परिवेश की कथा - श्रीनारायण चतुर्वेदी Parivesh ki Katha - Hindi book by - Srinarayan Chaturvedi
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परिवेश की कथा

श्रीनारायण चतुर्वेदी

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1995
पृष्ठ :172
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1710
आईएसबीएन :81-7315-136-9

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हिंदी में यूँ भी आत्मकथा दुर्लभ है, और इस प्रकार की आत्मकथा, जिसमें आत्म दूसरों में विलीन हो गया हो, दुर्लभतर है...

Parivesh Ki Katha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

बारात जिस समय भोजन करती है उस समय उसके ऊपर के खंड पर से (अट्टा की चत पर से) स्त्रियाँ गीत गाती हैं। ये गीत ‘ठिक के’ गीत कहलाते हैं। अब तो हमारी बहू-बेटियाँ ‘शिक्षित’ हो गई हैं और वे उन पुरातन गीतों को न तो जानती हैं, न गा सकती हैं और न उन्हें पसंद करती हैं। वे उन्हें दकियानूसी समझती हैं। मैंने किसी-किसी आधुनिक बारात में स्त्रियों को गजलें, खड़ीबोली के गीत और यहाँ तक कि सिनेमा के गाने गाते भी सुना है। पुराने गीतों का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्त्व है। उनके राग और स्वर बँधे हुए हैं। उनमें एक गीत ‘सारंग’ कहलाता है।

 आधी रात के सन्नाटे में जब वह कई स्त्रियों द्वारा समवेत स्वर में गाया जाता था तो उसकी गूँज आसपास कोसों तक सुनाई पड़ती थी। एक बार हमारे एक दूसरी जाति के विद्वान् मित्र ने उसे सुना और कहा कि इसका गाना अत्यंत कठिन है और दीर्घकालीन स्वर साधना ही से संभव है। हमारे कुछ गीतों के रागों को सुनकर हमारे एक वेद-विशेषज्ञ मित्र ने कहा था कि इनमें सामवेद के स्वर हैं। ये गीत परंपरा से मौखिक रूप से सिखाए जाते थे। लड़कियाँ बड़ी-बूढ़ियों से सुनते-सुनते और उनके साथ गाते-गाते उन्हें सीख जाती थीं। वेदों की तरह वे सुनकर ही याद किए जाते थे।-इसी पुस्तक से

भैया साहब ने अपने दीर्घ जीवन में इतिहास बनाया, इतिहास को बनते देखा, फिर बिगड़ते भी देखा। यही कारण है कि उनकी ‘परिवेश की कथा’ में एक पूरे युग का परिवेश समाया हुआ है। इतिहास और सांस्कृतिक दृष्टि से यह पुस्तक पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी; ऐसा हमारा विश्वास है।

 

भूमिका

 

चतुर्वेदीजी ने 1967 में अपनी आत्मकथा लिखनी आरंभ की। दुर्भाग्यवश दो मोटी कापियाँ भरने के बाद उन्होंने उसका लेखन बंद कर दिया। शायद उसके आकार से यह लगने लगा कि जिस ढंग से वह लिखी जा रही है, उससे उसका कलेवर बहुत बढ़ जाएगा। दो कापियों (प्रायः टंकित 150 पृष्ठों) में वे अभी स्कूल में भरती हो पाए हैं। इस गति से तो आत्मकथा दो हजार पृष्ठों की हो जाएगी ! बात यह थी कि चतुर्वेदीजी के लिए आत्मकथा का अर्थ स्वयं को परिधि पर रखकर उस युग के नगर, मोहल्ले, व्यक्ति, घटनाओं का आँखों देखा हाल प्रस्तुत करना था। इस विवरण में टिप्पणियाँ जोड़कर उन्होंने उस समय का सर्वांगपूर्ण चित्र उपस्थित कर दिया है। जनेऊ या बारात का वर्णन करते हुए उस समय के सारे रीति-रिवाज भी सम्मिलित कर लिये गए हैं। इस दृष्टि से उनकी आत्मकथा तदयुगीन समाज का व्यापक दस्तावेज है जिसका उपयोग भविष्य में समाजशास्त्री, इतिहासकार आदि भी कर सकते हैं। दुर्भाग्यवश चतुर्वेदीजी ने आत्मकथा पूरी नहीं की और हिंदी वाङ्मय एक अनमोल कृति से वंचित रह गया।

आत्मकथा लेखन को बंद करने के पीछे एक और भी कारण था। उन्हें इस प्रकार के लेखन की निरर्थकता का अनुभव होने लगा। उसे उन्होंने अपने ‘क्या, क्यों और किसके लिए लिखूँ’ शीर्षक लेख में व्यक्त किया है, जो इस ग्रंथ में प्रकाशित किया जा रहा है।

 

शैलनाथ चतुर्वेदी

 

प्राक्कथन

 

पूज्य भैया साहब (पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी जी) में इतने व्यक्तित्व समाए हुए थे कि पारदर्शी सहजता के बावजूद उन्हें समझना आसान नहीं था। एक ओर वे बड़े विनोदी और चौमुखी स्वाभाविक मस्ती के मूर्तिमान रूप, दूसरी ओर सूक्ष्म-से-सूक्ष्म ब्योरों में जानेवाले चुस्त शासक तथा मर्यादाओं के कठोर अनुशासन को स्वीकार करने वाले; अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के लिए आतंक; एक ओर काव्य-रसिक, गोष्ठीप्रिय और दूसरी ओर पैनी इतिहास-दृष्टि से घटनाओं की बारीक जाँच करनेवाले विश्लेषक। एक ओर अपने आचार विचार में कठोर, दूसरी ओर अपने बड़े कमरे को खुली स्वतंत्रता का कमरा (सिविल लिबरटी हॉल) कहते थे, जहाँ पर खुली छूट थी किसी की भी धज्जी उड़ाई जाए। यह सब मुक्त भाव से हो और भीतर-ही-भीतर गूँज बनकर रह जाए। किसी आपसी कटुता को जन्म न दे। इस प्रकार अगणित विरोधाभास उनके व्यक्तित्व में थे। पर यह सब उनमें ऐसे रच-पच गए थे कि हिंदी की कई पीढ़ियों के न बाबा बने, न ताऊ बने, बस भैया साहब बने रहे।
 
मैंने ही उन्हें सुझाया कि भैया साहब, आप भी अपनी आत्मकथा लिखिए, क्योंकि आपकी स्मृति इस उम्र में भी ऐसी अवदात है कि उसमें क्रमबद्ध घटनाओं के सजीव चित्र अभी भी ताजा हैं। पहले वे बिगडे-आत्मकथा आत्मश्लाघा हो जाती है या आत्मनिंदा के व्याज से आत्म-विज्ञापन। मैंने अनुरोध किया कि आपके पास निरा आत्म है ही कहाँ कि आप आत्मकथा लिखें। आपके हाथ में लोग जानें तो कितना परिवेश खुला हुआ है। उनसे भी अधिक जाने कितने व्यक्तित्वों की बहुरंगी छायाएँ आपका ही निजी अंग बन गई हैं।

उन्होंने 1967 में आत्मकथा लिखनी शुरू की, तथा दो मोटी कापियाँ भर डालीं और दर्जा चार पास नहीं हुई। अपने को उन्होंने एकदम पीछे रखकर अपने समय की पाठशालाओं की बात, शादी ब्याह के रीति-रिवाजों की बात इतनी लिख डालीं कि उन्हें लगा, अगर इसी तरह लिखते चले गए तो जीवनी पूरी ही न होगी। दूसरा कारण लेखन से उनके विरत होने का यह भी था कि निरंतर वह यह अनुभव करते थे कि आत्मकथा अहंकार कथा के रूप में न रची जाए। काश ! वे इसे पूरा कर पाते तो उनके स्मृति दर्पण में पड़ी पूरी शताब्दी के ऐतिहासिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन की छवि आज महत्त्वपूर्ण अभिलेख के रूप में हमारे सामने होती। इस अधूरी रचना को भी वह अपने जीवनकाल में प्रकाश में नहीं लाना चाहते थे। आज उनका अक्षर शरीर मात्र ही रह गया है, इसलिए उनके इस अभिलेख को हम छिपाकर नहीं रख सकते। उनके ज्येष्ठ पुत्र शैलजी की सहायता से पांडुलिपि तैयार हुई और आज उसे प्रकाश में लाते हुए मुझे बड़ा परितोष होता है कि भैया साहब के व्याज से पिछली शताब्दी की अंतिम चरण की पार्श्व छवि सामने ला रहे हैं; जो इतिहास की दृष्टि से तो महत्त्वपूर्ण है ही, सहज साहित्य की दृष्टि से भी अद्वितीय कृति है। हिंदी में यूँ भी आत्मकथा दुर्लभ है, और इस प्रकार की आत्मकथा, जिसमें आत्म दूसरों में विलीन हो गया हो, दुर्लभतर है।

 

विद्यानिवास मिश्र

 

परिवेश की कथा

 

मेरा जन्म आश्विन कृष्ण तृतीया, तदनुसार 28 सितंबर सन् 1993 ई. को मध्य रात्रि में हुआ था। उस समय महारानी विक्टोरिया का राज्य था-उन विक्टोरिया का, जिनके लिए प्रताप नारायण मिश्र ऐसे राष्ट्रीयतावादी ने लिखा था-‘‘पूरी अमी की कटोरिया-सी चिरजीवी रहो विक्टोरिया रानी।’’ उन दिनों देश में शांति थी। रुपया कम था-मेरे लड़कपन में कौड़ियाँ चलती थीं। एक पैसे का मूल्य बहुत था। तब रुपए में चौंसठ पैसे होते थे; आजकल की तरह सौ पैसे नहीं।‘ अधेला’ (पैसे का आधा) और ‘अधन्ना’ (दो पैसे) भी चलते थे। तब इकन्नी नहीं चलती थी। दुअन्नी, चवन्नी, अठन्नी और रुपए के सिक्के चाँदी के थे। वेतन और मजदूरी कम थी, किंतु चीजें सस्ती थीं। आवश्यकताएँ भी कम थीं। उन दिनों ‘फर्नीचर’ का प्रचलन मध्यवित्त के लोगों में नहीं के बराबर था। उसका आरंभ हो गया था। अच्छे घरों में दो चार बरेली की कुरसियाँ किसी अंग्रेज या अफसर के स्वागत के लिए रखी जाती थीं। बाइसिकिल का आरंभ होने लगा था, किंतु वह बड़े आदमियों की चीज समझी जाती थी। कलाई की घड़ी अप्राप्य थी।

शौकीन और बड़े आदमी ही जेबघड़ी रखते थे। दो ही जेबी घड़ियाँ अधिकतर चलती थीं-सस्ती ‘रास्कोफ’ और कुछ महँगी ‘हंटिंग’। ‘हंटिंग’ खुली भी आती थी और ढक्कनदार भी। जिन लोगों को समय का अधिक ध्यान रहता या शौक होता, वे घर पर ‘टाइमपीस’ रखते थे। ‘बी’ नामक टाइमपीस ही मैंने सब जगह देखी थी बहुत बड़े आदमियों के यहाँ ही पैंडुलमवाली दीवार घड़ी यदाकदा दिखाई पड़ जाती थी। भोजन का निम्न मध्यवर्ग को कष्ट न था। डेढ़ दो रुपए मन गेहूँ था। चना जो चावल दाल आदि इतनी सस्ती थीं कि इनके मूल्यों की ओर कोई ध्यान भी न देता था। बूरा तीन से पाँच आना सेर था। हमारे घर पर एक दूधिया बढ़िया शुद्ध दूध दे जाता था। रुपए का बीस सेर (एक तौल, जो लगभग 960 ग्राम के बराबर होता है) के हिसाब से उसे दाम दिए जाते थे। इटावा में उन दिनों जलेबी तीन आने सेर मिलती थीं। रबड़ी तीन आना सेर तक की याद है। कहने का तात्पर्य यह कि निरामिषभोजियों को खाद्य पदार्थ सस्ते ही नहीं मिलते थे, वे शुद्ध भी होते थे। फलों की बहुतायत थी। फलों के बागों को बेचने का रिवाज बहुत कम था। अधिकतर जमींदार या बड़े आदमी आम इत्यादि लोगों को बाँट देते थे। हमें याद है कि दीवान साहब तथा मिश्र जादोराय के यहाँ से बड़े-बड़े डलों में पहले कई बार कच्चे आम और कच्ची अमियाँ आती थीं, जिनका आचार डाला जाता था।

फिर जब आम पक जाते तो वे लोग छकड़ों में भरकर अपने गाँवों से मँगवाते और उन्हें मोहल्लों के घरों में भेजते। बाजार में भी आमों का मूल्य बहुत कम था। उन दिनों इटावा में आम, खरबूजा, फालसा, खिन्नी ककड़ी, खीरा तथा देसी अनार बहुतायत से होते थे। न मालूम क्यों, वहाँ अब फालसा और अनार बहुत कम हो गए हैं। घर के एक दो लोग ही बाहर नौकरी या रोजगार करने जाते थे। वे जो थोड़ा़ रुपया घर भेज दया करते थे, उससे घर का काम मामूली चल जाता था। मध्यवित्त के लोगों के लिए प्रारंभिक शिक्षा गुरुओं की पाठशालाओं में होती, फिर कुछ लोग ह्यमूगंज के टाउन स्कूल (वर्नाक्यूलर मिडिल स्कूल) में, और अधिक उच्च विचारवादी ह्यूम स्कूल में पढ़ते। जो अपने बच्चों को आगे पढ़ाना चाहते, वे उन्हें आगरा भेजते। वहाँ कई हॉस्टल थे, जिनमें विद्यार्थी प्रायः मुफ्त रहते तथा वहाँ भोजन का प्रबंध भी बड़े सस्ते में हो जाता था। उन दिनों इटावा से शायद ही कोई लड़का इलाहाबाद पढ़ने जाता हो। तब कानपुर का नाम भी शिक्षा के क्षेत्र में न था।

माथुर चतुर्वेदी जाति के आरंभ के तथ्य इतिहास के इतने गहरे गर्त में पड़े हुए हैं कि उनको निकालना यदि असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। मैंने उनके संबंध में अनेक सिद्धांत सुने हैं। हम लोग तो अपने को विशुद्ध आर्य समझते हैं, जो उन ऋषियों की संतान हैं जो वेदों के मंत्रद्रष्टा थे। किंतु कुछ लोगों का अनुमान है कि यह जाति या उपजाति वास्तव में ग्रीक है, जो सिकंदर के समय आकर भारत में बस गई तथा कालांतर में मथुरा चली आई। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि कुछ ग्रीक अवश्य यहाँ बस गए थे। और उनमें से कितनों ही ने भागवत धर्म (जिसे अब वैष्णव धर्म कहते हैं) स्वीकार कर लिया था। विदिशा का हेलिओदोरस का स्तंभ इस बात का साक्षी है। यूनानी हेलिओदोरस ने वहाँ भागवत धर्म स्वीकार करने पर विष्णु के मंदिर के सामने गरुड़ध्वज स्थापित किया था। ग्रीक लोगों के लिए बहुत दिनों यवन शब्द चलता रहा; क्योंकि ग्रीस का पुराना नाम ‘Ionia’ था। और वे लोग ‘Ionion’ कहलाते थे, जिससे ‘यवन’ शब्द बना। प्रेमसागर पढ़ने वालों ने इसमें काल यवन की कथा पर अवश्य ध्यान दिया होगा। बाद में यह शब्द पश्चिम से आनेवाले सभी विदेशियों के लिए प्रयुक्त होने लगा। पुराने ‘Ionion’ यहाँ इतने घुल-मिल गए कि उनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रह गया। अन्य कुछ लोगों का कहना है कि माथुर चतुर्वेदियों को एक ही प्रजाति या स्टाक का समझते हैं; क्योंकि दोनों के रूप-रंग रहन-सहन भोजन वसन और रीति-रिवाजों में अनेक साम्य हैं। बहुत से लोग उन्हें भी ग्रीक मानते हैं। अपने मित्र स्व. भोलानाथ झा आई.सी.एस से मैंने इसपर अनेक बार विचार विमर्श किया। शायद भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा से गुजरात गमन के कारण भी लोगों ने अनुमान किया हो कि उनके साथ उनके कुछ भक्त ब्राह्मण भी गुजरात चले गए। किंतु ये सब अनुमान मात्र हैं।

वास्तव में मथुरा में चतुर्वेदियों का आदि इतिहास अज्ञात है। जैसा कि सर्वविदित हैं, आरंभ में सब ब्राह्मण एक थे, और उनमें गोत्र बचाकर संबंध हुआ करते थे। किंतु धीर-धीरे जब आर्यगण भारत में फैले तो जो ब्राह्मण जिस स्थान में बस गए, वहीं के नाम से प्रसिद्ध हो गए। सरस्वती नदी के आसपास रहनेवाले ‘सारस्वत’, कान्यकुब्जदेश के ब्राह्मण ‘कान्यकुब्ज’, मिथिला के ‘मैथिल’, जेजाकभक्ति के ‘जुझौतिया’, मालवा के ‘मालवीय’ नर्मदा के तटवासी ‘नार्मदीय’ आदि कहलाने लगे। इसी प्रकार जो ब्राह्मण मथुरा मंडल में बस गए, वे ‘माथुर’ ब्राह्मण कहलाए।

प्रत्येक ब्राह्मण का धर्म था कि वह वेद पढ़े। और उन दिनों सामान्यतः प्रत्येक ब्राह्मण अपना वेद पढ़ता था। अपना वेद पढ़ना कोई उल्लेखनीय बात न थी। किंतु जो एक वेद और पढ़े, उसकी विशिष्टता बतलाने के लिए वह ‘द्विवेदी’ कहलाने लगता था। इसी प्रकार तीन वेद पढ़नेवाले ‘त्रिवेदी’ और चारों वेद पढ़नेवाले ‘चतुर्वेदी’ कहलाते थे। प्रायः प्रत्येक देश के ब्राह्मणों में ऐसे विशिष्ट व्यक्ति होते थे जो दो, तीन या चार वेद पढ़कर द्विवेदी, त्रिवेदी या चतुर्वेदी की उपाधि प्राप्त कर लेते थे। कान्यकुब्जों सरयूपारीयों और मालवीयों में भी चतुर्वेदी पाए जाते हैं। महामना मालवीयजी मालवीय चतुर्वेदी थे, और माखनलाल नार्मदीय चतुर्वेदी थे; पर परशुराम चतुर्वेदी सरयूपारी चतुर्वेदी हैं। आरंभ में यह उपाधि व्यक्तिगत होती थी। श्री लालबहादुर विद्यापीठ के स्नातक होने के कारण अपने नाम के पीछे स्नातक की उपाधि ‘शास्त्री लगाते थे; जो उनकी व्यक्तिगत अर्जित उपाधि थी। किंतु उनकी पत्नी ललिता शास्त्री और उनके पुत्र भी शास्त्री कहलाने लगे। उसी प्रकार जो चतुर्वेदी उपाधि आरंभ में व्यक्तिगत थी, वह बाद में वंशानुगत हो गई।

अन्य ब्राह्मणों का समुदाय बहुत बड़ा था। उनमें कुछ लोग ही द्विवेदी, त्रिवेदी और चतुर्वेदी होते थे। इसलिए उनका जातिगत परिचय ‘कान्यकुब्ज’ और विशिष्ट वंश परिचय ‘चतुर्वेदी’ बताया जाता था। किंतु मथुरा के ब्राह्मणों की संख्या बहुत कम थी, और आज भी बहुत कम है, अतः वे चतुर्वेदी कहलाए। सरयूपारी ब्राह्मणों की संख्या लगभग बीस लाख, और कान्यकुब्जों की तेरह-चौदह लाख है। किंतु माथुर ब्राह्मणों की संख्या केवल चौदह हजार के लगभग है। आरंभिक काल में तो जनसंख्या अत्यंत विरल थी, वह शायद सैकड़ों में गिनी जाती होगी। मथुरा का क्षेत्र भी कान्यकुब्ज आदि से बहुत छोटा और सीमित है। ऐसा मालूम होता है कि मथुरा के ये थोड़े से ब्राह्मण चारों वेद पढ़ा करते थे। अतएव वे और उनके सभी वंशज माथुर चतुर्वेदी कहलाने लगे। बोलचाल में उन्हें आज भी मथुरिया चौबे कहा जाता है। किंतु प्रत्येक माथुर ब्राह्मण के चतुर्वेदी होने के कारण ‘चतुर्वेदी’ शब्द ‘माथुर’ के विकल्प में भी प्रयुक्त होने लगा। प्रत्येक मथुरा ब्राह्मण चतुर्वेदी था, इसलिए केवल चतुर्वेदी कहने से सामान्यतः उसका बोध हो जाता था। इस प्रकार ‘चतुर्वेदी’ बहुत कुछ ‘माथुर’ का पर्याय हो गया। भारी-भरकम ‘माथुर-चतुर्वेदी’ न कहकर लोग अपने को केवल ‘चतुर्वेदी’ या चौबे कहने लगे। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि चतुर्वेदी एक प्रतिष्ठासूचक विशिष्टता प्रकट करता है। ‘माधुर’ केवल देशसूचक है। उसमें कोई प्रतिष्ठासूचक विशिष्टता नहीं है।

माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों में सात गोत्र हैं। प्रत्येक गोत्र किसी ऋषि के नाम पर है। संभवतः एक गोत्र के लोग उस ऋषि की संतान हैं, जिसके नाम पर वह गोत्र है। प्रत्येक गोत्र के साथ ‘प्रवर’ भी है, जिसमें उन विशिष्ट ऋषियों के नाम हैं जो उस गोत्र में उल्लेखनीय महत्त्व के हुए। यद्यपि प्रत्येक चतुर्वेदी चारों वेदों का अध्ययन करता था, तथापि वह अन्य ब्राह्मणों की तरह एक वेद का विशेष अध्ययन करता था। वह उसका ‘वेद’ कहलाता था। वेद में अनेक शाखाएँ होती हैं जिनका वह विशेषज्ञ होता था। अतएव वेद के साथ उस शाखा का भी उल्लेख किया जाता है। प्रत्येक गोत्र की कुलदेवी होती थी। उसके श्रौतकर्म जिस सूत्र के अनुसार होते थे, उसका भी उल्लेख किया जाता था। माथुरों के आठ गोत्र हैं: वसिष्ठ, धूम्र सौश्रवस, कुत्स, भार्गव, दीक्षित और भारद्वाज इनके प्रवर, शाखा और कुल-देवियाँ इस प्रकार हैं-

गोत्र                     प्रवर                   वेद                      शाखा                         कुलदेवी   
दक्ष                    आत्रेय                   ऋग्वेद                  आश्वासलायनी            महाविद्या
                        गाविर                                
                      पौर्वातिध,
वसिष्ठ              वसिष्ठ इंद्र,                 ऋग्वेद                        आश्वालायनी                 महाविद्या
                       प्रमदा,
                        भरदवसु
धूम्र (धौम्य)       काश्यप,                      ऋग्वेद                        आश्वालायनी              महाविद्या
                          आवत्सर,  
                          नैध्रुव
सौश्रवस               विश्वामित्र                   ऋग्वेद                      आश्वालायनी               महाविद्या
                         देवरात, औदत
भार्गव                 भार्गव,                         ऋग्वेद                      आश्वालायनी                महाविद्या
                        च्यावन,
                       आप्पवान
                        और्व,
                       जामदग्न्य  
भारद्वाज            आंगिरस,                             सामवेद                        रारायिणी                         चर्चिका
                       बार्हस्पत्य     
                        भारद्वाज

इनके अतिरिक्त ये सात गोत्रवाले चौंसठ उपनामों या ‘अल्लों’ में विभक्त हैं। ये उपनाम या अल्ल या तो वंश के विशिष्ट कार्य के आधार पर रखे गए हैं या ये उन गाँवों के नामों पर हैं जिनमें ये वंश उस समय रहते थे। ये सभी गाँव व्रज में मथुरा के आसपास हैं। एक गाँव में एक ही गोत्र के लोग बस गये थे। इसलिए एक अल्ल के सभी लोग एक ही गोत्र के हैं। माथुरों की चौंसठ अल्लें या उपनाम ये हैं-

(दक्ष गोत्र में) ककोर, पैंचरे, पुरवेऊ, दक्ष (4); (वसिष्ठ गोत्र में) निनावली, काबो, बहिया, जोनमाने, डाहरू, डटोलिया, डुंडवार, पैठवाल (8); (धौम्य गोत्र  में) लापसे, भरतवार, तिलभने, मोरे, घरवारी, चंद्रपेखी, जोजले, सुकल, ब्रह्मपुरिया, सोती, (10); (श्रोत्रिय सौश्रवस गोत्र में) पुरोहित, छिरोरा, घोरमई, मिश्र चकेरी, बुदौआ, तोयजाने, चंद्रसे, चंदपुरिया, बैसांदर, सुभावली (10); (कुत्स गोत्र में) मेहारी, खलहरे, अरेठिया या संतैरे, शांडिल्य (5); (भार्गव गोत्र में) दीक्षित-दरर, गेंदवार, गुगौलिया, गोंहजे, कनेरे, तर्र, घेहरिया सकना, चतुरमुर्र, आमरे, मकनियाँ (12); (भारद्वाज गोत्र में) पांडे, पाठक रावत, कारेनाग, तिवारी नसवारे, बीसा तिवारी, चौपोली तिवारी, भामले, अजमियाँ, कोहरे, दिआचाट तिवारी, सड्ड भेंसेरे, गुनार, सिकरोरी, पिलहोली (16)।

इन उपनामों से स्पष्ट है कि जिन गाँवों के नामों पर ये नाम पड़े हैं वे भाषा की दृष्टि से पूर्व मध्य युग के हैं। आज इनके उच्चारणों में उत्तर-मध्यकालीन भाषा का प्रभाव है। ‘सड्ड’ शब्द को लीजिए। ‘सड्ड’ आजकल के लोग बोलते हैं; किंतु वह होना चाहिए ‘सड्ढ’। सड्ढ प्राकृत शब्द है, जिसके संज्ञा रूप में दो अर्थ हैं-(1) श्रावक, जैन गृहस्थ, (2) (श्रद्धेय वजनवाला। यह शब्द श्रद्धा का प्राकृत रूप है। अतएव यह नाम इस गाँव या उसके निवासियों का उस समय पड़ा जब प्राकृत बोली जाती थी। उनके नामों का भाषाशास्त्रीय अध्ययन किया जाए तो मोटे तौर से उस युग का पता लग सकता है जब इनके मूल नाम पड़े। उदाहरण के लिए ‘भामले’ को लीजिए। प्राकृत से जब व्रज या खड़ीबोली का विकास हुआ तो कई जगह ‘र’ का ‘ल’ हो गया। प्राकृत में ‘भामर’ शब्द है। ‘भामरे’ का अर्थ हुआ, ‘भामरवाला’ या ‘भामर’ का निवासी। प्राकृत के ‘भामर’ के अर्थ हैं-मधु या शहद (भ्रमरी का बनाया हुआ)। इसी प्रकार गुनार (प्राकृत गुण, हिंदी गुना-मिष्टान विशेष से संबंधित), गुगोलिया (प्राकृत गुग्गुल, हिंदी गूगुल से संबंधित) गोंइजे (गौह-प्राकृत में गाँव का मुखिया या सुभट के स्थान का), कनेरे (कण-प्राकृत में तंडुल ओदन से संबंधित सकना (प्राकृत सकन्न-विद्वान् से संबंधित), डुंडवार (प्राकृत डुंडुअ-पुराना या बड़ा घंटा से संबंधित) आदि शब्दों के आदिरूप  की भाषा से उस काल या युग का मोटा बोध हो सकता है जब ये गाँव बसे, या जिन्हें इन लोगों ने बसाया। वह युग मेरी समझ में पूर्व-मध्यकाल ही हो सकता है अतएव मेरा अनुमान है कि ये अल्लें दसवीं शती के लगभग बनीं और तब से प्रचलित हुईं।






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