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आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :267
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 18
आईएसबीएन :8126313927

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ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कहानी संग्रह



इज्जत

हालाँकि उसने बताया, ''यही कोई चौदह-पन्द्रह साल की होगी भाभी!'' लेकिन उसे देखकर यही जान पड़ा कि सत्रह-अठारह से कम की नहीं होगी। ये सब अपनी उमर कम कर बताते हैं लेकिन इस लड़की को अपनी बस्ती में कहीं छुपाकर इतना बड़ा किया बासन्ती ने? ऐसी भरी-पूरी सेहत कहीं से चुरा लायी है? ऐसा निखरा-निखरा रूप कहां से पाया है उसने?

सुमित्रा अपनी हैरानी को छिपा भी नहीं पायी। बोली, ''तुम्हारी बिटिया तो बड़ी ही खूबसूरत है, बासन्ती! ऐसा नहीं जान पड़ता कि यह तुम्हारी बेटी है!''

बासन्ती की मुसकान में लाज और अभिमान दोनों की ही रगिमा खेल रही थी। बोली, ''जब यह छोटी-सी थी तभी से इसके बारे में सभी यही बात कहते रहे हैं। दरअसल, यह अपने वाप पर गयी है। इसका बाप भी बड़ा लम्बा-चौड़ा और कद्दावर आदमी था भाभी...साँप ने काट खाया। उसके गुजर जाने के बाद सास ने बड़ा सताया, भाभी! ऐसा जान पड़ता था कि मैंने ही नागन बनकर उसके बेटे को डसा हो। उसी जलन भरी आग से मैं बेटी को लेकर निकल आयी थी और सबसे एकदम अलग-थलग रहने लगी थी। मैंने कहा था दूसरे की ड्योढ़ी पर मर-खटकर पेट पाल लूँगी...शायद डसी से तुम्हारी आन-बान-शान बनी रहे।...और यही वजह है कि मेरे मरद को किसी ने देखा तो नहीं। इसीलिए सब-के-सब मुइासे मजाक करते रहते हैं कि तूने किसी बड़े आदमी की बेटी को चुरा लिया होगा...।''

सुमित्रा ने मुसकराकर कहा, ''मुझे भी ऐसा ही जान पड़ता है। तू इतने दिनों से मेरे यहाँ काम कर रही है लेकिन तेरी बिटिया इत्ती खूबसूरत है...ऐसा तो मैंने सोचा भी न था!''

बासन्ती का गर्व से खिला चेहरा थोड़ा मुरझा गया। उसने कहा, ''उसके छुटपन से ही मैं उसे साथ लिये काम पर निकल जाती थी, भाभी! वह कितना हाथ बँटाया करती थी मेरे कामों में। अब बड़ी होकर साथ निकलना नहीं चाहती। कहती है, मैं यहीं घर का सारा काम-काज करूँगी, माँ! बाबू लोंगों के घर नहीं जाऊँगी...लाज आती है मुझे। में कहती हूँ....जाने का मन न कर तो मत जा। लेकिन अब तो बिटिया को लेकर बड़ी मुसीबत हो गयी है...जैसा कि मैं आपको बता रही थी। अब आप अगर दया करके इसे थोड़ा-सा आसरा दे दें।''

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