श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य कहानियाँ - काका हाथरसी व गिरिराज शरण Shrestha Hasya-vyang Kahaniyan - Hindi book by - Kaka Hathrasi,Giriraj Sharan
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श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य कहानियाँ

काका हाथरसी व गिरिराज शरण

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :183
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1692
आईएसबीएन :81-7315-098-0

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प्रस्तुत है हास्य-व्यंग्य कहानियाँ...

Shreshtha Hasya Vyagya Kahaniyein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हास्य-व्यंग्य : जीवन के अंग

जिस प्रकार विरोधी दल के नेताओं में नयी-नयी योजनाएं सूझती हैं। उसी तरह ट्रेन में यात्रा करते समय हमारे मस्तिष्क में विचित्र कल्पनाएं उछल-कूद मचाती हैं।

 उस दिन डॉ० गिरिराजशरण के साथ यात्रा में स्टेशन पर मालूम हुआ कि गाड़ी एक घंटे लेट है। हमारे परिचित टी० टी० बाबू मिले तो हमने कहा, ‘‘क्या हो गया है, इमरजेंसी के बाद ? रोजाना गाड़ियां लेट आती हैं।’’ टी० टी० बाबू कवियों की संगत करते-करते काव्यरसिक बन गये थे। कहने लगे, ‘‘अजी काका, ट्रेन तो एक कुंआरी कन्या के समान है जो ‘मिस’ तो होती ही हैं, ‘लेट’ भी जाती हैं और ‘मेकअप’ भी करती है। अधिक मनचली हुई तो चलते-चलते सीटी बजाती है।’’ उनकी यह तुलनात्मक विवेचना सुनकर एक हास्यकवि ने तो इसपर कविता भी बना डाली थी।

गिरिराज जी ने कहा, ‘‘काका जी, आजकल हास्य-व्यंग्य के लेखक अच्छा लिख रहे हैं और आप स्वयं भी उनकी प्रशंसा करते हैं, क्यों न वर्तमान हास्य-व्यंग्याचार्यों की रचनाओं के संकलन तैयार किये जायें। प्रभात प्रकाशन इसे प्रकाशित करने को तैयार है। आपके पास तो बहुत-सा मैटर होगा। मैं जानता हूँ कि हास्य-व्यंग्य पर जो भी लेख या कविता आपको पसंद आती है, उसकी कटिंग आप एक फाइल में डाल लेते हैं।’’ ‘घर का भेदी लंका ढाये’ यह कहावत याद आयी और हमें स्वीकृतिसूचक सिर हिलाना ही पड़ा।

फिर वे बोले, ‘‘हास्य और व्यंग्य को कुछ साहित्यकार अलग-अलग मनाते हैं इस बारे में आपका विचार ? हमने कहा, ‘‘हास्य और व्यंग्य एक गाड़ी के दो पहिये हैं। हास्य के बिना व्यंग्य में मजा नहीं आता और व्यंग्य के बिना हास्य में स्वाद नहीं आता। दोनों बराबर एक-दूसरे का साथ दें तभी जन-गण-मन की मनोरंजनी गाड़ी ठीक से चलती है। अकेला व्यंग्य निंदा का रूप ले लेता है और अकेला हास्य भड़ैती का सूचक बन जाता है।’’ व्यंग्य का अंग और भी स्पष्ट करते हुए हमने कहा, ‘‘जिसपर व्यंग्य-बाण छोड़ा जाये वह तिलमिलाकर कुछ सोचने के लिए मजबूर हो जाये तो समझिये व्यंग्यकार सफल हुए।

इसके विरुद्ध वह व्यक्ति अपनी बेइज्जती समझकर व्यंग्यकार पर आक्रमण करने को तैयार हो जाये अथवा बदले में गाली देने लगे मैं उस व्यंग्य को व्यंग्य न मानकर अपमान या निंदा की संज्ञा ही दूँगा।’’

आप कड़ी से कड़ी बात कह जाइये, उसमें जरा-सा हास्य का पुट दीजिये। फिर देखिये उसका प्रभाव।  पिछले दिनों मेरठ में कवि सम्मेलन हुआ। वे जिस समय मंच पर आये उस समय प्रसिद्ध गीतकार नीरज गीत सुना रहे थे। नीरज जी का गीत समाप्त हुआ और आवाज लगी कि काका हाथरसी आयें ? मैंने कहा, ‘‘श्रीमान जी के आने से पूर्व मैं कई कविताएँ सुना चुका हूँ और अभी कई शेष हैं, उन्हें सुनवाइए।’’ उत्तर मिला, ‘‘नहीं आप ही आइये।’’ मैंने श्री राजनारायण को लक्ष्य करते हुए कहा, ‘‘श्रीमान मैंने तो आज ही आपके सम्मान में छह पंक्तियां लिखी हैं। नाराज न हों तो सुना दूँ।’’ मैंने सुनायाः


नाटक में ज्यों विदूषक, जोकर सरकस माहिं,
कवि सम्मेलन का मजा बिना हास्यकवि नाहिं।
बिना हास्यकवि नाहिं, हास्य का भारी पल्ला,
अकबर के दरबार बीरबल का था हल्ला।
यह उदाहरण देते हैं काका इस कारण,
आवश्यक हैं संसद में श्री राजनारायण।


मंत्री जी ने एकदम उछलकर हमसे हाथ मिलाया। तब मैंने अनुभव किया कि व्यंग्य का प्रयोग ढंग से किया जाए तो उसका कितना अच्छा प्रभाव पड़ता है।

 एक उदाहरण और देखिये। हमारी मिसरानी प्रायः मैली धोती पहनकर आया करती थी। मैंने उसे कई बार टोका, लेकिन वह टाल देती। एक दिन मैंने  व्यंग्य की बंदूक छोड़ दी और कहा, ‘‘मिसरानी जी, यह धोती जो तुम पहनकर आती हो, क्यों इसका सत्यनाश करती हो, देवछट का मेला रहा है, उसके लिए रख लो न इसे।’’ वह धोती का पल्ला मुँह पर रखकर इतना हँसी कि चूल्हे की रोटी जल गयी। दूसरे ही दिन स्वच्छ वस्त्रों में आना प्रारम्भ कर दिया।

यहाँ पर मैं एक बात और कहना चाहूँगा कि कुछ लोग व्यंग्य के टीले पर बैठकर अपने को महान व्यंग्यकार समझते हैं और जिस व्यंग्य में सरल हास्य भी रहता है, उसे निम्नकोटि का समझते हैं। ऐसे लोगों के लिए कार्ल मार्क्स ने लिखा है, ‘‘हम स्वयं को जो समझते हैं, अपने बारे में जो जानते हैं, जरूरी नहीं है, वह सही हो, व्यक्ति तो व्यक्ति, पूरा युग भी अपनी असलियत नहीं पहचान पाता।’’

वस्तुतः व्यंग्य में यदि हास्य नहीं होगा तो वह कोतवाल का हंटर हो जाएगा। उसकी पीड़ा से तिलमिलाकर अभियुक्त कैसा अनुभव करेगा, उसे आप अच्छी तरह समझ सकते हैं। इस कार्य के लिए न्यायालय पहले से ही मौजूद है, फिर व्यंग्य की क्या जरूरत है। हास्य-मिश्रित व्यंग्य सीधा प्रहार करता है और आपको चोट भी नहीं लगती। लगती भी है तो वह चोट आपके हृदय-परिवर्तन में सहायक होती है। स्व० हृषीकेश चतुर्वेदी कहा करते थे कि ‘‘मजाक करना नहीं है, मजाक करो तो तमीज के साथ करो, वरना चुप रहो।’’

हास्य-व्यंग्य की रचनात्मक धारा से ये पुस्तकें आपके सामने हैं, जिसमें हास्य-व्यंग्य की श्रेष्ठ कविताओं, कहानियों, निबन्धों और एकांकियों को अलग-अलग संकलित किया गया है। इनके रचनाकारों ने रचनाएं भेजने में जो तत्परता दिखायी है इनके लिए वे बधाई के पात्र हैं। इस प्रकार हमारी उस यात्रा में एक ऐसा काम हो गया जिससे हजारों हास्य-व्यंग्य-प्रेमियों को शिक्षात्मक मनोरंजन प्राप्त होगा और वे ‘हास्य-व्यंग्य जीवन के अंग’ इस सूत्र को स्वीकार करेंगे।

-काका हाथरसी


जैसा मैं सोचता हूँ



यह सौभाग्य की बात है कि पिछले कुछ वर्षों से  हास्य और व्यंग्यपरक विधा पर विचार होने लगा है। जिस शिल्प को महत्त्व नहीं दिया जाता था, जिस कथ्य को यों ही उड़ा दिया जाता था, समीक्षक नाक-भौं सिकोड़ते थे, आलोचक कन्नी काट जाते थे, अब कम–से-कम इतना तो हुआ समीक्षकों ने उसपर बातचीत चलायी है।

पर दुर्भाग्य है कि यह बातचीत अभी तक सुलझे हुए वस्तुगत निष्कर्षों तक नहीं पहुँची। हमारे देश के जाने-माने हिंदी व्यंग्यकार भी जब सृजनात्मक लेखन से हटकर व्यंग्य की प्रतिभा पर बात करते हैं तो उसे एक अजीब-सी स्वायत्तता प्रदान करना चाहते हैं। मसलन व्यंग्य है, वह ऊंचे दर्जे की चीज है, हास्य से उसका कोई लेना-देना नहीं, हास्य बेहद घटिया चीज है। न केवल हास्य-व्यंग्य के अंतः सम्बन्धों को समझने में गड़बड़ी है, बल्कि हास्य और व्यंग्य के मूल उत्सों की पहचान भी इस गड़बड़ी में खो जाती है।

हमें यहां बस दो बातें करनी हैं। पहली, हास्य और व्यंग्य की रचना-प्रक्रिया और दूसरी, हास्य और व्यंग्य के आपसी रिश्तों के संबंधों में। ज्ञान और संवेदना का अविच्छिन्न संबंध है। विशेषकर इस शताब्दी में अगर कोई ज्ञान रहित संवेदना की बात करता है या संवेदना-रहित ज्ञान की चर्चा करता है तो  त्रुटि पर है। हास्य को हम संवेदना का एक प्रकार मान सकते हैं। व्यंग्य में विचार या ज्ञान की प्रधानता स्वीकारी ही जाती है। मुक्तिबोध द्वारा गढ़े गये परिभाषित शब्द-युग्मों-ज्ञानात्मक संवेदना, संवेदनात्मक ज्ञान-के वजन पर हमारा मन भी ऐसे शब्दयुग्म बनाने को करता है। यात्रा और अनुपात के आधार पर हमें हास्य को ‘हास्यात्मक व्यंग्य’ और व्यंग्य को ‘व्यंग्यात्मक हास्य’ कहना चाहिए। ‘तर’ और ‘तम’ का अंतर भी से स्पष्ट प्रकट हो जायेगा और व्यंग्य को व्यंग्य एवं हास्य में द्वैत-पैदा करनेवालों को जवाब भी मिल जायेगा।

हास्य और व्यंग्य के उत्स पर विचार करते हुए व्यंग्यचित्रकार आबू की एक बड़ी मजेदार बाद आती है। उन्होंने बड़े मासूम अंदाज में कहीं लिखा हैः जरा सोचिए कि जानवर क्यों नहीं हँसते। सीधा-सा उत्तर है, उनके पास किसी पर हंसने का कारण नहीं होता हैं, क्योंकि वे सब समान हैं। असमान होते तो एक-दूसरे पर हंसते, व्यंग्य करते।’’

कहने को बात में लॉजिक नहीं है लेकिन काफी हद तक बात साफ हो जाती है। असमानता हास्य और व्यंग्य का कारण है। हम अपने बराबर वालों पर नहीं हँसते, हँसते हैं तो छोटों पर या बड़ों पर। हँसते हैं छोटों पर तो बड़े साथ देते हैं। बड़ों पर हँसते हैं तो छोटे साथ देते हैं। बड़ों की संख्या कम, छोटों की ज्यादा है इसलिए अधिकांशः छोटे ही बड़ों पर हँसकर उदात्तीकरण करते हैं। केले के छिलके पर कोई गरीब फटेहाल फिसल जाए तो शायद हँसी न आए; हो सकता है कि कोई सहृदय सज्जन उसे उठाने बढ़े लेकिन यदि मोटे लाला जी उससे फिसल जायें तो उठाने की बात तो दूर कुछ लोग खिलखिलाकर कुछ नजरें बचाकर, तो कुछ खुलेआम हंसेगे और काफी देर तक हँसते रहेंगे। देखा जाये तो इसमें हँसने की कोई बात नहीं है। इसमें बेचारे लाला जी का क्या दोष कि वे फिसल गये किंतु बारीकी से देखा जाये तो हँसने की बात निकलती है। थुल-थुल लाला जी के फिसलने में एक सहायिका उनकी तोंद भी थी, जिसके साथ दूसरों को चूसने का अच्छा-खासा अतीत जुड़ा हुआ है। असमानता का यह अहसास हमें यह तो याद दिलाता ही है कि हमें उन जैसी नहीं, लेकिन एक ही झटके में उसे तिरोहित कर उदात्तीकृत कर देता है। तोंद से संबद्ध शोषण की अतीत गाथा हमारी विचार-प्रक्रिया से टकराती है और हास्य में अंतर्निहित व्यंग्य धीरे-धीरे उभरने लगता है। इसे हम हास्यात्मक व्यंग्य कहेंगे।

यदि कोई व्यंग्यकार इस घटना में अपनी कल्पना विचार-भावना और बुद्धि का योग देकर इस चित्र को कुछ इस तरह खींच के मोटे मंत्री जी हाथ में फाइलें दबाये कैबिनेट की मीटिंग अटैंड करने की फुर्ती में हैं कि फिसल गये। खादी के कुरते के नीचे मिल के रेशम की बनियान झांकने लगी, फाइलों में से फिल्मी पत्रिका गिर पड़ी, कुरते की जेब से विदेशी पेन सरक गया, एक तरफ बत्तीसी जा गिरी-हँसी तो इस चित्र को पढ़-देखकर भी आयेगी किंतु हम इसे व्यंगात्मक हास्य कहेंगे।

हास्य-व्यंग्य के उत्स और उनके संबंधों की बात साथ-साथ चल रही है। उत्स के बारे में एक बात और कह देंगे जो प्रकारांतर से पिछली बात का विस्तार ही है। युग बदलता है परिस्थितियां बदलती हैं, परिवेश बदलता है किंतु कुछ क्षेत्रों में परंपराएं और रूढियां नहीं बदल पातीं। पुरानी मूल्य-व्यवस्था से जकड़न नहीं टूट पाती। नये परिवेश में वे अपनी उपयोगिता खो चुकती हैं। अतः विद्रूपित हो जाती हैं। यह विद्रूप भी हास्य-व्यंग्य का जन्मदाता होता है, क्योंकि इसके कारण अनेक प्रकार की विसंगतियां, विडंबनाएँ और सामाजिक विकार परिलक्षित होने लगते हैं।
परक विडंबनाएं जितनी अधिक होंगी, उतनी ही वहाँ हास्य और व्यंग्य की संभावनाएं होंगी।

विसंगितयों और विडंबना-विकारों के रहते कोई भी व्यंग्य हास्य-शून्य नहीं हो सकता और कोई भी हास्य व्यंग्य के बिना अस्तित्व नहीं रख सकता। हास्य से हमारा अभिप्राय मसखरेपन, मजाक या जोकरी से नहीं है, हास्य से हमारा तात्पर्य है—हास्यात्मक व्यंग्य।
सामान्य समीक्षकों को हास्य-व्यंग्य के अंतःसंबंधों पर पुनर्विचार करने की अदना राय के साथ हास्य-व्यंग्य के संकलन सामने हैं। इन्हें कहीं भी आप हंसने से वंचित नहीं होंगे, साथ ही व्यंग्य की मार से भी बच पाएंगे।


(डा.) गिरिराजशरण अग्रवाल


अजातशत्रु


राजा हरिश्चन्द्र के आंसू



वह रो रहा था। सचमुच रो रहा था। जब मैंने उसकी आँखों में टावेल लगाया। कहा, ‘‘भैया, मत रोओ, सिर दुखेगा।’’
उसने कहा, ‘‘होनी को कौन टाल सका है ? देखो, क्या होना था, क्या हो गया।’’ और उसके आंसुओं ने फिर स्पीड पकड़ ली। उसने अचानक पास में रखी हुई मसाला दोचने की लुढ़िया उठायी और अपने सिर पर मारते हुए कहा, ‘‘ले भुगत।’’
उसके सर पर एक बहुत बड़ा गुरमा निकल आया। मैंने टावेल निचोड़कर उसकी आँखों पर रख दिया।

वह फूड इंस्पेक्टर था। यूं उसका रंग वही था, जो भगवान कृष्ण का था, मगर उसके गाल लाल सुर्ख थे। इस सदी में यदि किसी को निखालिस दूध मिलता था, तो उसे ही, क्योंकि वह शहर के होटलों में दूध चेक करता था। उसके बच्चे भी मोटे-ताजे थे और उसकी बीवी गहनों से लदी रहती थी। वह स्वयं घी का व्यापारी नही था पर उसके घर में घी के कनस्तर रखे रहते थे। वह फूड इंस्पेक्टर की नौकरी करता में इतना खुश था कि अगर राष्ट्र के सबसे बड़े पद का आफर भी मिलता, तो वह ठुकरा देता। वह जानता था कि किसी को भी वह एडवांटेज नहीं है, जो फूट इंस्पेक्टर को है।
वह हफ्ते में एक बार शहर के बाहर नाके पर खड़ा हो जाता था और देहात से दूध लाने वाले ग्वालों के दूध में डिग्री लगाता था। यदि दूध में पानी होता, तो वह सैंपल की बोतल भर लेता और गद्वाले से कहता, ‘‘अब कचहरी में मिलना।’’
ग्वाला कहता, ‘‘छोड़ दो मालिक।’’

वह कहता, ‘‘तुम भ्रष्टाचार छोड़ दो।’’
ग्वाला कहता, ‘‘हुजूर, भ्रष्टाचार से तो गृहस्थी चलती है। विशुद्ध दूध बेचूंगा तो शुद्ध गृहस्थी कैसे चलेगी।’’
वह कहता, ‘‘फिर मेरी कैसे चलेगी ?’’
ग्वाला विचार करता।
अब चपरासी कहता, ‘‘अबे, समझा नहीं ? दूध में पानी मिलाता है और अकल नहीं रखता ? चल उधर कोने में।’’
ग्वाला कोने में चला जाता। चपरासी पूछता, ‘‘कितना दूध लाता है ?’’
‘‘बीस सेर।’’
‘‘पानी कितना डालता है ?’’
‘आधा।’’

‘‘साले, भ्रष्टाचार के घूस-रेट फिक्स हैं। अगर तू बीस सेर में दस सेर दूध लाता है तो पांच रुपये हफ्ता देना पड़ेगा। ज्यादा जल डालेगा तो हफ्ते के रेट भी बढ़ जायेंगे।’’
‘‘अगर मैं बिलकुल न मिलाऊं तो ?’’
चपरासी खीझ जाता। कहता, ‘‘अबे, पानी तो मिलाया ही कर। वरना तू क्या खायेगा और हम क्या खायेंगे ? हमारे साहब को भी दूध में पानी मिलाने में एतराज नहीं है। उन्हें एतराज है हफ्ता न देने का। अब तू जा और दूसरे दूध वालों को समझा दे। मिल-जुलकर जो होता है, वह भ्रष्टाचार नहीं होता।’’
ग्वाला टेंट से पांच रुपये निकालता और चपरासी को दे देता। आगे जाकर वह नगरपालिका के नल से और पानी मिला देता, क्योंकि पांच रुपये की चेंट वह क्यों भोगे ?’’
वह रोये जा रहा था। तौलिया भीगकर वजनदार हो गया।
उसने रोते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे पास टिक ट्वेंटी है ?’’
मैंने कहा, ‘‘नहीं।’’

वह बोला, ‘‘मैं पैसे देता हूं। ला सकते हो ?’’
मैंने कहा, ‘‘आज दुकान बंद है।’’
वह बहुत निराश हुआ और रोने लगा। उस समय वह आत्महत्या करने के मूड में था और मूड का कोई भरोसा नहीं, कब बदल जाये, इसलिए लगातार रो रहा था।
मैंने कहा, ‘‘उठो और मुंह धो लो। तुम्हारी क्या गलती थी ? तुमने तो अपना कर्तव्य किया।’’ वह चिढ़ गया। बोला, ‘‘कर्तव्य ने ही तो मुझे डुबाया। कर्तव्य करके  इस जमाने में कौन सुखी हुआ है ?’’
मैंने उसे पहली बार इतना दार्शनिक होते हुए देखा था। दूध की डिग्री से वह दर्शन पर कैसे आ गया, वह एक गोलाईदार बात है ?’’

मैंने कहा, ‘‘फिर तुमने सैंपल की बोतलें फार्वर्ड क्यों कर दीं ?’’
वह बोला, ‘‘बोतलें मैंने तो धमकी देने के लिए धरी थीं। पर वह मिलने नहीं आया तो मैं क्या करूं। ड्यूटी ही कर डाली। नीति कहती है कि जब जनता के साथ बेईमान न हो सको तो सरकार के साथ ईमानदार हो जाओ। अच्छे कर्मचारी की यही परिभाषा है।’’
मैंने कहा, ‘जब इतना समझते हो तो रोते क्यों हो ? आखिर सरकार तो तुमसे खुश है।’’
वह चिढ़ गया। बोला, ‘‘नहीं, सरकार ने भी उस पार्टी का साथ दिया, जिसके खिलाफ मैंने मिलावट का केस चलाया। कर्त्तव्यपरायणता ने मुझे मार डाला। आह !’’ फिर पूरा किस्सा सुनाया।
....कुछ हफ्ते पहले की बात है, वह डिग्री लेकर बाजार में खड़ा था। उसे पता चला कि कुछ नये दूधवालों ने धंधा शुरू किया है और बिना ‘हफ्ता’ दिये मिलावट का दूध बेचते हैं। इससे जनता के स्वास्थ पर भी भारी असर पड़ता था और उसकी कमाई पर भी। सो, उसने चपरासी से कहा, ‘‘देखो कालूराम,’’ मैं सामने मंदिर के पीछे छिप जाता हूं। जैसे ही कुप्पे आयें, तुम पूछ-पूछ कर छोड़ते जाना। जो काम का है, उसे रोक लेना।’’

चपरासी ने कहा, ‘‘जी हाँ, हुजूर। मैं देख लूंगा। फिकर मत करें। यह कोई आज का काम तो है नहीं ?’’
साहब बहुत खुश हुआ और मंदिर के पीछे छिप गया। थोड़ी देर में दूध वाले आने लगे। चपरासी ने पहली साइकिल को रोका। पूछा, ‘‘हफ्ता दे दिया ?’’
दूधवाले ने कहा, ‘‘साहब के घर जाकर दिया है।’’ चपरासी ने साइकिल छोड़ दी। कुछ देर बाद दूसरी साइकिल आयी। यह एक नये दूधवाले की थी। चपरासी ने उसे भी रोका। दूधवाले ने पूछा, ‘‘क्या बात है ?’’
चपरासी ने कहा दूध में डिग्री लगेगी।’’
दूधवाले ने कहा, ‘‘सबके दूध में लगती है ?’’
चपरासी बोला, ‘‘लग भी सकती है और नहीं भी लग सकती। यह तो हमें तय करना है कि किसके दूध में डिग्री लगेगी। तुमने ‘हफ्ता’ नहीं दिया इसलिए तुम्हारे दूध में लगेगी।’’
‘‘अगर मैं हफ्ता न दूं तो ?’’

चपरासी खिलखिलाकर हंसा। बोला, ‘‘फिर कानून किसलिए है ? यहीं पर तो हम कानून का सहारा लेते हैं।’’
दूधवाले ने कुछ न कहा और जाने लगा। चपरासी ने इशारा किया और साहब मंदिर के पीछे से निकल आये। आते ही बोले, ‘‘ऐ रुको, डिग्री लगेगी।’’
साहब ने डिग्री लगायी। बोतलें भरी और दूध वाले से कहा, ‘‘जाओ, बाद में हमसे मिल लेना। या तो कुछ होगा नहीं या बहुत कुछ होगा। सोच लेना।’’

दूधवाला सर झुकाकर चला गया।....
मैंने कहा, ‘‘यार, चुप भी हो जाओ। देखो पूरी दरी भीग गयी है।’’
वह कहने लगा, ‘‘अजातशत्रु भाई, मैंने तीन दिन दूधवाले की राह देखी। बोतलें जाँच के लिए नहीं भेजीं। सोचा कि वह जरूर आयेगा। शुद्ध दूध कब तक बेचेगा, पर वह नहीं आया। लाचार होकर मैंने सैंपल की बोतलें ‘फारवर्ड’ करवा दीं। तुम्हीं बताओ, जब घूस न मिले तो अपनी ड्यूटी नहीं करनी चाहिए ?’’
मैंने कहा, ‘‘करनी चाहिए।’’
 उसे राहत हुई और उसने आगे बोलना शुरू किया, ‘‘और, भैया, थोड़े ही दिनों में ‘पब्लिक एनालिस्ट’ (दूध-विश्लेषक) की रिपोर्ट आ गयी। उस दूध वाले पर केस कायम हो गया। दूध में पानी निकला।’’
मैंने कहा, ‘‘ठीक है, उसे सजा मिलनी चाहिए।’’

वह बिगड़ उठा। बोला, ‘‘जानते-समझते नहीं हो, बीच में क्यों बोल पड़ते हो। कल शाम को ही उस दूधवाले के एक रिश्तेदार आए थे। वे सामाजिक कार्यकर्ता हैं और मेरे मित्र हैं। उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘यार डायन भी एक घर छोड़ देती है तुमने हमारे आदमी का ही दूध पकड़ लिया।’
‘मैं बहुत लज्जित हुआ, क्योंकि पिछले साल जब मेरे खिलाफ नगर भ्रष्टाचार उन्मूलन युवक समिति ने शासन को लिखा था और रातोंरात मेरा तबादला करवाया था, तब इन्हीं सज्जन ने मेरा ट्रांसफर रुकवाया था और उक्त समिति के नेता को पिटवाया था।’’

‘‘तुमने उन्हें क्या सफाई दी ?’’ मैंने पूछा।
वह बोला, ‘‘मैंने जवाब दिया कि मामा जी, अगर मुझे पता चलता कि यह आपके आदमी का दूध है तो मैं खुद उसे सलाह देता कि पानी डाल ले, पर उसने भी कुछ नहीं बताया। फिर मैंने बोतल भी खोल रखी थी, पर वह नहीं आया। अब तो मैं कुछ कर नहीं सकता। उसे बचाऊंगा तो खुद फस जाऊंगा।’’
इतना कहकर वह चुप हो गया और गर्दन नीचे झुका ली।
मैंने बाल-जिज्ञासा से पूछा, ‘‘अब क्या होगा ?’’

‘‘होगा क्या ? हो चुका है।’’ उसने कहा, ‘‘उस दूधवाले के रिश्तेदार ने ऊपर जाकर मेरा ट्रांसफर करा दिया है। कहा है, ‘‘और लगा ले दूध में डिग्री ?’’ और इतना कहकर वह दहाड़ें मार कर रो उठा। मेरे पास अब गद्दा बचा था, इसलिए मैंने उसे ही उसकी आंखों से लगा दिया। वह रोते हुए कहता जा रहा था, ‘‘देखो, मैंने अपनी ड्यूटी की, तो सरकार ने ट्रांसफर कर दिया। अब कितना भरोसा करूं—ईमान का या बेईमानी का ?’’
गद्दा गीला होता जा रहा था। मुझे उसकी चिंता थी।



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