भारतीय सौंदर्य बोध और तुलसीदास - रामविलास शर्मा Bharatiya Saundarya bodh aur Tulsidas - Hindi book by - Ramvilas Sharma
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भारतीय सौंदर्य बोध और तुलसीदास

रामविलास शर्मा

प्रकाशक : साहित्य एकेडमी प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :527
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2134
आईएसबीएन :81-260-1237-4

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प्रस्तुत है भारतीय और यूरोपीय साहित्य, संस्कृति तथा दर्शन पर प्रकाश डाला गया है...

Bharatiya Saundarya bodh aur Tulsidas a hindi book by Ramvilas Sharma - भारतीय सौंदर्य बोध और तुलसीदास - रामविलास शर्मा

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मार्क्सवादी दृष्टि से सम्पन्न और प्रगतिशील विचार धारा के यशस्वी आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा (10 अक्टूबर, 1912-30 मई 2000) ने साहित्य आलोचना ही नहीं, भारतीय साहित्य एवं संस्कृति के साथ भाषा, समाजशास्त्र, इतिहास, दर्शन, राजनीति एवं साहित्य के अन्य अनुशासनों पर भी विपुल लेखन किया। भारतीय और यूरोपीय साहित्य, संस्कृति तथा दर्शन पर विचार करते हुए डॉ. शर्मा ने बड़ी गहराई से यह अनुभव किया था कि जब तक भारतीय दृष्टि और भारतीय स्त्रोंतो से भारतीय मनीषा या भारतविद्या का सम्यक अध्ययन नहीं किया जाएगा-हम एकांगी उपनिवेशवादी सोच और अराजक निष्कर्षों के सामने बौने बने रहेंगे। यही कारण था कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति और दर्शन को, इनके आरम्भ से जानने की और फिर तथ्यों-तर्कों और साक्ष्यों के आलोक में प्रस्तुत करने के संकल्प से दीप्त और उनकी एक-के-बाद-एक कई महत्वपूर्ण कृतियाँ आती चली गईं। इस बात पर भी उनका जोर रहा कि ऋग्वेद के अध्ययन बिना भारतीय चिन्तन एवं दर्शन को ठीक से नहीं समझा जा सकता है। अपनी चिन्तन परम्परा को जाने बिना किसी दूसरी धारा के प्रति न्याय कर पाना संभव नहीं।

अपना अन्तिम और अप्रतिम कृति भारतीय सौन्दर्य-बोध और तुलसीदास लिखने के मूल में उनका आग्रह भारतीय सौन्दर्य के उन कलात्मक प्रतिमानो की व्याख्या कर उस स्थान तक पहुँचना था, जो साहित्य, संगीत और स्थापत्य के क्षेत्र में निर्विवाद, श्रेष्ठ और शीर्षस्थ स्थान के अधिकारी रहे और आज तक जिनकी चुनौती नहीं टूटी है। इस दृष्टि से तुलसीदास, तानसेन और ताजमहल उनके लिए क्रमशः साहित्य, संगीत और स्थापन्य के न केवल उत्कृष्ट प्रतीक, बल्कि युगान्तकारी प्रतिमान भी रहे हैं। इस प्रतिमानत्रयी को भारतीय मध्यकाल के उत्कर्ष के रूप में रेखांकित करते हुए वे समस्त विश्व के भारतीय सौन्दर्य-बोध की श्रेष्ठता स्थापित करना चाहते थे। यह कृति उनके इसी यशस्वी संकल्प का प्रतिरूप है-जिसे साहित्य अकादेमी सगर्व और सहर्ष उनके असंख्य पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रही है। यह ग्रन्थ डॉ. शर्मा की विदिग्धता और वैदुष्य का प्रतिरूप है।

प्रस्तुति


मार्क्सवादी दृष्टि और प्रगतिशील विचारधारा के यशस्वी आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा (जन्म : अक्टूबर 1912-निधन : 30 मई 2000) ने केवल साहित्यिक आलोचना ही नहीं, निरन्तर प्रवाहशील भारतीय दृष्टि से भी भारतीय साहित्य एवं संस्कृति और दर्शन पर चिन्तन तथा लेखन किया है। इस संबंध में अपने पाठकों और प्रशंसकों की जिज्ञासा के अनुरूप उन्होंने कई-कई बार अपने इस वक्तव्य को दोहराया भी था कि भारतीय दर्शन को बहुधा युरोपीय दर्शन के आलोक में और युरोपीय चिन्तकों की दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है-जो आंशिक और एकांगी है। डॉ. शर्मा चाहते थे कि भारतीय दर्शन की पृष्ठभूमि में मार्क्सवाद का अध्ययन किया जाना चाहिए। यही वह बीज प्रेरणा थी, जिसे प्रस्थान बिन्दु मानकर डॉ. शर्मा ने पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में विपुल लेखन किया था। उनका यह भी मानना था कि साहित्य, भाषा, संस्कृति, राजनीति, समाजशास्त्र, इतिहास, नृतत्त्वशास्त्र आदि विषयों पर अलग-अलग विद्वानों ने काफी काम किया है-लेकिन इन अधिकायों या दृष्टिकोणों को साथ लेकर-समग्रत: व्यवस्थित कार्य नहीं हुआ है-इसीलिए हमारी दृष्टि-भारतीय इतिहास दृष्टि विकसित नहीं हो पाई है।

इस दिशा में डॉ. साहब का अध्ययन जब आगे बढ़ चला और वे दर्शन की आरंभिक सरणियों एवं सोपानों के संधान में लग गए तो उन्हें यह जान पड़ा कि भारतीय और युरोपीय दर्शन का सम्यक् अध्ययन, बिना ऋग्वेद के अध्ययन-अनुशीलन के संभव नहीं। इस क्रम में उनकी आरंभिक कृति के बाद, एक के बाद एक कई कृतियाँ प्रकाशित होती चली गईं। इन कृतियों के साथ डॉ. साहब की उदात्त दृष्टि का देश-विदेश के विद्वानों एवं पाठकों द्वारा स्वागत हुआ ही, उन अतिरेकपूर्ण और अराजक अवधारणाओं का भी खंडन होता चला गया-जो अब तक युरोपीय विद्वानों और उनकी आधी-अधूरी एवं अप्रामाणिक धारणाओं एवं निष्कर्षों को ही अपनी थाती बनाये छाती से चिपकाए बैठे थे। संभवत: इसी कारण डॉ. साहब ने वेदों को, विशेषकर ऋग्वेद को अपने परवर्ती अध्ययन का आधार बनाया। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार क्रम में मुझे बताया था कि भारतीय और यूनानी दर्शन पर कार्य करते हुए उन्हें लगा कि ऋग्वेद का अध्ययन किये बिना भारतीय चिन्तन परंपरा को ठीक-ठीक समझा नहीं जा सकता- क्योंकि इस आकार ग्रंथ से ही भारतीय दर्शन की कई धाराएँ-उपधाराएँ प्रवाहित हुई हैं। औपनिषदिक चिन्तन के साथ अनुवर्ती की कई सरणियाँ इससे विकसित हुई हैं।
मैक्समुलर, पुसालकर, प्रो. रानड़े, बी.वी.लाल, मार्शल, पीगॉट, मैकडनल पार्जीटर और श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जैसे विद्वानों को यह ठीक ही जान पड़ा था कि मानवीय सभ्यता और भारतीय प्रायद्वीप की संस्कृति के कई बीज ऋग्वेद में सुरक्षित हैं। ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा कवि आदिशक्ति प्रतीत होनेवाली प्रकृति और वनस्पति से सीधा संवाद करते हैं। उसे संबोधित करते हैं। अपने समस्त कृत्य और लोकाचार में उन्हें आमंत्रित करते हैं। वे सूर्य में, आप: (जल) में, मेघ में-यहां तक कि अंधकार में अग्नि का दर्शन करते हैं। यह तभी संभव है जब किसी की चेतना उस विराट चेतना का न केवल संधान बल्कि साक्षात्कार करना चाहती है-और इस चेतना के कई स्तर हैं। यहाँ तक कि व्यक्तिगत एवं पारिवारिक उत्कर्ष और योगक्षेम के लिए भी ऋग्वेद के मंत्रों के रचयिता प्रयत्नशील हैं।

पश्चिम एशिया और ऋग्वेद (हिन्दी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित) में डॉ. शर्मा ने पहली बार ऋग्वेद के इतिहास पक्ष पर विस्तार से लिखा था। इसी क्रम में उन्होंने अपने अगले ग्रंथ भारतीय साहित्य की भूमिका (राजकमल प्रकाशन, 1996) में ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा ऋषियों तथा ऋचाओं के काव्य पक्ष पर चर्चा की थी। इसी तरह उनके इतिहास दर्शन (वाणी प्रकाशन, 1995) ग्रंथ में भारत और यूनान की ऐतिहासिक एवं दार्शनिक परंपरा, आर्यभाषा क्षेत्र, वृत्र और जल-प्रवाह, सृष्टि और अग्नितत्त्व तथा पृथ्वी और कृषितंत्र पर विस्तार से चर्चा है। उन्होंने इस उपक्रम में ऋग्वेद के मंत्रों के देवों (वायु, इन्द्र. सूर्य, वृत्र आदि) तथा प्रकृति की विभिन्न शक्तियों को एक दूसरे से संबद्ध पाया और इन सबका संबंध पृथ्वी से है, यह बताया। यही संबद्धता और परस्परता मानवीय सभ्यता और संस्कृति की आदि पहचान बनी और कृषि संबंधी अनुभवों से निरंतर पुष्ट और समृद्ध होती चली गई। इसके तुरंत बाद प्रकाशित भारतीय साहित्य की भूमिका (1996) में भी उन्होंने ऋग्वेद और ऋग्वेदकालीन समाज पर विस्तार से चर्चा की। वे श्रम और श्रमण-दोनों ही परम्परा का संधान कर विश्व को भारत के सांस्कृतिक अवदान को रेखांकित करते रहे कि भारतीय परंपरा और मनीषा को न तो सिर्फ पंडितों और कर्मकाण्डी पुरोहितों के चश्में से पढ़ा जा सकता है और न पंड़ों के वर्चस्व को स्वीकार कर वेदों का तिरस्कार किया जा सकता है। इस ग्रन्थ में वैदिक कवियों की काव्य दृष्टि का आकलन एवं मूल्यांकन करने के लिए किया गया है। इसी तरह भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रवेश (प्रथम खंड 1999) ग्रंथ के आरंभिक दो अध्यायों में ऋग्वेदकालीन संस्कृति और तीसरे अध्याय में महाभारत काल से जुड़े इतिहास, दर्शन और लोक संस्कृति पर विस्तार से चर्चा थी-और ऋग्वेद, महाभारत तथा गीता के संदेशों के माध्यम से उन विचारों एवं सूत्रों को पहली बार उद्घाटित किया-जिन पर अब तक विद्वानों की दृष्टि नहीं गई थी। डॉ. शर्मा के अनुसार, ‘‘ऋग्वेद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम का भेद मिट गया है। यह हमारा अतीत है और जिस भविष्य की ओर हमें जाना है, वह भी यही है।’’ (पृ.63)

सन् 1992 में पंत अस्पताल से डॉक्टर साहब जब अपनी गहन चिकित्सा के बाद पेट का आपरेशन कराकर घर लौटे तो बावजूद शारीरिक पीड़ा और थकान के-उनके चेहरे पर प्रसन्नता दीख पड़ी थी। मिलनेवालों को मुस्कराकर यह बताना ‘‘एकदम ठीक हूँ’’- हमें बड़ी राहत देता था। कहना न होगा, वे अपनी तकलीफ या परेशानी को भीतर ही भीतर पी जाते थे और सामान्य नज़र आते थे। यह समय उनके लिए बेहत सक्रियता का था और वे मिलने पर किसी न किसी नई योजना के बारे में बताये रहते थे। मुझे पहले तो हैरानी होती थी-क्योंकि बढ़ती उम्र के बावजूद उनके काम करने का तौर-तरीका जहाँ गहन अध्ययन, नये अन्वेषण, तथ्यपूर्ण विश्लेषण, तथ्यों की अद्यतन जाँच के साथ, पुनरावृत्ति से बचाव का होता था, वहाँ आलोच्य विषय वस्तु की केन्द्रीयता और उसके सम्यक् प्रतिपादन से भी जुड़ा होता था। वे एक विषय को विभिन्न कोणों में रखते थे और प्रस्तावित विषय पर अब तक की गई गवेषणाओं की पूरी जाँच-परख करने के बाद ही, अपनी स्वीकृति या अस्वीकृति की मुहर लगाते थे। वे उन्हीं विषयों को अपने लेखन के लिए चुनते थे-जिनके साथ वे पर्याप्त न्याय करने की स्थिति में होते थे। ऐसा करने के लिए पूरी सामग्री का मनोयोगपूर्वक अध्ययन करते थे और इसके बाद ही उसका आकलन एवं मूल्यांकन करते थे। अपनी योजना से जुड़ी पुरानी और नई से नई रचनाओं के लिए वे क्या कुछ नहीं करते थे-संबंधित मित्रों एवं विद्वानों से पत्राचार करना, अपने परिवार के लोगों के दौड़ाना, फोटो कापियाँ प्राप्त करना, संबंधित विषय पर पुस्तकें मँगवाना, वे कहाँ, किस पुस्तकालय में मिलेगी- इसका संधान करते हुए, उन पुस्तकों और लेखकों की सही वर्तनी, प्रकाशन वर्ष, पृष्ठ संख्या और प्रकाशक का पूरा पता आदि बताना वे कभी नहीं भूलते थे। यही कारण था कि वे अपने स्वाध्याय या संदर्भ के लिए जिस किसी कृति को उपयोगी समझते थे- उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह ही चाहने लगते थे और अक्सर उलटते-पलटते रहते थे। मैंने उनकी किताबों की रैक पर विषयावार रखीं अनगिनत पुस्तकें- जो काफी भारी भरकम हैं- अक्सर उनके हाथ में या सिरहाने रखी देखता रहता था- और इनमें नई-पुरानी पुस्तकें लगातार शामिल होती रहती थीं।

वर्ष 1992 में स्वास्थ्य में तनिक सुधार होते ही, डॉक्टर साहब पहले की तरह अपनी चर्या में डूब गये थे- जैसे कुछ हुआ ही न हो। हालाँकि अब उन्हें लिखने में थोड़ी परेशानी होने लगी थी- क्योंकि उनका हाथ काँपने लगा था। कंपन के बावजूद वे देश भर में फैले अपने पाठकों को लगातार पत्र लिखते रहते थे। बाद में अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिए उन्होंने ‘कैसेट’ पर बोलना शुरु किया। हालाँकि आरंभ में उन्हें इस कार्य में कठिनाई आई- लेकिन अभ्यास हो जाने पर उनके लिए यह विधि कही सुगम हो गई। इसके लिए वे पहले से ही पाठ-सामग्री का व्यवस्थित चयन, अवश्यक टिप्पणियाँ, प्रकाशित कृतियों के पृष्ठों पर निशान, पर्चियाँ, संकेत आदि तैयार करके रखते थे। हालाँकि उनके पास एक कामचलाऊ फिलिप्स टेपरिक़ॉरेडर ही था- जो बैटरी से चलाया जाता था। आये दिन बिजली का चला जाना और तार और प्लग के झंझट से मुक्ति पाने के लिए ऐसा किया गया था।

डॉक्टर साहब ने उक्त पुस्तकों का लेखन-कार्य बहुत पहले पूरा कर लिया था और नये कार्य में जुट गये थे। प्रकाशकों द्वारा पुस्तकें तय समय पर प्रकाशित न करने पर वे अपनी उद्विग्नता छिपा नहीं पाते थे। मैं कभी-कभार उनकी तरफ़ से प्राकशकों को, उनके द्वारा की जा रही देर से, डॉ. साहब की नराज़गी के बारे में बता-जता देता था। इसी दौरान उनकी तबीयत कुछ इतनी बिगड़ी कि उन्हें पंत अस्पताल के सघन चिकित्सा कक्ष में रखना पड़ा। आँतों में सूजन के इलाज के लिए एक अगस्त 1992 को उनका ऑपरेशन भी हुआ। इस समय डॉक्टर साहब अपने जीवन के अस्सी वर्ष पूरे करने जा रहे थे। इस मुसीबत को उन्होंने ‘बीमारी के मज़े’ शीर्षक से विस्तार से लिखा था- जो अपनी धरती अपने लोग, (खण्ड दो) में प्रकाशित है।
चूँकि विकासपुरी में उनके आवास के पास ही मेरा भी आवास है इसलिए मैं अक्सर दर्शनार्थ वहाँ पहुँच जाता था। उनके स्नेह और सान्निधिय को पाकर मेरा जीवन धन्य हो गया था।

एक दिन किसी शाम को, अपने आवास पर बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे भारतीय सौंदर्य-बोध पर विस्तार से एक ग्रंथ लिखने की योजना के बारे में बताया था। वे भारतीय सौंदर्य-बोध को केन्द्र में रखकर वैदिक ऋषियों, वेदोत्तर काल खंड़ों में कलाओं की यात्रा तथा विविध कलाओं में सौंदर्य की सरणियों, सोपानों और साक्ष्यों के आलोक में, भारतीय पक्ष को स्थापित करना चाहते थे ताकि इस क्षेत्र में युरोपीय विद्वानों की एकांगी और पक्षपातपूर्ण दृष्टि का निरसन हो सके। और इस क्षेत्र में उनके वर्चस्व को भारतीय चुनौती दी जा सके। मैं उनसे पहले भी अकादेमी के लिए पुस्तक लिखने का अनौपचारिक अनुरोध कर चुका था। साहित्य अकादेमी के एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम ‘लेखक से भेंट’ के अंतगर्त उनका आगमन, व्याख्यान और इसकी अभूतपूर्व सफलता से जहाँ अकादेमी की साख बढ़ी थीं- वहीं मेरा हौसला भी बड़ा था। डॉ. साहब छुट्टियों के दिन, शाम के समय, अपने घर पर मिलने वालों को समय देते थे और मैं भी बिना पूर्व सूचना के, उनसे मिलने चला जाया करता था उनके दर्शन करने कभी-कभी उनके लिए कोई किताब या पत्रिका लेकर, कोई सूचना लेकर या फिर अखबारों की कटिंग लेकर।

इस बीच उनके दो ग्रंथ- इतिहास दर्शन और भारतीय साहित्य की भूमिका प्रकाशित हो चुके थे और भारतीय संस्कृति तथा हिन्दी-प्रदेश (दो खंड़ों में) ग्रंथ का काम पूरा हो चला था। उनके मन में विलियम जोन्स के कुछ निबंधों को हिन्दी में रूपांतरित करने की बात भी थी- हालाँकि भारतीय साहित्य की भूमिका में वे विलियम जोन्स पर एक लम्बा अध्याय लिख चुके थे। वे उस महान भारतविद् और विद्वान लेखक पर विस्तार से लिखना चाहते थे। बाद में उन्हें जब यह पता चला कि डॉ ओमप्रकाश केजरीवाल (प्रकाशन विभाग के तत्कालीन महानिदेशक) विलियम जोन्स पर शोध कार्य कर रहे हैं तो उन्होंने डॉ. केजरीवाल को इस दिशा में और भी काम करने की प्रेरणा दी थी।


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