऑक्साइड और लवणों की मात्रा सीमाकारी रूप में कार्य करती है।
(4) साधारणतया लवणों की मात्रा एक प्रतिशत होती है, लेकिन क्षारीय व अम्लीय भूमि में लवणों की मात्रा अधिक होती है।
(5) इनमें पाए जानेवाले जीव तथा वनस्पति, जल की परिवर्तनशील परिस्थितियों के साथ समाजोयन करनेवाले होते हैं।
(6) रासायनिक दृष्टि से अलवण जल को हम कठोर जल तथा मृदु जल में विभक्त कर सकते हैं। कठोर जल में यहाँ ग्लिसियस, कैल्सियम आदि की अधिकता होती है, वहीं मृदु जल में ये पदार्थ कम मात्रा में पाए जाते हैं।
(7) अलवणीय जल-आवास गर्मी के मौसम में सूखने का खतरा बना रहता है।
(8) अलवणीय जल-स्रोतों में पानी के रुके रहने की स्थिति में उसके दूषित होने का खतरा बना रहता है। दूषित जल से वहाँ आवास कर रहे जीवों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
(9) अलवणीय जल-आवास में जो जल होता है, उसमें लवणों की मात्रा प्राणी के शरीर की कोशिकाओं में पाए जानेवाले तरल से कम होती है; अर्थात् आंतरिक तरल पदार्थ अति प्रसारी होता है। ऐसी स्थिति में यदि शारीरिक कोशिका-कलाएँ पानी के प्रति पारगम्य होती हैं, तो पानी शरीर की कोशिकाओं के अंदर ओसमोसिस के द्वारा प्रवेश करता रहेगा। इससे शरीर फूलकर फट सकता है। इस प्रकार की समस्या का सामना अलवणीय जलीय आवास में रहनेवाले प्राणियों को करना पड़ता है और उनमें इस समस्या के समाधान हेतु अनुकूलन पाया जाता है।

2.लवणीय जल-पर्यावरण या समुद्री आवास


यह भी जलीय पर्यावरण का एक रूप है। समुद्री आवास में, अपनी गहराई एवं विस्तार के कारण, अलवणीय जल-पर्यावरण की अपेक्षा अधिक स्थायी गुण-धर्म होते हैं। समुद्री जल-आवास में लवणों की मात्रा अधिक पाई जाती है। इस आवास की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं-
(1) समुद्री पर्यावरण अनेक क्षेत्रों में विभक्त होता है। इसमें अनुकूलन पाया जाता है।
(2) इस आवास में अलग-अलग क्षेत्र में पाए जानेवाले जंतु एवं पौधे भी अलग-अलग प्रकार के होते हैं तथा क्षेत्र के अनुसार ही इनमें अनुकूलन पाया जाता है।
(3) यह आवास अधिक गहराई वाला होता है।
(4) इस आवास में तापक्रम बाहरी तल पर 20 से. से आंतरिक तल पर 300 से. तक होता है।
(5) लवणता इस आवास का महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण है। इसमें लवणों का उच्च अंश पाया जाता है। समुद्र के पानी में लगभग 49 तत्त्व विभिन्न अवस्थाओं में पाए जाते हैं। समुद्री जल वफर विलयन के रूप में रहता है; अर्थात् अम्लीय से क्षारीय, क्षारीय से अम्लीय दशाओं में परिवर्तित होता रहता है।
(6) समुद्री तट पर ज्वार और भाटे भी आते रहते हैं।
(7) समुद्री जल में धाराएँ चलती हैं। ये धाराएँ वायुजनित या थर्मोहेलायन धाराएँ हो सकती हैं। इन धाराओं का इस आवास में कई प्रकार से लाभ होता है।
(अ) ये धाराएँ पोषक पदार्थ को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में सहायक होती हैं।
(ब) ये धाराएँ अपशिष्ट पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में सहायक होती हैं।
(स) ये धाराएँ समुद्री आवास के जंतुओं व पौधों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में सहायक होती हैं, साथ ही उन्हें विस्तृत क्षेत्र में फैलाने का भी कार्य करती हैं।

3.स्थलीय वातावरण या पर्यावरण


स्थलीय पर्यावरण जलीय पर्यावरण की अपेक्षा अधिक परिवर्तनशील होता है। स्थलीय आवास या पर्यावरण में भौतिक एवं जैविक कारकों द्वारा विभिन्न पारिस्थितिकीय अवस्थाएँ बनती रहती हैं; यही कारण है कि स्थलीय पर्यावरण में विविधता पाई जाती है। इस आवास की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं-
(1) स्थलीय पर्यावरण में नमी एक सीमाकारी कारक है।
स्थलीय जीवों में सदैव निर्जलीयकरण की समस्या बनी रहती है। वनस्पतियों द्वारा वाष्पोत्सर्जन तथा जीवों के शरीर से वाष्पीकरण की क्रिया होती रहती है। अतः इस आवास की वनस्पतियों एवं प्राणियों में वाष्पोत्सर्जन तथा वाष्पीकरण की क्रिया को नियंत्रित करने के लिए अनुकूलन पाया जाता है।
(2) इस स्थलीय पर्यावरण में तापक्रम का भी परिवर्तन होता रहता है।
(3) इस आवास की वायु में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाई-ऑक्साइड का अनुपास निश्चित होता है।
(4) पहाड़, मैदान, घास, स्थल आदि पर अलग-अलग पर्यावरण होता है।
(5) इस आवास में विभिन्न जैवीय-व अजैवीय कारकों की परस्पर अंतः क्रिया होती रहती है।

पारिस्थितिकी-तंत्र


किसी भी समुदाय में अनेक जातियों के प्राणी रहते हैं। ये सभी जीव एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं, साथ ही अपने आसपास के वातावरण को भी प्रभावित करते हैं, इस प्रकार संरचना एवं कार्य की दृष्टि से समाज एव वातावरण एक ‘तंत्र’ की तरह कार्य करता है। इसे पारिस्थितिकी-तंत्र या ‘ईको-सिस्टम’ कहते हैं। जब से मनुष्य ने प्रकृति का अधिक दोहन शुरू किया है, तभी से पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ रहा है और अंततोगत्वा अस्थायी रूप से तो हम अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति कर लेते हैं, लेकिन आनेवाली पीढ़ी के लिए स्थायी लाभ विकसित नहीं कर पा रहे हैं। अतः विकास और प्रकृति में सामंजस्य बैठाकर चलना ही पारिस्थितिकी-संतुलन को बनाए रखने में सहायक हो सकता है।
पारिस्थितिकी-तंत्र शब्द का उपयोग सर्वप्रथम ए.जी.टांस्ले ने सन् 1935 में किया। पारिस्थितिकी-प्रणाली को हम सरलतम भाषा में प्रकृति भी कह सकते हैं; क्योंकि प्रकृति में मुख्यतया जीवों तथा अजैविक वातावरण का योग होता है। पारिस्थितिकी-तंत्र एक जटिल संकल्पनात्मक इकाई है जो सजीव प्राणियों तथा उनके वातावरण से बनती है। पारिस्थितिकी-तंत्र में समुदाय आपस में तथा अपने भौतिक वातावरण से ऊर्जा, द्रव्य आदि का आदान-प्रदान करते रहते हैं। इस आदान-प्रदान के अभाव में पृथ्वी पर सजीव प्राणियों को जीवित रहने के लिए अपने आसपास के भौतिक वातावरण तथा रासायनिक पदार्थों से अंतः क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। तालाब, जंगल, गाँव आदि पारिस्थितिकी-तंत्र के ही उदाहरण हैं।
पारिस्थितिकी-तंत्र में जीव अपने आसपास के पदार्थों को ग्रहण करके अपने शरीर में वृद्धि करते हैं और कार्बनिक पदार्थों का निर्माण करते हैं। ये कार्बनिक पदार्थ पुनः खंडित होकर अकार्बनिक पदार्थों में बदल जाते हैं। इस प्रकार प्रकृति में विभिन्न प्रकार के पदार्थों का चक्रीकरण चलता रहता है।

पारिस्थितिकी-तंत्र में पदार्थों का चक्रीकरण


विभिन्न प्रकार के अजीवीय घटकों को हरे पौधे (उत्पादक) अपने अंदर लेकर सूर्य के प्रकाश और ऊर्जा के सहयोग से कार्बनिक पदार्थ (भोजन) बनाते हैं। यद्यपि ये कार्बनिक पदार्थ भी अजीवीय होते हैं, लेकिन इन कार्बनिक पदार्थों से ही पौधों व इनको खानेवाले जीवों के जीवद्रव्य को आत्मसात करने से ही इनकी वृद्धि संभव होती है।
विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों व जीवों द्वारा निकाले गए अपशिष्ट पदार्थ बाहर वातावरण में छोड़ दिए जाते हैं। ये छोड़े गए पदार्थ अजीवीय घटक होते हैं। प्रकृति में इस प्रकार का चक्र निरंतर चलता रहता है। इस प्रकार के चक्रों में जीवीय तथा अजीवीय दोनों प्रकार के घटक निरंतर क्रियाशील रहते हैं, इसलिए इस ‘भू-जीवीय रासायनिक चक्र’ भी कहते हैं।

भू-जीवीय रासायनिक चक या खनिज-प्रवाह


प्रकृति  के पारिस्थितिकी-तंत्र में विभिन प्रकार के खनिज पदार्थों का एक चक्र चलता रहता है। इनमें नाइट्रोजन-चक्र, जल-चक्र, कार्बन-चक्र, फास्फोरस-चक्र आदि मुख्य हैं।

नाइट्रोजन चक्र


प्रकृति में नाइट्रोजन सबसे अधिक मात्रा में पाई जाती है। लेकिन इसका, कुछ जीवों (जीवाणु एवं शैवाल) को छोड़कर, सीधे प्रयोग करना संभव नहीं है। पौधे भूमि से अपनी जड़ों द्वारा नाइट्रोजन यौगिकों के रूप में अवशोषित करते हैं। पौधों में अन्य प्रकार के पदार्थों की तरह प्रोटीन एवं अमीनो-अम्लों का भी संश्लेषण होता रहता है। जंतु प्रोटींस  को अमीनों-अम्लों के रूप में ग्रहण कर आवश्यकतानुसार प्रोटींस में बदलते या ‘निर्मित करते रहते हैं।’
नाइट्रोजन का नाइट्रेट्स, नाइट्राइट्स आदि के रूप में परिवर्तन भूमि में, विभिन्न विधियों द्वारा होता। पौधो व जंतुओं के द्वारा उत्सर्जित पदार्थों, मृत शरीर आदि के साथ-साथ वायुमंडल की नाइट्रोजन यौगिकों में परिवर्तित  होकर भूमि में ही रहती है। इन क्रियाओं में जीवाणुओं का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। भूमि से वायु तक पौधे, जंतु, प्राकृतिक क्रियाएँ, जीवाणु आदि नाइट्रोजन के संतुलन को बनाए रखने में सहायक होते हैं। इसे ही नाइट्रोजनचक्र कहते हैं।

जल चक्र


विभिन्न प्रकार के जीवों और वनस्पतियों के शरीर में जल सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है। जल पृथ्वी पर समुद्र, नदी, झरनों, तालाबों आदि में रहता है। यह जल निरंतर वाष्पीकरण के द्वारा वायुमंडल में जाता रहता है। वायुमंडल में उपस्थित जल-वाष्प तथा आई हुई जल-वाष्प मिलकर बादलों का निर्माण करते हैं। यह बादलों की वाष्प ही वर्षा, कुहरा या ओस के रूप में पृथ्वी पर वापस लौट आती है।
जल-चक्र का जीवों के लिए बहुत महत्त्व है। ये अपने संपूर्ण आंशिक तल से (जैसे जलीय पौधे) या विशेष अंगों के द्वारा (जैसे जंतुओं के मुख या पौधों में जड़ों द्वारा) जल को ग्रहण अथवा अवशोषित करते हैं। जीवों के शरीर में जल विभिन्न प्रकार की उपापचयी क्रियाओं में भाग लेता है और यही जल मूत्र, पसीने या वाष्पोत्सर्जन द्वारा जंतुओं व पौधों के शरीर से बाहर निकलकर प्रकृति में चला जाता है।

कार्बन चक्र


समस्त जीवों का शरीर जिस जीव-द्रव्य से बना है, उसमें कार्बन प्रमुख तत्त्व है। इसलिए जीव-द्रव्य की मात्रा बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि कार्बन स्वांगीकरण की मात्रा को बढ़ाया जाए। प्रकृति में कार्बन जीवों के अलावा कार्बन डाई-ऑक्साइड आदि के रूप में भी मिलता है। हरे पौधे प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया में इसी वायुमंडलीय कार्बन डाइ-ऑक्साइड का उपयोग कर अपने भोजन (कार्बनिक पदार्थों) का निर्माण करते हैं। यह कार्बनिक भोज्य पदार्थ अन्य जीवों की वृद्धि, निर्माण आदि के लिए उपयोग में आता है।
कार्बनिक पदार्थों का श्वसन द्वारा, जलने पर, अपघटन होने पर या ऑक्सीकरण होने पर फिर से कार्बन डाई-ऑक्साइड में परिवर्तन हो जाता है।
कुछ मात्रा में कार्बन डाइ-ऑक्साइड जल में भी घुली रहती है। यह अन्य तत्वों आदि के साथ संयुक्त होकर अनेक खनिज पदार्थों का भी निर्माण करती है-इनमें सोडियम कार्बोनेट, कैल्सियम कार्बोनेट आदि प्रमुख हैं। प्रकृति में ये विमुक्त होती रहती है। जलीय पौधे पानी में घुली कार्बन डाइ-ऑक्साइड का ही उपयोग करते हैं।

पारिस्थितिकी-तंत्र के घटक


प्रत्येक पारिस्थितिकी-तंत्र-चाहे वह तालाब हो या जंगल हो-मौलिक रूप से सभी की संरचना समान होती है। प्रत्येक पारिस्थितिकी-तंत्र में निम्नलिखित पदार्थों का समावेश होना आवश्यक है-

जैविक घटक


पारिस्थितिकी-तंत्र में जीवित प्राणियों-जंतुओं, वनस्पतियों व जीवाणुओं आदि की जातियाँ आती हैं। ये जातियाँ मिलकर संयुक्त रूप से पारिस्थितिकी-तंत्र का एक समुदाय बनाती हैं। इस समुदाय में पाए जानेवाले संपूर्ण जैविक घटक के भार को जीव-भार कहा जाता है। इसमें उत्पादक, उपभोक्ता व अपघटक आते हैं।

उत्पादक


प्रकृति के हरे पौधे स्वपोषी होते हैं, जोकि अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। इन पौधों में हरिलवक पाया जाता है और ये सूर्य के प्रकाश में कार्बन डाइ-ऑक्साइड व जल ग्रहण कर सरल अकार्बनिक पदार्थों को ऊर्जावाले कार्बनिक पदार्थों में परिवर्तित करते हैं। प्रकृति में केवल हरे पौधे ही अपना भोजन स्वयं बना सकते हैं; अतः इन्हें उत्पादक कहा जाता है।

उपभोक्ता


ये जीव अपने भोजन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वयंपोषी (पौधों) पर निर्भर रहते हैं, अतः इन्हें परपोषी भी कहा जाता है। इन्हें निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जा सकता है
(अ) प्रथम उपभोक्ता
सभी शाकाहारी जंतु जो हरे पेड़-पौधों पर अपने भोजन के लिए आश्रित रहते हैं, उन्हें प्रथम उपभोक्ता कहा जाता है; जैसे खरगोश, हिरण, गाय, टिड्डे आदि।
(ब) द्वितीय उपभोक्ता
द्वितीय उपभोक्ता वे जीव होते हैं जो प्रथम उपभोक्ताओं को खाते हैं; जैसे टिड्डी को मेंढक, छोटी मछली को बड़ी मछली आदि खाते हैं।
(स) तृतीत उपभोक्ता
ये वे उपभोक्ता हैं जो तृतीय उपभोक्ताओं को खाते हैं; जैसे मेंढक को साँप खाता है।
(द) चतुर्थ उपभोक्ता
तृतीय उपभोक्ता का भोजन करनेवाले उपभोक्ता को चतुर्थ उपभोक्ता कहा जाता है; जैसे सर्प को चील खाती है। इसे हम सर्वोत्तम उपभोक्ता भी कह सकते हैं। सर्वोत्तम उपभोक्ता की मृत्यु स्वयं होती है।
इस उपभोक्ता-श्रृंखला को आगे दर्शाये क्रमानुसार व्यक्त किया जा सकता है



प्रथम पृष्ठ

लोगों की राय

No reviews for this book