बाँस की फाँस - वृंदावनलाल वर्मा Bans ki Phas - Hindi book by - Vrindavanlal Verma
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बाँस की फाँस

वृंदावनलाल वर्मा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :184
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1708
आईएसबीएन :81-7315-437-6

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वर्माजी के इस सामाजिक नाटक में हमारे विद्यार्थियों में आचरण का जो असंयम और भोंडापन तथा साथ ही कभी-कभी उन्हीं विद्यार्थियों में त्याग की महत्ता दिखाई पड़ती है, उसका अच्छा सामंजस्य है। निश्चय ही यह उच्च कोटि की कृति है।

Bans Ki Phas a hindi book by Vrindavanlal Verma - बाँस की फाँस - वृंदावनलाल वर्मा

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पहला अंक

पहला दृश्य

(स्थान : ग्वालियर का रेलवे स्टेशन। समय संध्या के उपरांत। गरमियों के दिन हैं, परंतु पवन में कुछ ठंडक आ गई है। प्लेटफॉर्म पर अच्छा उजेला है। लोग अपने-अपने काम में लगे हैं। कुछ आ जा रहे हैं। आगरा और झाँसी भिन्न-भिन्न दिशाओं-से आनेवाली गाड़ियों का मिलान होना है। टिकिट बँट चुके हैं। गाड़ियों के आने में कुछ विलंब है, इसलिए यात्री प्लेटफॉर्म पर प्रतीक्षा में हैं-कुछ दरियों, बक्सों और जमीन पर बैठे हैं, कुछ टहल रहे हैं। सामान का तकिया-सा बनाए हुए


दो विद्यार्थी दरी पर बैठे हुए हैं। दोनों हमउम्र के तुष्ट देह और साधारण आकृतिवाले। एक का नाम फूलचंद है और दूसरे का गोकुल। दोनों विद्यार्थी एक कॉन्फ्रेस से लौट रहे हैं। विजय-गर्व में हैं, परंतु कुछ थके हुए से। इनको आगरे की ओर जाना है। पास ही सामान रखे हुए एक दरी पर मंदाकिनी बैठी हुई है। आयु सोलह साल से ऊपर। नाक कुछ अधिक लंबी, ओंठ कुछ अधिक पतले, चेहरा कुछ अधिक भरा हुआ। वैसे कुरूप नहीं है। लिपिस्टिक, रूज क्रीम इत्यादि ने रूप की त्रुटियों को या तो पूरा कर दिया है या उनको बढ़ा दिया है। परंतु मंदाकिनी के रूप का यह पहलू या वह, मंदाकिनी भी भावना पर निर्भर नहीं है, वरन् आँख गड़ाकर देखनेवालों की भिन्न-भिन्न रुचि के ऊपर। वह बहुत आबदार साड़ी पहने है, जिसके आकर्षण में सनी हुई रुचि को भी कोर-कसर नहीं दिखलाई पड़ती। मंदाकिनी को स्वयं अपनी साड़ी का, लिपस्टिक इत्यादि से, कहीं अधिक आश्वासन है। थोड़ी ही दूर पर भीडाराम टहल रहा है। वह सेना में हवलदार है। आयु लगभग तीस साल, लंबा-तड़ंगा मूछें ऐंठी हुईं, अपनी पलटन की वरदी में। वह अवसर पाते ही मंदाकिनी की ओर टहलते-टहलते देखता है।

निश्चय नहीं कर पाता कि सौंदर्य उसमें कहाँ है ! जब कभी उसको ताकते हुए कोई देख लेता है, वह सहमता नहीं है, मंदाकिनी अवश्य दूसरी ओर देखने लगती है। वैसे मंदाकिनी को इस प्रकार अपनी आकृति, अपना श्रृंगार और अपनी साड़ी का देखा जाना जरा भी नहीं अखरता। मंदाकिनी की आँखें कभी-कभी अपने देखनेवालों की ओर फिर जाती हैं, परंतु कान फूलचंद और गोकुल की बातों पर हैं। इन सबसे उचटकर मन कभी-कभी आगरे की दिशा से आनेवाली गाड़ी की ओर चला जाता है, क्योंकि उसे झाँसी की ओर जाना है। थोड़ी दूर एक तिपाई पर पैर फैलाए हुए पुलिस का सिपाही बैठा हुआ है।)


गोकुल : अगली कॉन्फ्रेंस में गिरधारीलाल को काले झंडे न दिखलाए तो नाम नहीं (मंदाकिनी की ओर तिरछी निगाह से देखकर) झंडों पर लिखा होगा-‘गिरधारीलाल, लौट जाओ, गिरधारीलाल तुम्हारी हमको जरूरत नहीं, वापिस जाओ।

फूलचंद : इसी कॉन्फ्रेस में उसकी किरकिरी तो काफी रही।

गोकुल : वह अब नेता बन गया है। लखनऊ के बहुत से लफंगों और बनारस के बहुरूपियों को ले आया था; मगर अपने आगरा और इलाहाबाद के पट्ठों ने ढेर कर दिया। अब जमाना आ गया है कि हम अपना संघ अलग कायम करें। (मंदाकिनी की ओर देखकर) लड़कियों को भी उसमें शामिल करना चाहिए। स्त्रियों की स्वाधीनता और समान अधिकार अपना पहला सिद्धांत है।

फूलचंद : (मंदाकिनी की ओर जरा सा देखकर) सो तो है ही; वह तो है ही। लेकिन काउंसिल के चुनाव में अबकी बार खास सरगर्मी से काम लेना पड़ेगा। अपनी एक पार्टी बनाकर काउंसिल की जगहों को मुट्ठी में करना चाहिए और अपने मन मुताबिक मंत्रिमंडल बनाना चाहिए।

गोकुल : (हँसकर) असंभव तो नहीं है।

फूलचंद : अजी, बिलकुल संभव है। ये नेतालोग चुनाव लड़ते तो हम लोगों के ही बूते हैं। हमीं लोगों को वोटरों के पास जाना पड़ता है।

गोकुल : और गालियाँ भी हमीं लोग खाते हैं। कोई कहता है-विद्यार्थियों में अनुशासन की कमी है, कोई कहता है-विद्यार्थी आवारा होते जा रहे हैं। हम लोगों पर धौंस जमाना चाहते हैं।

फूलचंद : (हवलदार भीडाराम को मंदाकिनी की ओर कुछ अधिक ध्यान के साथ घूरते हुए देखकर) देखा इस बदतमीज को! बाहर की टीम-टाम ऐसी बना रखी है जैसे पृथ्वीराज चौहान हो !

गोकुल : भीतर बिलकुल बोदा होगा।

फूलचंद : (इधर-उधर देखकर) दो-तीन विद्यार्थी और होते तो मैं एक प्रहसन करता।

गोकुल : (धीरे से) विद्यार्थिनी तो है।

फूलचंद : (धीरे से) वह अपना कमजोर अंग है।

गोकुल : तो हम-तुम—दो—क्या कम हैं ? प्लेटफॉर्म पर और विद्यार्थी न होंगे। जरूरत पड़ने पर भीड़ों का छत्ता इकट्ठा हो जाएगा।

फूलचंद : (खड़े होकर, हवलदार भीडाराम से) बैठहु हुइएँ पाँव पिराने-आपने महाकवि तुलसीदासजी का वचन सुना है ?

भीडाराम : (अकड़कर) क्या मतलब ? कौन तुलसीदास ?

फूलचंद : हाँ....हाँ....माफ कीजिए। आपको तुलसीदास या किसी कवि से क्या मतलब। पैर दर्द करने लगे होंगे, आइए, बैठिए न!

[गोकुल हँसता है।]

भीडाराम : (जरा झेंपकर) गाड़ी कमबख्त इतनी लेट है कि समझ में ही नहीं आता, टहलने के सिवाय और क्या करूँ!

गोकुल : यहाँ आइए, कुछ बात ही करेंगे। आखिर हम लोगों को भी तो जाना है। आप कहाँ जा रहे हैं?

भीडाराम : दिल्ली।
फूलचंद : भाई वाह ! क्या खूब रही हम लोग भी उसी दिशा में जा रहे हैं।
आइए, बैठिए।
[फौजी अफसर विद्यार्थियों की दरी को अधिक सुभीते का स्थान समझकर आ बैठता है। वह इस तरह बैठता है कि सहज ही मंदाकिनी को बार-बार देख सके। मंदाकिनी अपना मुँह थोड़ा सा दूसरी दिशा में फेर लेती है।]
फूलचंद : आप फौज में कोई अफसर हैं ?
भीडाराम : हाँ, मैं हवलदार मेजर हूँ।
गोकुल : आपने तो लड़ाई भी लड़ी होगी ?
भीडाराम : कई लड़ी हैं। घायल भी हुआ हूँ।
फूलचंद : आपका नाम ?
भीडाराम : हवलदार मेजर भीडाराम।
गोकुल : (हँसी को दबाकर) जैसा आपका नाम है वैसा गुण भी है। आप बहुत भिड़े हैं। आपको डर तो किसी बात का लगता न होगा ?
भीडाराम : (मुसकराकर, मंदाकिनी की ओर देखते हुए) डर का क्या काम जी ?
फूलचंद : आपने रामायण का नाम सुना है ?
भीडाराम : हाँ जी। वह राम लक्ष्मण और रावणवाली न ?
गोकुल : हाँ-हाँ, वही जी, वही। तुलसीदास की ही लिखी तो वह रामायण है।
भीडाराम : (हँसकर) हाँ जी, उस तुलसीदास का तो नाम सुना है। रामायण कभी-कभी सुनी तो है, पर पढ़ने का वक्त नहीं मिला। मिला ही नहीं काम के मारे।
गोकुल : आपको तुलसीदास का नाम खूब याद रहा।
[मंदाकिनी मुसकराती है।]
भीडाराम : (हँसकर) हाँ जी। हमको याद तो बहुत रहता है, तुसलीदास नाम का सिपाही जो हमारे बेड़े में था। याद क्यों न रखता !
फूलचंद : भाई वाह ! भाई वाह !! (हँसता है)
भीडाराम : वह हमारी साइकिल में फुक्की मारा करता था। (कुछ रोब के साथ) हम आपको फौजी जिंदगी की इतनी मजेदार बातें सुना सकते हैं कि हँसी के मारे आपका दम फूल जाएगा।
गोकुल : जरूर-जरूर। एक के मारे तो पेट आधा भर गया।
भीडाराम : हम विलायतों में गए हैं। पूरब, पश्चिम और ईरान में भी रह चुके हैं। बाबू, वहाँ के लोग बुलबुल से बहुत घबराते हैं।
[मंदाकिनी हँसी के मारे मुँह दाब लेती है।]
फूलचंद : (कुतूहल दिखलाता हुआ) बुलबुलों से घबराते हैं या गुलाब और बुलबुल को प्यार करते हैं ?
भीडाराम : (आश्चर्य के साथ) ओ बाबू ! वे लोग भी कविता करते हैं और बुलबुलों से डरने की बातें कहते हैं। हम हिंदुस्तानी सिपाही सोचते हैं, क्या ईरान की बुलबुल में कोई जहर होता है ? (मंदाकिनी की हँसी मुसकराहट से प्रोत्साहन पाकर) पर अपने देश की भी बुलबुल जहरीली हो सकती है।
[मंदाकिनी की मुसकराहट बंद हो जाती है। गोकुल और फूलचंद के मन में क्षोभ आता है, परंतु वे ऊपर ऊपर मुसकराहट बनाए रखते हैं।]
गोकुल : इलाहाबाद में एक पलटन थी। उसमें हमारी जान-पहचान का एक हवलदार था-नाम था भोंदूराम।
फूलचंद : (हँसकर) हाँ-हाँ ! यही नाम था-हवलदार मेजर भोंदूराम।
[भीडाराम व्यंग्य को समझ जाता है। उसे क्रोध आता है;
परंतु उन दोनों के पुष्ट शरीरों को देखकर आत्मदमन कर लेता है।]
भीडाराम : आप लोग कौन से स्टेशन पर उतरेंगे ?
गोकुल : जहाँ भगवान् पहुँचा दें।
फूलचंद : कह तो दिया था-उसी तरफ जा रहे हैं जिस तरफ आप।
[भीडाराम और भी कुद्ध होता है; परंतु उसकी समझ में नहीं आता कि क्या उत्तर दे। वह दूसरी ओर देखने लगता है, मानो गाड़ी के आने की बाट जोह रहा हो।]
गोकुल : (मंदाकिनी की ओर देखकर, एक हाथ की गदेली पर दूसरे हाथ की टेहुनी रखकर उस हाथ को साँप के फन की तरह हिलाते हुए फूलचंद से) उस हवलदार मेजर के डेढ़-डेढ़ बालिश्त की मूँछें थीं और दाढ़ी यों लहराती थी।
[मंदाकिनी हंसती है।]
भीडाराम : बाबू हम सिपाही हैं। याद रखना।
गोकुल : हम देश के चमत्कार, आगे की पीढ़ी के नेता और भिड़ों के छत्ते कॉलेज के विद्यार्थी हैं !
फूलचंद : और हम सरीखे कम से कम दर्जनों और इसी फ्लेटफॉर्म पर मटरगश्ती में मस्त हैं।
भीडाराम : तो आप हमसे लड़ना चाहते हैं ?
गोकुल : सवाल यह नहीं है, सवाल है, क्या आप हमसे लड़ जाना चाहते हैं
[तभी पुलिस का एक सिपाही उठकर आता है।]
सिपाही : अजी हवलदार मेजर साहब, आप अपना काम देखिए। ये कॉलेज के लड़के हैं, इनसे मत उलझिए।
भीडाराम : खडे होकर तो क्या हम दब जाएँ ? अपनी वरदी की बेइज्जती करवाएँ ?
सिपाही : (पीछे हटता हुआ) तो होने दीजिए। मुझे क्या पड़ी जो इस समय रोक-टोक करूँ ? जरा कुछ और हो तब सीटी पर हाथ डालूँगा। [हल्ला सुनकर कुछ लड़के आ जाते हैं।]
कुछ : क्या है ?
कुछ और: क्या बात है ?
[मंदाकिनी भी खड़ी हो जाती है।]
गोकुल : कुछ नहीं, भाई, हवलदारजी को अपनी मूँछों की बड़ी ऐंठ है। मैंने कहा-हमारे इलाहाबाद में भी हवलदार मेजर हैं, जिनका नाम है भोंदूराम और जिनकी दाढ़ी इस तरह फहराती है। हाथ को फिर उसी प्रकार हिलाकर दिखलाता है। समस्या की पूर्ति न करके बिगड़ गए हवलदारजी।
[भीडाराम बढ़ती हई भीड़ में अपनी कुशल न देखकर बड़बड़ाता हुआ वहाँ से हट जाता है।]
एक लड़का : हवलदार भोंदूराम और हवलदार भेड़राम या क्या-एक ही बाल के दाने निकले !
दूसरा : (साँप के फन की तरह हाथ हिलाकर) पर दाढ़ी ऐसी नहीं है।
तीसरा : लू लू है !
फूलचंद : है कुछ लड़ने-वड़ने का हौसला, हवलदारजी ?
[हवलदार जलती आँखों से देखता हुआ अपनी गठरी-पुठरी उठाकर दूसरे कोने की ओर चला जाता है।]
बहुत से : वह भागा ! वह भागा !
[फूलचंद मंदाकिनी के पास जाता है।]
फूलचंद : आपको कोई कष्ट तो नहीं है ? आप कुछ थकी सी जान पड़ती हैं।
मंदाकिनी : (भयभीत होकर) नहीं तो।
[फूलचंद उसके पास से हट जाता है।]
गोकुल : (फूलचंद से धीरे से) अकेले में क्या बात कर आया ?
फूलचंद : (धीरे से) ठहर भी जा जरा, फिर सुनाऊँगा। वह मुझको चाहती है।
[लड़के टुकड़ियों में बिखर जाते हैं।]
गोकुल : अरे यार, मुझको भी कोई चाहे।
फूलचंद : भगवान् जब देते हैं तो छप्पर फाड़कर देते हैं।

[एक अंधी बुढ़िया बगल में पोटली दबाए और लाठी लिये हुए अपनी लड़की पुनीता के साथ आती है, जिसको वह पुनियाँ कहती है। पुनीता या पुनियाँ चौदह वर्ष की अतीव सुंदर लड़की है। हाथ में काँच की दो-दो, तीन-तीन चूड़ियाँ फटे कपड़े तन पर, रुखे, केश, पैर नंगे। उसकी आँखों में चमक और ओठों पर अवहेलना है। वे दोनों भिखारिनी हैं। भीड़ के निकट आते ही गाती हैं।]
[अंधी बुढ़िया और पुनीता का गायन]


मन का चेत न खोने दे तू,
जग का हित मत सोने दे तू,
तब हरियाली छाएगी,
फूलों से लद जाएगी।
लदी रहेगी, फली रहेगी, जगी रहेगी।


गोकुल : (पुनीता की ओर पैसे बढ़ाकर) तुमने बहुत अच्छा गाया। बहुत सुंदर और मोहक।
पुनीता : (उसकी आँखों में कृतज्ञता नहीं है। समझती है गाने की मजदूरी मिली; परंतु ओठों पर सहज सरल मुसकराहट है, तो भी कृतज्ञता प्रदर्शन करते हुए) जय हो आपकी, धन्य हो !
[और लोग भी उसको पैसे देते हैं। मंदाकिनी अपने आसन पर ही बैठे हुए उसकी ओर हाथ बढ़ाती है। पुनीता उसके पास जाती है और पैसे लेकर उसको सिर से पैर तक देखती है।]

पुनीता : (आँखों में ढिठाई और ओठों पर विनय के साथ) आप बड़ी हैं, समर्थ हैं, कुछ और दीजिए।
मंदाकिनी : (पुनीता के स्वाभाविक सौंदर्य से कुढ़कर परंतु उसके फटे कपड़ों और हीन दशा पर दया का भाव दिखलाते हुए) खैर, लो। पैसे देती है) जाओ, तंग मत करो। तुम लोग प्लेटफॉर्म पर भी पीछा नहीं छोड़तीं।
बुढ़िया : माई, हम गरीब हैं। हमारे ऊपर दया करो। आपको पुण्य मिलेगा। आपके बच्चे सुखी रहें।

[मंदाकिनी शरमाती है। गोकुल फूलचंद की बगल में धीरे से कुहनी टेकता है और मुसकराता है। मंदाकिनी देखकर मुँह फेर लेती है। पुनीता आँखों में तिरस्कार सा उड़ेलकर चलने को होती है।
गोकुल : इतने पैसे मिल गए, तुम्हारा जी नहीं अघाया ? (आँख दबाकर और मुसकराकर) लो, मैं और देता हूँ।
पुनीता : (तिरस्कार के स्वर में) मुझको नहीं चाहिए। रखे रहो अपने पैसे। देना अपनी माँ बहन को। हम भीख माँगती हैं तो क्या हमारी कोई इज्जत नहीं ? आँख मारता है, गुंडा !

गोकुल : (क्षोभ की दबाते हुए) ओ हो ! यह शान ! घर में नहीं हैं दाने, अम्मा चली भुनाने। कुछ गा लेती है, उसका इतना घमंड। (मंदाकिनी की ओर देखकर) वैसे कोई अधेला भी न देता।
बुढ़िया : क्या है, बेटी ? कौन है ये ? चल, आगे चल। गाड़ी के आने में कितनी देर है ?
पुनीता : (तनकर) है किसी स्कूल का लफंगा।
गोकुल : (कुद्ध स्वर में) हट यहाँ से अभागिन स्त्री जाति है, नहीं तो एक चाँटे में होश ठिकाने कर देता। चिथड़याऊ छोकरी कहीं की !
पुनीता : आ, मार मुझे। बड़ा मर्द बना फिरता है। हाथ उठाया तो खून पी जाऊँगी।
[पुलिस का सिपाही बेंच पर से उठकर आता है।]
सिपाही : निकलो यहाँ से। ये डाइनें इतनी ढीठ और लड़ाकू हो गई हैं कि जिसका ठिकाना नहीं।
पुनीता : क्यों निकलें ? हमारे पास टिकिट है।
सिपाही : अच्छा ! तुम्हारे पास टिकिट है ! नरक का टिकिट होगा ! हँसता है। गरीब जानकर हम तुम लोगों को इस जगह भीख माँगने के लिए चले आने देते हैं। उसका नतीजा यह कि तुम इतनी निडर हो गईं और भले आदमियों तक को गालियाँ देने लगीं ?
पुनीता (रुआँसे स्वर में) यह भला आदमी है। यह...यह...यह जो आँख मारता है।
सिपाही : हँसता हुआ। अच्छा, अच्छा ! लक्ष्मी, जा यहाँ से। आँख ही मारते हैं, हाथ तो नहीं मारते।
[सब हँस पड़ते हैं। मंदाकिनी मुँह फेर लेती है। क्रोध और क्लेश के मारे पुनीता के आँसू निकल पड़ते हैं।]
पुनीता : रुद्ध कंठ से चलो माँ, दूसरी तरफ चलें।
सिपाही : (आत्मगौरव के साथ) कहाँ जा रही हो ? क्या सचमुच तुम्हारे पास टिकिट है ?
बुढिया : हाँ दीनबंधु हमारे पास टिकिट है। हम लोग झाँसी जा रहे हैं।
सिपाही : यहाँ से क्यों जा रही हो ? यहाँ तो काफी पैसे मिल जाते हैं। पुनियाँ अच्छा गाती है। इसमें सिर्फ एक ऐब है-इसकी नाक पर गुस्सा बैठा रहता है। किसी से भी अच्छी तरह नहीं बोलती है। कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे चबाए डालती हो। (मुसकराकर) वैसे गाती अच्छा है।
पुनीता : रुष्ट स्वर में चलो माँ, उस ओर चलें जहाँ भलेमानस बैठे होंगे।
बुढ़िया : (पुनीता के साथ दूसरी ओर जाते हुए। बेटी सब जगह ऐसे ही लोग हैं। पर तेरी जीभ न जाने क्यों कभी-कभी काँटे बिछा डालती है।
[वे दोनों दूसरी ओर चली जाती हैं।]
गोकुल : सिपाही से इन भिखमंगों को प्लेटफॉर्म पर नहीं आने देना चाहिए। तुरंत पसीजकर परंतु बिचारे करें क्या।
सिपाही : उसके पास टिकिट था।
फूलचंद : शायद बहाना कर रही हो।
मंदाकिनी : (गला साफ करके) भिखमंगों में इतनी हेकड़ी तो नहीं देखी।
फूलचंद : जी हाँ, आप ठीक कह रही हैं। कुछ पागल सी जान पड़ती है। काफी उजड्ड।
सिपाही : (तिपाई पर बैठने के लिए जाते हुए) पागल तो नहीं है। भिखारिन समझकर लोग उसके साथ छेड़छाड़ करते हैं, इसलिए बचने के लिए वह ऊल-जलूल बक उठती है।
[सिपाही तिपाई पर बैठ जाता है और पुनीता के गाए हुए गीत की एक कड़ी को बेसुरा गुनगुनाने लगता है।]


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