फुलवाड़ी भाग 10 - विजयदान देथा Phulwadi Bhag 10 - Hindi book by - Vijaydan Detha
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फुलवाड़ी भाग 10

विजयदान देथा

प्रकाशक : साहित्य एकेडमी प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :208
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2135
आईएसबीएन :81-260-2049-0

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साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत विजयदान कृत बाताँ री फुलवाड़ी के दसवें भाग का हिन्दी अनुवाद...

Phulwari Bhag 10

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत कृति फुलवाड़ी : भाग दस साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत विजयदान कृत बाताँ री फुलवाड़ी के दसवें भाग का हिन्दी अनुवाद है। इस भाग की प्रथम दस कथाओं का संबंध सर्प से है। इसके बाद की ग्यारह कथाएँ विभिन्न विषयों पर हैं। लेखक के पास सशक्त राजस्थानी शब्दावली है, कहावतों-मुहावरों का भंडार है, कल्पना की उर्वरक क्षमता है और सबसे बड़ी बात यह है कि उन्हें मालूम है कि कथा के माध्यम से उन्हें क्या कहना है।


मणि कौल प्रोडक्शंस
21 मई, 1972

प्रिय श्री विजयदान-बिज्जी !


सच तुम तो छुपे हुए ठीक हो। न जाने क्यूँ आज लगा कि तुम्हारी कहानियाँ शहरी जानवरों तक पहुँच गईं तो वे कुत्तों की तरह टूट पड़ेंगे। गिद्ध हैं-नोच खाएँगे। तुम्हारी नम्रता है कि तुमने अपने रत्नों को गाँव की झीनी धूल में ढक कर रखा है। धूल भी नजर आती है। रत्न भी। कल रात से आज दिन तक तीनों कहानियाँ बिना रुके पढ़ चुका हूं-‘असमांन जोगी’, ‘नागण थारौ बंस बधै’ और ‘मिनख-जमारौ’। कहानियों का विश्लेषण करना तो आँधी के बाद चीजों को फिर-से समेटना-सा लगता है। और विश्लेषण करना भी तो नहीं आता। मन में आया सो लिखा, समझना।

‘नागण थारौ बंस बधै’ पढ़कर मैं कुछ हैरान-सा हो गया। खास तौर पर ‘वीलिया खवास’ के अंतिम शब्दों में तो कमाल कर दिया तुमने। सच गाँव चौधरी तो बात समझा न समझा, मैं भी बात समझ न पाया। किंतु उसका जितना abstracted सार था, पूरा समझ गया। किसी कहानी को उसके स्थूल घेरे में बिना फँसाए (यानी उसके स्थूल अर्थ से परे रहकर) कहानी को मांसल शरीर का आभास दे देना-और उसकी अनुभूति को शब्दों में साफ-साफ व्यक्तकर देने पर भी अनुभूति को मरने न देना तो जैसे असंभव काम है। तुम्हारी इस कहानी का रूप तो किसी गणित की पहेली का स्वरूप है। गणित में प्रश्नों का उत्तर नहीं हुआ करता, उनका हल होता है और यह हल अपने-आप में किसी प्रकार का विचार नहीं होता-उसका कर्म तो केवल उन साधनों की ओर संबोधित करने का है, जिनसे वह गणित-प्रश्न सुलझा। गाँव-चौधरी और मेरी हालत कहानी के अंत में एक-सी हो गई।

याद आया, Claude Levi-Strauss नामक फ्रांस के एक anthropologist ने अपने structural methods के बारे में चर्चा करते समय बताया कि कभी-कभी किसी myth को सुलझाने में Law of Inversion लगाना पड़ता है। यानी myth द्वारा जो भी प्रश्न पैदा होते हैं, उन्हें बिलकुल invert कर देना। उसका उदाहरण देता हूँ। मानो एक statement है-Thre is a question to which there is no answer, अब उस उत्तर को प्राप्त करने का कोई साधन नहीं है। और हम लोग तो इस चक्कर में खास फँसे ही रहते हैं, तुम्हारी कहानियों में तो इसका कोई पार ही नहीं, कई ऐसी समस्याएँ तुमने प्रस्तुत की है। तो ऐसे statement का केवल एक ही हल है कि उसे बिलकुल invert कर दिया जाए, यानी-There is an answer to which there is no question. यही अनुभूति की सही प्रकृति है। जिसे तुमने पा लिया। ‘जिण अजोगती बात सूं थानै इत्तौ इचरज व्हियौ उणरौ औ म्यांनौ है। समझ परवांण इण में सार लाधैला।1’ तुम्हारी खोज उस उत्तर के लिए, तुम्हारी कहानियों में जगह-जगह उभर आती है, जो पैदा हुए प्रश्नों का जवाब नहीं देती, किंतु साथ-साथ ऐसे फूलों की फुलवाड़ी पैदा कर देती है, जिस के सामने उन प्रश्नों का ‘मरम’ फीका पड़ जाता है। जिंदगी को उन प्रश्नों की जरूरत नहीं रहती। हर बार ‘वीलिया-खवास’ कहानी सुनाने के बाद बदलता जाता है। हर बार हम जैसे कहानी सुनने वाले बदलते जाते हैं। हो सकता है ये फूटे शहरी लेखक ऐसे प्रश्नों को सामने ला दें जिनका वास्तविकता से कोई संबंध हो और इसी बहाने उस में उलझ रहें। किंतु तुम्हें इन प्रश्नों से क्या लेना-देना ! तुम्हारे सामने तुम्हारे उत्तरों के सामने इन प्रश्नों में सार ही क्या ? उनकी ‘जिनात’ ही क्या ?

आज तुम्हें ‘तुम’ कहने में आनंद आ रहा है, निकटता लग रही है। इसीलिए हिम्मत कर ली। ‘बिज्जी’ लिख कर संबोधित किया। असमांन जोगी में कुम्हारी के लड़के का भोलापन ही कैद में फँसे हम सबके चित्त को छुटकारा दे सकता है। आसमान जोगी जब विचलित हो जाता है और उसे यह पहली बार लगता है कि वह किसी औरत के लिए उतावला नहीं हो रहा है। उसे कुछ और परेशान कर रहा है। बालपने की सहजता और तब का निर्मल स्वरूप ही तो फिर लौटता है, जो जिगर को फाड़ देता है-जो इतना निर्मल, भोला व सुकुमार होते हुए भी तड़फा देता है। फिर तुमने एक दूसरे पैंतरे से कमाल किया। अलग चाल से पहेली सुलझा दी। संतुलन रखा। बात को इतना fantansy रूप देकर उसके खास मतलब को बराबर साफ जाहिर करते गए। बात को कुछ ऐसा बुना जाए कि जब सीधा ताना चले, यानी किस्सों का ताना, तो आड़ा जो कभी नजर से दूर न हो पाए, यानी मतलब का ताना-और जब आड़ा चले तो सीधा हर समय मौजूद। जैसे कोई कपड़ा बुना जा रहा हो। सीधा भी, आड़ा भी। कहानी पढ़ने के बाद लगा कि मैं खुद असमांन जोगी भी हूँ और कुम्हारी का लड़का भी। तुम चरित्रों को अलग-अलग निभा जाते हो, किंतु उन सबकी पूर्ण इकाई से नजर गिरने नहीं देते। अंत में जब ये शब्द आए, ‘साच मांनणिया कुम्हारी

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1. बातां री फुलवाड़ी, भाग-10, नागण थारौ बंस बधै, पृष्ठ : 156
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रै बेटा री गळाई सुखी व्हैला। गाजां-बाजां मनचायौ ब्याव व्हैला। अर अभरोसौ करणिया मर्यां उपरांत ठौड़-ठौड़ आक-धतूरौ बणनै ऊगैला।’2 मैं यह तय नहीं कर पाया कि मेरा क्या होगा ? हाँ, चूँकि गाजे-बाजे से विवाह हो चुका है, शायद कुम्हारी के लड़के की योनि पहिले से प्राप्त है।
कल रात देर तक इस कहानी ने तो सोने ही नहीं दिया। सुलझन का चैन और दोषों की चुभन, दोनों बराबर जाग्रत थीं।
‘आदमी की ज़िंदगी’ (मिनख-जमारौ) के बारे में लिखना-कहना नहीं चाहता। दोष मेरा ही है। शायद दो कहानियों के नशे में तीसरी कहानी शुरू करना ही बेवकूफी है। फिर से कभी पढ़ूँगा तो लिखूँगा। शायद डर गया इस कहानी से। फिर एक बार देखूँगा कि इतना झेलने का जिगर है या नहीं।

चित्र और शब्दों के बारे में तुमने जो लिखा, मुझे बिलकुल सही लगा। किंतु पूर्णतया कूख से स्वतंत्र हो जाने के लिए तो कितने वर्ष चाहिए। कोशिश पूरी कर रहा हूँ। उसमैं मैंने क्या-क्या तरीके निकाले हैं, उस पर तो एक पूरी किताब लिख सकता हूँ। पढ़ेगा कौन ? यहाँ तो कूख तक भी बहुत कम पहुँचे हैं-गुड्डा-गुड्डी से खेल रहे हैं, ऐसा लगता है। उनके लिए कहानी वाकई एक खेल-सा है। खेलते हैं। रोते हैं। हँसते हैं। उसका सही संबंध अब तक इसीलिए स्थापित नहीं हो पाया, क्योंकि कहानी को एक पूर्ण रूप नहीं दिया गया, बल्कि उसे एक तरह से use करते हैं और use का रिश्ता तो एक अजीब तरीके से स्वयं अपनी ही स्वतंत्रता छीन लेता है। मैं किसी को use करूँ तो मेरा उस पर निर्भर होना स्वाभाविक है : फिर स्वतंत्रता कहाँ ? मुझे समय तो लगेगा। लगना भी चाहिए-इन फिल्मी जादूगरों की तरकीबों का भंडा फोड़ते। वर्षों हो गए सालों को उन्हीं तरकीबों में रिसते। बदलते भी हैं तो बेचने का नया तरीका पैदा करके। चाहता हूँ ‘नागण थारौ बंस बधै’ और ‘आसमांन जोगी’ पर फिल्म मैं ही बनाऊँ कभी।
आदमी हूँ, इतने सारे रत्नों का उघड़ा हुआ ढेर देख कर दो-दो बाँस उछल रहा हूँ। आस पास कोई नहीं। संभव है, सारी माया मेरे ही हाथ लगे।

-तुम्हारा मणि

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2. बातां री फुलवाड़ी, भाग-10, असमांन जोगी, पृष्ठ : 241



लोक-कथाओं को समझने का उपक्रम



कोमल कोठारी


पृष्ठभूमि

लोक-कथाओं की आंतरिक गठन-प्रक्रिया को कितने ही रूपों में खंड-विखंड करके देखने का प्रयास किया गया है। कथा-मानक की स्थापना के द्वारा पूर्ण कथानक की घटनात्मक समानताओं के जरिए, विश्व की लोक-कथाओं को एक सुनिश्चित आधार दिया गया। एक विशिष्ट क्रम एवं विशिष्ट घटनावली के संघटन से कथा-मानक के स्वरूप की कल्पना निर्मित की गई। स्थूल कथानकों की तात्विक तालिकाओं से अधिक गहराई में जाते हुए अभिप्राय अथवा कथानक की रूढ़ प्ररूढ़ियों पर दृष्टि पहुँची। अभिप्राय वस्तुतः एक घटना मात्र है, जो निरंतर अनेक कथाओं में ज्यों की त्यों प्रयुक्त मिलती है। एक कथा में एक अभिप्राय से लेकर अनेक अभिप्राय का गुंफन हो सकता है। कथा-मानक की संरचना पर एंटी आर्ने ने कार्य किया तो अभिप्रायों की विश्वजनीन मान्यता पर सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य स्टिथ थॉमसन ने किया।

लोक कथाओं की उत्पत्ति : कुछ मत

किंतु इन दोनों प्रकार की अध्ययन प्रणालियों में कथानक अथवा कथानक को सृजित करनेवाली घटनाओं को ही आधार बनाया गया। ये प्रयत्न शुद्ध लोक-कथा के गठनात्मक वस्तु-तथ्यों तक ही सीमित रहे। किंतु एक अन्य प्रयोजन की तुष्टि के लिये यह देखने का प्रयास आरंभ हुआ कि अंततः लोक कथा को कहने सुननेवाले कौन हैं ? इन लोगों का सामाजिक और राष्ट्रीय समस्याओं से अद्भूत सांस्कृतिक जीवन क्या व कौन-सा है ? एक समाज की सांस्कृतिक परंपराओं एवं अन्य संस्कृतियों के आदान-प्रदान से कौन से प्रभाव उत्पन्न हुए ? यहाँ लोक कथा का प्रयोग एक ऐसी सत्ता अथवा तत्व के रूप में होने लगा जो विश्व के विभिन्न समाजों की संस्कृतियों के विश्लेषण हेतु एक प्रमाणभूत आधार देने लगा। इस प्रकार के अध्ययन का आरंभ जर्मन विद्वान फ्रेडरिक मैक्समूलर ने किया। मैक्समूलर ने तुलनात्मक भाषा-विज्ञान के आधार पर सौर-पुराकथा सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। मैक्समूलर की सैद्धान्तिक मान्यता के विषय में रिचार्ड डोरसन ने अपने ‘सौर-पुराकथा का अंत’ नामक निबंध में लिखा है-

‘मैक्समूलर ने तर्क के द्वारा स्थापित करने का प्रयत्न किया कि यूनानी देवी-देवताओं के समतुल्य संस्कृत नामों को एक साथ रखा जाए और उनके आधार पर वेदों को समझने का प्रयत्न किया जाए। वेद जो आर्य जाति के सबसे प्राचीन साहित्यिक ग्रंथ हैं और जिनके द्वारा देवी-देवताओं के अलौकिक लक्षणों को समझा जा सकता है। संपूर्ण भारोपीय जन-समुदाय का संबंध आर्य वंश से है और अपने मूल भारतीय निवास से विभिन्न यूरोपीय जन समूहों की यात्रा प्रारंभ हुई थी। इस यात्रा के दौरान भाषा एवं पुराकथाएँ अनेक शाखा-प्रशाखाओं में विभक्त हो गईं। एक समय आया जब वैदिक देवी-देवताओं के नाम विलुप्त हो गए और अनिश्चयात्मक अर्थ देनेवाले पुराकथात्मक मुहावरे एवं कहावते ही शेष रह गए। इन मुहावरों को पुनः समझाने की दृष्टि से कथाएँ सृजित होने लगीं। इस प्रकार भाषा की बीमारी (डिजीज ऑफ़ लेंग्वेज) से पुराकथाओं का जन्म हुआ।’

भाषा की इस तुलनात्मक एवं उत्पत्तिमूलक धारा के साथ मैक्समूलर ने रूपक की चर्चा भी की। उन्होंने बताया कि रूपक ने दो प्रकार से अपने अर्थ प्रदान किए। यथा: ‘आलोकित करना’ जैसी क्रिया के धातु से सूर्य का संज्ञात्मक बोध कराया गया अथवा उसे विचारों के आलोक के साथ भी अभिहित कर दिया गया। इस प्रकर निर्मित संज्ञाओं को काव्यत्व की कल्पनाशील शक्ति के द्वारा अन्य वस्तुओं को भी संकेतित किया जाने लगा। सूर्य की किरणों को अँगुलियाँ कहा गया तो बादलों को पर्वतों से उपमित किया गया। पानी से भरे बादल गाय के दूध भरे स्तनों के समान व्यक्त किए गए तो कड़कती बिजली को तीर एवं सर्प की साम्यता पर आधारित करने का प्रयास किया गया। शब्दों की इन भाषा वैज्ञानिक व्याख्यों एवं यूनानी सभ्यता के देवी-देवताओं के नामों के तुलनात्मक विश्लेषण के द्वारा भारोपीय पुराकथा शास्त्र का निर्माण किया जाने लगा। मैक्समूलर एवं उनके साथियों ने स्थापित करने का प्रयास किया कि सूर्य एवं सौर-मंडल की अज्ञात एवं विस्मयपूर्ण स्थितियों की प्रतिक्रिया के स्वरूप ही पुराकथाओं ने अपना स्वरूप ग्रहण किया। इस विद्वत-समूह ने व्युत्पत्तिजनक शब्दों के द्वारा प्रत्येक पुराकथा को सूर्य अथवा सौर मंडल की प्रक्रियाओं पर सप्रयत्न आरोपित करने का प्रयत्न किया। यह कहा गया कि वैदिक देवता ‘द्यौस’ एवं यूनानी देवता ‘ज्यूअस’ की तुलनात्मक पुराकथा के द्वारा इस संपूर्ण योजना को आत्मसात किया जा सकता है।

लोक-कथा : कथ्य अवशेष

मैक्समूलर के अध्ययनों के समकालीन मानवशास्त्र के अन्य विद्वान एडवर्ड बी. टेलर आदिवासी जनजीवन पर पृथक ही लिख रहे थे। एंड्यू लांग ने टेलर की मानवशास्त्रीय मान्यताओं के आधार पर मैक्समूलर के सिद्धान्तों का मखौल बनाने का एक क्रम प्रारंभ किया। लांग ने सैद्धांतिक रूप से विकासमान मानव-शास्त्र के सिद्धातों के जरिये मैक्समूलर के कथनों का खंडन प्रारंभ किया। लांग ने स्थापित करने का प्रयत्न किया कि संपूर्ण मानवसमाज एक समान गति से विकसित हुआ। विकास का यह क्रम ‘सेवेजरी’ से ‘सिविलाइजेशन’ तक चला। साथ ही साथ आदिम विश्वासों एवं रीतिरिवाजों के अवशेष ग्राम्य कृषकों में अस्तित्व को बनाए रहे अथवा वर्तमान काल के आदिवासियों में ज्यों के त्यों जीवित रहे। लांग ने निर्णय निकाला है कि आधुनिक ग्राम्य-समाज एवं आदिवासियों के जीवन-अध्ययन के आधार पर मानव जीवन की आदिम अवस्थाओं का सांगोपांग चित्रण प्रस्तुत किया जा सकता है। जीवन-शास्त्र के अध्ययन में अस्थि-अवशेषों के सहारे जिस प्रकार प्राचीन मानव-वंश की स्थितियों को धीरे-धीरे निर्मित किया जा रहा है, उसी प्रकार मानव मन में स्थित अवशेषों से मानसिक विकास की दशाओं का इतिहास निर्मित किया जा सकेगा।

एंड्यू लांग ने मैक्समूलर की सूर्य, चंद्र एवं तारों संबंधी पुराकथाओं के विश्लेषण को अपने पूर्ण रूप में नकारा तो नहीं, किंतु साथ ही साथ आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका एवं दक्षिमी प्रशांत महासागर के द्वीपों से प्राप्त पुराकथाओं, परीकथाओं एवं लोक-कथाओं के आधार पर सौर-कथा चक्र पर बुनियादी आक्रमण किए। मैक्समूलर ने लांग के तर्कों का निरंतर जवाब दिया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि लांग महोदय को प्राचीन भाषाओं का ज्ञान नहीं है और इसलिए वे शब्दों के तुलनात्मक एवं भाषा वैज्ञानिक अर्थों के गांभीर्य को समझ पाने में असमर्थ हैं। मैक्समूलर ने अनेक प्रश्न किए और पूछा कि मानव-समाज के विकास के दौर में पुरा-कथा युग के पूर्व मिथिकों का उद्भव क्यूँ नहीं हो पाया ? शब्दों, अर्थों, मुहावरों व कहावतों के अर्थ क्यूँ भुला दिए गए और किस प्रकार नई कथाओं के जरिए उनकी पुनर्स्थापना हुई ?

भारतीय लोक-कथा : विश्वजनीन तथ्य

लांग एवं मैक्समूलर की पुराकथा संबंधी बहस का परिणाम यह निकला कि धार्मिक विचारों के ऊहापोह में कथाओं का एक स्वतंत्र विवेचन होने लगा और अनेक विद्वान नए-नए विचारों के साथ इस साहित्यिक-विधा की ओर आकर्षित होने लगे। बीसवीं शताब्दी तक पहुँचते हुए आदिवासी जनसमूह के साथ-साथ विकसित एवं अर्ध-विकसित देशों की संस्कृतियों के गंभीर एवं शोध पूर्ण प्रयास प्रारंभ हुए और लोक-कथाओं के प्रति चैतन्य विचार प्रक्रिया का शुभारंभ हो गया। भारत में पुरा-कथाओं के अध्ययन धार्मिक एवं दार्शनिक मान्यताओं की सीमाओं में ही चलता रहा-उसे मानवशास्त्रीय ज्ञान के आलोक में परखने का प्रयास लगभग नगण्य ही बना रहा। पश्चिमी देशों में लोक कथाओं के विसरण (डिफ़्यूजन) सिद्धांत एवं ऐतिहासिक भौगोलिक कथा-सिंद्धात का विकास भी हुआ, किंतु उसकी गरिमा का प्रभाव भी हमारे देश पर नहीं पड़ पाया। हम आज भी अपने देश की लोक कथाओं को एक प्रसंगहीन प्रकिया के रूप मे ग्रहण किए हुए चल रहे हैं।

विश्व की लोक कथाओं के महान अध्येताओं ने जहाँ भारतीय लोक-कथाओं के साहित्यिक एवं मौखिक स्वरूपों की सामग्री के द्वारा स्थापित करने का प्रयत्न किया कि किस प्रकार देश की निधि का अनेक रूपों में प्रसार अथवा विसरण हुआ। संभवतया हमारे लिए यह प्रश्न भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि विश्व के अध्येताओं ने जिस सामग्री पर अपने निर्णय निकाले हैं, वे मुख्यतया लिखित साहित्यिक परंपरा के ही भाग हैं। वेद, उपनिषद् ब्राह्मण आगम के ग्रंथों के अलावा कथा –सरित-सागर, कथा मंजरी और इन्हीं के विभिन्न एवं सीमित रूप हितोपदेश, पंचतंत्र, सिंहासन-बत्तीसी बैताल-पच्चीसी आदि ग्रंथ ही वह आधार प्रदान कर सके जो भारतीय लोक-कथाओं के प्रकाशित रूप रहे हैं। किंतु भारतीय लोकवार्ता के विद्वान भलीभाँति जानते हैं कि इस प्रकाशित सामग्री के अलावा लाखों कथाएँ आज लोगों के कंठों पर ही हैं और उसके संकलन एवं वैज्ञानिक वर्गीकरण का क्रम अभी आरंभ नहीं हुआ है। कंठों के सहारे जीनेवाली कथाओं का महत्त्व केवल ऐतिहासिक ही नहीं है, अपितु वे वर्तमान समाज की सांस्कृतिक स्थितियों पर भी एक टिप्पणी प्रस्तुत करती हैं। आज के समाज की जीवंत कथाओं के उस प्रबल पक्ष पर विचार किया जाना अत्यंत आवश्यक है कि अंततः ये प्रतीक, उपमाएँ, रूपक अथवा कथांश अब तक क्यूँ कथ्य-परंपरा में जीवित रह गए और उन में यह क्षमता क्यूँ बनी हुई है कि वे आनेवाले भावी समाज की आत्मभिव्यक्ति को तुष्ट कर सकते हैं ?

‘फुलवाड़ी’ का उद्देश्य

‘बांता री फुलवाड़ी’ के द्वारा यही प्रयत्न किया जा रहा है कि वर्तमान ग्राम्य समाज से लोक-कथाओं को संग्रहीत किया जाए और उनके परिप्रेक्ष्य में वर्तमान सामाजिक मूल्यों एवं स्थितियों का मूल्यांकन किया जाए। जिन प्रतीकों एवं रूपकों ने युगों से आदमी के मन को रंजित किया। इन कथाओं ने कभी वस्तु-सत्य की कठोरता को प्रतीकों की गहराई में छिपाकर अभिव्यक्त किया तो कभी सामाजिक विषमता पर सीधे ही प्रहार किया। मन की संभवतया किसी भी दशा को लोक कथाओं ने अछूता नहीं छोड़ा। आदमी और आदमी के बीच के संबंध, एक जाति के अन्य जाति से संबंध, आदमी की प्रकृति से संबंध और आदमी के दैनन्दिन अनुभवों के साथ जो संबंध निर्मित हुए, सभी वस्तु स्थितियों ने लोक मानस को उद्धेलित किया। कभी ऐतिहासिक घटना, कभी किसी चमत्कारिक वस्तु-स्थिति को मन के सहज विश्वास ने कथाओं के क्रमिक सृजन में अपना योगदान दिया। जो कथाएँ समाज के यथार्थ के साथ चल सकती थीं-वे जीवित परंपरा के रूप में चलती रहीं और जिनका संदेश काल की गति में अपनी उपयोगिता खो चुका था-वे सहज ही विलुप्त हो गईं। उपयोगिता की यही धारणा भावी समाज की लोक-कथाओं की संरचना और उनके संघटन की प्रक्रिया के साथ जुड़ी रहेगी।

‘बातां रील फुलवाड़ी में प्रकाशित होनेवाली कथाओं का संग्रहस्थान एक ही है अर्थात् राजस्थान का बोरुंदा ग्राम। भौगोलिक कथा-क्षेत्र का यह ज्ञान इसलिए आवश्यक है कि अंततः किस क्षेत्र में कथा का विशिष्ट रूप प्रचलित है ? सांस्कृतिक क्षेत्र के परिवर्तन के साथ कथा के प्रतीक संभवता अन्य संकेत देने लगते हैं। कथाओं को समझने का दूसराक्रम उनके ऐतिहासिक रूप से संबंधित है अर्थात् इतिहास के किस काल तक हम इन्हीं कथा-रूपों को प्राप्त कर पाते हैं। ‘बातां री फुलवाड़ी’ में प्रकाशित कथाओं का एक निश्चिय रूप बन जाने के बाद ही हम यह प्रयत्न करेंगे कि उसे भौगोलिक क्षेत्रों एवं इतिहास के कालमान के परिप्रेक्ष्य में पुनः परखें और उन से निर्मित मूल्यों एवं निर्णयों का पृथक अध्ययन प्रस्तुत करें।
‘बातां री फुलवाड़ी’ का दसवां भाग तैयार होकर पाठकों के हाथ में पहुँच रहा है केवल इसी भाग में प्रकाशित कथाओं के बारे में कुछ विचार कर लेना आवश्यक होगा। इस भाग की प्रथम दस कथाओं का संबंध सर्प से है। यों तो ‘बातां री फुलवाड़ी’ के भागों को प्रकाशित करते हुए, यह क्रम नहीं रखा गया कि विशिष्ट वर्गीकरण के आधार पर ही कथा का चयन लेखन एवं प्रकाशन हो, किंतु संग्रह क्रम में यदि समान समस्याओं की कथाएँ आ गईं तो उनका प्रकाशन भी एक साथ हो गया। यह एक अनायास घटना ही समझनी चाहिए कि सर्प-संबंधी दस कथाएँ इस भाग में एक साथ आ गई हैं। सर्प संबंधी कुछ कथाएँ पिछले नौ भागों में आ चुकी हैं और ये संभवतया भावी खंड में भी आएँ। दसवें भाग की केवल इन्हीं दस कथाओं के आधार पर कुछ विचार करना संगत होगा।

सर्प संबंधी कुछ मान्याताएँ

प्राचीन पुराकथाओं में सर्प अथवा नाग को अनेक कथाओं में पात्रत्व मिला। भारतीय पुराकथाओं में शेषनाग की कल्पना के साथ पृथ्वी को अपने सिर पर उठाए रखने का विवरण अनेक रूपों में आया। वैदिक समय में सर्प को भय मिश्रित संदेह के साथ देखा जाता था। अहि अथवा वृत्र नामक असुर की प्रतीकात्मक कल्पना में उसे रात्रि के घनघोर अंधकार एवं वर्षा को उड़ा ले जानेवाला चित्रित किया गया। विलियम क्रुक ने सर्प-पूजा की स्थिति के विषय में संकेत दिया कि वैदिक काल के काफी समय बाद ही संभवतया सर्प पूजा की निश्चित परंपरा प्रारंभ हुई। सर्प-दंश अथवा विष के साथ जीवन के अंतका प्रश्न निश्चित ही अदिम मन में एक भयावह कल्पना को जाग्रत करता रहा होगा जो आज भी कम सशक्त नहीं है। भय की इसी धारणा के साथ पूजा के विधानों का संकलन-आकलन होता गया और देश के विभिन्न भागों में विभिन्न सर्प पूजा के कल्ट्स भी उत्पन्न होने लगे। राजस्थान में गोगा के देवल का अवदान सर्प-दंश एवं उसके निदान के साथ जुड़ा हुआ है। बंगाल की मनसा देवी की पूजा का आधार भी सर्प संबंधी मान्यताओं में निहित है।

भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में सर्प एवं उसे विषाक्त सर्प-वंश से संबंधी छोटे-बड़े देवी-देवताओं की स्थापना की जा चुकी है। राजस्थान में गोगा के साथ खाखळ या खागळ देव नाम से भी सर्प-पूजा की प्रक्रिया चल रही है। बोरुंदा के इर्द-गुर्द सर्प-वंश का निदान केसरिया कुंवरजी के थान पर होता है। खाखळजी या खागळजी के नाम का प्रभाव क्षेत्र ब्यावर एवं निकट के क्षेत्र में है। गोगा के थान भी उत्तरी पश्चिमी राजस्थान के सभी क्षेत्रों में हैं। उनके सामने धूप देने का दीवट रहता है जिस में राळ एवं अन्य सुगंधित पदार्थों का उपयोग किया जाता है। मंत्रोच्चार या भाव आने की विधा (पुजारी को छाया आना) के द्वारा सर्प के विष को उतारने का उपक्रम किया जाता है। गाँव में थान या उसके पुजारी के न होने पर निकट के महात्म्य वाले थानों या देवालयों पर सर्पदंशित व्यक्ति को ले जाया जाता है।

अनेक बार सर्प संबंधी देवता के नाम से धागे की तांत भी बाँध ली जाती है और माना जाता है कि उस तांत के प्रभाव से व्यक्ति विषमुक्त हो जाएगा। गाँवों में ऐसे लोग भी होते हैं जो मंत्रोच्चार के जरिये सर्प-दंश का झाड़ा देते हैं। बोरुंदा गाँव में एक झाड़ा देनेवाले व्यक्ति से ज्ञात हुआ कि इक्कीस दिन तक पवित्र रहकर एक मंत्र विशेष का जाप कर लेने के कारण वह सहज ही सर्प के जहर को दूर कर सकता है। उसके मंत्र को सुनने से ज्ञात होता है कि वह आधुनिक राजस्थानी के साथ कुछ ध्वनियों के मिश्रण से चल रहा है। सर्प की विभिन्न जातियों के विषय में सामान्य ग्राम्य-जीवन काफी जानकारी रखता है। अनुभव से उसे यह भी ज्ञात है कि कौन सा सर्प विषमय है और कौन-सा नहीं। यह सामान्य धारणा है कि सर्प को यदि छेड़ा नहीं जाए तो वह डसेगा नहीं। काले सर्प (कोबरा) को सर्वाधिक भय और श्रद्धा से देखा जाता है। प्रतिशोध लेने की शक्ति के विषय में अनेक विश्वास भी प्रचलित है। सर्प को मार देने के बाद उसकी मानवोचित अंत्येष्टि करने का रिवाज भी अनेक जगहों पर प्रचलित है। यह माना जाता है कि सर्प को मारने वाले का चित्र उसकी आँखों में अंकित हो जाता है और जोड़े का दूसरा सर्प उसी आकृति के सहारे सर्प के हत्यारे से प्रतिशोध लेने के लिए पहुँचता है। लगभग प्रत्येक सर्प के थान या देवालय के विषय में किसी-न-किसी प्रकार का प्रवाद या कथा का निर्माण भी मिलता है।




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