घर की मुरगी - दीनानाथ मिश्र Ghar ki Murgi - Hindi book by - Dinanath Misra
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घर की मुरगी

दीनानाथ मिश्र

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1696
आईएसबीएन :81-7315-309-4

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घर की मुरगी...

Ghar Ki Murgi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

महात्मा गाँदी ने स्वदेशी का मंत्र दिया था आज इसमें खास तरक्की हुई है। अब पेप्सी कोला नामक अमेरिकी कंपनी इस देश में कोल्ड-डिंक की बोतलों के पहाड़ लगा देगी। बच्चे दूध की बजाय कोल्ड डिंग माँगा करेंगे। हाँ जी यह स्वदेशी व्यंग्यों का संग्रह है-देखन में छोटे पर गंभीर घाव करनेवाले व्यंग्यों का संग्रह। ये व्यंग्य अपनी लोकप्रियता और प्रासंगिकता के लिए सदाबहार कहे जा सकते हैं।

भूमिका
घर की मुरगी


प्रस्तुत पुस्तक कायदे से मुरगी दर्शन है। मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग इस बात से सहमत नहीं होगे कि मुरगों से संबंधित भी कोई दर्शन होता है या हो सकता है। सच्चाई यह है कि मुरगे अपने दर्शन का ऐलान पौ फटने के पहले चालू कर देते हैं। यह जो कहावत है-घर की मुरगी दाल बराबर, यह मुरगे की बाँग का ही अनुवाद है। इंडिया के लोग ‘मेड इन यू.एस.ए. या ‘मेड इन जापान’ पर फिदा है। मुरगा समाज उसका प्रबल विरोधी है। जब केंटकी फ्राइड चिकन का इंडिया-प्रवेश हुआ तब स्वाभाविक रूप से मुरगों के समाज से आवाज उठी। प्रस्तुत पुस्तक में घर की मुरगी दाल बराबर के चिंतन पर अनेक रचनाएँ हैं। एक अन्य कहावत है-घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध। हमारे पागल परदेशी प्रेम का असर साफ है। घर से बाजार तक विदेशी भरा है। पैर के नीचे से लेकर सिर के ऊपर तक सब जगह विदेशी का भूत सवार है।

स्वदेशी-विदेशी का फर्क भूलकर हमने पिछले एक हजार साल में जैसी भूलें की है, इसीका नतीजा था हमारी लंबी गुलामी। अब हमें दूसरी तरह की गुलामी घेर रही है। आजादी की पचासवीं वर्षगाँठ हो या क्रिकेट मैच का नकली महा-महोत्सव, विदेशी बहुराष्ट्रीय निगम भारत की राष्ट्रीय अस्मिता के सर्वोच्च स्वर निकाल रहे थे। विदेशी माल का वर्चस्व उत्कृष्ट स्वदेशी बाने में आबादी के एक बहुत बड़े भाग को भ्रमित करने में कामयाब है।

यह तो जानी-मानी बात है कि जो घोड़े पर नहीं चढ़ता वह घो़ड़े पर से गिर नहीं सकता। यही बात मुझपर और इस पुस्तक पर भी लागू होती है। मेरी कोई साहित्यिक प्रतिष्ठा है ही नहीं कि इस पुस्तक के प्रकाशन से उसके समाप्त होने की रत्ती भर आशंका हो। मैंने ही इसे लिखा है सो, मैं इस बारे में आश्वस्त हूँ कि व्यंग्यकार के रूप में स्थापित होने का रंच मात्र खतरा मुझे नहीं है। लेखक, उपन्यासकार व पत्रकार और हास्य या व्यंग्यकार का अनुपात हिंदी या किसी भी भाषा में कम-से-कम सौ और एक का होता है इस सदी में जितने व्यंग्यकारों को होना था, उनका कोटा खत्म हो चुका है। अच्छा हिंदी पाठक भी स्वर्गीयों को मिलाकर पाँच-छह से ज्यादा व्यंग्यकारों के नाम नहीं गिना सकता। इस पुस्तक के छपने से उस संख्या में फर्क नहीं पड़नेवाला।

जिस समय इन्हें लिखा गया था उस समय लोगों ने इन्हें पढ़ा। अगर ये पठनीय नहीं होते तो ‘अखबार के मालिक’ इतने तो समझदार जरूर होते हैं कि सिर्फ कागज का पेट भरने के लिए इन्हें नहीं छापते। इसलिए मैं हद-से-हद इन रचनाओं को पांच मिनट की आयुवाली अमर रचना मानता हूँ। अब इसकी कितनी प्रासंगिकता बची है, यह तो भगवान् ही जाने या प्रकाशक जानते हों। कम-से-कम मैं नहीं जानता। आपकी इच्छा हो तो खुद पढ़कर मालूम कर लीजिए। मेरा इस संबंध में कोई दावा नहीं है। इन रचनाओं का सबसे बड़ा गुण इनका आकार में छोटा होना है। कोई चाहे तो इन्हें बौनी रचना कह सकता है। मैंने अभी-अभी ‘अखबार के मालिक’ का प्रयोग किया है। मैं चाहता तो अखबार का संपादक भी लिख सकता था। लेकिन जिन वन्य प्राणियों और शहरी जीवों की नस्ल की समाप्त होती जा रही है, उनका उपयोग करना उचित नहीं होता।

साल में मुश्किल से दो दर्जन पत्रों के मिलने की बात जब मैंने आग्रही मित्र से कही तो उन्होंने बडा समाजशास्त्रीय जवाब दिया। हिंदी पाठकों को लिखकर प्रतिक्रिया भेजने की आदत नहीं है। मैं इसमें पाठकों का दोष कम देखता हूँ। हिंदी के ज्यादातर लेखक लिखते ही ऐसा हैं कि जिससे पाठक में प्रतिक्रिया का गर्भाधान नहीं हो पाता। कलकत्ता में शादी या अन्य सामाजिक अवसरों पर अगर कोई प्रतिष्ठित बँगला साहित्यकार पहुँचता है तो बड़ी-बड़ी राजनीतिक हस्तियों के मुकाबले साहित्कार के पास भीड़ ज्यादा होती है। ऐसा कुछ अन्य भाषा के साहित्यकारों के बारे में कहा जा सकता है। मेरे एक पत्रकार मित्र मलयालम में लिखते हैं। जब वह केरल के स्टेशन या हवाई अड्डे पर पहुँचते हैं तो लोगों की आँखें बरबस उनकी तरफ वैसे उठ जाती हैं जैसा अभिनेता के प्रकट होने पर होता है। हिंदी के लेखक, कवि या पत्रकार के बारे में ऐसा बहुत कम सुना जाता है।

मुझसे कई लोग हास्य-व्यंग्य अथवा व्यंग्य की परिभाषा पूछते हैं। इस सवाल को गलत आदमी से पूछने की एक वजह है। कहीं-न-कहीं वह मेरे व्यंग्यकार होने की गलतफहमी पालते हैं। मैं व्यंग्य की परिभाषा भी नहीं जानता । अलबत्ता मुझे छोटा सा व्यंग्य प्रसंग याद है। किसी व्यंग्य पत्रिका में पढ़ा था। स्मृति शेष इस प्रकार है-एक वृद्धा और एक षोडशी भरी बस में चढ़ गई। सवारियों की अर्थवान् नजरें उन दोनों पर पड़ी। वृद्धा ने सोचा, कहाँ बैठूँ ? षोडशी के सामने समस्या थी, कहाँ-कहाँ बैठूँ ? मैं इकतीस शब्दों के इस प्रसंग को ही व्यंग्य की परिभाषा मानता हूँ। अगर जींस कटि प्रदेश के दक्षिण भागों की परिभाषा हो सकते हैं तो यह शब्दों की जींस व्यंग्य की परिभाषा क्यों नहीं हो सकती। ?

दीनानाथ मिश्र

संपादक की बात


जब-जब स्वदेशी अस्मिता के विरुद्ध निर्णय हुए, दीनानाथ जी का बहुचर्चित व्यंग्य स्तंभ-‘आरपार’ जमकर लोहा लेता रहा। इसके अनेक उदाहरण मुझे विगत एक दशक के इन व्यंग्य लेखों में देखने को मिले। उन्हीं का संग्रह ‘घर की मुरगी...’ के नाम से आप पाठकों के सामने प्रस्तुत हुआ है। ये व्यंग्य जनजीवन के सभी पक्षों की रक्षा के लिए विदेशी अर्थतंत्र के जहरीले साँपों पर करारी चोट करते हैं। मेरी दृष्टि में ये स्वदेशी व्यंग्य है। इनकी भूमिका वर्तमान परिस्थितियों में बड़े महत्व की है।

विदेशी कंपनियाँ अपने उत्पादों को बेचने के लिए किस्म-किस्म के तरीके उपयोग करती हैं, जिनसे बेखबर लोग उनके उपभोक्ता बनते जाते हैं। कैसे-कैसे होते हैं ये तरीके ? कैसे इनके आघातों से बदल जाता है जनमानस ? पत्रकारिता की पैनी नजर इसे आसानी से पकड़ लेती है। साहित्य के नए व्यंग्य विषयों का परिचय इन व्यंग्यों से अवश्य मिल सकता है। इनकी बानगी देखिए ‘किसी दिन किसी मेडिकल शोध के जरिए यह साबित किया जाएगा कि जलजीरा पीने से एक्जीमा होता है। लस्सी पीनेवालों को कैंसर होने का खतरा ज्यादा रहता है।..ऐसे दो सौ शोधों से यही पूरी तरह सिद्ध हो जाएगा कि कोका को छोड़कर कोई भी पेय सुरक्षित नहीं है (एकमेव कोला)।’

यूरोप के पारंपरिक त्योहारों में पेप्सी के प्रवेश का उदाहरण देते हुए व्यंग्यकार ने भारतीय जनमानस को जागरूक करने के लिए लिखा है-‘यह भी हो सकता है कि पंडित शादी कराने के बाद वरमाला के नेग पूरे कर नव विवाहित जोडे़ को पेप्सी की बोतलें आदान-प्रदान करने का कोई नया मंत्र पढ़े...या फिर गर्भाधान संस्कार और दाह संस्कार के बीच चौदह अन्य संस्कारों में किसी तरह कोका कोला संस्कार जुड़ जाए (कोका संस्कार)।’ व्यंग्यकार की चिंता है कि हमारी स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी क्या, जब विदेशी कंपनियाँ हमारी बीमा व्यवस्था सँभालेगी ?...विदेशी बैंक दनादन अपना जाल फैला रहे हैं। ये तो शेयर घोटाले में भी सबसे बड़े अपराधी पाए गए। इन्हीं के खातों से धन बाहर जाकर आसानी से लापता होता रहा।...मेरा ख्याल है, देश की अपनी बीमा कंपनियाँ पापड़ बेलने का काम करेंगी। यही फायदे का काम बचा रहेगा।’

‘कोका जैसे तीन दर्जन साम्राज्यों का नाम ही अमेरिकी साम्राज्य है। भारत में भी कोला युद्ध आरंभ हो गया।’
लोक-रुचि और सांस्कृतिक पक्षों पर विदेशी कंपनियों के हमले से उत्पन्न दुष्परिणामों को व्यंग्यकार ने इन स्वदेशी व्यंग्य में आड़े हाथों लिया है-‘मनमोहन सिंह की नीतियों का जैक्सन-लाभ और मैडोना-लाभ तो है ही, अब हॉलीवुड की मारधाड़ और हिंसाचार-यौनाचार से भरी फिल्में हिंदी में डब करके दिखाई जाएँगी। अनुबंध हो गया है। सचमुच सारे देश को इस दौर का स्वागत करना चाहिए।’ (आदाब जैक्सन-सलाम मैडोना)। सोए हुए जनमानस और दिग्भ्रिमित सरकारी नीति से घायल हुई स्वदेशी अस्मिता को देख मर्माहत व्यंग्यकार कथ्य उलटकर कहता है-‘इतना तो हम जानते ही हैं कि देशी देशी होती है-वह घटिया होती है, विदेशी की बात और है। कुछ लोग कहते हैं कि यह महज इन कंपनियों की लूट का जरिया होगा। सो, ये कंपनियाँ पानी पर उतर आई हैं। मगर हमारा पानी पहले ही भर चुका है (पानी का आयात)।’

हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान को कुचलती फोटो पत्रकारिता के एक हमले को व्यंग्यकार ने अपने व्यंग्य का विषय बनाया है। उसका शीर्षक है ‘मेजर का जूता।’ मैं इसे पढ़कर उस फोटो की याद में लौट गया था। मुझे याद आया-जॉन मेजर के जूते को खोलते या पहनाते उक्त कर्मचारी के सिर पर गांधी टोपी थी। यह व्यंग्य विषय की मजबूती और नए पन के कारण मुझे रोमांचित कर गया था। पता नहीं, इस विषय पर कितनी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। पाठक इस व्यंग्य से लेखकीय दायित्व का अनुभव करेंगे और उस चोट का भी, जिसे भारतीय मन को झकझोरने के लिए लिखा गया। इस प्रकार अनेक लेख इस संग्रह में है, जो स्वदेशी मन पर हुए हमलों को निरस्त करते हैं।

इन व्यंग्य लेखों का संचयन इस आत्मविश्वास से किया गया है कि ये स्वदेशी आंदोलन के लिए निश्चय ही घृत-समिधा सिद्ध होंगे।

प्रमोद कुमार दुबे

फिर नींद क्यों नहीं आ रही ?


यह कल रात की बात है। डनलप के गद्दे पर सोया था। क्रोंपटन का पंखा चल रहा था। उसे बंद किया और बी.पी.एल. सेन्यो का एयर कंडिशनर चालू किया। ब्लैक नाइट के दो पैग लगा चुका था। एक और लगाया। सोने की कोशिश करने लगा। मगर नींद नहीं आ रही थी। आज यह नींद क्यों नहीं आ रही है ? क्या मैंने दिन में कोई इंडियन प्रोडक्ट का इस्तेमाल किया ? जहाँ तक मुझे याद है, मुझसे यह गलती नहीं हुई होगी। भूलकर भी मैं कोई इंडियन चीज पास नहीं फटकने देता।
रॉथमैंस सिगरेट को विमको माचिस दिखाकर कई कश लिये, फिर कश पर कश लिये। नहीं, कोई इंडियन चीज नहीं थी। फिर नींद क्यों नहीं आ रही ? होटल ‘लॉ मेरीडियन’ गया था। फ्रेंच डिशेज ली थी। दोपहर को कंटीनेंटल में चाइनीज खाना खाया था। फिर सिस्टम कैसे खराब हो गया ? नींद क्यों नहीं आ रही ? अच्छा, सुबह से याद करता हूँ।

सुबह उठते ही लिपटन की चाय ली। उसके साथ बोर्नाविटा का बिस्कुट लिया। फिलिप्स म्यूजिक सिस्टम में ब्रेक डांस की धुनें सुनीं। फिर फोरहंस के ब्रश से कोलगेट पेस्ट से ब्रश किया। क्लोजअप का माउथ वॉश लिया। यही फ्रेशनर मुझे पसंद है।
दाढ़ी बनाने में विलमैन के डबल रेजर का इस्तेमाल किया। शेविंग क्रीम भी इंडियन नहीं थी। मैं ओल्ड स्पाइस पसंद करता हूँ। आफ्टर शेव लोशन खत्म हो गई थी। सो एवज में लड़के के बाथरूम से इरेश्यिक लिया। मगर वह भी इंडियन नहीं है। फिर गलती कहाँ हुई ? नींद क्यों नहीं आ रही ? स्नान मैंने पियर्स साबुन से किया। बैकॉक से लाए टावल का इस्तेमाल किया। बालों के लिए ब्रिलक्रिम ठीक रहता है।

मैं बच्चों का तो खास खयाल रखता हूँ। वे जॉनसंस बेबी ऑयल, बेबी पाउडर इस्तेमाल करते हैं। मैं उनके कान साफ करने के लिए जॉनसन इयर बड का डिब्बा रखता हूँ। बच्चों को मैंने कभी ऐरे-गैरे खिलौने नहीं लेने दिए। मेरे सभी बच्चे लिओ टॉयज से खेलते रहे हैं। लियो से मन ऊबा तो बार्बी डौल-डाल से खेलते रहे हैं। नाश्ते में बच्चे फेरेक्स, लेक्टोडेक्स, बोर्नविटा लेते हैं। नाश्ते में मैं यहाँ तक चेक कर लेता हूँ कि चाय फिलिप्स की केटली में ही बनी है या नहीं। ब्रिटेनिका ब्रेड के अलावा घर में कोई दूसरी ब्रेड नहीं घुसती। फिर आज नींद क्यों नहीं आ रही ?

रसोई में मैगी नूडल, डॉट सूप और स्वीट सॉस से लेकर नेस्केफे प्रोडक्ट होते हैं। दूध के बदले हमारे घर एवरी डे डेयरी वाइटनर का इस्तेमाल होता है। कॉस्मेटिक में मुझे पोंड्स प्रोडक्ट पसंद है। सो यहाँ भी गलती नहीं हुई। फिर नींद क्यों नहीं आ रही ? गुड इयर टायर लगी मारुति पर मैं दफ्तर गया। कपड़े डाई पावर सर्फ से धुले थे। सिंगर मशीन से स्टिच किए हुए हैं। कपड़ों में इन्फेक्शन नहीं हो सकता। दफ्तर की ओटिज लिफ्ट से ऊपर चढ़ा। दफ्तर में रोशनी भी फिलिप्स बल्बवाली थी। सेक्रेटरी ने रेमिंगटन और नेटवर्क से टाइप किए लेटर दिए; जिसपर मैंने पारकर से दस्तखत किए।

आई.बी.एम. का सिस्टम है। टेलीफोन क्लिपरटॉनवाला था। कहीं कोई इंडियन चीज नहीं थी। फिर नींद क्यों नहीं आ रही ? मैंने कोल्ड ड्रिंक भी पेप्सीवाला लिया था। डिनर भी फिलिप्स कुकिंग रेज में बना था। ऑयल ब्रिटेनिका के वाइटल था। रेक्स जेली थी और  पोलसन का कस्टर्ड था। टेलीविजन बी.पी.एल. सेन्यो देखा। कुछ जुकाम, सिरदर्द जैसा था। उसके लिए विक्स और डिस्प्रिन ली है। फिर नींद क्यों नहीं आ रही ? कहीं कोई इंडियन इन्फेक्शन नहीं है।

जी हाँ, विदेशी


आज खुश होना चाहिए। अब भारतीय अदालतों में विदेशी वकील पैरवी कर सकेंगे-लंदन के, वाशिंगटन के, बर्लिन के, जगह-जगह के। हमें उत्सव मनाना चाहिए। अब यूरोप और अमेरिका में चार्टर्ड एकाउंटेंट अपनी ओर हमारी कंपनियों का लेखा परीक्षण करेंगे, हमारा स्टैंडर्ड सुधरेगा। लेकिन हमारी स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी क्या जब विदेशी बीमा कंपनियाँ हमारी बीमा व्यवस्था सँभालेंगी ? कौन किसकी देखभाल करता है आज के जमाने में। मेरा खयाल है, देश की अपनी बीमा कंपनियाँ पापड़ बेलने का काम करेंगी, यही फायदे का काम होगा।

गौरव की एक बात और है, विदेशी बैंक दनादन अपना जाल फैला रहे हैं। ये तो शेयर घोटाले में भी सबसे बड़े अपराधी पाए गए। उन्हीं के खातो से धन बाहर जाकर, आसनी से लापता होता रहा। इन्हें थोड़ा सा अर्थदंड भुगतना पड़ा। इससे कोई बात नहीं, ये दिल दनदनाने लगे हैं। क्रेडिड कार्ड की असल होड़ विदेशी बैकों में ही है। अब हम आजादी से अगले दो साल की कमाई इस साल ही खर्च कर सकेंगे। इस तरह लाखों मालदार लोगों और बड़ी-बड़ी तनखावालों के पैसे सँभालने की तमीज देशी बैंकों में कहाँ। सो, सौभाग्य से इनका आगमन हुआ है।

हम अपने लिए अच्छी खबर नहीं बना सकते थे। उसका कितना बुरा असर देश पर पड़ रहा था, इसकी आप कल्पना नहीं कर सकते थे। पैसा हो और अच्छी शराब न मिले, नकली स्कॉच हजार-बारह सौ में मिले। देश का पैसा मिट्टी में मिल रहा था। अब हम भारत निर्मित स्कॉच पी सकेंगे। सिर्फ उसका कंसंट्रेट और पानी विदेश से आएगा।  हमारी गायों-भैसों को अच्छा गोबर देने की तमीज नहीं। सो गोबर भी विदेश से आएगा। हवाई जहाज और होटल की बुकिंग अब कोई बीस सेकेंड में विदेशी कंपनियाँ कर देंगी। हमारे छोटे-मोटे ट्रेवल एजेंट इतने निकम्मे हैं कि कई बार बुकिंग में आधा घंटा या एक घंटा लगा देते हैं। देर करते हैं तो भुगतें। अब इन निकम्मों का धंधा चौपट हो जाएगा। विदेशी कारों की भरमार है। फिसड्डी फिएट और अंबेसडर अब बाजार में लोकप्रिय नहीं है। यही होना चाहिए। खास बात यह है कि सबकुछ होगा, मगर हमारी स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी।

खाने-पीने की पचासों चीजें बाजार में अवतरित हो ही गई हैं। अब हमारे बच्चों का स्तर विश्व के दूसरे देशों के मुकाबले का हो गया है। उनके जूते एक-से-एक विदेशी नस्ल के हैं। जींस और अमेरिकी झंडेवाले छापे का शर्ट भी है। जो बच्चे नहीं खरीद सकते वे कम-से-कम दूसरों की देख तो सकते हैं। पहले तो हम देखने को भी तसरते थे। क्या यह आनंद का विषय नहीं है कि अचानक हमारे टेलीविजन में विश्व भर के कार्यक्रम आने लगे हैं। अब मार-धाड़, नितंबांदोलन देखने के लिए तरसता नहीं। जो कुछ है, खुल्लम-खुल्ला है।

दवा-दारू के मामलों में भी यही है। तीन-चौथाई दवाइयाँ विदेशी कंपनियों की है। सो हमारा स्वास्थ्य भी उनके हवाले है-मिलावट के डर से बिलकुल मुक्त, शानदार पैकिंग में। ऐसी पैकिंग के बिना बीमार हुए इन दवाइयों को खाने का जी करने लगे। अब खेती में भी क्रांति होगी। लेकिन कोई यह नहीं कह सकता कि इससे हमारी स्वतंत्रता पर आँच आएगी। बल्कि वह ज्यादा सुरक्षित रहेगी, क्योंकि वह उनके ही हवाले रहेगी, ताकि हम अपनी स्वतंत्रता से खिलवाड़ करके उसे बरबाद न कर दें।

एकमेव कोला


अगस्त 1945 में कम्युनिस्ट नेता हो-ची मिन्ह ने जिस बालकनी से अक्तूबर क्रांति की घोषणा की थी, उसके ठीक सामने आज तीस-तीस फीट ऊँची, लाल लेबलवाली कोका कोला की कद्दावर बोतलें लगी हुई हैं। वियतनाम बीस साल तक अमेरिकी फौजों से लड़ता रहा। 1975 में यह लड़ाई खत्म हुई और अब अमेरिकी उपभोक्तावाद का सबसे प्रबल प्रतीक कोका कोला वहाँ उछल-कूद कर रहा है। एक अमेरिकी कार्टूनिस्ट ने टिप्पणी करते हुए एक वियतनामी के मुँह में शब्द डाले हैं कि ‘वह अमेरिकी को तब ज्यादा पसंद करता था जब वह उनका दुश्मन था।’

वियतनाम की प्रति व्यक्ति औसत आय भारत से भी कम है। फिर भी अमेरिकी रक्तपायी उसके शिकार में लगे हुए हैं। कोला एक तरह के अमेरिकी जादू-टोने का नाम है, जिससे ये क्लोरीनयुक्त रंगीन पानी से पीढ़ी-की-पीढ़ी में एक चस्का पैदा कर देते हैं; और धीरे-धीरे उपभोक्ता वर्ग पानी पीना भूल जाता है, पानी के बदले कोला पीता है और समझता है कि वह अमेरिकी शान-ओ-शौकत की जिंदगी जी रहा है। यह चस्का संसार के बेहतरीन विज्ञापन जाल में फँसते जाने से लगता है।
कोला जैसे तीन दर्जन साम्राज्यों का नाम ही अमेरिकी साम्राज्य है। भारत में भी कोला युद्ध प्रारंभ हो गया। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव, कैबिनेट सचिव जैसे आधे दर्जन चोटी के महत्वपूर्ण अफसरों की बैठक में कोला युद्ध के बारे में एक फैसला लिया गया। भारत सरकार कश्मीर और पूर्वोत्तर के विद्रोह के संबंध में भले ही सुस्ती दिखाती रही, मगर कोला युद्ध में जरूर चुस्ती दिखाई। अब तय कर दिया गया है कि महाकोलाओं को ‘आकार’ की छूट है।

इन कोलाओं को पीने के कई लाभ हैं। कोला पर आज तक यह आरोप नहीं लगा कि उसमें शरीर के लिए कोई भी गुणकारी तत्त्व है। लस्सी, छाछ, फलों के रस से देश का पैसा अमेरिका में जमा कराने का फायदा भी नहीं मिलता। कुल जमा पंद्रह-बीस पैसे का क्लोरीनेटेड पानी जब चार-पाँच रुपए तक में बिकता है तब करोड़ों बोतलों का अरबों रुपए का फायदा कहाँ-कहाँ, किस-किसको जाता है और क्या-क्या करता है, यह रोमांचक रहस्य भी देश के लिए एक फायदेमंद तत्त्व हैं।
 जिस तरह विश्व भर में कोला साम्राज्य, कोका संस्कृति और कोला दर्शन फैल रहा है, उससे तो यही लगता है कि सर्वेगुणा कोलामाश्रयंते। कोई सोच सकता है कि लस्सी, दूध, छाछ, रस, नारियल पानी अंत में विजयी होंगे। वह कोला से अर्जित राशि का उपयोग करके इन पेयों की बुरी लत को छुड़वा सकते हैं। किसी दिन किसी मेडिकल शोध के जरिए यह साबित किया जा सकेगा कि जलजीरा पीने से एक्जीमा होता है, लस्सी पीनेवालों को कैंसर होने का खतरा ज्यादा रहता है, फलों के रस से मस्तिष्क की कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होती हैं। ऐसे दो सौ शोधों से यह पूरी तरह साबित हो जाएगा कि कोका को छोड़कर कोई भी पेय सुरक्षित नहीं है।

प्यास लगे तो कोला पी


आपको याद होगा कि समुद्र मंथन के बाद अमृत निकला था, विष भी निकला था-और भी बारह चीजें निकली थीं। पुराणों को लिखनेवाले यह भूल गये कि असल में कोका कोला और पेप्सी कोला भी समुद्र मंथन से ही निकले थे। दोनों अमृत से थोड़े बहुत बेहतर तरल पेय हैं। सिकंदर और नेपोलियन के बाद विश्व विजय की इच्छा से एक सौ अठहत्तर देशों में कोला युद्ध चल रहा है। आप यह भी जानते हैं कि युद्ध और मुहब्बत में हर हथकंडा वाजिब माना जाता है। इन दोनों की विश्व विजय के युद्ध में भी टक्कर इस बात की है कि पृथ्वी पर कोका कोला का राज चलेगा या पेप्सी कोला का ? मैं पहले कह चुका हूँ कि पुराणों के लेखकों ने सर्वोच्च पेय का श्रेय अमृत को देकर कोक और पेप्सी दोनों के साथ अत्याचार किया। आज कहाँ गया अमृत ? वह कहीं नहीं मिलता। अब तो मैदान में दो ही योद्धा बचे हैं-कोक और पेप्सी। एक का नारा है-‘यही है राइट च्वायश बेबी’-अर्थात् तमाम बेबियों के लिए पेप्सी से ज्यादा बेहतर च्वायश हरगिज नहीं हो सकती। अलबत्ता कोक ने अपने पेय को असली चीज कहा है। इसका मतलब है, पेप्सी सहित बाकी सारे पेय नकली हैं।

अभी इस हफ्ते दिल्ली में दो बड़ी घटनाएँ हो रही हैं-एक, कांग्रेस महासमिति का अधिवेशन और दूसरा, कोका कोला का पुनरागमन। विज्ञापन और प्रचार के सैकड़ों तरीकों से जनमानस को होल्ड इन बैनर्स कर लेने की होड़ देख ऐसा लगता है कि कांग्रेस महासमिति के अधिवेशन के मुकाबले कोक का पुनरागमन कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। इसकी महिमा ही कुछ ऐसी है। आर्ट पेज पर एक सप्लीमेंट डालकर कोका कोला ने अपने पेय को ग्यारह ढंग से गुणकारी और महत्वपूर्ण बताया है। मैं उन महत्व के मुद्दों को जानता हूँ। मुझे यह भी पता है कि कांग्रेस महाधिवेशन के मुकाबले बच्चे-बच्चे की जबान पर कोका कोला की रट है। अगर मैं किसी दूसरे लोक से आया तो मैंने निश्चय ही इसे पेय के बजाय महानायक ही समझा होता। मेरे हिसाब से इसके और पेप्सी के गुण काफी समान हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि इसके पीने से कोई हानि नहीं होती; जबकि फलों का रस, दूध, छाछ, ठंडाई, शरबत से लेकर जलजीरा तक के पीने से भारी नुकसान होने के संभावना बन जाती है। मैं तो फिर यही कहूँगा कि पेप्सी और कोक दोनों में से कोई भी नुकसानदेह नहीं है; क्योंकि प्रति बोतल आठ रुपए का नुकसान भी कोई नुकसान है। इसकी दूसरी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह चमत्कारिक रूप से सस्ता पेय है, जिसे लोग महँगा खरीदेने में मजा लेते हैं। बाकी पेय के उत्पाद मूल्य और विक्रय मूल्य में एक रिश्ता होता है। जैसे लस्सी। डेढ़ रुपए के दही से चीनी-बर्फ मिलाकर पाँच रुपए की लस्सी बनी तो आधा लाभ हुआ। पेप्सी या कोक के साथ यह दकियानूसी तथ्य नहीं है।

विद्वानों में मतभेद है कि इस राइट च्वायश या रीयल थिंग के अंदर पेय ज्यादा कीमती है या बोतल ? बोतल तो वह वापस ले लेते हैं, चाहे उसकी कोई भी कीमत हो। अलबत्ता बोतल के सिरे को होंठों से पकड़ने का स्वर्गिक आनंद जरूर होता है। उस आनंद के लिए आठ रुपल्ली दे देना कौन सी बड़ी बात है। सो, अपनी तो सिफारिश साफ है कि ‘भूख लगे तो टी.वी. देख’ और ‘प्यास लगे तो कोका पी।’ बल्कि भूख को बरदाश्त करके भी गरीब से गरीब आदमी को भी रुपए-दो रुपए बचाते हुए जब भी आठ रुपए हो जाएँ तो एक कोला जरूर पीना चाहिए; क्योंकि यह अमृत से भी श्रेष्ठ है। अमृत को किसने देखा है ? वह तो निराकार है। कोला तो साकार है-हर नुक्कड़ पर उपलब्ध, ईश्वर की तरह सर्वव्यापी। आपका कोला ! पेप्सी कोला या कोका कोला !!


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