अपना दीपक स्वयं बनें - सुधा मूर्ति Apna Deepak Swayam Banein - Hindi book by - Sudha Murti
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अपना दीपक स्वयं बनें

सुधा मूर्ति

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :148
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1720
आईएसबीएन: 81-7315-500-3

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प्रस्तुत है अपना दीपक स्वयं बनें...

Apna Deepak Swayam Banein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत पुस्तक अपना स्वयं बनें में सदाचार ईमानदारी,कर्तव्यपरायणता आदि शिष्टाचार सिखानेवाली अनुभवजन्य कहानियाँ संकलित हैं। लेखिका ने अपने अध्यापकीय जीवन के सच्चे एवं जीवंत अनुभवों को इसमें उड़ेलने का महती प्रयास किया है। यह पुस्तक बच्चों को ही नहीं,बड़ों को भी सच्चरित्र,निर्णय-सक्षम उदार बनाने एवं जीवन पथ पर प्रगति की राह में अग्रसर रहने में उनका मार्गदर्शन करेगी।

लेखकीय

मेरे प्रिय विद्यार्थियों को, जो मेरी बढ़ती आयु में भी मुझे अंतःकरण से युवा बनाए हुए हैं।
मेरा लालन-पालन एक गांव में हुआ था। उन दिनों घर में न टी.वी था, न मनोरंजन के अन्य साधन। मनोरंजन का एकमात्र साधन पुस्तकें थीं। सौभाग्य से मेरे दादा-दादी तब जीवित थे। दादाजी सेवानिवृत्त अध्यापक और पढ़ने के शौकीन थे। उन्हें संस्कृत का अच्छा ज्ञान था। इसलिए टिमटिमाते तारों तले रात के अँधियारे में नित नई कहानियाँ सुनाया करते थे। ये कहानियाँ भारतीय इतिहास, पौराणिक साहित्य, विदेशों में घटी घटनाओं से संबंधित हुई करती थीं। मैंने ‘कथासरित्सागर’,‘अरब की रातें’, ‘पंचतंत्र’, इसोपा की कहानियाँ’,‘बीरबल, रामकृष्ण आदि की रोचक कहानियों से बहुत कुछ सीखा है। उन सुहानी रातों मे समय के साथ-साथ भारत में इतने परिवर्तन हुए कि परिवार की अवधारणा ही बदल गई।

टी.वी. के अधिकार और उसके द्वारा भारतीय महाकाव्यों-ग्रंथों पर आधारित धारावाहिकों के प्रसारित होने से हमें अपने महाकाव्यों को समझने में काफी सहायता मिली; किंतु इससे हमारी कल्पना-शक्ति का ह्रास भी हुआ है। कहानियाँ सुनाना इतना आसान नहीं है। इसके लिए अपनी आवाज में प्रसंग के अनुसार उतार-चढ़ाव, जोश, आतंक, भय, विस्मय, हास्य एवं शांति का भावानुभाव उत्पन्न करना पड़ता है। मैंने अपने दादाजी के साथ राजस्थान में हल्दीघाटी का पूरा आनंद उठाया, जो उन्होंने अपनी माता जीजाबाई के पास बैठकर प्राप्त किया था। मैंने राजा रणजीत सिंह के युद्धों के वर्णन का पूरा आनंद लिया तथा उनके कल्याणकारी कार्यों का भी, जब प्रजा की सहायता के लिए वह अपना विशाल कोषागार खोल देते थे। मैं स्वतंत्रता के प्रथम युद्ध की गाथाओं में आँसू भी बहाए, जिसे अंग्रेजों ने राज विद्रोह और हमने स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी थी। मैंने अपने मन-ही-मन में अपनी वेशभूषा बदली और वजीरे आलम के साथ बगदाद की गलियों में चोरों को ढूँढने लगी। मैंने इसोपा और उसके स्वामी के साथ दूर तक यात्रा की और समझा कि इसोपा दास है, किंतु वास्तव में वह बहुत ज्ञानी था। तेनाली रामाकृष्ण ने विजयनगर के दरबार में हमारा भरपूर मनोविनोद किया, जबकि बीरबल से कई महान् पाठ पढ़े। अपने दादाजी द्वारा सुनाई गई अनेक सच्ची कहानियों के परिणामस्वरूप ही कल्पना की ये सभी उड़ाने संभव हुई थीं।

मैंने उनमें से कुछ कहानियों में निहित आदर्शो को अपने अनुभव के आधार पर पुनर्जीवित करने के कुछ प्रयास भी किए। अपने कार्य के दौरान मैं ऐसे अनेक बच्चों से मिली हूँ, जो अपने मन में कई सपने, कई आकांक्षाएँ सँजोए रहते हैं। हमारे देश में विभिन्न धर्मों भाषाओं संस्कृति के विशाल परदे पर अथाह भक्ति उपलब्ध है। किंतु याद रहे कि वे सभी परस्पर एक सूत्र में बँधे हैं। भाषा-भेद हो या धर्म-भेद, हम सभी एक ही देश के वासी हैं। हमें समझना चाहिए कि हमें आपसी समझदारी के साथ शांतिपूर्वक रहना है और यह भारतीयता की विशेषता है। शांति से सुदृढ़ता प्राप्त होती है और सुदृढ़ होने पर आत्मविश्वास उभरता है, जिससे अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं।

मुझे सदा यही विचार आया करता है कि इन कहानियों में छिपे ज्ञान-भंडार को भावी पीढ़ी के हवाले कर दूँ। मैं इन्हें सरल-सुबोध बनाने का सतत प्रयास किया है। मैंने अपने अध्यापकीय जीवन के सच्चे जीवंत अनुभवों को भी इसमें बुनने का यत्न किया है। यदि इनमें कोई कमी रह गई तो वह मेरे अल्पज्ञान एवं अभिव्यक्ति अक्षमता के कारण ही है।
अंग्रेजी में प्रकाशित मेरी मूल पुस्तक ‘हाऊ आई टॉट माई ग्रैंड मदर टु डील एंड अदर स्टोरीज के कन्नड़, मराठी, गुजराती, तमिल और अब हिंदी में अनुवाद छप गए हैं।

इस पुस्तक के सुरुचिपूर्ण हिंदी अनुवाद के लिए मैं श्रीमती ज्योति (थपलियाल) उनियाल को हार्दिक धन्यवाद देती हूँ।
-सुधा मूर्ति

आयु बंधन नहीं

तब मैं बारह वर्ष की लड़की थी। मैं अपने दादा-दादी के साथ उत्तरी कर्नाटक के एक गाँव में रहती थी। उन दिनों पहिवहन-व्यवस्था बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए हमें सुबह का अखबार दोपहर बाद मिला करता था। साप्ताहिक पत्रिका एक दिन विलंब से प्राप्त होती थी। हम सब लोग अखबार, साप्ताहिक पत्रिकाएँ एवं डाक लेकर आनेवाली बस की प्रतीक्षा बड़ी उत्सुकता से करते रहते थे। उन दिनों कन्नड़ भाषा की एक बहुत ही लोकप्रिय लेखिका थीं। त्रिवेणी। वह बहुत ही सरल व प्रभावकारी शैली में प्रायः आधारभूत मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर लिखती थीं, अतः वे हम सबसे संबंधित होती थीं। यह कन्नड़ साहित्य का दुर्भाग्य था कि वह बहुत छोटी आयु में ही चल बसीं। उनके लिखे उपन्यासों की सराहना आज चालीस वर्ष बाद भी लोग करते हैं।

उनका एक उपन्यास ‘काशी यात्रा’ उन दिनों कन्नड़ साप्ताहिक ‘कर्मवीर’ में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ करता था। वह एक वृद्ध महिला की कहानी थी, जिसकी काशी की यात्रा करने की उत्कट अभिलाषा थी। अधिकतर हिंदुओं की आस्था है कि काशी जाकर भगवान् शिव की पूजा करना ही अत्यंत पुण्य कार्य है। उस वृद्धा की भी यही अभिलाषा थी और उस उपन्यास में उसकी काशी यात्रा के लिए किए गए संघर्ष की ही कहानी है। उसमें एक अन्य अनाथ लड़की की कहानी भी है, जो प्यार कर बैठती है, किंतु ब्याह करने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। वह वृद्धा अपनी काशी यात्रा के लिए संचित समस्त राशि उस अनाथ लड़की की शादी में खर्च कर डालती है। वह कहती है, ‘‘इस अनाथ लड़की के जीवन में खुशियाँ लाना काशी में भगवान् शिव की पूजा से अधिक महत्त्वपूर्ण है।’’ मेरी नानी कृश्टक्का कभी पाठशाला नहीं गई थीं, अतः वह पढ़ना नहीं जानती थीं प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक पत्रिका आती थी और मैं उसमें लिखी कहानी सुनाती थी। उस समय वह सब काम भूलकर बड़ी तन्मयता से कहानी सुनती थीं। बाद में वह सारी कहानी मुखाग्र सुनाती थी। मेरी नानी काशी भी नहीं गई थीं। इसलिए वह स्वयं को कहानी की वृद्धा से एकरूप मानती थीं। इसीलिए वह कहानी पढ़ने के लिए मुझपर जोर डालती थीं। अब मुझे समझ आता है कि पाठक के लिए एक सुंदर उपन्यास के प्रति कितना आकर्षण होता है। बच्ची होने के कारण मैं कहानी पढ़कर खेलने के लिए बाहर चली जाती थी। वह मंदिर परिसर में अपनी सहेलियों से मिला करती थीं, जहाँ हम बच्चे लोग लुका-छिपी का खेल खेला करते थे और वह कहानी के बारे में बच्चा चर्चा करती थीं। तब मुझे समझ नहीं थी कि उस कहानी के विषय में इतनी चर्चा क्यों होती थी।

एक बार में अपने चचरे भाई की शादी में पड़ोस के एक गाँव में गई थी। तब विवाह-समारोह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य हुई करता था। हम सभी बच्चों की मौज होती थी। हमारे सभी चचरे-ममरे भाइयों के आने से खूब धूम मची रहती थी। बड़े-बुजुर्ग अन्य कार्यों में व्यस्त रहते थे। इसके कारण हम पूरी तरह स्वतंत्रता का लाभ उठाते थे। मैं कुछ दिनों के लिए ही गई थी, किंतु एक सप्ताह तक वहाँ मुझे रुकना पड़ा।
जब मैं वापस अपने गाँव लोटी तो मैंने अपनी नानी को आँसू बहाते देखा। मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि मैंने उन्हें कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में भी विचलित होते या रोते नहीं देखा था। मुझे चिंता सताने लगी।
‘‘अव्वा क्या सबकुछ ठीक-ठाक है ? क्या आप कुशल हैं ? ‘‘मैं उन्हें ‘अव्वा कहती थी, जिसका अर्थ उत्तरी कर्नाटक की भाषा में ‘माँ’ होता है।

उन्होंने सिर हिलाया, किंतु बोलीं कुछ नहीं। मैं कुछ समझी नहीं और उन्हें पूरी तरह से भूल गई। रात के खाने के बाद हम घर के खुले आँगन में सो गए। ग्रीष्म की रात और पूर्णमासी का चाँद। अव्वा आईं और मेरे पास बैठ गईं। उनके स्नेहिल हाथों ने मेरे माथे को छुआ। तब मुझे लगा कि वह कुछ बोलना चाहती हैं। मैंने पूछा, ‘‘क्या बात है ?’’
‘‘जब मैं छोटी थी तो मैंने माँ को खोया। मेरी देख-रेख करने और मुझे सही-गलत का ज्ञान करानेवाला कोई नहीं था। पिताजी काम में व्यस्त रहते थे। उन्होंने दूसरी शादी कर ली थी। उन दिनों लोग लड़कियों को पढ़ाना जरुरी नहीं समझते थे। इसलिए मैं कभी पाठशाला नहीं गई। छोटी आयु में ही मेरा ब्याह हो और फिर बच्चे भी हुए। मैं गृहस्थी में पूरी तरह व्यस्त हो गई। बाद में बच्चों के भी बच्चे हो गए तो नाती-नातिनों की देख-रेख, उनके लिए खाना पकाने और फिर उन्हें खिलाने-पिलाने में ही जीवन की ढेर सारी खुशियाँ अनुभव कर ली थीं। कभी-कभी पाठशाला न जा पाने का मलाल अवश्य होता था, इसलिए मैंने इस बात का हमेशा ध्यान रखा कि मेरे बच्चे व नाती-नातिन अच्छी शिक्षा पाएँ।’’
मेरी नानी मुझे आधी रात में मुझे बारह वर्ष की लड़की को अपनी जीवन-गाथा क्यों सुना रही थीं ? यह बात मैं नहीं समझ सकी। मैं उनसे बहुत प्यार करती थी। मुझसे इस तरह की बातें करने का अवश्य कोई कारण रहा होगा। मैंने उनके चेहरे पर नजरें टिकाईं। उसपर दुःख की परछाईं थी और उनकी आँखों में आँसू तैर रहे थे। वह देखने में बहुत ही सुंदर महिला थीं, जो सदा मुसकराती रहती थी।

‘‘अव्वा, रोओ मत-बात क्या है ? क्या मैं आपकी कुछ सहायता कर सकती हूँ ?’’
‘‘हाँ, मुझे तुम्हारी सहायता चाहिए। तुम जानती हो कि तुम्हारी अनुपस्थिति में भी ‘कर्मवीर’ सदा की भाँति आया करता था। मैंने पत्रिका खोली तो काशी यात्रा की कथावाली तसवीर देखी। उसमें क्या लिखा था, वह तो मैं समझ नहीं पाई। मैंने अपने हाथों को उस तसवीर पर कई बार घुमाया कि शायद समझ सकूँ कि उस कहानी में क्या लिखा है। किंतु मैं जानती थी कि यह संभव नहीं है। काश, मैंने इतनी शिक्षा पाई होती ! मैंने उत्सुकता से तुम्हारी प्रतीक्षा की। मुझे लगा कि तुम जल्दी ही आओगी और मुझे कहानी पढ़कर सुनाओगी। कभी सोचती कि गाँव ही चली आऊँ और कहानी पढ़ने के लिए तुमसे कहूँ। उस कहानी को पढ़ने के लिए मैं इसी गाँव में किसी से कह सकती थी, किंतु कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति मिला ही नहीं। मैं इतनी असहाय और विवश थी। मेरे पास इतनी पूँजी है, किंतु क्या लाभ, जबकि मैं स्वयं को स्वतंत्र नहीं पाती हूँ !’’
मुझे कोई उत्तर नहीं सूझा। अव्वा बोलती रहीं, ‘‘मैंने कल से ही कन्नड़ वर्णमाला सीखने की ठान ली है। मैं मेहनत करूँगी। दशहरा में मैंने सरस्वती-पूजा करने का संकल्प लिया है। उस दिन तक मैं स्वयं पूरी तरह उपन्यास पढ़ने में सक्षम हो पाऊँगी। मैं स्वतंत्र होना चाहती हूँ।’’
मैंने उनके चेहरे पर दृढ़ संकल्प देखा। फिर भी मैं उन पर हँसी।

मैंने कहा, ‘‘अव्वा, बासठ वर्ष की आयु में तुम वर्णमाला सीखोगी ? तुम्हारे सारे बाल पक गए हैं। हाथों पर झुर्रियाँ पड़ गई हैं। आँखों पर चश्मा चढ़ गया है और किचन का इतना सारा काम करती हो।’’ मैंने बच्चों के स्वर में उस वृद्धा का उपहास किया।
किंतु वह केवल मुसकरा दीं-‘‘अच्छे काम के लिए संकल्प लेकर आप किसी भी बाधा को पार कर सकते हैं। मैं अधिक-से-अधिक मेहनत करूँगी, किंतु यह काम अवश्य करूँगी। ज्ञान-प्राप्ति के लिए आयु की कोई सीमा नहीं होती।’’
दूसरे दिन से मैंने उन्हें शिक्षा देनी शुरू की। वह एक अच्छी छात्र थीं। उन्होंने जो मेहनत की, वह सचमुच अचंभे में डालनेवाली थी। वह पढ़ती दुबारा पढ़तीं, लिखती व बोलती जाती थीं। मैं ही उनकी एक मात्र शिक्षिका थी और वह मेरी प्रथम छात्र थीं। मुझे कुछ भी पता नहीं था कि एक दिन मैं कंप्यूटर विज्ञान की अध्यापिका बनूँगी और सैकड़ों विद्यार्थियों को पढ़ाऊँगी।

सदा की भाँति दशहरा पर्व आया। मैंने चुपके से ‘काशी यात्रा’ जो तब तक पूर्ण उपन्यास के रूप में प्रकाशित हो चुका था, खरीद लिया। नानी ने मुझे पूजा-स्थल पर बुलाया और एक स्टूल पर बैठने को कहा। उन्होंने मुझे फ्रॉक का सामान दिया और एक विलक्षण काम किया-उन्होंने झुककर मेरे पाँव छुए। मैं आश्चर्यचकित होकर सकपका गई। बड़े लोग बच्चों के पाँव नहीं छूते हैं। हमने हमेशा ईश्वर के, बड़ों अध्यापकों के पाँव छुए हैं। इसे आदरसूचक माना जाता है। यह महान् परंपरा है; किंतु आज तो बिलकुल उलटा ही हुआ है। यह सही नहीं है।
नानी ने कहा, ‘‘मैंने एक शिक्षिका के पाँव छुए हैं, अपनी नातिन के नहीं-वह शिक्षिका, जिसने मुझे इतनी अच्छी तरह से पढ़ाया, प्रेम से पढ़ाया कि इतने थोड़े समय में ही मैं कोई भी उपन्यास भलीभाँति पूर्ण आत्मविश्वास के साथ पढ़ सकती हूँ। अब मैं स्वतंत्र हूँ। मेरा कर्तव्य है कि शिक्षिका का सम्मान करूँ। क्या यह हमारे शास्त्रों में नहीं लिखा है कि बिना किसी आयु-भेद व लिंग-भेद के हमें गुरु को आदर-सम्मान देना चाहिए।

मैंने उनके पाँव छूकर उन्हे नमस्कार किया और अपनी पहली महान् छात्र को अपनी लाई हुई भेंट दी। उन्हें उसे खोला और त्रिवेणी लिखित उपन्यास ‘काशी यात्रा’ व प्रकाशक का नाम पढ़ा।
मैंने जान लिया कि मेरी छात्रा विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण हो गई है।

आज उन्हें हम....कहते हैं, कल...

वर्षों से मैं एम.सी.ए. के छात्रों को कंप्यूटर विज्ञान पढ़ाती आ रही हूँ। मैंने बहुत से छात्रों के साथ मिल-बैठकर काम किया है। उन सभी की याद अब नहीं आती है, किंतु कुछ छात्र मेरे मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ गए हैं। ऐसा नहीं कि वे सब बहुत मेधावी थे।
मेरे छात्र-समूह में हसन नामक छात्र बहुत होनहार था। लंबा, देखने में सुंदर और अच्छी स्मरण-शक्तिवाला। वह समृद्ध परिवार का इकलौता लड़का था। मैं प्रायः पहली कक्षा में पढ़ती हूँ, प्रातः नौ बजे या फिर दस बजेवाली दूसरी कक्षा को पढ़ाती हूँ। मैं इसे प्राथमिकता देती हूँ, क्योंकि तब तक छात्र तरो-ताजा एवं ध्यानमग्न रहते हैं।
प्रारंभ में मैं उसके अस्तित्व को बिलकुल नहीं जानती थी, क्योंकि वह कक्षा में कभी-कभी उपस्थिति रहता था। कभी कक्षा जाँच या परीक्षा के समय ही वह आता था। उसकी उपस्थिति में कमी के कारण उससे मेरी भेंट प्रायः कम ही होती थी। वह अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए इस भाँति प्रार्थना करता था कि ‘ना’ कहना कठिन होता था। कभी-कभी मैं विचलित होकर कह देती थी, ‘‘नहीं, मैं तुम्हारी उपस्थिति अंकित नहीं करूँगी, अनुशासन तो होना ही चाहिए।’’
‘‘हाँ, मैडम।’’ वह क्षमा याचना करता है, ‘‘मुझे क्षमा करें। अगली छमाही से मैं अवश्य आपकी कक्षा में उपस्थित रहूँगा। क्या इस बार आप क्षमादान नहीं करेंगी ? भूल करना मानव का स्वभाव है और क्षमा करना ईश्वरीय लक्षण-यह आपने ही हमें सिखाया है।’’

मै अधिक समय तक उससे रुष्ट नहीं रह पाती। अध्यापक निरंतर अनुपस्थित रहने वाले छात्रों से विचलित हो जाते हैं, किंतु यदि उनकी उपस्थिति में कमी के कारण उन्हें परीक्षा से वंचित होना पड़े तो ऐसे में सूर्य के सम्मुख बर्फ के समान द्रवित होना स्वाभाविक है। एक अच्छे अध्यापक के लिए छात्र-कल्याण ही प्रसन्नता की बात है न कि नियमों की परिधि, यद्यपि मैं स्वीकार करती हूँ कि अनुशासन का भी अपना महत्त्व है।
हसन के साथ यह नाटक प्रत्येक सेमेस्टर में चलता था। मैं रुष्ट हो जाती थी, किंतु अंततः हार भी जाती थी। हसन हर समय अपनी उपस्थिति सुधारने का प्रण करता था और एक सप्ताह तक पूर्णतः अनुशासित रहता था और उसके बाद फिर वही पुरानी कहानी। हर समय उपस्थिति में कमी का कारण भिन्न होता था। दुर्भाग्य से मुझे हर कहानी समय के कारण उचित जान पड़ती थी।

मेधावी होने से वह निश्चय ही परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता था। एक बार उसकी बहानेवाजियों (कहानियों) से तंग आकर मैंने उसके अभिभावकों को बुलवाया और कहा, ‘‘आपका पुत्र बहुत होशियार है। वह उद्दंड नहीं है, किंतु अनुशासनहीन है। यदि वह नियमित रूप से कक्षा में उपस्थित रहे तथा प्रयोगशाला में जाता रहे तो मुझे विश्वास है कि वह पढ़ाई में उच्च स्थान प्राप्त कर सकता है। मैं उसे समझाने में विफल रही हूँ। मुझे प्रसन्नता होगी, यदि आप इस बात पर गंभीरतापूर्वक ध्यान दें; क्योंकि यह निश्चय ही उसके जीवन को प्रभावित करेगा।’’
हसन के पिता एक व्यस्त व्यक्ति थे। वह बोले, ‘‘जब तक ठीक चल रहा है। ठीक है; क्योंकि बड़ी आयु में आने के बाद बच्चे किसी की नहीं सुनते। जीवन के उतार-चढ़ावों से उन्हें स्वतः शिक्षा मिलती रहती है।’’
किंतु उसकी माँ की आँखों में आँसू भर आए। बोली, ‘‘मैडम, माँ होने के नाते मैं विफल रही। वह मेरी एक नहीं सुनता। वह रात भंर संगीत सुनता और अपने मित्रों से गपशप करता रहता है। प्रातः छह बजे वह सोता है। अतः कक्षा में कैसे आएगा ? मेरे कहने पर वह बिलकुल ध्यान नहीं देता और कहता है कि मैं हमेशा यही कहती रहती हूँ।’’

हमारी भेंट उसके माँ-बाप के बीच बहस के साथ समाप्त हो गई। पिता बोला, ‘‘तुम माँ हो। उसे सुधारना तुम्हारा कर्तव्य है। तुम उसके साथ अधिक समय रहती हो। मैं व्यस्त हूँ। तुम्हीं विफल रही हो।’’
उसकी माँ बोली, ‘‘आप पिता हैं। लड़कों पर नियंत्रण कठिन है। आप आमने-सामने बात कर सकते हैं। पैसा कमाना ही जीवन में सबकुछ नहीं है।’’
कुछ देर तक ऐसे ही चलता रहा। भेंट निष्फल रही। हसन अपने ढंग से चलता रहा, हालाँकि वह हमेशा की तरह प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता गया। आखिर में एक दिन मेरे पास आकर वह मुझे धन्यवाद दे गया, ‘‘मैडम मुझे तीन वर्ष तक पढ़ाते रहने के लिए धन्यवाद। आपकी दयालुता से मुझे आवश्यक उपस्थिति मिलती गई। काश, इस महाविद्यालय में सभी अध्यापिकाएँ आप जैसी होतीं।’’
मैं हँस पड़ी, ‘‘ईश्वर ने चाहा तो हम फिर मिलेंगे।’’

किंतु हसन बहुत समय तक नहीं मिला। उसके विषय में मैं सबकुछ भूल गई। मैं अपने छात्रों को पढ़ाती रही। उनमें से कुछ बहुत भले बने कुछ ने ख्याति प्राप्त की, कुछ धनी हो गए और कुछ सामान्य ही रह गए। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, वे सब मेरे बच्चों के समान थे। कुछ मुझे आज भी याद करते हैं, शादी-ब्याह, जन्म-दिवस या गृह-प्रवेश आदि पर आमंत्रित करते हैं। शहर में होने पर मैं अवश्य इनमें भाग लेती हूँ, क्योंकि पुरानी यादें, पुराने मित्र, पुराने छात्र बहुत मूल्यवान् एवं निराले होते हैं। उनका उत्कृष्ट प्रेम ही मेरी शक्ति है।
एक सोमवार को सुबह मेरे सचिव ने कहा कि एक व्यक्ति विद्यालयों में शिक्षा हेतु अत्याधुनिक कंप्यूटर बेचने के उद्देश्य से मुझसे मिलना चाहता है। मैं अत्याधिक व्यस्त थी और मुझे ढेर सारे पत्रों के जवाब देने थे। विक्रेता से बात करने का समय तब मेरे पास नहीं था, इसलिए मैं उससे बोली, ‘‘वह किसी अन्य व्यक्ति से मिल ले, मेरे पास समय नहीं है।’’ किंतु मेरी सचिव ने कहा कि वह केवल मुझसे ही भेंट करना चाहता है तथा वह मेरा छात्र रह चुका है। वह जानती थी कि मैं अपने छात्रों को कितना चाहती हूँ। अतः वह उसे मना नहीं कर सकी।

‘‘ऐसा है तो वह दोपहर दो बजे मुझसे मिल ले।’’
दोपहर बाद लगभग पैंतीस वर्ष का, बड़ी तोंद एवं कुछ गंजे सिर तथा सामान्य वस्त्रोंवाला एक व्यक्ति कंप्यूटर उपकरणों के साथ कार्यालय में मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। मैं उसे पहचान न सकी, यद्यपि चेहरा देखा-भाला लगता था।
वह मुसकराकर कहने लगा, ‘‘मैडम, क्या आपने मुझे पहचाना ? शायद नहीं, क्योंकि सभी छात्रों को याद करना कैसे संभव हो सकता है। खिड़की से आप बाहर की दुनिया तो देख सकती हैं, किंतु बाहर से कमरे के अंदर तो सबकुछ नहीं देखा जा सकता।’’
मुझे उसका तर्क भा गया और लगा कि वह मेरा ही छात्र है, क्योंकि यह वाक्य मैं अपनी कक्षा में प्रायः कहा करती थी। फिर भी मैं अनुमान नहीं लगा सकी कि वह कौन है।
‘‘मैडम, मैं आपकी कक्षा में प्रायः विलंबं से आया करता था।’’
अब मेरी समझ में आया, ‘‘हाय हसन, कैसे हो तुम ? तुमसे मिले काफी समय हो गया है।’’ उसे देख मुझे प्रसन्नता हुई।
‘‘मैडम, मैं ठीक-ठाक हूँ और आपकी दी हुई कई सीखें याद है मुझे।’’
‘‘क्या यह डाटा आधारित प्रबंधन है ? या सी या पास्कल ?’’
‘‘इनमें से कोई नहीं मैडम, मैं नैतिक शिक्षा की सीख के संबंध में कह रहा हूँ।’’
मुझे नहीं पता कि मैंने कौनि सी नैतिक शिक्षा दी, यद्यपि सॉफ्टवेयर के पाठ पढ़ाते समय मैं कुछ कहानियाँ अवश्य सुनाती रही हूँ।
‘‘हसन, अब क्या कर रहे हो ?’’
उसके चेहरे पर निराशा की झलक थी।
‘‘मैडम, मैं गणित, भोतिकशाला एवं रसायनशाला की शिक्षा में लाभकारी सॉफ्टवेयर बेचता हूँ। यह छात्रों वह अध्यपकों के लिए बहुत ही उपयोगी सॉफ्टवेयर है। मुझे ज्ञात है कि आपका संस्थान हाई स्कूल स्तर पर अच्छी शिक्षा देता है। मैंने सोचा कि शायद आप इसमें रुचि लेंगी।’’
‘‘हसन इतने सालों तुम क्या करते रहे ?’’

मुझे पता है कि उसके सभी सहपाठी सॉफ्टवेयर उद्योग में ऊँचे ओहदों पर हैं। मेधाबी छात्र हसन शायद और भी अच्छा सिद्ध होता, किंतु इसके विरीत वह घर-घर जाकर सॉफ्टवेयर बेचने भर का छोटा सा कार्य कर रहा है।
‘‘मैंडम, आप जानती हैं कि मैं कॉलेज में बहुत ही अनियमित था। स्नातक शिक्षा के बाद भी मेरी वही स्थिति रही। देर से उठना और बहुत ही सुस्त रहना। माँ गुस्सा करतीं और मानसिक शांति खोती थीं। मैंने उनकी बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया। मैंने उन्हें ठीक से नहीं समझा। माँ के बहुत कहने के बाद मैंने नौकरी कर ली; किंतु मेरी वही आदत रही-दफ्तर देर से जाना, लोगों से वादे न निभाना और छोटी-से-छोटी जिम्मेदारी उठाने से आनाकानी करना। पूरा ज्ञान भी नहीं था। कॉलेज में पढ़ाई की नहीं। कक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने मात्र से ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता। केवल परीक्षा से पहले पढ़ना, संभावित प्रश्नों को रटना और बीच के अनेक पाठों को छोड़ना। मैं हमेशा सोचता कि बाद में देख लूँगा। बिना ज्ञान के कोई काम करना कठिन होता है। मैं मेहनती लोगों की खिल्ली उड़ाया करता था और उन्हें ‘नई’ कहा करता था। आज वही नए करोड़पति हो गए हैं। मेरे स्वभाव के कारण कार्यालय में मुझे कोई नहीं चाहता। कोई भी मालिक मेरे जैसे को काम पर नहीं रखता। मैं जो भी काम पकड़ता, वह छूट जाता। हताश होकर घर और दफ्तर में झगड़ना मेरा स्वभाव हो गया। अंततः मेरे पिताजी इतने निराश हो गए कि मुझे अलग रहने के लिए कहा गया। मैं हमेशा पूर्ण रूप से स्वतंत्र रहा, पर कोई अच्छी आदत नहीं पाली। आज मेरी दयनीय हालत मेरी अपनी आदतों का ही परिणाम है।’’
हसन के लिए मुझे दुःख हुआ। अपनी बुद्धि और अच्छा स्वभाव होने पर भी वह कुछ न कर सका।

‘‘हसन, तुम अपनी कमियाँ जानते हो। तुम सुधर सकते थे। अब तुम अच्छा जीवन व्यतीत कर सकते हो। जीवन में कभी भी सही रास्ता पकड़ा जा सकता है। निराश मत होओ। तुम हार गए हो, किंतु अभी भी इस युद्ध में विजय प्राप्त कर सकते हो।’’
‘‘मैडम, पुरानी आदतें छूटती नहीं।’’
‘‘किंतु हसन, आदतें बदलना संभव है। असंभव कुछ नहीं है। केवल इच्छा-शक्ति चाहिए। तुम्हें अपने में छुपी शक्ति का पता नहीं है। इतना याद रखो कि जब कोई बड़े-बूढ़े कहते हैं तो वे तुम्हारे भले के लिए ही कहते हैं, ताकि तुम अच्छा जीवन बिता सको। श्रेष्ठता या निपुणता अनायास प्राप्त नहीं होती। उसके लिए सतत प्रयत्न करते रहना पड़ता है।’’
मैं उसकी आँखों में आई चमक देख सकी।


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