मंगलसूत्र - वृंदावनलाल वर्मा Mangalsutra - Hindi book by - Vrindavanlal Verma
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मंगलसूत्र

वृंदावनलाल वर्मा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1998
पृष्ठ :179
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1736
आईएसबीएन :81-7315-253-5

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प्रस्तुत है उत्कृष्ट उपन्यास..

Mangalsutra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ऐतिहासिक उपन्यासों के कारण वर्माजी को सर्वाधिक ख्याति प्राप्त हुई । उन्होंने अपने उपन्यासों में इस तथ्य को झुठला दिया कि ऐतिहासिक उपन्यास में या तो इतिहास मर जाता है या उपन्यास बल्कि उन्होंने इतिहास और उपन्य़ास दोनों को एक नई दृष्टि प्रदान की है।

एक

उसका नाम था चंदन। गर्मियों की छुट्टियों में अपनी माँ के साथ वह अपने ननिहाल आया था। उसके दोनों मामा शादी के उपरांत अपनी-अपनी घर-गृहस्थी में व्यस्त थे। घर में उसका हमउम्र अन्य कोई बच्चा नहीं था। शाम के समय साफ-सुथरे कपड़े पहन कर वह अकेला ही घूमने निकल गया। गाँव के बाहर पोखर के पास जब वह पहुँचा तो वहाँ उसने एक लड़की को सिसक-सिसक कर रोते हुए पाया। लड़की उसकी हमउम्र प्रतीत होती थी। लड़की के पास जाकर वह बोला, ‘‘तुम क्यों रो रही हो ?’’ लड़की ने उसके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया। आँखे मतले हुए वह गाँव की ओर वापस जाने लगी। बीच-बीच में उसकी सिसकियों का स्वर भी वायुमण्डल में उभर उठता। उस युवती का अनुसरण करते हुए वह बोला, ‘‘मेरा नाम चंदन है। इस गाँव में मेरा ननिहाल है। गर्मियों की छुट्टियों में मैं यहाँ आया हूँ। क्या तुम भी स्कूल में पढ़ती हो ?’’ मुँह से कोई शब्द कहे बिना उसने अपना सिर हिला दिया मानो कहना चाह रही हो, ‘हाँ, मैं भी स्कूल में पढ़ती हूँ।’
‘‘छुट्टी के दिन अपने गाँव में कितना मजा आता था ? दिन-भर हम लोग खूब मौज-मस्ती करते थे। कल्लू के बगीचे से आम चुराकर चोरी-छिपे खाते थे। इस गाँव में तो मेरा कोई साथी नहीं है।’’

उसका यह कथन सुनकर वह लड़की ठिठक कर अपने स्थान पर खड़ी हो गई। कौतूहलपूर्ण दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए वह बोली, ‘क्या आम चुराते हुए तुम्हें डर नहीं लगता ?’’
‘‘किस बात का डर ?’’ आत्मविश्वास-भरे स्वर में उसने पूछा।
‘‘चोरी करते हुए रँगे हाथ पकड़ जाने का।’’
‘‘कल्लू के बगीचे में न जाने मैंने कितनी बार आम चुराये। आज तक एक बार भी नहीं पकड़ा गया।’’
‘‘मान लो आम चुराते हुए कल्लू तुम्हें पकड़ लेता है।’’
‘‘तब की तब देखी जायेगी। पकड़ लेने पर भी वह क्या कर लेगा ? एक-दो हाथ रसीद कर देगा या ज्यादा-से-ज्यादा घरवालों से शिकायत कर देगा।’’
‘‘क्या तुम्हें मार से डर नहीं लगता ?’’
‘‘अभी तक मार खाने की नौबत नहीं आई है। मेरी माँ मुझसे बहुत प्यार करती है। मैं उनका इकलौता बेटा हूँ। बाबू जी बाहर से बड़े सख्त हैं, परंतु भीतर-ही-भीतर वे भी मुझे बहुत प्यार करते हैं। क्या तुमने कभी किसी के बगीचे से आम चुराए हैं ?’’
‘‘नहीं। मुझे डर लगता है।’’
‘‘किस बात का डर ?’’
‘‘पकड़े जाने का।’’
‘‘आम की चोरी भला क्या चोरी होती है ? फिर हमें आम चुराते हुए कोई कैसे पकड़ सकता है। क्या इस गाँव में आम का कोई बगीचा है ?’’
‘‘एक नहीं बल्कि दो-दो हैं।’’

‘‘क्या आम चुराने में तुम मेरा साथ दोगी ? सच कहता हूँ कि इस खेल में बड़ा मजा आएगा।’’
‘‘अगर कहीं पकड़े गये तो ?’’
‘‘‘‘इसकी चिंता तुम मत करो। तुम बगीचे के बाहर खड़ी रहना। बगीचे के भीतर आम तोड़ने के लिए मैं जाऊँगा। तुम्हें एक काम करना होगा।’’
‘‘कौन-सा काम ?’’
‘‘अगर बगीचे की ओर आता हुआ कोई आदमी तुम्हें नजर आये तो जल्दी से मुँह से जोर की सीटी बजा देना। तुम्हारी सीटी की आवाज सुनते ही मैं वहाँ से नौ-दो ग्यारह हो जाऊँगा।’’
‘‘पर मुझे तो मुँह से सीटी बजानी नहीं आती।’’
‘‘यह बहुत सरल है। अपने दोनों होंठों को गोल कर भीतर से बाहर को हवा निकालो। खुद-ब-खुद सीटी बज जाएगी।’’
उसके बताये अनुसार तीन-चार बार उसने सीटी बजाने का अभ्यास किया, परन्तु असफल रही।
‘तुम्हें घर में सीटी बजाने का बार-बार अभ्यास करना चाहिए। शीघ्र ही मेरी तरह ही तुम भी सीटी बजाने लग जाओगी।’’ यह कहते हुए उसने पूरे जोर में मुँह से हवा में सीटी की आवाज निकाली। उसकी ओर प्रशंसा-भरी दृष्टि से देखते हुए वह बोली, ‘‘मुझे सीटी बजाना नहीं आता। फिर मैं तुम्हें सचेत कैसे करूँगी ?’’
‘‘क्या तुम्हें उल्लू की तरह आवाज निकालना आता है ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘लोमड़ी की ?’’
‘‘वह भी नहीं।’’
‘‘कुत्ते की ?’’

‘‘उसकी बात का कोई उत्तर दिये बिना उसने मुँह से कुत्ते के भौंकने की आवाज निकालना शुरू कर दिया। उसे आश्वस्त करता हुआ वह बोला, ‘‘यह ठीक है। तुम्हारी यह आवाज सुनकर मैं समझ जाऊँगा कि हमारा कोई दुश्मन आ रहा है। मैं वहाँ से सरपट भाग जाऊँगा।’’
‘‘भागने के बाद तुम मुझसे कहाँ मिलोगे ?’’
‘‘इस बात को तय करना तो मैं भूल ही गया था। तुम सामने वाले इस पेड़ के चबूतरे पर बैठ जाना।’’
‘न बाबा, रात के अँधेरे में पेड़ के चबूतरे पर बैठने से मुझे भय लगता है।’’
‘‘किस चीज का भय ?’’
‘‘मेरा भइया कहता है कि रात के समय मेड़ों के ऊपर आत्माएँ रहती हैं। जिस किसी इंसान से वे एक बार चिपक जाती हैं, वह इंसान पागल हो जाता है।’’
‘‘मैं इस बात को नहीं मानता। रात कई बार आम चुराने के लिए मैं अपने दोस्तों के साथ पेड़ पर चढ़ा हूँ। खैर, उस बात को जाने दो। मैं एक काम करूँगा। इस पेड़ के तने में जो सुराख है उसके भीतर तुम्हारे हिस्से के आम रख दूँगा। सुबह आकर तुम उन आमों को ले जाना।’
‘‘मेरे यहाँ पहुँचने से पहले और कोई भी तो उन आमों को ले जा सकता है।’’

‘‘किसी को आमों के बारे में पता कैसे चलेगा ? सुराख के मुहाने पर मैं एक पत्थर रख दूँगा।’’ उसके इस समाधान से संतुष्ट होकर वह बोली, ‘‘हाँ, यह ठीक है।’’
‘‘पहले यह तो बताओ कि आम के ये बगीचे कहाँ हैं ?’’
‘‘एक बगीचा सूरज बन्धुओं का है। वे लोग बड़े खतरनाक किस्म के लोग हैं। गाँव के सभी लोग उनसे डरते हैं।’’
‘‘दूसरे बगीचे के मालिक कौन हैं ?’’
‘‘उनका नाम चाँद बंधु है। वे लोग इतने बुरे नहीं हैं। फिर भी चोरी होने पर वे भी नाराज होकर मार-पिटाई कर सकते हैं।’’ उसका यह कथन सुनकर मुस्कराते हुए वह बोला, ‘‘मेरा नाम चंदन है। कोई माई का लाल मुझे पकड़ कर तो देखे।’’
उसकी बहादुरी के बारे में वह धीरे-धीरे आश्वस्त होने लगी थी।
‘‘क्या तुम्हें सूरज बन्धुओं के बगीचे का रास्ता मालूम है ?’’
स्वीकृति में उसने अपना सिर हिला दिया।
‘‘चलो, वहीं चलते हैं।

बड़ी सतर्कता से वे दोनों उस बगीचे की ओर चलने लगे। जब वे दोनों बगीचे के निकट पहुँच गये तो उसे एक स्थान पर खड़े रहने के लिए कह कर उसने बगीचे के चारों ओर की परिक्रमा की। तत्पश्चात् उसके पास आकर वह बोला, ‘‘मैंने इस जगह की पूरी तरह छान-बीन कर ली है। डरने की कोई बात नहीं है। तुम्हें अपनी वह बात याद है न ?’’
‘‘हाँ।’’ सिर हिलाकर उसने उत्तर दिया। गले में पहना हुआ तावीज चूमते हुए वह बोला, ‘‘जय बजरंग बली की। खतरे का आभास होते ही तुम अपने मुँह से वह आवाज निकाल देना। तुम्हारी आवाज सुनकर मैं सारी बात समझ जाऊँगा।’’ यह कह कर वह पीछे के रास्ते उसकी दृष्टि से ओझल हो गया।
गोधूली बेला होने के कारण अँधेरे की परछाइयाँ धरती पर गोचर होने लगी थीं। झींगुरों की आवाज सुनकर उसका मन भय से दहल उठा। हवा चलने के कारण पेड़ों की टहनियाँ हिल रही थीं। सायंकाल के उस झुरमुट अँधेरे में अपने अवचेतन मन में उसे ऐसा लगा मानो कई लोगों ने उसे एकाएक चारों ओर से घेर लिया हो। वे लोग चिल्ला कर कह रहे हो, ‘चोर को पकड़ लिया है।’
‘चोर मैं नहीं बल्कि चंदन है।’

‘यहाँ कोई चन्दन नहीं है ! चोरी करते हुए हमने तुम्हें पकड़ा है। सजा भी तुम्हें मिलेगी।’
‘मैं सच कहती हूँ कि मेरे पास चोरी के आम नहीं है। आप चाहें तो मेरी खानातलाशी ले सकते हैं।’
‘हो सकता है तुमने आम नहीं चुराये हों। परन्तु आम चुराने का तुम्हारा इरादा तो था।’
‘आम चुराने के लिए चंदन ने मुझे कहा था।’
‘हम किसी चंदन को नहीं जानते। तुम्हारा वह चंदन कहाँ है ?’
उसका एक मन हुआ कि वह उन्हें बता दे कि वह आम चोरी करने के लिए बगीचे के भीतर गया है।
उसके यह बताने पर ये लोग उसे पकड़ लेंगे। हो सकता है उसकी जमकर पिटाई भी कर दें।

चंदन की पिटाई की सम्भावना से वह सिहर उठी। इस बीच धूल-भरी आँधी चलने लगी थी। अपनी ओर आते हुए किसी आदमी की आहट उसे अपने कानों में सुनाई देने लगी। उसका एक मन हुआ कि मुँह से आवाज निकाल कर वह चंदन को सचेत कर दे। उसकी उस आवाज को सुनकर वह व्यक्ति उस पर भी तो सन्देह कर सकता था। अपने भीतर उमड़ते हुए भय से विचलित होकर वह तेजी से अपने घर की ओर बढ़ने लगी थी। घर पहुँच कर उसने चैन की साँस ली। उसे देखकर माँ बोली, ‘‘आगे से शाम को जल्दी घर आ जाया करो।’’ कमरे के भीतर आने पर उसकी नजर चारपाई पर लेटे हुए अपने भाई पर पड़ी। उसके घुटने पर चोट थी और दर्द से वह कराह रहा था। माँ ने उसके घुटने पर हल्दी का लेप लगा रखा था। मन-ही-मन वह अपने उस भाई से रुष्ट ही नहीं बल्कि क्रोधित भी थी। परन्तु उसका लहूलुहान घुटना देखकर उसका मन पसीज गया। उसके निकट आकर वह बोली, ‘‘तुम्हें यह चोट कैसे आई ?’’
‘‘माँ से कुछ मत कहना।’’
‘‘मैं माँ को सब कुछ बता दूँगी।’’
‘‘माँ को तुम क्या बताओगी ?’’

‘‘तुम अपने साथियों के साथ चाँद वालों के बगीचे में आम चोरी करने गये थे। वहीं पर पेड़ से फिसल कर नीचे गिर जाने के कारण तुम्हें यह चोट लगी।’’
‘‘माँ को यह सब बताकर तुम्हें क्या मिलेगा ?’’
‘‘मरे मन को शांति मिलेगी। अपने साथ तुम मुझे क्यों नहीं ले गये थे ?’’
‘‘पहरेदार के आने पर तुम तेजी से नहीं भाग सकती हो। मुझे तुम्हारे पकड़े जाने का डर था।’’
‘‘क्या तुम मुझे बुद्धू समझते हो ?’’
‘‘मेरी बहन तो चतुर है। तुम्हारे लिए मैं बगीचे से अमिया लाया हूँ। आगे से मैं तुम्हें भी अपने साथ ले जाया करूँगा।’’
‘‘सच कह रहे हो ?’’
‘‘हाँ।’’
‘‘अमिया कहाँ रखी हैं ?’’
‘‘पेड़ के नीचे छिपाई है। सुबह तुम्हें दे दूँगा।’’
इस बात पर उन दोनों में समझौता हो गया। खाना खाने के पश्चात् वे दोनों अपने-अपने बिस्तर पर लेट गये। बिस्तर पर लेटे-लेटे उसके मन में विचार आया, ‘क्या चंदन ने भी बगीचे से अमिया तोड़ी होंगी ?’
‘उस बगीचे वाले लोग बड़े जालिम हैं। उनके बगीचे में एक नहीं बल्कि तीन-तीन पहरेदार रहते हैं। कहीं उन्होंने चंदन को पकड़ तो नहीं लिया होगा ?’

‘पकड़ने पर वे उसकी जमकर धुनाई भी तो कर सकते हैं। अपनी इस दुर्गति के लिए वह उसे ही जिम्मेवार मानेगा।’
‘परन्तु मैं क्या कर सकती थी ?’
‘मुझे घर आने से पहले-पहले मुँह से वह आवाज निकालनी चाहिए थी। ऐसा करने पर मेरा फर्ज पूरा हो जाता। इसके आगे किसी भी बात के लिए मेरा कोई जिम्मा नहीं होता।’
रात को इस विषय पर सोचने के कारण कई बार उसकी नींद उचटी। सुबह उठने पर जब घर से बाहर गई तो उसे देखकर उसका भाई उसे एक कोने में ले गया। उसके हाथ में एक अमिया थमाते हुए वह बोला-‘‘मैं नमक भी अपने साथ लाया हूँ।’’ बड़े ध्यान से उसने उस अमिया की ओर देखा। मुँह बनाते हुए वह बोली, ‘‘यह भी क्या अमिया है ? इसका स्वाद भी तो कसैला होगा। इस प्रकार की अमिया मुझे नहीं चाहिए।’’

‘‘चाँद वालों के बगीचे को न जाने इस साल क्या हो गया है ? आँधी के कारण सारे बौर झड़ गये हैं। सारा बगीचा सूनसान पड़ा है। इसी से अबकी बार वहाँ कोई पहरेदार भी नहीं है। बगीचे के भीतर जाने के लिए कोई रोक-टोक नहीं है। क्या तुम मेरे साथ आज वहाँ चलोगी ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘तुम स्वयं ही कहती हो कि मैं तुम्हें अपने साथ नहीं ले जाता। आज जब मैं कह रहा हूँ तो तुम खुद ही इन्कार कर रहीं हो।’’
‘‘मैं चाँद वालों के बगीचे में नहीं बल्कि सूरज वालों के बगीचे में जाना चाहती हूँ।’’
‘‘वहाँ चोरी से जाना खतरे से खाली नहीं है। तीन-तीन पहरेदारों के अलावा वहाँ एक कुत्ता भी रहता है।’’
‘‘पर वहाँ तो हर पेड़ पर मोटी-ताजी अमिया हैं।’’
‘‘वहाँ घुसने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता।’’
‘‘क्या सभी को तुम अपनी तरह डरपोक समझते हो ?’’
‘‘इसी बात पर शर्त लग जाये। अगर तुम मुझे इस बगीचे से अमियाँ तोड़ कर दिखा दो तो मैं तुम्हें इनाम दूँगा।’’
‘‘कौन-सा इनाम ?’’

‘‘इनाम बाद में तय करेंगे। पहले तुम अमियाँ तो तोड़ कर दिखाओ।’’
‘‘पहले इनाम की बात करो। अमियाँ तो तोड़ी-तुड़ाई रखी हैं।’’
‘‘यह तुम क्या कह रही हो ?’’
‘‘मैं सही कह रही हूँ।’’
उसकी ओर अविश्वास-भरी दृष्टि से देखते हुए वह बोला, ‘‘अगर तुम्हारी बात सही निकली तो मैं तुम्हें अपना नया मफलर दे दूँगा। तुम्हें वह मफलर बहुत पसंद है।’’
‘‘तुम्हारी यह शर्त मुझे स्वीकार है। कल रात मैंने उस बगीचे से अमियाँ तोड़ी थीं।’’
‘‘यह कभी नहीं हो सकता। अगर तुम्हारा यह कहना सत्य है तो तुम्हारी तोड़ी हुई वे अमियाँ कहाँ हैं ?’’
‘‘मैंने छिपाकर रखी हैं।’’
‘‘पर कहाँ ?’’
‘‘यह नहीं बताऊँगी।’’
‘‘शर्त जीतने के लिए वे अमियाँ तुम्हें मुझे दिखानी होंगी।’’
‘‘तुम्हारी यह बात मुझे स्वीकार है।’’

इस वार्तालाप के उपरान्त वे दोनों अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गये। इन अमियों को लेकर वह संशय की स्थिति में थी।
‘क्या कल रात चंदन ने उस बगीचे से अमियाँ तोड़ी होंगी ? अगर उसने तोड़ी होंगी तो उस वृक्ष के तने की खाली जगह में उसे अपना हिस्सा अवश्य मिल जायेगा।’ इस आशा से प्रोत्साहित होकर वह अपने भाई की नजर बचाकर चुपचाप उस पेड़ की ओर चली गई। वहाँ पहुँचने पर धड़कते दिल से उसने तने के भीतर खाली जगह में हाथ डाला। उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहा। वहाँ एक या दो नहीं बल्कि पाँच अधपके आम रखे थे। उन आमों को देखकर वह प्रसन्नता से विह्वल हो उठी। चुनरी में उन आमों को लपेटकर वह घर वापस लौट रही थी कि अपनी ओर आते हुए चंदन पर उसकी दृष्टि पड़ी। उसे देखकर हर्ष से वह बोला, ‘‘कल रात सही समय पर तुमने मुझे बचा लिया। वरना वह खूँखार पहरेदार मुझे पकड़ लेता।’’
‘‘यह तुम क्या कह रहे हो ?’’ आश्चर्य-भरे स्वर में वह बोली।

‘‘कुत्ते भौंकने की तुम्हारी आवाज सुनते ही मैं तेजी से पेड़ से नीचे उतर कर झाड़ियों में छिप गया। उस पहरेदार की बड़ी-बड़ी मूँछें देखकर उस समय मुझे सचमुच में ही डर लग गया था।’’
‘‘क्या तुमको भी डर लगता है ?’’
‘‘इसमें अनहोनी बात क्या है ? डर तो सभी को लगता है। इस डर को भगाने के लिए जी कड़ा करना पड़ता है।’’
‘‘क्या जी कड़ा करने से डर भाग जाता है ?’’
‘‘हाँ।’’
‘‘मैं भी अपना जी कड़ा करना चाहती हूँ।’’
‘‘क्या कल रात तुम भी डर गई थीं ?’’
‘‘हाँ।’’

‘‘तब तो तुम्हें भी मेरी तरह जी कड़ा करना होगा।’’
‘‘वह कैसे ?’’
‘‘मैं प्रतिदिन सुबह नहाने के पश्चात् हनुमान चालीसा का पाठ करता हूँ। हनुमान के जो भक्त होते हैं उनका कोई भी बाल बाँका नहीं कर सकता।’’
‘‘मेरे पास तो हनुमान चालीसा नहीं है।’’
‘‘मेरे ननिहाल में है। मैं तुम्हें लाकर दे दूँगा। अगर तुम भी हर रोज इसका पाठ करोगी तो धीरे-धीरे तुम्हारा जी भी कड़ा हो जायेगा।’’
जाने से पहले उसने पूछा, ‘‘क्या आज शाम तुम फिर उस बगीचे में जाओगे ?’’
‘‘आज शाम मुझे अपने नाना के साथ निमंत्रण में जाना है। कल शाम हम दोनों जायेंगे। वहाँ जाने में अब खतरे वाली कोई बात नहीं है।’’
‘‘वह कैसे ?’’

‘‘झाड़ियों से लगा ही आम का एक पेड़ है। उस पेड़ की टहनियाँ आमों से लदी हैं। भीतर जाने के लिए झाड़ियों में एक छोटा रास्ता भी है। क्या तुम्हें पेड़ पर चढ़ना आता है ?’’
‘‘पेड़ पर चढ़ना तो आता है परन्तु गिरने का भय लगता है।’’
‘‘हनुमान चालीसा के हर रोज पढ़ने पर तुम्हारा यह डर जाता रहेगा। कल शाम तुम मुझे कहाँ मिलोगी ?’’
‘‘इसी जगह। गोधूली बेला में मैं यहाँ आ जाऊँगी।’’ यह कहकर वह आगे बढ़ गई। अभी कुछ ही कदम चली थी कि उसका स्वर सुनकर वह रुक गई। तेज कदमों से चलता हुआ वह उसके पास आकर वह बोला, ‘‘तुमसे एक बात पूछना तो मैं भूल ही गया।’’
‘‘कौन-सी बात ?’’
‘‘मेरा नाम चंदन है।’’
‘‘मैं जानती हूँ।’’
‘‘पर तुम्हारा नाम क्या है ?’’
‘तुम मेरा नाम क्यों जानना चाहते हो ?’’
‘‘तुम्हारा नाम न जानने पर मैं तुम्हें कैसे पुकारूँगा ?’’
उसकी आँखों में आँखें डालते हुए वह बोली, ‘‘चन्द्रमुखी।’’
‘‘तब तो मेरा नाम चंदन नहीं बल्कि चंद्र होना चाहिए था।’’
‘‘पर क्यों ?’’

‘‘चन्द्रमुखी याने जिसका मुखड़ा चन्द्र की तरह हो। अगर मेरा नाम चंद्र होता तो तुम्हारा चेहरा मेरी तरह हो जाता।’’
‘‘क्या तुम्हें अपना चंदन नाम पसंद नहीं है ?’’
‘‘पसंद तो है। मैं तो तुम्हारे नाम के साथ अपना नाम जोड़ने की सोच रहा था।’’
‘‘इससे क्या अन्तर पड़ता है ?’’
‘‘दिल को अच्छा लगता है।’’
‘‘तब तो मैं तुम्हें चन्दन नहीं बल्कि चन्द्र कहकर पुकारूँगी।’’
‘‘और मैं तुम्हें चन्द्रमुखी नहीं बल्कि चन्द्रा कहकर पुकारूँगा।’’
‘‘अगर तुम्हें ऐसा करना अच्छा लगता है तो मुझे कोई एतराज नहीं है।’’
‘‘आज के उपरांत मैं चंद्र और तुम चंद्रा।’’
इस समझौते के उपरांत वह वहाँ से चली गई। अपनी तमाम सतर्कता के उपरांत वह इस बात से बेखबर थी कि शर्त लग जाने के उपरांत चोरी-छिपे उसका भाई उसका पीछा कर रहा है। ज्योंही वह आगे बढ़ी उसके सामने उसका भाई खड़ा था।
‘‘चन्द्रमुखी, मैं अपनी हार स्वीकार करता हूँ। इन आमों को देखकर कोई भी कह सकता है कि ये आम सूरज वालों के बगीचे के ही हैं।’’
‘‘तब तो तुम्हें मेरी बात का यकीन हो गया होगा।’’

‘‘हाँ, वह तो है। जिस लड़के से तुम बातें कर रही थीं, वह कौन है ?’’ आज से पहले उसे मैंने कभी इस गाँव में नहीं देखा।’’
‘‘गर्मी की छुट्टियों में वह अपने ननिहाल आया है।’’
‘‘तुम उसे कैसे जानती हो ?’’
‘‘जैसे टिंकू, पिंकू तथा बबलू तुम्हारे मित्र हैं, उसी तरह वह मेरा मित्र है। तुम्हारे दोस्तों से वह कई गुना अच्छा है।’’
‘‘तुम ऐसा क्यों कहती हो ?’’
‘‘अपने दोस्तों के कहने पर ही तुम मुझे अपने साथ नहीं ले जाते। उल्टा डाँट कर भगा देते हो। यह न तो मुझे डाँटता है और न ही डराता है।’’
‘‘परन्तु उसका नाम क्या है ?’’
उसके मुख से ‘चंदन’ शब्द निकलने ही वाला था कि उसे उससे हुए अपने समझौते की याद आ गई। अपनी भूल सुधारते हुए वह बोली, ‘‘उसका नाम चंद्र है।’’ पुलकित मन से वह अपने भाई के साथ घर पहुँची। खुले आम अमिया लेकर वह घर नहीं जा सकती थी। ऐसा करने पर उसे माँ की डाँट-डपट सुननी पड़ती। उसने चुपचाप पिछवाड़े में रखे भूसे के ढेर में उन अमियों को छिपा दिया।

चन्द्रमुखी की इस विजय ने उसके दिल में चन्द्र के प्रति ईर्ष्या-भाव भर दिया। वह अपने मन में बेचैनी महसूस कर रहा था। स्कूल में छुट्टियाँ चल रही थीं। खाना खाने के पश्चात् जब वह घर से बाहर जाने लगा तो माँ बोली, ‘‘नूतन, तुम कहाँ जा रहे हो ?’’
‘‘माँ, मित्र के घर किताब लेने जा रहा हूँ। शीघ्र की लौट आऊँगा।’’
मित्र के घर पर ही उनकी आगामी व्यूह-रचना बनी। एक बाहरी लड़का उनके गाँव में हीरो बनकर घूमे, उनसे यह कैसे सहन हो सकता था ! पूरी बात सुनने के पश्चात् उसका मित्र अजय बोला, ‘‘उसकी हेठी करने के लिए हमें कुछ-न-कुछ करना होगा।’’
‘‘पर क्या किया जा सकता है ?’’
काफी सोच-विचार के उपरांत इस विषय में उन्होंने एक गुप्त निर्णय लिया।
शाम होते-होते वे सभी दोस्त उसकी ताक में बैठ गये। जब चन्दन अपने घर से बाहर निकला तो उसे घेरते हुए नूतन बोला, ‘‘तुम आम-चोर हो।’’

‘‘परन्तु तुम लोग भी तो आम चुराते हो। यह अलग बात है कि मैंने सूरज वालों के बगीचे से आम चुराये हैं और तुम लोग चाँद वाले बगीचे से आम चुराते हो।’’
‘‘ये दोनों बगीचे हमारे गाँव वालों के हैं। तुम एक बाहरी लड़के हो। इन बगीचों पर तुम्हारा क्या हक है ?’’
‘‘इस गाँव के होने के नाते तुम्हारा इन बगीचों पर हक नहीं हो जाता। अगर हक होता तो तुम्हें वहाँ से आम चुराने की क्या आवश्यकता होती ?’’
‘‘इसका निर्णय करने वाले तुम कौन होते हो ?’’

नूतन का हाथ पकड़ते हुए वह बोला, ‘‘मैं तुमसे उलझना नहीं चाहता। अच्छा होगा जो तुम मेरे रास्ते से हट जाओ। तुम्हारे सभी साथियों से मैं निपट लूँगा।’’
‘‘क्या तुम्हें नूतन से डर लगता है ?’’ उनमें से एक लड़का बोला।
‘‘मैं वीर बजरंग बली हनुमान का भक्त हूँ। मैं किसी से भी नहीं डरता।’’
‘‘फिर नूतन को अपने रास्ते से हटने के लिए क्यों कह रहे हो ?’’
यह चंद्रा का भाई है।’’
‘‘कौन चंद्रा ?’’
उस लड़के का यह प्रश्न सुनकर अपनी भूल उसकी समझ में आ गई।
‘‘मैं चन्द्रमुखी की बात कर रहा हूँ।’’
‘‘वह तुम्हारी क्या लगती है ?’’

उस लड़के की आवाज में छिपे व्यंग्य को समझकर उसने नूतन को एक ओर हटाया।
उस लड़के का कालर पकड़कर उसके गालों पर जोर से दो थप्पड़ रसीद कर दिये। उसका प्रतिरोध करने के लिए उसके अन्य साथी भी आगे आ गये। नूतन अपने स्थान पर यथावत् खामोश खड़ा था।
देखने-सुनने में वह ज्यादा ताकतवर नहीं दिखता था, परन्तु उसके बदन में गजब की चुस्ती-फुर्ती थी। देखते-देखते उसने सभी को धूल चटा दी। वहाँ से जाने से पूर्व वह नूतन से बोला, ‘‘तुमसे मेरी कोई दुश्मनी नहीं है। मैं तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ। अगले कल चन्द्रा के साथ मैंने एक बार फिर सूरज वालों के बगीचे से आम तोड़ने का प्लान बनाया है। अगर तुम चाहो तो हमारे साथ चल सकते हो। अब की बार बड़े-बड़े फ्के आम तोड़ेंगे।’’
‘‘उस बगीचे में तीन-तीन पहरेदार तथा एक खूंखार कुत्ता भी रहता है।’’

‘‘इन सब बातों का जिम्मा तुम मुझ पर छोड़ दो। मेरे रहते हुए तुम लोगों का बाल भी बाँका नहीं होगा। अगर तुम्हें डर लगता हो तो तुम बाग के बाहर ही खड़े रहना। पेड़ पर चढ़कर मैं आम तोड़ूँगा।’’ एक ओर वह उसकी ओर मैत्री का हाथ बढ़ा रहा था तो दूसरी ओर उसके पिटे हुए दोस्त उसकी ओर कौतूहलपूर्वक उसकी ओर देख रहे थे। उसके लिए शीघ्र ही कुछ-न-कुछ निर्णय लेना आवश्यक था। सोच-विचार करने के उपरांत वह बोला, ‘‘मैं तुम्हारे साथ वहाँ जाऊँगा, चन्दन।’’

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