न्याय अन्याय के एकांकी - गिरिराजशरण अग्रवाल Nyaya Anyaya ke Ekanki - Hindi book by - Girirajsharan Agarwal
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न्याय अन्याय के एकांकी

गिरिराजशरण अग्रवाल

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1742
आईएसबीएन :81-7315-181-4

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प्रस्तुत है न्याय अन्याय के एकांकी...

Nyay Anyay Ke Ekanki

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


‘‘मेरा असली नाम है चौधरी धरमचंद।’’ ‘‘असली नाम ! क्या मतलब ?’’
‘‘वैसे तो मेरा, जो है सो है, हर मुकदमें में नया नाम होता है, पर असली नाम धरमचंद है।’’
‘‘चौधरी धरमचंद, मुझे एक झूठी गवाही दिलवानी है।’’
‘‘झूठी ? तो कोई और घर देखिए। मैं तो हमेशा सच्ची गवाही देता हूँ। चाहे मौके पे रहूँ या न रहूँ, पर गवाही सच्ची देता हूँ। भगवान् झूठ न बुलाए, आज तक सैकड़ों गवाहियाँ दी हैं, कोई भी झूठी साबित नहीं हुई।’’
इसी संकलन में पढ़ें

आँखों पर काली पट्टी बाँधे,
हाथों में तराजू लिए खड़ी
न्यायदेवी की अंधी तलवार के शिकार
आम आदमी की व्यथा-कथा को,
नाटकीय और मनोरंजक परिदर्शन में कहते

न्याय-अन्याय के एकांकी

पेशेवर गवाहों और निर्जीव प्रमाणों के सहारे
न्याय का नित नया नाटक रचनेवाली
आधुनिक विदेशी न्याय-प्रणाली का
कच्चा चिट्ठा पेश करते हैं।

न्याय-अन्याय के एकांकी


मरती-जीती फाइलें


इस वक्त मैं जहाँ हूँ, यह वह सड़क है, जो न्याय चाहने वाली जनता और न्याय देने वाले वर्ग के बीच शहर की भरी-पूरी आबादी में एक विभाजन-रेखा स्थापित करती है।
आज रविवार है और वर्षा की एक सुहानी सुबह का ब्रेकफास्ट टाइम ! रात की तेज वर्षा ने वातावरण को ठण्डा बना दिया है। सड़कें धुली-धुली-सी हैं। सड़कों के दोनों ओर खड़े पेड़-पौधे रात में नहा धोकर नये-नये ताजा-ताजा से दिखाई दे रहे हैं।
दाईं ओर देखता हूँ तो एक कोठी के अहाते में बरसाती गुलाब के फूल हवा की हलकी लहरों में धीरे-धीरे झूल रहे हैं। मैं कुछ और आगे बढ गया हूँ। अभी किसी आवास के द्वार पर लगी वह ‘नेम प्लेट’ दिखाई नहीं दी है, जहाँ मुझे जाना है। पीछे से आती हुई एक आहट पर घूमकर देखता हूँ तो दूर तक लम्बी-काली सड़क सलेटी रंग की पथरीली चादर ओढ़े लेटी है। मैं मुड़कर सड़क की तरफ देखता हूँ। सड़क कुछ कहती नहीं है।

लेकिन सड़क बहुत कुछ कहती है। सोचता हूँ, यह सड़क ही है जो मुझे बताती है कि आदमी इसके एक छोर से दूसरे छोर तक विभिन्न श्रेणियों में बँटा खड़ा है। एक तरफ अधिकार हैं, दूसरी तरफ अधिकारहीनता ! एक तरफ न्यायविद् और न्यायाधीश हैं, दूसरी ओर आशा-निराशा में भरी वे आँखें, जिन्हें संरक्षण चाहिए, कानून का सहारा चाहिए, और जिन्हें चाहिए एक ऐसा कवच, जो समस्त कानूनी व्याख्याओं का उपयोग कर असत्य को सत्य की भाँति सुरक्षित कर सके।
अभी सूरज अपनी दिन भर की यात्रा में आसमान का बहुत छोटा भाग ही तय कर पाया है। धूप घने वृक्षों की शाखाओं और पत्तियों से गुजरकर रात की ठण्डी भीगी धरती का प्रेमपूर्वक आलिंगन कर रही है। वातावरण में वह उमस नहीं है, जो बरसात के मौसम में वर्षा होने से पूर्व होती है। बादलों के टूटे-बिखरे टुकड़े आसमान पर इधर-उधर तैर रहे हैं। एक-दूसरे की बाँहों में बाँहे डालकर ये फिर कब एकाकार होंगे, मैं नहीं जानता। मैं यह भी नहीं जानता कि बादल एक-दूसरे के साथ जुड़कर फिर कब भीगी चादर निचोड़कर धरती की चादर भिगोएँगे ? लेकिन मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।
हाँ ! शायद बादल मुझे बहुत अच्छे लगते हैं

बादल और इस बस्ती के बीच कोई अन्तर नहीं करते, जिसे मैं पीछे छोड़ आया हूँ। वर्षा की फुहार उसी उदारता से अधिकार हीन व्यक्तियों के घरों में खड़ी उस कँटीली बेरी को भी स्नान कराती है, जिस उदारता से भीनी-भीनी चमेली के उस पौधे को सींचती है, जिसकी महक रात की निस्तब्धता में इस कॉलोनी के निवसियों को ही नहीं, उन व्याक्तियों की बासी आत्माओं को भी सुगंधित कर देती है, जो यदा-कदा इस ओर से गुजरने के लिए विविश हो जाते हैं।
मुझे सूरज भी अच्छा लगता है, क्योंकि उसका प्रकाश बाँटा नहीं जा सकता, विभाजित नहीं किया जा सकता। यहाँ भी सूरज की धूप है, जिसे मैं उन लोगों की कॉलोनी में छोड़ आया हूँ जिन पर ज्ञान और कानून की रोशनी के द्वार अब तक खुल नहीं पाये हैं। मुझे रात की कालिमा भी अच्छी लगती है क्योंकि इस अन्धकार में कोठियाँ और झोपड़ियाँ सुख और शान्ति की एक ही चादर ओढ़कर सो जाती हैं।

मुझे हवा भी अच्छी लगती है क्योंकि मेरे नथुनों से लेकर विशिष्ट व्यक्तियों के नथुनों तक उसकी प्रवृत्ति बदलती नहीं है। जिस हवा में इस वक्त मैं साँसे ले रहा हूँ, उसी हवा में कानून बनाने वाले और कानून का सहारा लेने वाले, दोनों एक साथ साँस ले रहे होगें।
प्रकृति उन लोगों के लिए भी अपनी सुख-सुविधाओं के द्वार बन्द नहीं करती जो पापी हैं, अत्याचारी हैं, जिन्होंने अपने ही जैसे अन्य व्यक्तियों के साथ अन्याय किया है–क्यों ? सोचता हूँ, क्या प्रकृति उन्हें एक बार और अवसर नहीं दे रही है अपने सुधार का, अपने-आपको परिवर्तित करने का ? यह उदारता नहीं है प्रकृति की ? क्षमादान नहीं है यह ? यह तो एक समायिक छूट है, अपने-आपकों जाँचने परखने की, स्वयं अपना निरीक्षण करने की-यह सोचने की कि आदमी और आदमी के बीच मानवता का रिश्ता और सन्तुलन किस तरह बना रह सकता है।
शायद कानून हमें शिक्षा नहीं देता, अनुशासन नहीं सिखाता, वह तो मात्र हम पर अंकुश लगाता है कि उन सीमाओं से बाहर से नहीं निकलना है, जिनके छोर अराजकता से मिल जाते हैं।
आदमी के समाज को कानून की जरूरत है।

लेकिन पशुओं के समाज को कानून की कोई आवश्यकता नहीं, सोचता हूँ तो आश्चर्य की एक तरंग मेरे मस्तिष्क से उभरती हुई रीढ की हड्डी में सनसनाने लगती है।
सोचता हूँ कि मैं ही क्या, सम्भवतः संसार का कोई भी आदमी ऐसा नहीं कर सकता है, जिसने हाथियों के समूहों में या भेड़ियों के समाज में कभी निषेधाज्ञा लागू होते देखी हो, या निषेधाज्ञा का उल्लंघन करते हुए इनमें से किसी को कानून के हवाले करते देखा हो।
क्या आदमी पशु-पक्षियों से भी अधिक मूर्ख है जिसे शिक्षा और सभ्यता के ऊँचे शिखर पर पहुँचकर भी कानून के उस सहारे की जरूरत है, जिसकी उँगली थामकर वह अपना सन्तुलन बनाये रख सके और उन राहों पर न भटक जाए जो असामाजिकता और अराजकता की तरफ जाती हैं।
मैं धीरे-धीरे चलता हुआ मुख्य चौराहे के उस टरमिनल तक पहुँच गया हूँ, जहाँ से आदमी और वाहन सभी अपनी-अपनी दिशाओं में मुड़ जाते हैं। चौक के बीचोंबीच राष्ट्रपिता माहात्मा गाँधी की आदमकद मूर्ति स्थापित है। मैं ध्यान से उसकी ओर देखता हूँ-

शान्ति,
धैर्य,
साहस और
एक अपार सहनशक्ति का भाव लिये उसका चेहरा प्रभात की धूप में जगमग कर रहा है। बहुत-से लोग हैं, जो उस के नीचे से गुजर रहे हैं, लेकिन कोई भी उसकी तरफ नहीं देखता। यह मूर्ति अब ऐसी अकेली है, जैसे आवश्यकताएँ पूरी होने के बाद वस्तुएँ अपनी उपयोगिता खो देती है। जैसे बच्चा उन पुस्तकों को भूल जाता है, जिससे उसे जीवन का पहला पाठ पढ़ाया गया था।
सोच का एक गहरा सागर है, जिसमें कोई अनजानी शक्ति मुझे बार-बार डुबो देती है और मैं उभर-उभरकर बाहर निकल आता हूँ।
अचानक एक जबरदस्त छनाका !
मैं चौंककर आवाज की तरफ ध्यान देता हूँ।
एक साइकिल-सवार सामने से आते हुए स्कूटर से टकरा गया है। साइकिल सवार और स्कूटर चालक एक-दूसरे से भिड़ गए हैं। लगता है, किसी को कोई खास चोट नहीं आई है। लेकिन यह लोग जो एक दुर्घटना से बच गए हैं, एक और दुर्घटना को आमन्त्रित करने पर तुले हैं।

शोर-
गाली-गलौज,.
हाथापाई,
इच्छा होती है कि आगे बढ़कर इनसे कहूँ-मैंने भेड़ियों और जंगली कुत्तों का समाज देखा है- वहाँ ऐसा टकराव नहीं होता। वे प्राणी इस प्रकार एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था नहीं होते।
तुम सिद्ध करो कि तुम उनसे श्रेष्ठ हो।
तुम साबित कर रहे हो कि तुम उनसे अच्छे नहीं हो !
मैं अभी और आगे नहीं बढ़ा हूँ कि देखता हूँ, पुलिस दोनों के बीच हस्तक्षेप कर रही है।
पुलिसकर्मी दोनों से मुट्ठी गर्म करने के प्रयास में है। लेकिन जोश से फटते हुए नवजौवान उसका तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं पुलिसकर्मी ने शान्ति भंग करने का प्रयास करने के आरोप में दोनों का चालान लिख दिया है-

नाम, पता-
पिता का नाम-
निवास-स्थान-
और मेरी कल्पना में न्यायालयों के वे प्राँगण जाग उठे हैं, जहाँ सुबह दस बजे से शाम के पाँच बजे तक लोगों की भीड़ जुटती है; जहाँ लोग आते हैं, न्याय की खोज में, अपने जीवन और अधिकारों की रक्षा के लिए, उन काले वस्त्रधारी कानूनविदों का सहारा लेने के लिए, जिनकी बगलों में कानून की मोटी-मोटी पुस्तकें हैं और जो कानून की बारीकियों से अधिक इस कला से परिचित हैं कि अदालत के चंगुल में फँसे व्यक्ति को किस प्रकार निचोड़ा जाता है, किस तरह अपने स्वार्थों की सिद्धि की जाती है, किस प्रकार उसे सिखाया जाता है कि इंसाफ कानून में लिखे शब्दों से नहीं, पैसे से खरीदा जाता है-और पैसे के बिना अदालत के आँगन तुम्हारे लिए सूने हैं, निरर्थक हैं।
मुझे वह आलीशान बिल्डिंग अपनी तरफ खींचती है, जिसके एक भव्य चैम्बर में सबसे बड़ा अधिवक्ता आने वालों को अपनी सम्पन्नता का परिचय दे रहा है। इसके साथ ही मेरी कल्पना में वे सारे खण्डहर उभर आते हैं, जिनके मलवे में वह भव्य इमारत निर्मित हुई है।

मैं सड़क को अपने कदमों से नापता हुआ उस स्थान से आगे निकल आया हूँ, जहाँ एक साधारण-सी टक्कर में दो युवक एक-दूसरे भिड़ गए थे, और जहाँ उनकी इस छोटी-सी असावधानी का पुलिसकर्मी फायदा उठाने का प्रयास कर रहा था।
कैसी जटिल हो गई है जिन्दगी !
एक साधारण-सी असावधानी, हमारे बीच में उन हाथों को हस्क्षेप करने की अनुमति दे देती है, जो बाद में गर्दन से पकड़कर उन गलियारों की ओर धकेल देते हैं जहाँ आदमी को कानून का संरक्षण मिलता है और यह संरक्षण पाने के लिए युवावस्था इतनी लम्बी अवधि तक भागती है कि उसके सिर के बाल सफेद पड़ जाते हैं और कमर झुककर कमान की तरह दोहरी हो जाती है।
दोनों युवक, साइकिल-सवार भी और स्कूटर-चालक भी, पुनः मेरे स्मृतिपटल पर उभर आए हैं-
मैं उनके जीवन के कई अगले बरस निरन्तर न्याय-दीर्घाओं में घूमते और जूतियाँ घिसते देखता हूँ, तो मुझे उस आदमी पर दुख होता है जिसने बहुत कुछ सीखा है लेकिन शिष्टाचार शायद अभी नहीं सीखा है।
मैं विचार के इस बिन्दु पर खड़ा हूँ।

तभी मुझे लगता है कि किसी ने धीरे से मेरे कन्धों पर अपना हाथ रख दिया है, घूमकर देखता हूँ-
अरे, यह तो स्पेनोजा है ! फ्रांस का यथार्थवादी दार्शनिक ! उसकी धीमी लेकिन सशक्त आवाज मेरे कानों में गूँजती है-
‘‘सभी आदमी शिष्ट और तर्कसंगत होते तो लोगों को कानून की जरूरत नहीं थी- तब वे कानून और अदालत के बगैर रह सकते थे, अधिक सुख और शान्ति से रह सकते थे।’’
मैं अपने दार्शनिक मित्र स्पेनोजा से कहता हूँ, यदि सब शिष्ट और तर्कसंगत हों, तो दुनिया की सारी चहल-पहल, कानून बनाने वाली संस्थाओं की समस्त गतिविधियाँ, विधि-विधान का पालन कराने वालों के मठ, वैधानिक ज्ञान और कानूनी दक्षता बेचने वालों की सजी-सजाई दुकानें, इंसाफ की परिभाषाओं से भरी मोटी-मोटी पुस्तकें, इन सबका क्या होगा ? इन सबके बगैर यह संसार और जीवन कितना सुनसान हो जाएगा मेरे मित्र...!
बूढ़ा दार्शनिक कुछ बोलता नहीं है, धीरे से मेरा हाथ थामकर यूनान की ओर ले चलता है।
यह यूनान की राजधानी एथेन्स है –

शहर के बीचोबीच काले पत्थर से तराशी हुई यह किसकी प्रतिमा खड़ी है ? स्पेनोजा मुझे बताता है –
इसे देखो-
यह दुनिया का सबसे पहला दार्शनिक सुकरात है। यह वही महान् व्यक्ति है जो अपने शिष्यों से पूछा करता था—
‘‘क्या तुम बता सकते हो कि न्याय की परिभाषा क्या है ? और क्या जिस क्रिया को तुम न्याय कहते हो, वह अन्त में जाकर एक पक्ष के लिए न्याय और दूसरे पक्ष के लिए प्रति अन्याय नहीं हो जाती ‍?’’

बूढा स्पेनोजा सुकरात की प्रतिमा के नीचे मुझे अकेला छोडकर गायब हो गया है। मैं दुनिया के इस पहले यथार्थवादी दार्शनिक से उसी का प्रश्न पूछने का प्रयास करता हूँ। लेकिन अचानक मेरी स्मृति मुझे ले जाती है उस अभागिन वृद्ध महिला के आँगन में, जिसके जवान बेटे को कुछ ही दिन पहले हत्या के अपराध में फँसी की सजा हुई है।
मैं सोचता हूँ, अपराध की अनिवार्यता और उन परिस्थितियों के बारे में जिसमें कोई विशेष आपराधिक घटना घटित हुई है।
‘‘तुम बता सकते हो, न्याय की परिभाषा क्या है और जिस चीज को तुम न्याय का नाम देते हो, क्या वह एक पक्ष के लिए न्याय और दूसरे पक्ष के लिए अन्याय नहीं है ?’’
यह मौलिक प्रश्न बिजली की भाँति बार-बार मेरे मस्तिष्क में कौंधता है और बार-बार वृद्ध महिला की आकृति मेरे स्मृति-पलट पर उभर आती है।

उसका इकलौता पुत्र पिछले साल से विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में था-सात साल-सात लम्बे साल, यानी एक आम भारतीय नागरिक की औसत आयु का एक बटे छः भाग
विचाराधीन सजा की यह लम्बी अवधि किस खाते में जाएगी ? मैं अदालत से पूछता हूँ। लेकिन अदालत पत्थर की मूर्ति की तरह चुप है, एकदम खामोश। हत्या का दण्ड फाँसी ?
किंतु हत्या के मामले पर विचार करने का दण्ड ? सवाल शून्य में भटक गया है। सात लम्बे साल मेरी आँखों के सामने पहाड़ बनकर खड़े हो गए हैं।
मानता हूँ युवक ने अपराध किया था, हत्या की थी-
उत्तेजना में उग्र और उन्मादी क्षणों में उस गुण्डे को मार डाला था, जो उसकी युवा बहन को बलपूर्वक उठाकर ले गया था और बलात्कार कर रहा था। मैं यह भी मानता हूँ कि उत्तेजना के क्षणों में वह अपना मानसिक संतुलन किसलिए खो बैठा और कानून को अपने हाथ में लेने का दुस्साहस उसने किया।
मानता हूँ, सजा देने का काम कानून का था, उसका नहीं था। भावनाओं की हत्या का और भावनाओं मे किये गए अपराधों का कानून की दृष्टि में कोई औचित्य नहीं है।
मैं मानता हूँ कि कानून ने अपने हिसाब से उस युवक के साथ ठीक-ठीक इंसाफ किया है और मौत का हिसाब मौत से चुका दिया है-

लेकिन...?
लेकिन इस दोटूक फैसले के बाद भी अपराध पक्ष एक और अन्याय का शिकार हो गया है- इंसाफ द्वारा की गयी नाइंसाफी का शिकार।
मेरी स्मृति में उन दो महिलाओं की दुःखी आकृति उभर आई है जिनमें से एक का भाई और एक का बेटा अपनी बहन की लाज बचाने के अपराध में फाँसी पर झूल गया है। और अब इन अनाथ महिलाओं के पास जीवित रहने का कोई साधन नहीं है-
दो जून की रोटी देने वाला अब कोई नहीं है घर में-चारों ओर दुःख है, निराशा है, अभाव है, भुखमरी और दुनिया है दरिन्दों और राक्षसों से भरी हुई।
ये राक्षस, ये दरिन्दें कहाँ ले जा रहे हैं, इस युवती को, जिसकी लाज बचाने के लिए उसका जवान भाई कुछ ही समय पूर्व फाँसी पर झूल गया था। उसी रास्ते पर ना-
जिसे वेश्यावृत्ति का रास्ता कहते हैं,
जिसे जिस्मफरोशी का नाम देती है दुनिया-

पहले हविस के मारे लोग उसे बलात् उस रास्ते पर घसीट रहे थे, जो पाप का है और अब कानून ने अपने इंसाफ द्वारा उसे एक ऐसी खाई में धकेल दिया है जहाँ वेश्यावृत्ति के अतिरिक्त जीवनयापन का कोई साधन ही नहीं बचा है शायद ! न्याय के समय, कानून की शब्दों की पट्टी बँधी आँखे यह देख नहीं पाई थीं, ‘मौत की सजा मौत’ का नियम एक बूढ़ी औरत को भूखों मरने और एक मासूम युवती को अपनी देह बेचने पर भी विवश कर सकता है !
महन् दार्शनिक, एक बार फिर चीखकर कहो-‘‘आखिर न्याय की परिभाषा क्या है ? क्या एक पक्ष के साथ जिस क्रिया को तुम न्याय का नाम देते हो, वह दूसरे के साथ अन्याय नहीं हो जाता ?’
प्रिय स्पेनोजा ! दुःखी मत हो, जब तक लोग तर्कसंगत नहीं होते हैं, कानून एक पक्ष के साथ न्याय और दूसरे के साथ अन्याय करता ही रहेगा।
विचारों के सागर में बहता हुआ कहाँ आ गया हूँ ?– उस द्वार पर जहाँ मेरा मित्र निवास करता है, जो कुछ ही समय पूर्व मुन्सिफ मजिस्ट्रेट होकर यहाँ आया है।

कमरा आधुनिक सुविधाओं की सभी आवश्यक वस्तुओं से सजा है। खिड़की से बाहर स्थापित कूलर अन्दर के वातावरण के शीतल करने में व्यस्त है। कोने में बिछी एक बड़ी मेज पर अनेक फाइलें क्रम में लगी हैं। उमस है लेकिन कूलर की ठण्डी हवा इस उमस को मार भगाने का असफल प्रयास कर रही है बाहर उमस नहीं थी, यहाँ है-
‘‘तो क्या जहाँ फाइलें होती हैं, वहाँ उमस भी होती है ? शायद-शायद-’’
मैं अपने मित्र की ओर देखता हूँ और फाइलों के अम्बार की तरफ इशारा करते हुए कहता हूँ-
‘‘न्यायालय के समय में क्या यह सब काम नहीं कर पाते हैं आप-?’’
सोफों के बीच बिछी मेज पर चाय की प्यालियों से गर्म भाप उठ रही है। मैं एक-एक घूँट गले के नीचे उतार रहा हूँ। मेरा मित्र खामोशी तोड़कर अनायास बोल उठा है-

‘‘लगभग डेढ़ हजार मुकदमें लम्बित पड़े थे, पिछले साल से। ऊपर से आदेश आया है कि अगले दस महीनों में सभी प्रकार के विचाराधीन मुकदमों का निस्तारण कर दिया जाए।’’
एक खोखला कहकहा मेरे कानों में गूजता है। आवाज फिर मेरे कानों में आती है-
‘‘पन्द्रह साल का काम क्या केवल दस महीनों के भीतर पूरा करना सम्भव है ? कैसे सम्भव है- ?’’
मैं पन्द्रह साल की अवधि और डेढ़ हजार मुकदमों का हिसाब लगाना चाहता हूँ, लेकिन लगा नहीं पाता। सवाल पूछता हूँ-
‘‘इसमें दोष किसका है, वादकारियों का या अदालत की सुस्ती का ?’’
जवाब मिलता है दोष किसी का भी हो, फाँसी का फन्दा तो मेरे गले में है। कुछ भी हो, काम तो निबटाना ही होगा।’’
‘‘लेकिन कैसे ?’’ मैं आश्चर्य से पूछ रहा हूँ।
मुझे लगता है, जैसे मेरा मित्र इस सवाल का जवाब देने के लिए तैयार नहीं है। जैसे वह कोई रहस्य छुपाना चाहता है।
मेरा मस्तिष्क असमंजस में है। डेढ़ हजार फाइलें दस महीने की अल्पावधि के भीतर किस प्रकार ठिकाने लगाई जाएँगी और इस जल्दबाजी में वादकारियों के प्रति न्याय हो सकेगा ?

चाय की प्यालियाँ अपना महत्त्व खो चुकी हैं वे खाली हैं। लेकिन फाइलें महत्त्वहीन नहीं हुई हैं, खाली नहीं हुई हैं, कागजों से भरी हैं फिर कुदेरता हूँ-
‘‘कैसे करोगे इतना काम दस महीनों में -?’’
‘‘अब करना ही क्या है, बहुत कुछ कर चुका हूँ, थोड़ा और बाकी है, वह भी हो जाएगा-’’
‘‘लेकिन कैसे -?’’ मैं हैरत से पूछता हूँ- और इस सवाल का उत्तर मुझे मिलता है, वह और भी अचम्भे में डाल देता है मुझे-
‘‘सभी वादियों-प्रतिवादियों से बात हो गई थी-सारे मुकदमे एक कलम खारिज कर दिए जाएँगे।
चपरासी आवाज लगाएगा-
‘अमुक–पुत्र हाजिर है ?’ और हाजिर होते हुए भी कोई हाजिर नहीं होगा-तब पेशकार फाइल पर नोट करेगा-
‘अदम-पैरवी में मुकदमा खारिज किया गया’ यानी मामले का निस्तारण हो गया-’
‘‘तो क्या सभी डेढ़ हजार मुकदमें खारिज ?’’ मैं आश्चर्य से पूछता हूँ, ‘‘लेकिन...’’
‘‘लेकिन क्या- ?’’ मेरी बात बीच में ही काट देता है मुन्सिफ माजिस्ट्रेट-


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