अपना इलाज स्वयं करें - बी. एल. वत्स Apna Ilaz swayam karen - Hindi book by - B. L. Vats
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अपना इलाज स्वयं करें

बी. एल. वत्स

प्रकाशक : भगवती पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :100
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1753
आईएसबीएन :81-7457-185-X

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‘गागर में सागर’ भरते हुए अनेक चिकित्सा-पद्धतियों का सर्वांगपूर्ण परिचय इस कृति में दिया जा रहा है...

Apna Ilaj Swayam Karen -A Hindi Book by B.L. Vats - अपना इलाज स्वयं करें - बी. एल. वत्स

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अपना इलाज स्वयं करें

आज ऋषि-भूमि भारत में अति प्राचीनकाल से अपनाई जाती रही चिकित्सा प्रणालियों के पुनर्जीवन की सर्वत्र आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिये ‘गागर में सागर’ भरते हुए अनेक चिकित्सा-पद्धतियों का सर्वांगपूर्ण परिचय इस कृति में दिया जा रहा है, जिससे प्रत्येक वर्ग का पाठक अत्यल्प व्यय में अपनी चिकित्सा स्वयं कर सके और महँगे इलाज से मुक्ति पा सके। क्या रीति-नीति अपनाई जाये जिससे रोगों का उद्गम ही न हो और यदि रोग उत्पन्न हो जाये तो उसके लिये क्या उपाय किये जाये ? इस विस्तृत विवेचन के साथ प्रस्तुत है घर-घर में रखने योग्य अनुपम कृति।

प्राक्कथन

हजारों चिकित्सा पद्धतियों के होते हुए और विज्ञान की खोजों की चरम परिणति के बाद देखने में यह आ रहा है कि डॉक्टरों ,वैद्यों और चिकित्सालयों में रोगियों की भरमार है। यह भी देखने में आता है कि समय से चिकित्सा न हो सकने के कारण लाखों व्यक्ति असमय काल कवलित हो जाते हैं। शिक्षित हों या अशिक्षित, छोटे हों या बड़े, अमीर हों या गरीब, उच्च वर्ग के हों या निम्न वर्ग के अथवा मध्य वर्ग के सभी रोगों से अक्रान्त हैं। त्रयतापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) से अक्रान्त हैं। चिकित्साशास्त्र पर भी हजारों पुस्तकें लिखी गयी हैं किन्तु प्राचीन पुस्तकों का सर्वत्र अभाव दिखाई देता है। अधुनातन खोजों का सर्वजनहिताय उपयोग नहीं हो पा रहा है। इसी कारण समाज का हर वर्ग रोग ग्रस्त भी है व परेशान भी। देश में 90 प्रतिशत रोगग्रस्तता तो सर्वत्र नजर आ रही है। ऐसी स्थिति में क्या किया जाये ? बुद्धिजीवी वर्ग ही हतप्रभ है और रोगी भी; दार्शनिक भी किंकर्तव्यविमूढ़ है और विचारक भी।

इन विषम परिस्थितियों में जहाँ-जहाँ हमें आशा की किरणें दिखाई दीं, उनका निश्चल भाव से आधार ग्रहण करते हुए और अपने जीवन के अनुभवों की संजीवनी को इन आधारों से अनुस्यूत करते हुए हमने सर्वजनहितार्थ यह एक मौक्तिक-माला तैयार की है। हमें पूर्ण विश्वास है कि पाठक यदि इसका अद्योपान्त अध्ययन कर लेंगे तो इस पुस्तक में वर्णित 8 चिकित्सा पद्धतियों में से कोई-न-कोई चिकित्सा पद्धति अपनाये बिना वे न रह सकेंगे और यदि ऐसा सम्भव हो सका तो हम मिनटों में रोगमुक्त हो जाएंगे और एक स्वस्थ आन्नदमय जीवन का उपभोग करेंगे।

हमने प्रत्येक चिकित्सा पद्धति के व्यावहारिक पक्ष पर ही बल दिया है। अपने जीवन के अनुभवों को इसमें जोड़ने से इसकी उपादेयता बढ़ी है। हाल ही की बात है कि प्राय: 80 वर्ष की एक वृद्धा जो 6 माह से ज्वर पीड़ित थी। हमारे पास उपचार पूछने के लिये आयी। 6 महीने की लम्बी बीमारी से और रोज इंजेक्शन लगने के उपरान्त भी ज्वर मुक्त न हो पाने के कारण वह निराश भी हो चुकी थी व टूट भी चुकी थी। हमने सहज ही उसे अमृता (नीम ग्लोय) का काढ़ा बनाकर पीने के लिये दिया। 2 दिन में ही उसका ज्वर चला गया। तीसरे दिन काढ़ा लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। वह बोली कि आपने तो सचमुच अमृत दे दिया। हजारों, लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी जो निराश व हताश हो चुके हैं उन्हें भी इस कृति में सुझाए गए उपचार का सहारा लेकर नवजीवन मिल सकता है।

कृति की दूसरी विशेषता यह है कि शास्त्रों में वर्णित जटिल और दुर्बोध चिकित्सा पद्धतियों को छोड़ दिया गया है। केवल उन्हें ही ग्रहण किया गया है जिनका हर व्यक्ति आसानी से उपयोग कर सके। यथा स्थान औषधियाँ कहाँ उपलब्ध होंगी, उनकी जीवनी शक्ति कब तक सुरक्षित रहेगी। इस बात का भी उल्लेख कर दिया गया है।

इस कृति में साधारण बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है जिसे औसत भारतीय समझ सके। दुरुह व कठिन शब्दों को छोड़ दिया गया है। डॉक्टर और वैद्य भी अपनी रीति-नीति निर्धारित करने में इसका सहारा ले सकते हैं। वैद्यों और डॉक्टरों का व्यवसाय बहुत पुनीत है। वे मरणासन्न व्यक्तियों में जीवन डालते हैं। वे अपने कर्तव्य के प्रति अधिक सजग हो सकेंगे, ऐसा हमें विश्वास है।

इस कृति के लेखन में प्राय: एक माह का समय लगा है और प्रकाशन में 15 दिन का। हम भगवती पॉकेट बुक्स के कृतज्ञ हैं कि उनकी अनवरत प्रेरणा से इसका लेखन सम्भव हो सका। पाण्डुलिपि तैयार करने में निशीथ वत्स ने हमारी बड़ी सहायता की है। उसके प्रति भी हम कृतज्ञ हैं। पुस्तक को अधिक उपयोगी बनाने के लिए सुधी पाठकों के सुझाव सादर आमंत्रित हैं। इस कृति के प्रणयन में जिन आधार ग्रन्थों का उपयोग हुआ उनके लेखकों को प्रकाशकों के भी हम आभारी हैं।


मेरा इसमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा।
तेरा तुझको सौंपते, क्या लागे है मेरा ?


डॉ.बी.एल. वत्स

1
उपचार से सावधानी भली


आधि-व्याधि से ग्रस्त आज का मानव इतना व्यथित है कि आर्थिक सम्पन्नता के बावजूद इंग्लैण्ड, अमरीका जैसे विकसित और सम्पन्न राष्ट्रों में भी प्रतिदिन आत्महत्याओं की संख्या बढ़ती जा रही है। इतने सम्पन्न और समृद्ध देशों का भी जब यह हाल है तो विकासशील देशों की क्या गति होगी ? इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है।
इस पुस्तक के प्रारम्भ में ही हम कुछ ऐसे सूत्र दे देना चाहते हैं जिनसे रोगों की उत्पत्ति को निर्मूल किया जा सकता है। इन सूत्रों में प्रमुख हैं-
1. जल्दी सोना व जल्दी जागना।
2. नियमित व्यायाम।
3. समग्र विश्व का संचालन करने वाली ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास।
4. सद्चिन्तन।
5. दुष्प्रवृत्तियों का प्रयत्नपूर्वक निष्कासन और सत्प्रवृत्तियों का ग्रहण।


1. जल्दी सोना व जल्दी जागना



एक अंग्रेजी में कहावत है- ‘‘Early to bed and early to rise makes a man healthy wealthy & wise.’’ जल्दी जागने से हमारे सौरमण्डल की अधिष्ठित शक्ति से समूचे विश्व ब्रह्माण्ड को कुछ ऐसी स्फूर्ति, चेतना, प्रेरणा, सद्बुद्धि और सद्भावनाओं का उद्रेक मिलता है कि हमारी सभी आपदाओं की कल्पना निर्मूल हो जाती है। सर्वत्र चेतना प्रस्फुटित हो जाती है। आपने देखा होगा कि प्रकृति प्रात:काल के समय कुछ नये रूप में दृष्टिगत होती है। सर्वत्र चेतना प्रस्फुटित हुई दिखाई देती है। चिड़ियों का कलरव, कलियों का प्रस्फुटन और स्वच्छ वायु का स्वच्छन्द प्रवाह सभी के प्राणों में नयी चेतना का संचार करता है। जब जड़ जगत् में इतना आनन्दमय दिखाई देता है तो चैतन्य प्राणियों के आनन्द की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। इस सौरमण्डल का अधिष्ठाता सूर्य उषा के सहयोग से जड़ चेतन जगत् में नये जीवन का संचार करता है।

पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण से हमने देर तक सोते रहने की जो बुरी आदत डाल ली है यदि उससे संकल्प पूर्वक निवृत्ति पालें तो हमारी सारी समस्याओं का समाधान अनायास ही निकल आयेगा। हमें वैद्यों और डॉक्टरों के घर के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। सौ रोगों की अकेली दवा सुबह जल्दी उठना है।

जो व्यक्ति जल्दी जागेगा, स्वाभाविक है कि वह दिनभर के कार्य (अधिक शीघ्रता से करने के कारण) जल्दी ही निबटा लेगा। ऐसी स्थिति में उसे जल्दी सोना भी आवश्यक है। इसलिए देर से देर रात्रि में 9 बजे सो जाना चाहिये ताकि प्रात: 5 बजे उठा जा सके। आठ घंटे की नींद बच्चों, वृद्धों और युवाओं सभी के लिए पर्याप्त है।


2. नियमित व्यायाम



प्रात: दिशादि से निवृत्त होकर हल्का-फुल्का शारीरिक व्यायाम अवश्य करना चाहिये। सुबह उठकर दौड़ना या टहलना भी एक व्यायाम है। इसे रुचि के अनुरूप अपनाया जा सकता है।

शान्ति कुंज, हरिद्वार ने हर व्यक्ति के लिए योग व्यायाम का अभियान चलाया है। इसमें उन सभी व्यायामों को सम्मिलित कर लिया है जिसे नियमित रूप से हर वर्ग का व्यक्ति आसानी से कर सकता है। इस प्रज्ञा योग व्यायाम की चित्र सहित मुद्रायें (16 निर्देशों में) व्यायाम की एक श्रृंखला में पूरी होती हैं। व्यायाम के समय लड़के-लड़कियों के कपड़े शरीर पर उसके अनुरूप हो।

(1) धीरे-धीरे श्वास खींचना प्रारम्भ करें। दाहिने हाथ को दाहिने तरफ बायें हाथ को बाईं तरफ से ऊपर ले जाते हुए, दोनों पैरों के पंजों के बल खड़े हुए शरीर को ऊपर की ओर खींचें। दृष्टि आकाश की ओर रखें। ये चारों क्रियायें एक साथ करें। यह सम्पूर्ण व्यायाम ‘ताड़ासन’ (चित्र 1) की तरह पूरा होगा। सहज रूप में जितनी देर यह क्रिया सम्भव हो कर लेने के बाद चित्र नम्बर दो देखें।

(2) श्वांस छोड़ते समय सामने की ओर झुकना। हाथों का पाद-हस्तासन की तरह सामने की ओर ले जाते हुए दोनों हाथों से दोनों पैरों के समीप भूमि स्पर्श करें। सिर को पैर के घुटनों से स्पर्श करने का प्रयास करें।

(3) हस्त पादासन की स्थिति में सीधे जुड़े हुए पैरों को घुटनों से मोड़ें, दोनों पंजे पीछे की ओर ले जाकर उन पर वज्रासन की तरह बैठ जायें। दोनों हाथ दोनों घुटनों पर, कमर से मेरुदण्ड तक शरीर सीधा रहे व श्वांस सामान्य रहे।

(4) घुटनों पर रखे दोनों हाथ पीछे की तरफ ले जायें। हाथ के पंजे पैरों की एड़ियों पर रखें। अब धीरे-धीरे श्वास खींचते हुए उष्ट्रासन की तरह सीने को फुलाते हुए आगे की ओर खींचें। दृष्टि आकाश की ओर हो।


विनामूल्य पूर्वावलोकन

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