जंगली कबूतर - इस्मत चुगताई Jungali Kabutar - Hindi book by - Ismat Chugtai
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जंगली कबूतर

इस्मत चुगताई

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :88
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2091
आईएसबीएन :81-8143-346-7

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इस्मत चुगताई की कलम से कुछ रोचक कहानियाँ...

Jangali Kabuter

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दुनिया तेजी से बदलती है।
वर्षों पहले नहीं, बस जरा दस-बीस साल पहले पीछे चले जाइए तो पर्दे में भी रही एक पिछड़ी दुनिया हमारे सामने आ जाती है। अब ज़रा सोचिए कि इस्मत ने जब लिखने की कल्पना की होगी तब दुनिया कैसी होगी, लेकिन इस्मत तो इस्मत थी। अपने समय से काफी आगे चलने वाली काफी आगे देखने वाले इस्मत के ‘लिहाफ़’ में हलचल हुई तो कट्टरवादी भौंचक रह गये। तरक़्क़ी पसंदों को एक मज़बूत हथियार और सहारा मिल गया। मंटो को एक बेहतरीन लड़ाकू दोस्त। इस्मत का ‘लिहाफ़’ हिलता था और सारे जग की नंगी सच्चाई उगल देता था। शायद इसलिए इस्मत पर फ़तवे भी लगे मुकद्दमें भी हुए। उनके साहित्य को ‘गंदा’ और ‘भौंदा’ साहित्य कहने वालों की भी कमी नहीं थी। मगर इस्मत तेजी से अपनी कहानियों की ‘मार्फ़त’ विशेषकर महिलाओं के दिल में जगह बनाती जा रही थी। क्योंकि इन कहानियों में एक नयी दुनिया आबाद थी। यहाँ औरत कमज़ोर और मज़लूम नहीं थी। वो सिर्फ़ अन्याय के आगे हथियार डालकर ‘औरत-धर्म’ निभाने को मजबूर नहीं थी बल्कि वो तो मर्दों से भी दो कदम आगे थी। अर्थात कहीं-कहीं तो वो ‘आबिदा’ (जंगली कबूतर) भी थी। यानी इन्सान से भी दो क़दम आगे की उम्मीदवार।

इस्मत की कहानियों का तर्जुमा आसान नहीं। सबसे भारी मुसीबत है- भाषा क्योंकि इस्मत की कहानियों में विषय के साथ सबसे चौकाने वाली चीज़ है-‘भाषा’ आप इस अजीबो-गरीब भाषा का क्या करेंगे। ग़ालिब के अशआर का तर्जुमा यदि मुमकिन है तो इस्मत की कहानियों का भी तर्जुमा हो सकता है। मगर आप जानिए, ग़ालिब तो ग़ालिब थे, ग़ालिब का असल मज़ा तो भाषा में है। बस यहीं इस्मत को भी ‘छका’ देती है। निगोड़ी, ऐसी अजीबों-गरीब ज़बान का इस्तेमाल करती हैं कि बड़ें-बड़ों और अच्छे-अच्छों के पसीने निकल आयें। इस भाषा के लिए अलग से ‘अर्थ’ की दुकान नहीं खोली जा सकती, इसलिए ज़्यादा जगहों पर इस्मत की ख़ूबसूरत जबान से ज़्यादा छेड़-छाड़ की कोशिश नहीं की गयी है। हाँ, कहीं-कहीं हिन्दी तर्जुमा जरूरी मालूम हुआ है, तो लफ़्ज़ बदल गये हैं, तजुर्में में नबी अहमद ने सहयोग दिया है।
इस्मत अपने फ़न में, वाणी प्रकाशन की ये भी कोशिश है कि इस्मत का समग्र साहित्य को पेश किया जाए। यदि वो ऐसा करने में कामयाब होते हैं तो न सिर्फ पाठकों, बल्कि हिन्दी भाषा को समृद्ध करने की दिशा में भी एक बड़ा क़दम होगा।

 

जंगली कबूतर

 

आधे अँधेरे कमरे में, आबिदा दोनों हथेलियों से कनपट्टियाँ दबाए गुमसुम बैठी थी। रात आहिस्ता-आहिस्ता सुर्मई धुएँ की तरह कमरे में भरती जा रही थी। मगर फ़िज़ा से ज़्यादा गहरी तब्दीली उसके वीरान दिल में घुटी हुई थी। आँसुओं के सोते सूख चुके थे और पलकों में रेत खनक रही थी। पास के बंगले में टेलीफ़ोन की घंटी बराबर सिसकियाँ ले रही थी। घर वाले शायद कहीं बाहर गए हुए थे। नौकरों के क्वार्टर से धीमी-धीमी बातों और बरतनों की झनकार सुनाई दे रही थी।

हाथ बढ़ाकर आबिदा ने डबल बेड पर पड़े हुए कवर की सिलवट मिटा दी। काश, इनसान के हाथों में इतना दम होता कि दिल पर पड़ी तह-ब-तह शिकनों को भी मिटा सकता। दहशत से डरकर उसने सरहाने का लैंप जला दिया। बेड कवर की हरी और सुर्मई कलियाँ खिल उठीं...आधा पलंग जाग उठा था मगर वह हिस्सा जहाँ माज़िद सोते थे, क़ब्र जैसे अँधेरे में डूबा रहा। उनके सरहाने का लैंप आबिदा की पहुँच से दूर था और वह ये भी जानती थी कि बेड-लैंप की रौशनी उस अँधेरे को न तोड़ सकेगी, जिसमें वह डूब चुके थे।

‘इद्दत’ ख़त्म हुए भी छः माह बीत चुके थे। अम्माँ कितनी बार लिख चुकी थीं-कि बेटी ‘ढनढार’ घर में कब तक अकेली जान को घुलाती रहोगी।
मगर आबिदा ने दुख को जिंदगी का सहारा बना लिया था।
उसके पास और उनकी कोई दूसरी निशानी भी तो न थी। माज़िद के ग़म में एक पहलू और भी था। जैसे वह ख़ूब जानती थी कि डबल बेड़ का आधा हिस्सा कभी उजागर न होगा। हाथ छू जाने पर ‘उनका’ जिस्म चौंककर आलिंग्न की दावत कभी न देगा। उस कमरे में उनके बेहदख़ास सिगरेट की खुश्बू कभी न महकेगी। अब कोई स्नानघर में सुबह बड़-बड़ करके बेसुरे गीत न गाएगा। न बिना शेव किया किसी का खुर्दरा गाल ठुड्डी को छीलेगा।

ठीक खिड़की के पास चमेली की झाड़-झंखाड़ बेल पर चिड़ियाँ ऊधम मचा रही थीं। कोई बैलगाड़ी चूँ-चूँ आवाज़ करती हुई सड़क पर गुज़र रही थी। आबिदा दबे पाँव उठी, अलमारी खोल कर माजिद की एक क़मीज़ निकाली। उसे खूब दोनों हाथ से मसला। फिर बड़ी सावधानी से ज़मीन पर फेंक दी। कोट, पतलून और टाई बेढंगेपन से आधी कुर्सी पर, आधी नीचे डाल दी। दराज़ में से एक सिगरेट और लाइटर निकाला। सिगरेट सुलगाई। माज़िद की तरफ़ का लैंप ऑन कर दिया, और सुलगती हुई सिगरेट ऐश-ट्रे के ऊपर टिका दी।

एकदम कमरे की वीरानी रफू-चक्कर हो गई। आबिदा ने इत्मीनान से झूलने वाली कुर्सी पर बैठकर माज़िद का स्वेटर बुनना शुरू कर दिया।
मकन बाजी की शादी में पहली बार बारातियों के साथ क़हक़हे लगते उसने भाई माज़िद को देखा था। वह उसके दूर के रिश्ते की मौसी के बेटे थे। देखा नहीं था, मगर सुना बहुत कुछ था उनके बारे में। बड़े फ़्लर्ट हैं। अनगिनत नाकाम और कामयाब इश्क लड़ा चुके हैं। हर साल उड़ती-उड़ती ख़बर आती थी कि भाई माज़िद ने किसी एक्ट्रेस से शादी कर ली। फिर सुनते, शादी होने वाली है। मगर किसी दोस्त की तलाक़शुदा बीवी से। कभी सुना, एक लेडी डॉक्टर पर मेहरबान हैं। सिविल मैरेज होने ही वाली है। और वह स्कूल टीचर, जिससे बेहद दोस्ती थी खुदकुशी की धमकी दे रही है। ये बातें सुन-सुन कर बहुत सारा ग्लेमर उनके लिए पैदा हो गया था। भाई माज़िद के व्यक्तित्व से लड़कियाँ मज़े ले-ले कर उनके इश्क के तजुर्बों पर चुहलबाज़ियाँ करतीं।

बजिया की शादी के बाद ख़ानदानी दावतों में भाई माज़िद को और क़रीब से देखने का मौक़ा मिला। कहीं से भी यसुफ़* द्वितीय न थे, लेकिन था कोई चार्म कि मिलकर कुछ जी जलता, कुछ दिल में गुदगुदियाँ-सी होतीं। कई लड़कियाँ तो बेतरह आशिक भी हो चुकी थीं और भाई माज़िद से छेड़ी जाती थीं।

‘‘अच्छा तो आप हैं आबिदा !’’ उन्होंने छूटते ही छींटा कसा था।
‘‘जी क्या आप से किसी ने मेरी शिकायत की ?’’ आबिदा ने चट से जवाब दिया।
‘‘आं...नहीं तो, शिकायत तो नहीं की, ये मैंने कब कहा ?’’
‘‘आपने कहा तो कुछ इसी अंदाज़ में।’’
‘‘चेहरा पहचानने में भी माहिर हैं आप ?’’

‘‘जी, शुक्रिया !’’ और वह बड़ी तेज़ी से मुड़कर ख़ाला बेगम का हाथ बँटाने डाइनिंग रूम में चली गई थी। उसे गुस्सा आ रहा था क्योंकि उसका दिल ख़्वहमख़्वाह इस बुरी तरह धड़क रहा था।
‘‘ए बी, ज़रा खीर के प्यालों पर पिस्ते की हवाइयाँ तो कतर कर छोड़ दो, ये लड़कियाँ तो खुदा जाने क्या पच्चीकारी कर रही हैं।’’ ख़ाला बेगम ने प्याज़ के लच्छे सीख़ कबीब की डिश में जमाते हुए कहा।

आबिदा ने देखा-चार पाँच लड़कियाँ दो खीर के प्यालों पर बजिया और उनके दूलहा का नाम पिस्ते की हवाइयों से लिखने में जुटी हुई थीं। वह झुक कर पढ़ने लगी तो शबाना ने शरारत से उसके होठों पर चाँदी का वर्क़ लगा दिया। शबाना भाई माज़िद की छोटी बहन थी। वह हर लड़की को भाभी कहकर चिढ़ाया करती थी।
खाना खिलाते में वह भाई माज़िद के पास गुज़री तो उन्होंने
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• पैगम्बर, जिनकी सुन्दरता का तज़किरा क़ुरान-शरीफ़ में आया है।

छींटा कसा।
‘‘लोग ख़ातिर-मदारन की आड़ में तर-माल उड़ा रहे हैं।’’
‘‘अच्छा आप अंदर की बात भी जानते हैं या ऐनक में एक्स-रे लगी है जो पेट के अंदर का हाल मालूम कर सकती है।’’ उसने खट्टेपन से जवाब दिया, खुदा समझें, दिल फिर कुलांचें भर रहा था।
‘‘पेट का एक्स-रे करने की ज़रूरत नहीं, होठ जुर्म की गवाही में खुद बोल रहे हैं।’’ तब चुड़ैल शबाना खिलखिलाने लगी थी। पोंछने के बाद भी होठों पर चाँदी के वर्क़ का असर बाकी था।
लेकिन जब उसकी नज़र भाई माज़िद के सामने रखे खीर के प्याले पर पड़ी तो दम निकल गया। ‘‘आबिदा-माज़िद’’। पिस्ते की हवाइयों से लिखा हुआ था।
उसने चाहा प्याला बदल दे। मगर हाथ बढ़ाया तो माज़िद ने रोक दिया।
‘‘जी ये मेरे हिस्से का है।’’
‘‘मैं...मैं...वह...मैं दूसरा ला देती हूँ’’ वह बौखला गई। ‘‘अगर अम्मी ने प्याला देख लिया, या किसी बूढ़े-बुढ़िया की नज़र पड़ गई तो क़यामत टूट पड


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