वहीं रुक जाते - नरेन्द्र नागदेव Vahin Ruk Jaate - Hindi book by - Narendra Nagdev
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वहीं रुक जाते

नरेन्द्र नागदेव

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :119
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2009
आईएसबीएन :81-263-1223-8

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इस पुस्तक में मानवीय मूल्यों के विघटन से लेकर सर्वग्राही भौतिकतावाद और उससे उत्पन्न आँच में झुलसती संवेदनाओं का जीवन्त चित्रण किया गया है......

Vahin ruk jate

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हिन्दी  के प्रतिष्ठित कथाकार नरेन्द्र नागदेव की नवीनतम कहानियों का संग्रह है ‘वहीं रुक जाते’। कथाकार ने इनमें मानवीय मूल्यों के विघटन से लेकर सर्वग्राही भौतिकतावाद और उससे उत्पन्न आँच में झुलसती संवेदनाओं का जीवन्त चित्रण किया है। उनकी कहानियों में पात्रों के अन्तर्मन ऊपरी तौर पर जहाँ एक-ओर अपने परिवेश से संघर्षरत हैं वहीं स्वयं अपने से भी। काव्य के सुनियोजित संयोजन के साथ ही कहानियों का एक आत्मीय सफर जारी रहता है-यथार्थ और फैण्टेसी के बीच, सही और गलत के बीच, वर्तमान और अतीत के बीच।

नागदेव की ये कहानियाँ कहीं सामाजिक सन्दर्भों को छूती हुई मानवीय मूल्यों की प्रश्नाकुलता में विराम लेती हैं तो कहीं वैयक्तिक अनुभव के सामाजिक सन्दर्भों में।
शिल्प की महीन बुनावट हो या भावनात्मक स्पर्श वाली मोहक भाषा हो-हर दृष्टि से एक भिन्न धरातल पर खड़ी कहानियों का संकलन है-‘वहीं रुक जाते’।
नरेन्द्र नागदेव का यह कहानी-संग्रह प्रकाशित करते हुए भारतीय ज्ञानपीठ को प्रसन्नता है।


सबमैरीन

भोर होने में देर थी अभी। लेकिन मकानों और दरख्तों की स्याह आकृतियों के पीछे हल्का सिन्दूरी धुँधलका पसरने लगा था। चेतना की पहली कसमसाहट उभरने लगी थी, दूर तक पसरे सन्नाटे के बावजूद।
उसी सन्नाटे पर खड़खड़ाहट की लकीर खींचती, एक घोड़ेवाली पुरानी बग्घी किसी दूरदराज के गाँव से रातभर का मुश्किल सफर तय करके यहाँ तक पहुँची थी।

यहाँ, अर्थात् समुद्र के किनारे स्थित इस भव्य इमारत के सामने, जिसके ऊँचे-ऊँचे गोलाकार रोमन खम्भे आकाश में धँसे थे ताकत के प्रतीक बनकर—देश की सबमैरीन शक्ति का संचालन करने वाली इस इमारत के पोर्च में !
सामने दूर तक फैला समुन्दर था। जिसके किनारे गोलाई में घूमता हुआ रास्ता उस भवन-परिसर के मुख्य द्वार तक पहुँचकर रुक गया था।
बग्घी इसी रास्ते से उस द्वार तक पहुँची थी।

∆ ∆

बग्घी के रुकते एक अधेड़ स्त्री उससे उतरी और गिरते-पड़ते किसी तरह उसके विशाल लोहे के द्वार पर पहुँची, और उसकी सलाखों को पकड़कर हिलाने की कोशिश करने लगी—खोलो...खोलो दरवाजा...।
वह रात भर की त्रासद यात्रा से बेहद थकी थी। बहुत घबराई थी। उसके अस्त-व्यस्त कपड़ों और चेहरे पर धूल की पर्त जमी थी। उसके अधपके बाल चेहरे पर छितराए थे। और आँखों में वह असीम वेदना और व्यग्रता थी, जो सिर्फ एक माँ की आँखों में हो सकती है—जब बेटे की जिन्दगी दांव पर लगी हो।

.....कहीं कोई फर्क नहीं पड़ा। न लोहे की ठण्डी सलाखों पर, न दोनों ओर पत्थर की मूर्तियों की तरह खड़े सन्तरियों पर, जिनकी ठण्डी, काँच की आँखें सीधे आकाश को ताक रही थीं—एकटक !
बग्घी को कुछ दूर किनारे खड़ा करके बूढ़ा कोचवान गेट तक आया। उसने सन्तरियों से संवाद करने की कोशिश की—....सुनो, हमारे गाँव की औरत है।...ऐसा है कि कल शाम को जिस पनडुब्बी के दुर्घटना होने की खबर आयी थी, उसमें इसका बेटा है...।

कहीं कुछ फर्क नहीं पड़ा। सन्तरी वैसे ही बुत की तरह खड़े रहे।
शोर सुनकर कुछ देर बाद हाथ में छड़ी घुमाता एक नीली आँखों वाला सर्जडेण्ट आया। चुस्त वर्दी पहने। वह गेट पर हो रही इस हलचल से सख्त नाराज- लग रहा था। क्या मतलब है इतने शक्तिशाली दफ्तर के आगे इस तरह गेट भड़भड़ाने का ?
‘‘देखो !’’—उसने गुस्सा दबाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘दफ्तर में यह सूचना कल मिल चुकी थी। जहाँ तक मेरा ख्याल है, सम्बन्धित अधिकारियों ने इस बात पर भी की थी।’’
‘‘तो मुझे भीतर जाकर उन अधिकारियों से मिलना है अभी !—स्त्री भावावेश और घबराहट में काँप रही थी !’’
‘‘लेकिन अभी इतनी सुबह कोई होता भी है दफ्तर में ? अभी जाओ वे लोग नौ बजे आएँगे।’’

‘‘अरे...। लेकिन...? एक सबमैरीन दुर्घटनाग्रस्त होकर कहीं समुद्रतल में पड़ा है। उसमें लोग हैं, जिन्दगी और मौत के बीच झूलते हुए।...और आप कह रहे हैं कि दफ्तर आराम से, रोज के वक्त खुलेगा।...रात भर कुछ भी नहीं किया गया ?’’
स्त्री शायद रातभर इस उम्मीद को सहेजे आयी थी, कि बचाव-कार्य तुरन्त शुरू हो चुका होगा। भागदौड़ हो रही होगी। गाड़ियाँ आ-जा रही होंगी। इधर से उधर सूचनाएँ आ-जा रही होंगी रात-भर। राहत सबमैरीन को तुरन्त कूच के आदेश दिए जा चुके होंगे।

लेकिन यहाँ का संवेदनहीन, निर्विकार माहौल देखकर वह सकते में आ गई थी।
‘‘तो क्या करते ?’’—सर्जेण्ट तेज बोलने लगा था—‘‘बताया तो है आपको कि मीटिंग हो चुकी है। अधिकारियों का कहना है कि हमारे पास राहत-कार्य के लिए कोई अतिरिक्त पनडुब्बी है ही नहीं।
‘‘बस ?...इतनी बात हुई और सब घर चले गए अपने-अपने हाथ झाड़कर ?...कुछ और करने की कोशिश तक नहीं  ?’’...स्त्री की आवाज भी सर्जेण्ट की आवाज जैसी ऊँची हो गयी थी।
सर्जेण्ट स्वयं को अपमानित अनुभव कर रहा था—‘‘अरे कोई है।...कौन है इसके साथ ? इसे समझाओ कि जो भी किया जा सकता है, वह किया जाएगा। और अब इसे ले जाओ, ले जाओ यहाँ से।’’

अधेड़ औरत समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या करे ? क्या नहीं करे ? उसने बदहवासी में गेट को मजबूती से पकड़ने की कोशिश की। उसके धूल भरे चेहरे पर थकान और उत्तेजना, एक अव्यक्त चीख बनकर कौंध रही थी।
बूढ़ा कोचवान ही उसे समझा-बुझा अलग ले गया।
‘‘सबमैरीन जहाँ डूबी है, वहाँ समुद्र कितना गहरा होगा ?’’—स्त्री ने टूटती आवाज में पूछा।
‘‘समुद्र बहुत गहरा होता है। मुझे ज्यादा नहीं पता, पर शायद दो-तीन किलोमीटर गहरा हो।’’ कोचवान ने सोचते हुए कहा।

‘‘अर्थात्...मेरा बेटा जहाँ है, उसके ऊपर दो-तीन किलोमीटर तक पानी-ही–पानी है।’’
‘‘ऐसा तो होगा है...और वहाँ घुप्प अँधेरा भी रहता है।’’
‘‘क्या इतनी गहराई में, पनडुब्बी तलहटी की वनस्पतियों में उलझ गयी होगी ?..और इसके इर्द-गिर्द समुद्री जीवन मँडराने लगे होंगे ?’’

‘‘ऐसा भी होगा ही। और क्या हो सकता है ? और हो सकता है क्या कुछ ?’’
‘‘मेरा मन कहता है कि मेरा बेटा जिन्दा होगा। क्यों’’—अधेड़ स्त्री ने कातरता से बूढ़े कोचवान को देखा, ‘सिर्फ ‘‘हाँ’’ में उत्तर सुनने की बेसब्री में।
‘‘हाँ-हाँ,...क्यों नहीं।’’ कोचवान ने अस्फुट स्वर में कहा, ‘‘लेकिन पता नहीं क्यों.. न जाने मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि उस दुर्घटनाग्रस्त पनडुब्बी में...मैं भी रह चुका हूँ।....’’
स्त्री के चेहरे पर छपी गहन वेदना की पर्तों के बीच भी, एक हल्के विस्मय की रेखा चमककर बुझ गयी, जैसा विश्वास करना चाहती हो कि उसने ठीक ही सुना है।

∆ ∆

सुबह मौसम बिगड़ने लगा। क्षितिज की ओर से बादल बेचैनी से उड़ते हुए आये, और आनन-फानन में इधर के आकाश पर छा गये। पहले समुन्दर का जल मटमैला हुआ। फिर पूरा माहौल झरझराहट में डूब गया।
कोचवान के आग्रह के बावजूद स्त्री कोच में नहीं छिपी। वह बार-बार भीगती हुई कुछ कदम उस भव्य इमारत की ओर बढ़ती, फिर लौटती, और फिर उधर मुड़ती...जैसे थाह लेना चाहती हो कि इसी इमारत में वह सत्ता है, जो उसके बेटे तक भेज सकती है राहत-दल को। राहत-दल के रूप में दूसरी जिन्दगी को।....क्या ऐसा होगा ?
तभी गेट के बाहर एक शानदार काली गाड़ी आकर रुकी। जिस पर लाल बत्ती घूम रही थी। उसने गेट खोलने के लिए हार्न दिया।

सन्तरी इधर-उधर दौड़े। धीरे-धीरे विशालकाय गेट भीतर की ओर खुलने लगा।
स्त्री पलक झपकते, बारिश-पानी और सुरक्षा की परवाह किये बगैर गेट की तरफ दौड़ी, और काली गाड़ी के लगभग साथ-साथ दौड़ती हुई गेट के भीतर पहुँच गयी।
कोचवान सन्न रह गया। सन्तरी उसे पकड़ने दौड़ा। सर्जेण्ट की सीटी ठण्डे, पनीले माहौल को चीरती हुई निकल गई। लेकिन स्त्री ने कार की खिड़की को मजबूती से पकड़े रखा और छोड़ा नहीं।
वह बदहवास, कार में बैठे चीफ को सम्बोधित करते हुए कह रही थी, ‘‘सर...वो पनडुब्बी की दुर्घटना...मेरा बेटा...क्या यहाँ से कोई रक्षक दल ?...सर...प्लीज...।’’

आधे घण्टे के बाद वह चीफ के केबिन में विशाल गोलाकार मेज के आगे बैठी थी। भव्य कक्ष में विक्टोरियन सजावट थी। फर्श पर कारपेट और दीवारों पर पनडुब्बियों के आकर्षक चित्र।
चीफ उस स्त्री को लगातार अपने विभाग को गौरवान्वित करते हुए लेक्चर दे रहे थे, ‘‘...देखो, कल दोपहर को पनडुब्बी की दुर्घटना की सूचना मिलते ही डिपार्टमेण्ट ने किस फुर्ती से इमरजेन्सी मीटिंग बुलायी। सबसे पहले तो यही पता लगाना था ना, कि दुर्घटना थी या आक्रमण ?’’
सामने बैठी स्त्री को अपनी देह सर्द होती लगी, ‘‘मतलब ?’’...यानी कि पनडुब्बी कल दिन में ही दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थी ? और वह क्या सोच रही थी, उससे भी शायद छः घण्टे अधिक समय से वह समुद्रतल पर पड़ी है, पिछले बीस बाईस घण्टों से। या शायद उससे भी अधिक।’’

‘‘....अब देखो, मैं तुम्हें समझाता हूँ।’’ चीफ सबमैरीन के एक मानचित्र पर छड़ी घुमाने लगे, ‘‘देखो, ये वो जगह है पनडुब्बी में जहाँ से मैसेज भेजे जाते हैं। समझी तुम ? बात यह है कि ये मैसेज समुद्र तल से नहीं भेजे जा सकते।’’
स्त्री की बेचैनी बढ़ती जा रही थी, ‘‘सर, क्या मीटिंग में सिर्फ दुर्घटना के कारणों पर ही चिन्ता हुई ? और जो नाविक उसमें फँसे हैं, उन्हें बचाने के बारे में...?’

‘‘बताता हूँ। पहले मुझे समझाने दो। क्या है कि मैसेज भेजने के लिए पनडुब्बी को आना पड़ता है समुद्र की सतह पर। अब पकड़ा गये न ? और मान लो कि आसपास घूमती दुश्मन की सबमैरीन ने सीधे नहीं भी देखा हो तो मैसेज पकड़कर वे वहीं अपनी पनडुब्बी की स्थिति का पता लगा लेते हैं। डेंजरस् है...है...न ?’’ चीफ के चेहरे पर अपनी बात समझा पाने का सन्तोष था और वे अपनी घनी सफेद मूछों से मुस्कराते हुए-से लग रहे थे।
स्त्री अब कुर्सी से उठ खड़ा हुई थी, ‘‘सर, रक्षकदल भेजा गया है या नहीं ?’’
इस बार उसका प्रश्न सीधा और धारदार था। घबराहट से कापती आवाज के बावजूद।
‘‘मुश्किल यह है कि यहाँ जो सबमैरीन है, वह उतने गहरे समुद्र में नहीं उतर सकती।’’ चीफ का चेहरा पहली बार कुछ सोचता-सा लगा।

‘‘फिर ?...’’
‘‘और जो सबमैरीन सक्षम हैं, वे यहाँ से हजारों किलोमीटर दूर, एक युद्धाभ्यास कर रहे हैं...तुम समझ रही हो न ? इस तरह के बड़े अभ्यास बड़े जरूरी होते हैं। डिपार्टमेंट ने बड़ी तैयारी की थी इसके लिए दो सालों से।’’
‘‘फिर अब ?...’’
इस अन्तिम फिर का कोई उत्तर नहीं आया।
अब चीफ से मुलाकात का समय खत्म।
कृपया उस दरवाजे से बाहर जाइए।

∆ ∆

कोचवान झिर-झिर बारिश में बाहर गेट पर ही खड़ा था।
‘‘कुछ बात हुई ?...भेज दिया उन्होंने रक्षक दल ?’’ उसने स्त्री के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करते हुए व्यग्रता से पूछा।
उसने कोई उत्तर नहीं दिया। वे दोनों धीरे-धीरे आगे समुद्र के किनारे चलने लगे। बारिश में मटमैला समुन्दर। एक-दूसरे से लड़ती-भिड़ती, किनारे की ओर से दौड़ती फेनिल, सर्पीली लहरें। वे किनारे पर पत्थरों की गोलाकार दीवारों से टकराकर ऊपर उठतीं और पूरे रास्ते पर झरझराकर बौछार करती जा रही थीं। बौछार-पर-बौछार...
इसी बेचैन, मटमैले समुन्दर के विस्तार में दूर, बहुत आगे, हजारों मील दूर वह जगह होगी, जहाँ जल की गहराई हजारों फुट होगी।....वहाँ इसके तल में फँसी होगी एक क्षतिग्रस्त पनडुब्बी, जिसमें उसका बेटा होगा।
पता नहीं, कल क्या हुआ होगा ?
शायद सब सामान्य ही चल रहा होगा। हमेशा जितनी गहराई में, जिस दफ्तर से सबमैरीन चलती है, वैसी ही चल रही होगी। लोग अपने-अपने काम में डूबे होंगे।
कि अचानक कोई चीज उससे भीषण रफ्तार से टकराई होगी, और पनडुब्बी बुरी तरह डगमगा गयी होगी। शायद कोई मिसाईल टकरायी हो।



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