प्रजा का राज - बीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य Praja ka Raj - Hindi book by - Birendra Kumar Bhattacharya
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प्रजा का राज

बीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य

प्रकाशक : साहित्य एकेडमी प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2118
आईएसबीएन :81-7201-534-8

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प्रस्तुत है असमिया उपन्यास.....

Praja Ka Raaj

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


बर्मी सीमान्त प्रान्त से लगा छोटा-सा गाँव है उखूल-एक नगा गाँव। एक मित्र के आग्रह पर युवा बीरेन्द्र विज्ञान के अध्यापक होकर इस गाँव में चले आये। ‘दैनिक असमिया’, ‘जनता’ और ‘रामधुन’ जैसी पत्र-पत्रिकाओं में पत्रकारिता का अनुभव तो था ही, लेकिन अध्यापन को उन्होंने चुनौती के रूप में स्वीकार किया था। दो जोड़ी कपड़े और पुराना फौजी ग्रेट कोट ही उनका सम्बल था। पूरे चार वर्ष तक इस प्रवास और परिवेश में एक नये बीरेन्द्र को अपने हाथों से दोबारा गढ़ा। प्रश्नों ने उनको नये सिरे से सिरजा। उन दिनों फ़ीजो इस प्रयत्न में लगे थे कि नया युवक पृथक्तावादी आन्दोलन में सम्मिलित हो जायें। जापानी सैनिकों द्वारा नगा प्रदेश (नगालौण्ड) पर बर्बर आक्रमण और उनके दमन एवं अत्याचार से जूझ रही नगा जाति की तड़प को बीरेन्द्र बाबू ने बहुत निकट से देखा। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से आन्दोलनरत लेकिन असमंजस में पड़े युवकों को भारतीय राष्ट्रीयता की मुख्य धारा में बनाये रखा। उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशालता और जातिगत वैविध्य की अनुभूति से अपने अनुभव को समृद्ध किया और प्रजा का राज (इयारुइंगम) में अपना विचार इस प्रकार व्यक्त किया-

‘‘टांखुल नगा जाति के बीच निवास करने के दौरान मैंने उनके विचित्र जीवन के अंतरंग प्रकोष्ठ में प्रवेश करने का यत्न किया था। एक कथा-सर्जक और कवि-दृष्टि से जहाँ तक सम्भव है, मैंने उन लोगों के अन्तर्जगत में गहराई से झाँकने की कोशिश की। मेरे लिए यह कार्य ऐसी चट्टान साबित हुई, जिसे पूरी ताकत लगाकर भी, तिल भर हिलाना मुश्किल था। मगर मन को तो जैसे किसी ने मोह लिया था। यह कोई आदिम भाव या मोह नहीं था, फिर भी नजाने क्यों उसी भाव के भीतर से मैंने अभिनव मानव जीवन के ऐसे कुछ उपादानों को पाया था, जिन्हें हम ढूँढ़ते रहते हैं। भिन्न परिवेश में पहुँचने पर जीवन के प्रश्न और प्रसंग बदल जाते हैं, लेकिन जीवन की सार्थकता से जुड़े रहनेवाले मूल प्रश्न बराबर बने रहते हैं, जो सर्जक मन को भटकाते रहते हैं।’’


निवेदन



‘यारुइंगम’ (प्रजा का राज) उपन्यास लिखकर समाप्त किए हुए आज लगभग तीन वर्ष हो गए। काफी दिनों बाद अब जाकर यह रचना प्रकाशित हो पा रही है। देर के कारणों की चर्चा करना अनावश्यक है।
इस उपन्यास के चरित्र पूरी तरह से काल्पनिक हैं। उनके भाव, भाषा, कथोपकथन, नाम और उनकी विचरण-स्थली सभी कुछ मेरे मन की सृष्टि है।

टांखुल नगा प्रदेश में निवाश करते समय मैंने उन लोगों के विचित्र जीवन के अन्दर प्रकोष्ठ में प्रवेश करने का प्रयत्न किया था। जहाँ तक काव्य दृष्टि जा सकती है, मैंने उन लोगों के अन्तर्जगत में वहाँ तक की गहराई से देखने का प्रयास किया था। परन्तु सच यह कि वह कार्य मेरे लिए ऐसी चट्टान साबित हुआ जिसे बल लगाकर भी हिलाया न जा सके; मगर मन को तो जैसे किसी ने मोह लिया था। यह आदिमता का मोह नहीं था, फिर भी जाने क्यों उसी आदिमता के भीतर मैंने मानव जीवन के ऐसे कुछ उपादानों को देखा था, जिन्हें हम ढूँढ़ते रहते हैं। भिन्न प्रकार के परिवेश में पहुँचने पर जीवन के भिन्न रूप सामने आ जाते हैं। ऐसे समय में हम जीवन को अधिक व्यापक, विशाल और ऐतिहासिक रूप में अनुभव कर सकते हैं।
नगा लोग भी मनुष्य हैं, परन्तु कुछ विशेष किस्म के मनुष्य हैं वे। उन लोगों के हृदय के ऊपर जो लौह-कवच पड़ा है, उसके अन्तराल में सनातन मानवता का अपूर्व रूप-कुशुम खिला हुआ है। उसकी सुगंध मन को मतवाला बना देती है, सैन्दर्य चित्त को चुरा लेता है, सत्य वीनस की मूर्ति के रूप में हमारे समक्ष साकार हो उठता है। अपनी इस रचना में मैंने उन्हीं रमणीय तत्वों को कुछ आभा, देने का प्रयत्न किया है। इसमें कहाँ तक सफल हो सका हूँ, कह नहीं सकता।

इसका नामकरण करते समय नाना प्रकार के द्वन्द्वों-दुविधाओं से होकर गुज़रना पड़ा है। पहले के जिन नामों को छोड़ दिया गया था, वे अब मन को परेशान नहीं करते। परन्तु एक-एक नाम को मन की डलिया से निकाल फेंकने में कितना तनाव भुगतना होता है, इसे नाम खोजने-ढूढ़ने वाले और नामकरण करने वाले ही जानते हैं। नवजात शिशु का नामकरण करने की भांति ही नई रचना का नामकरण करना भी बड़ा कठिन होता है।

‘यारुइंगम’ टांखुल नगा-भाषा का शब्द है। किसी-किसी नगा गृहस्थ के मकान के सामने एक विशेष प्रकार का छतनार वृक्ष लगा हुआ दिखाई पड़ता है, जो उस घर की अवस्था का सूचक होता है। मैंने अपने इस उपन्यास के मुख-द्वार पर ‘यारुइंगम’ शब्द को रोप दिया है, जो इस उपन्यास के विशेष परिवेश की जानकारी प्रदान करेगा।
इस रचना को लिखते समय और लिख चुकने के बाद भी, छुई-मुई (लाजवन्ती) लता की भाँति छूने भर से मुरझाये मन को मेरे कुछ एक मित्रों ने उत्साह से सींचकर उसे बराबर उत्फुल्ल बनाये रखा था। उन लोगों के प्रति मेरी सीमातीत कृतज्ञता अर्पित है। जिस समय, जिस वस्तु की आवश्यकता हो, उस समय उस वस्तु का दान दे सकने की क्षमता सबकी नहीं होती। उसके लिए तो पर्याप्त त्याग की आवश्यकता होती है। जो इस रूप में दे सकता है, उसका दान साधारण होने पर भी चिरस्मरणीय होता है। इस तरह की वस्तु मैं अपने इष्ट-मित्रों में सदा पाता आया हूँ और आशा करता हूँ कि आगे भी पाऊँगा।

मैं क्यों लिखता हूँ ? लिखने के लिए क्या सचमुच मेरे पास कुछ है ? किसके लिए लिखता हूँ ? ऐसे कुछ प्रश्न मेरी लेखनी को कभी-कभी कँपा डालते हैं।
हालाँकि इस तथ्य को मैं स्वीकार करता हूँ कि लिखने के लिए सचमुच ही किसी प्रयोजन का अनुभव मैं सदैव करता आया हूँ, परन्तु लगता है कि अन्तर के सत्य को सुन्दर रूप प्रदान कर बहिर्जगत के समक्ष प्रस्तुत कर पाने में जैसे अभी भी मैं सक्षम नहीं हो पाया; ऐसी अनुभूति से अक्षमता की भावना मन को आर्द्र कर देती है और तब मैं असहाय-सा अनुभव करता हूँ। परंतु साथ-ही-साथ जिन लोगों के लिए लिखता हूँ, उन लोगों के प्रेम, उनकी दया पाने के लिए मन फिर आतुर हो उठता है।
जब उन लोगों की प्रतिक्रिया जान सकूँगा, तभी मैं समझूँगा कि सत्य को सुन्दर बना पाने की शक्ति मुझमें कितनी है ? अभी, तो ऐसा महसूस होता है जैसे वह शक्ति मुझमें है ही नहीं।

गुवाहाटी
7-10-60




बीरेन्द्र भट्टाचार्य



एक



हवा में तिरती मिट्टी की सोंधी-सोंधी गंध आकर नाक में समा गई। वह थकी-सी चारपाई पर निढ़ाल हो पड़ी हुई थी। इश्वेवरा अपने जूतों के फीते बाँध रहा था। एकाएक उसके मन में इश्नेवरा के प्रति घृणा उमड़ आई। अगर उसके प्रेम में गहराई रही होती, तो वह इस तरह उसे शत्रुओं के पंजों में छोड़कर कभी नहीं जाता। जयथार के मैदान से उसे पकड़कर यहाँ लाये हुए आज पूरा एक वर्ष हो गया। इस एक वर्ष में उसने जब भी पूछा है, तब इश्वेवरा ने एक ही बात कही है-‘वह उसे छोड़कर कभी नहीं जायेगा।’’ परंतु आज जैसे ही जापानी सेना की टुकड़ी के सैनिक लौट जाने के लिए तैयार हुए हैं, उसके साथ जाने में इश्वेवरा को तनिक भी देर नहीं लगी। अब तो शारेंला के बारे में चिन्ता करने के लिए इश्वेवरा के पास समय ही नहीं है।

अपनी ख़ाकी कमीज़ पर रायफल डाल, इश्वेवरा उसके बिलकुल निकट आकर खड़ा हो गया। उसके कपड़ों की तीखी गंध उसकी नाक में आ चुभी। शारेंला के मन की घृणा भावना और भी भड़क उठी। दरवाज़ा खुला होने के कारण उसके अन्दर आ रहे उजियारे में भीतर का सारा परिवेश अच्छी तरह स्पष्ट हो रहा था। शारेंला को लगा जैसे इश्वेवरा के कामाशक्त दोनों ओंठ धीरे-धीरे उसके मुँह की ओर झुकते चले आ रहे है।
‘‘ऊँहुक !’’ कहते हुए वह झटपट उठ बैठी। रंगीन चादर छाती के नीचे खसक जाने के कारण उसकी खुली हुई अंगिया की फाँकों से झाँकता उसका गोरा चिकना वक्ष लुभाता-सा झलक उठा। इश्वेवरा ने सर झुकाकर चूम लेने को जैसे ही कोशिश की अकस्मात् उसकी नाक में दो बूँद आँसू आ टपके।
‘‘तुम भी इन सब सैनिकों जैसे बुरे आदमी हो, ‘‘आँखों से बहते आँसुओं को पोंछते-पोंछते शारेंला ने कहा। उसके छिटके-छितराये केशों में अपने दाहिने हाथ की अँगुलियाँ फिराते उन्हें सँवारते हुए प्यार से उसने कहा—‘‘मैं तो फिर लौट आऊंगा न !’’

‘‘झूठ !’’ इश्वेवरा के वादे के भुलावे में न आकर उसने अपने माथे पर धरे हुए उसके हाथ को धीरे-से परे हटा दिया।
इस कपटी छलिया विदेशी सैनिक की संतान अभी भी उसके गर्भ में विद्यमान है। इस तथ्य को जानते हुए भी वह उसे यूँ छोड़कर चला जाना चाहता है। परंतु उसकी देह का भोग करते समय तो उसने खुले दिल से आश्वासन दिलाया था कि जीवन-मरण में, वह अब सदा के लिए उसी का रहेगा। उन बातों की याद दिलाने पर भी उसे कोई पश्चाताप न हुआ। स्त्री की अपेक्षा उसके लिए जापान के सम्राट हिरोहितो का आदेश ही बड़ा है और यदि यही सच है, तो फिर उसने उसके साथ यह छल-कपट क्यों किया ? स्त्री का मन, स्त्री की देह सैनिकों के खेलने भर की चीज़ हैं ?
हताश-निराश इश्वेवरा काठ-सा कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा। उसके बाद बोला, ‘‘मैं यहाँ अगर रुक भी जाऊँ तो वे मुझे कुत्ते की मौत मार डालेंगे।’’
‘‘कौन ’’’

‘‘वही गोरे अंग्रेज़ साहब लोग। इसी कराण यहाँ रहने से कोई लाभ नहीं।’’
अबकी बार शारेंला को उसकी बातों पर विश्वास हो गया।—‘तो फिर चलो हम कहीं भाग चलें।’’
सर हिलाते हुए इश्वेवरा ने कहा—‘‘कोई लाभ नहीं। तुम्हारे अपने नगा लोग ही मुझे पकड़वा देंगे।’’
उसकी इस बात पर विश्वास न कर शारेंला ने कहा—‘‘नहीं पकड़वायेंगे।’’
इश्वेवरा ने समझाया—‘‘देखो ! युद्ध की बातें, तुम कुछ भी नहीं जानती। मैं अगर आज यहाँ से चला जाऊँ, तभी अधिक दिनों तक जीवित रह सकने की आशा है। और अगर यहीं ठहरा, तो फिर आज ही मारा जाऊँगा।’’
शारेंला की पहले ऐसी धारणा था कि वह युद्ध के बारे में बहुत कुछ जानती है, पर अब उसे लगा कि उसे बहुत कम बातों की जानकारी है। फिर भी उसने बड़े सरल भाव से पूछा—‘‘अच्छा, अगर तुम यह रायफल-ठाइफल सब कुछ उतार फेंको, तब ?’’

एकाएक दूर उसके दल के नायक की कड़कड़ाती आवाज़ सुनाई पड़ी—‘‘इश्वेवरा !’’ उसे चल पड़ने के लिए बुलाया जा रहा है। इश्वेवरा के चेहरे का रंग उड़ गया।
‘‘अगर अब भी मैं न जाऊँगा, तो यही मुझे मार डालेगा।’’
शारेंला की देह थर-थर काँपने लगी। अबकी बार उठकर उसके पास पहुँच गई और अपनी देह की सारी शक्ति लगाकर उसे अपने अलिंगन में कसते हुए बोली—‘‘मैं तुम्हें कहीं भी जाने न दूँगी।’’

इश्वेवरा का झँवाया चेहरा और भी फीका पड़ गया। असहाय व्यक्ति की तरह शारेंला के चेहरे की ओर निहारकर उसने कहा—‘‘मैं फिर लौट आऊँगा। अगर अब थोड़ी-सी भी देर हो गई तो वह घर के अन्दर घुस आयेगा।’’
शारेंला के दोनों हाथ ढीले पड़ते-पड़ते अन्ततः उसके शरीर पर से धीरे-धीरे अलग हो गये। मानो सारी धरती निर्थक सूनेपन से भर गई हो। अपने आपको किसी तरह सँभाल कर इश्वेवरा ने उसके छरहरे बदन को बड़ी कोमलता से अपनी देह से चिपका लिया। शारेंला की छाती उसकी छाती से आ लगी। कुछ क्षणों के लिए उसके हृदय की सारी विकलता, सारे हाहाकार उसके धधकते हृदय में पड़कर जैसे छार-खार हो गये। तभी कहीं पर एक हारीप पक्षी (हरे रंग का कबूतर-हाइठा) अपनी गुड़ुक-गुड़ आवाज़ में पुकार उठा। घर के एक कोने में सुअर के बच्चे भूख से विकल हो चीख़ने लगे। बाहर के देवदारुवन की ओर से सनसनाती तीखी बयार का एक हिलकोरा घर के अन्दर आ घुसा और उसी अवस्था में ठिठुरा गया।
इश्वेवरा ने अपने आप को बिल्कुल अकेला-सा अनुभव किया। शारेंला जमी हुई बर्फ़-सी उसकी छाती से चिपकी रही। काल और चराचर ब्रह्माण्ड जैसे एकाएक निश्चल हो गये हों।

बाहर अकेले खड़े भोज वृक्ष से बड़ी तेज़ हवा का झोंका आया। हवा के झोंके की सनसनाहट में एक करुण आवाज़ आकर इश्वेवरा के कानों में पड़ी। उसने शारेंला को अपने बाहु-बंधन से छोड़ दिया और अचकचाकर बाहर की ओर देखा। तभी उसका विश्वासपात्र कुत्ता आबेई भौंकता हुआ आ पहुँचा। आते ही उसने अपने अगले पैरों के पंजों से उसके बूट को खरोंचते हुए उसे मुँह की ओर देख-देख कर चिरौरी भरे सुर में कुछ कहना चाहा। इश्वेवरा के मन में तत्परता लौट आई। आबेई की ओर बड़े ध्यान से देखते हुए, शारेंला की ओर देखे बिना ही उसने कहा—‘‘अब मैं यहाँ क्षण भर भी नहीं ठहर सकता, वे बस आ ही पहुँचे हैं।’’
‘‘कौन हैं वे ?’’—इश्वेवरा के संग सुख में आत्मविभोर शारेंला ने बात के संकेत को न समझ पाने के कारण पूछा।
‘‘गोरे सिपाही।’’

डरे और कोंय-कोंय करते पास खड़े आबेई के चेहरे की ओर देखकर शारेंला का चेहरा फिर काला पड़ गया। निश्चय ही आबेई बुरी ख़बर लाया है, वे सचमुच ही आ पहुँचे हैं, इस दशा में वह चुपचाप, उदास नजरों से, हवा के हिलकोरों में काँपती भोजवृक्ष की पत्तियों की ओर देखती रही।
इश्वेवरा ने उसकी ओर एक बार भी देखे बिना ही कहा, ‘तुम्हारे पास यह आबेई रहेगा। और—इतना कहते ही उसके कुम्हड़े की तरह फूले पेट की ओर देख कर वह एकाएक और कुछ भी कह पाने में असमर्थ हो गया। पितृत्व के उत्तरदायित्व का निर्वाह न कर पाने के पाप-कर्म के कारण उसका विवेक अन्तर्वेदना के मारे काँप उठा। लेकिन युद्ध तो कोई नियम-कानून नहीं मानता। अपने आपको पुनः सँभालते हुए, संयत होकर उसने कहा—‘‘मैं फिर आऊँगा। इस पृथ्वी पर सदैव तो युद्ध नहीं जगा रहेगा। आबेई को तुम्हारे पास रखे जा रहा हूँ।’’

अपने मालिक के निर्णय से असंतुष्ट होकर आबेई अपनी पूँछ हिलाकर, उसके दोनों पैरों के बीच में घुसकर, उसकी ओर अपना मुँह उठाकर विनती करने लगा।
शारेंला ने अनुभव किया कि उसके पेट में स्थित संतान के अलावा इश्वेवरा की ओर से कोई भी चीज़ उसके पास नहीं रहना चाहती। भाग्य ही उन्हें अलग करवा रहा है। ‘‘आबेई भी तुम्हारे साथ ही जाये।’’—उसने बेहिचक मत प्रकट कर धीरे से अपना मुँह दूसरी ओर घुमा लिया और आँखों में उमड़ते आँसुओं को आँचल के छोर से पोंछ दिया। उसके बाद एक अपूर्ण साहस के साथ उसके बिल्कुल करीब जाकर खड़ी हो गई तथा जितना हो सके सहज स्वाभाविक होकर उसने कहा—‘‘ठीक है, जाओ ! अब देरी मत करो। मेरे भाग्य में जो बदा है, वही होगा।’’

इश्वेवरा ने महसूस किया कि अब पल भर की देरी करना भी विपत्ति का कारक है। उसने बड़ी कातर दृष्टि से एक बार उसके चेहरे की ओर निहारा। मुँह से एक शब्द भी कहे बिना, वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता दरवाज़े से बाहर निकल गया। और कुछ दूर जाकर आँखों से ओझल हो गया। एक अपूर्व शहनशीलता से अपने आप को सँभालकर, शारेंला ने दरवाज़े की ओर देखे बिना ही चुल्हे की बुझी आग और साग-सब्जियों से भरा हुआ कनस्तर चूल्हे की आग पर चढ़ा दिया।

थोड़ी देर बाद ही भात के दाने एवं सब्जियाँ वगैरह उबलने लगे। दोनों के उबलने की खदखदाहट की आवाज़ सुनकर उस खाली घर के दरवाज़े पर कई सुअर आ खड़े हुए और खाने के लिए लगातार रोने-चिल्लाने लगे कि सुनना असह्य था। उसी प्रकार का विषाद-अवसादपूर्ण राग शारेंला के हृदय में भी बज रहा था, परन्तु निर्दयी भाग्य के समक्ष आत्म-समर्पण कर देने की एक अद्भुत् शक्ति उसने भाग्य के साथ समझौता कर लेने का निश्चय कर लिया। परदेशी सैनिकों के हाथों बन्दिनी होने को विवश हो जाने के अनन्तर उसने अपनी जो चीज़ गँवाई, वह स्त्री-जीवन की सर्वश्रेष्ठ सम्पदा है। अब तो वह मात्र एक पतिता भर है। हां, अपनी नज़रों में वह किसी रूप में पतिता नहीं हो सकती, क्योंकि बाध्य होकर ही सही, उसने अपने एकान्त मन से इश्वेवरा को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया था, परिणामस्वरूप अब उसके अतिरिक्त कोई और उसका पति नहीं हो सकता। परन्तु इश्वेवरा ने आज उसे यूँ त्याग कर जो अपराध किया है वह अक्षम्य है—इसके लिए वह उसे कभी भी क्षमा नहीं कर सकेगी।

सुअर सब अपने थूथनों की रेल-पेल से चभर-चभर अपना खाना खाने में जुटे हुए थे; तभी अचानक उसे अहसास हुआ कि दक्षिण दिशा की ओर अनेक बमवर्षक विमानों की उड़ती कतारें आकाश में छा गई हैं। ऐसे में डर के मारे वह चीख़ पड़ी, और सूअरों को खाना परसने की जो करछुल उसने हाथ में पकड़ रखी थी, उसे बाहर के आँगन में फेंक, वह पास की आपात-छावनी (रेड-एलर्ट शेल्टर) की ओर भागी। दौड़ते-भागते यहाँ घुस जाने के बाद हाँफते-हाँफते उसने बाहर की ओर झाँककर देखा कि कानों के पर्दे फट जायें, ऐसे भीषण विस्पोट के साथ सारा-का–सारा गाँव धू-धू कर राख होने लगा है। अचानक उसका माथा बड़े ज़ोरों से चकराया। फिर कुछ देर बाद आँखों के सामने की धरती भी तेज़ी से घूमने लगी और बमों के प्रचण्ड धमाकों के बीच उसकी बाहरी चेतना ही विलुप्त हो गई।

जब उसने फिर से आँख खोली, तब उसे बनैले गुलाब की सुगंध आई। आँखें खोलकर कुछ दूर तक दृष्टि दौड़ाई तो देखा कि दो हाथ की दूरी पर गुलाब के कई पौधे फूलों सहित लदे-बदे सारे परिवेश को सुवसित कर रहे हैं। गुलाब के पौधों के उस ओर क्रमशः ऊँचा उठता चला गया एक टीला है। टीले की चोटी पर से प्रातःकाल का निर्मल, शान्त आकाश ऐसा लग रहा है कि मानो हाथों से छुआ जा सकता हो। थोड़ी देर पहले बमों के जो धमाके सुनाई पड़े रहे थे, वह सब अब बिल्कुल शान्त हैं। माथे के अन्दर वह अभी भी झनझनाहट महसूस कर रही थी। लेकिन आँखें और मुखमण्डल बहुत शीतल लग रहे थे, मानो बहुत दिनों से मन जिस थोड़ी-सी शांति की चाह कर रहा था उसी शांति को उसने घड़ी भर में पा लिया है।
दाहिनी ओर की पगडण्डी के किनारे फुटुका (एक जंगली पौधा, जिसके एक ही गुच्छे में सफेद, हल्के पीले और केसरिया रंगों वाले फूल खिलते हैं।) की झाड़ियों के पास कोई चीज खड़खड़ाई। चौंककर वह उठ बैठी। फिर ध्यान से देखा। एक सुअर बेखबर-बेपरवाह हो अपनी टाँगों से गड्ढा खोद रहा है। अब की बार उसने आंखें घुमाकर सिरहाने की ओर आँखें दौड़ाई तो डर के मारे चीख़ पड़ी। उसके सर के नीचे किसी का लम्बा कोट तह लगाकर रखा हुआ है। तब जाकर उसे चेत आया कि वह यहाँ तक अपने आप नहीं आई है। जब वह आपात् में भीतर गई थी, उसके बाद क्या कुछ हुआ ? इस संबंध में उसे कुछ पता नहीं। यहाँ एक कोमल ठण्डी घास पर उसे किसने सुलाया ?

अब वह उठ खड़ी हुई। धीरे-धीरे पांव बढ़ाती हुई कुछ कदम चलकर गुलाब के पौधों के पास जाकर खड़ी हुई और गुलाब के फूलों पर हाथ फेरती हुई, उन्हें हिला-हिलाकर प्यार करने लगी। एक कुम्हलाये हुए फूल पर एक भौरे को बार-बार बैठते, फिर निराश हो परे उड़ जाते देख उसका हृदय किसी अज्ञात कारण से भर आया। उसने दूसरे खिले फूलों पर नज़र डालकर लम्बी-सी आह भरी। पूरब दिशा के बादलों को चीरता हुआ सूर्य बाहर निकल रहा था। जंगल में रास्ता ढूँढ़नेवाले शिकारियों की तरह सूर्य के शुभ मुख पर एक प्रकाशयुक्त खोजी दृष्टि उभर आयी थी। ऐसा लगा जैसे वह इश्वेवरा के देश से चलता–चलता यहाँ शारेंला के देश में आ पहुँचा है।
इश्वेवरा की बातें याद आने के साथ ही साथ शारेंला का कलेजा काँपने लगा। उसके दोनों हाथ सुन्न-से हो गये। गर्भ के भीतर उसने वेदना का अनुभव किया। इश्वेवरा के आज के व्यवहार से वह इतनी विक्षुब्ध थी कि उसके अंतर में उसके प्रति घृणा का भाव भी अंकुरित हो गया था।

अचानक उसके मन में यह जानने की उत्सुकता जागी कि गोरे सैनिक आये अथवा नहीं ? गाँव का कितना नुकसान हुआ और उसे इस टीले पर कौन उठा लाया ? अपने आप को निपट असहाय समझकर वह अत्यन्त व्याकुल हो गई डरते-डरते, एक पग, दो पग बढ़ाती वह धीरे-धीरे टीले की चोटी पर जा चढ़ी।
चोटी पर सबसे पहले उसे गिरजाघर (चर्च) दिखाई पड़ा। गिरजाघर का ऊपरी शिखर तब भी धू-धू जल रहा था। आज पूरे एक वर्ष के बाद गिरजाघर पर उसकी दृष्टि पड़ी। अभी तक वह इश्वेवरा का निर्देश मानकर निर्धारित सीमा क्षेत्र से अधिक दूर घूमने-फिरने भी नहीं निकली थी। आज जल-जल कर राख होते गिरजाघर की ओर देखकर उसका हृदय टूक-टूक हो गया। एकाएक वह घुटने टेककर बैठ गई और प्रभु से प्रार्थना करने लगी—‘‘हे भगवान ! मुझे थोड़ी-सी शांति दो’’ परंतु कुछ क्षणों के बाद ही इस तरह की प्रार्थना की निरर्थकता पूरी तरह उसके समक्ष स्पष्ट हो गई। उसे लगा भगवान से भी बड़ी भयानक कोई और शक्ति इस धरती पर है, जिस शक्ति के बल पर प्रमत्त हो, आदमी सुअर की तरह कोंच-कोंचकर दूसरे आदमी की हत्या करके अकल्पनीय तृप्ति का अनुभव करता है।

एक दिन आदमी ने ही इस गिरजाघर का निर्माण किया था और फिर आदमी ने ही इसे तहस-नहस कर डाला। यदि भगवान सचमुच ही कहीं होता तो ऐसे चुपचाप इस मृत्य और विध्वंश-यज्ञ को कैसे सहन कर सकता ?
वह उठ खड़ी हुई। गाँव के सारे घर अभी तक धधककर जल रहे थे। प्रत्येक टीले के ऊपर राख की काली चादर पड़ गई थी। लाल-लाल अंगारे सुलग-सुलग कर जल रहे थे। गर्म हवा के झोंकों ने एक चिन्गारी को उड़ा लाकर उसी टीले पर गिरा दिया, जहाँ वह खड़ी थी। थोड़ी दूर पर कुछेक जिन्दा बचे मुर्गे या सुअर के बच्चे प्राण बचाने के लिए जलते हुए अंगारों से जहाँ तक हो सके दूर भाग रहे थे। उसे चिन्ता हुई, उसके अपने जो सूअर थे, वे किधर गये ?
तब तक आकाश स्वच्छ-शांत हो गया था। आसमान में कहीं बादल नहीं थे। उसने मुँह घुमाकर दक्षिण दिशा की ओर देखा। काफी दूर पर स्थित शिरई गाँव के ऊपर सेआग की लपटें उठती दिखाई पड़ रहीं थीं। उनके अपने टांखुल गाँव का तो सम्भवतः अब कुछ भी नहीं बचा होगा, कितने सारे लोग निराश्रय हो गये, इसका कोई ठिकाना नहीं।

अचानक ही कुछ लोगों की बातचीत सुनकर उसने टीले से नीचे की ओर मुड़कर देखा। नाजेक, गँठिंगखू और रिश्वांग उसी की ओर देख-देखकर कुछ विचार-विमर्श कर रहे हैं। पिछले एक वर्ष उसने अपने गाँव के किसी भी आदमी का चेहरा तक नहीं देखा था। वे लोग जंगल के भीतर कहीं घर बनावाकर रह रहे हैं, ऐसा उसने सुना था, परन्तु कभी उन लोगों से मिलने का मौका उसे नहीं मिला था। अब क्या वे लोग उसे पहले की तरह ही अपनायेंगे ? युद्ध के पहले गाँव के लोग उसे गांव का गुलाब कहकर छेड़ते थे, परन्तु आज तो वह एक मुरझाया हुआ फूल भर रह गई है। जापानी सैनिक ने उसकी देह को कलुषित कर दिया है। इस कलंक के बाद अब वह गाँव की उन्मुक्त किशोर बेटी बनी नहीं रह सकती। अब तो वह कलंकिनी है, पतिता है। हे भगवान ! इस तरह का निरर्थक जीवन जीने से पहले ही बमों की चपेट में आकर उसके प्राण क्यों नहीं चले गए ?

उसके वहाँ रहते ही नाजेक और गाँठिंगखू दोनों रिश्वांग के साथ विचार-विमर्श समाप्त कर जिधर से आये थे, उसी रास्ते से लौट गए। झाड़ी के पास रखे लम्बे कोट को पहनकर, कंधे पर रायफल लिये धीरे-धीरे टीले पर चढ़ता हुआ रिश्वांग उसके पास आ गया। रिश्वांग के सर के बाल ललछौंहे हो गए थे। दोनों आँखें बत्तख के मटमैले अण्डों की तरह पीली-पीली सी लग रही थीं। उसके दोनों गालों की हड्डियाँ उभर आने के कारण उसके यौवन का रूप भी कुछ कुम्हला गया था। रायफल पकड़नेवाले दाहिने हाथ की चमड़ी की पहले की कोमलता समाप्त हो गई थी। निकट आते ही उसने दो बार खँखारा, फिर शारेंला को सर से लेकर पाँव तक बड़े गौर से देखा, उसके बाद पूछा—‘‘लोगों का कहना है कि तुम किसी जापानी के संग रही थीं ?’’

उत्तर में कोई और बात न करके शारेंला ने सर हिलाकर स्वीकृति जताई। न्यायाधीश के सामने कोई अपराधी अपने आप को जैसे बहुत लघु महसूस करता है, वैसे ही उसने भी रिश्वांग के तीखे और सीधे प्रश्न के आगे अपने आप को बहुत छोटा अनुभव किया।
‘‘नाजेक और गाँठिंगखू ने मुझे सबकुछ बता दिया है।’’
‘‘सब बता दिया है ?’’ उसने आश्चर्य चकित होकर पूछा, ‘‘पर उन्हें पता कैसे चला ?’’
‘‘हमारे गाँव के लोग तुम्हारी सारी करतूत जान गए हैं।

शारेंला कुछ नहीं बोली। वह एक अपराधिनी है, इस बारे में उसे खुद भी कोई संदेह नहीं था। इसे लेकर बहस करने से भी कोई लाभ नहीं है। अब समाज उसे पुनः स्वीकार नहीं करेगा—इसका आभास उसे बहुत पहले ही हो चुका है। परन्तु वे उसे एक पतिता की तरह भी किसी के आश्रय में रहने देंगे या नहीं ? अब तो असली सवाल यही है। रिश्वांग का चेहरा देखकर उससे यह पूछने का साहस वह नहीं कर सकी।

रिश्वांग के ललाट की रेखाओं में बल पड़ गये। उसके बाद उसने एक गहरी निःश्वास छोड़ी। शारेंला ने हैरानी से उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर कठोरता का कोई भाव नहीं था, बल्कि ऐसी उदासी छायी थी जिसे समझ पाना सम्भव नहीं।
हताश-निराश दृष्टि से उसने शारेंला के चेहरे की ओर निहारा। शारेंला की दोनों आँखें अंदर धँस गई हैं। दोनों गाल पीले पड़ गये हैं। वक्षस्थल के दोनों स्तन लटक गये हैं और पेट का निचला भाग मोटा हो गया है। दुश्मनों की सेना के किसी अज्ञात सैनिक की और संतान का भार वह ढो रही है। इस बारे में अब रिश्वांग को तनिक भी संदेह नहीं रहा। परन्तु बचपन से ही वह शारेंला को इतना प्यार करता रहा है, श्रद्धा देता रहा है कि आज शारेंला किसी अज्ञात परपुरुष की प्रेयसी और गर्भवती प्रणयिनी है, ऐसा सोच पाना भी उसे असहनीय लग रहा था। ईर्ष्या के साथ-साथ घृणा के भाव ने भी, उन दोनों की लरकाई की प्रीत में भेद की एक दीवार खड़ी कर दी। वह हृदय से शारेंला को क्षमा नहीं कर पाया। इस तरह की अवस्था में पड़ने की अपेक्षा आत्महत्या कर लेने पर ही सम्भवतः उसका नैतिक सम्मान सुरक्षित रहा होता।

शारेंला ने अपने अवांछित दुर्भाग्य को सामान्य रूप में ग्रहण कर लेने के लिए बाध्य हो ही गई, तो फिर वह चाहे कितना भी कुपात्र ही क्यों न हो, उसे अपने जीवन भर के एक दुशचरित्र पति के रूप में स्वीकार कर लेने के अतिरिक्त भला चारा ही क्या है ? किसी तरह वेश्या बनने से बच जाये, तो इसे ही वह अपना परम सौभाग्य समझेगी। गाँव के लोग क्या उसे इतना भी सुयोग न देंगे ?




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