निर्बुद्धि का राज काज - गोपाल दास Nirbuddhi Ka Raaj Kaaj - Hindi book by - Gopal Das
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निर्बुद्धि का राज काज

गोपाल दास

प्रकाशक : साहित्य एकेडमी प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :94
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2164
आईएसबीएन :9788172019969

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इसमें संकलित कहानियाँ पुरानी और परिचित भारतीय लोक कथाएँ है....

Nirbudhi Ka Raj-Kaj

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

निर्बुद्धि का राज-काज में संकलित कहानियाँ पुरानी और परिचित भारतीय लोक-कथाएँ हैं। हिन्दी के अनगिनत किशोर पाठकों तक पहुँचाने के लिए इन्हें यहाँ-वहाँ व्यवस्थित किया गया है। इससे इन कहानियों का स्वर मुखर और निवेदन प्रभावी हो गया है। इन कहानियों के प्रस्तुतकर्ता श्री गोपाल दास ने आधी सदी पहले अजमेर के मैगज़ीन स्थित संग्रहालय में अंग्रेज़ी पत्रिका ‘इण्डियन एन्टीक्वेरी के अंकों में इन्हें पढ़ा था। इन्हें पढ़ने के बाद हिन्दी में इनका भाषांतर करने की साध उनके मन में रची-बसी थी, जो अब इतने सालों बाद पूरी हो पायी है। ऐसी ही कहानियों ने भारतीय भाषाओं के लाखों पाठकों में रचनात्मक ऊर्जा और कल्पनात्मक क्षमता का विस्तार किया है।

साहित्य अकादेमी को विश्वास है कि ये कहानियाँ अपने पाठकों को अपनी गौरवपूर्ण लोक-कथाओं के और भी निकट ले आयेंगी।

 

1
सोनाबाई

 

वह सूरत नगर का एक बड़ा व्यापारी था। नाम था दान्ता सेठ। चाँदी-सोने, हीरे-मोती का कोराबार था। देश-विदेश माल आता-जाता था। सुघड़ घरवाली थी। सात बेटे थे। सब सुन्दर और होनहार। उनका ब्याह हो चुका था। बहुएँ भी एक से एक धनी परिवार की थीं।
एक ही कमी थी। कोई बेटी नहीं थी। माँ मंदिर जाती, बाप दान-पुण्य करता। हवेली में दिन-राज पूजा-पाठ होता रहता।
भगवान ने सुन ली। बेटी का जन्म हुआ। ब्राह्मण भोज हुआ। दक्षिणा के लिये थैलियाँ खुल गईं। उसका कुंदन-सा रंग था। नाम रखा गया। सोनाबाई।
उसका सोने का पालना था। रेशम की डोर थी। भाभियाँ झुलाती रहती थीं। माँ रोज़ सवेरे उस पर मोतियों की एक माला वारती। वे मोती भिखमंगों में बँटवा दिये जाते थे।

सोनाबाई आठ साल की हो गई। देखने में छोटी अप्सरा लगती थी। बोलती थी तो कोयल कूकती थी, हँसती थी तो मोती-से फूल झरते थे। दिन भर झूले में झूलती रहती थी। उसकी हर माँग पूरी होती थी, और एकदम। माँ, बाप, भाइयों की लाड़ली जो थी। भाभियों पर हुकम चलाती थी। वे उससे कुढ़ने लगी थीं। सास-ससुर के आगे मुँह नहीं खोल पाती थीं।
फिर, सब उलटा हो गया।
नगर में महामारी फैली। माँ-बाप स्वर्ग सिधार गये। भाइयों पर व्यापर का बोझ बढ़ा। सवेरे से शाम तक उसी में लगे रहते। फिर भी बहन के लाड़ में कोई कमी नहीं आई। उसे सिर आँखों पर रखते।
भाभियों की कुढ़न और बढ़ने लगी थी।
सोना इससे अनजान थी।

व्यापार के लिये भाइयों को विदेश जाना पड़ा। उनकी अपनी पालदार नौका थी। रवाना होने से पहले पत्नियों को आदेश दिया कि उनके पीछे सोना की देखभाल में कोई चूक न हो। सबने सिर हिला दिया।
उन्होंने झूठमूठ को सिर हिला दिया था।
भाइयों के जाते ही भाभियों ने सोना पर अपनी भड़ास निकालनी शुरू कर दी। उससे नौकरों का काम लेने लगीं। भांडा-बरतन, झाड़ू-बुहारी।

ननदजी, बहुत झूले में झूल लीं। अब कुछ हाथ पैर भी हिलाओ।’’
सोना से नहीं होता, बिगड़ जाता, वह अलसा जाती तो डाँट-डपट करतीं, कभी धप-धौल भी जमा देतीं। उसके आँसू आते, वे मुसकातीं। सोना का जीवन दूभर हो गया।
एक दिन हुकम हुआ, जंगल से लकड़ियाँ बीनकर लाओ। लकड़ियाँ सीली न हों। उसने लकड़ियाँ बाँधने को रस्सी माँगी। मना कर दिया। हाथों की कैंची बना कर कसना और सिर पर ढोकर लाना। एक और शर्त लगा दी। गट्ठर छोटा न हो, न तो दुबारा जाना होगा।

जंगल में लकड़ियाँ बीनकर सोना ने एक ढेर बनाया। जैसे ही सिर पर धरने को उठाया, वे फिसल गईं। हाथ में दो चार बचीं। उसने फिर ढेर बनाया, फिर उठाया, फिर वे फिसल गईं ऐसा कई बार हुआ। हारकर वह धरती पर बैठ गई और रोने लगी।
पास में एक साँप का बिल था। उसने सुना वह बाहर निकला, रोने का कारण पूछा।
सोना विलाप करने लगी:

 

बड़ा व्यापारी था दान्ता सेठ।
सेठ के थे सात बेटे,
अन्त में जन्मी एक बेटी,
नाम था उसका सोनाबाई।
प्यार उसे सारा घर करता,
रोज़ सवेरे माँ वारती
उस पर एक मोती की माला।
माँ-बाप हुए ईश्वर को प्यारे,
व्यापार को भाई विदेश सिधारे,
भाभियाँ उसे सताती हैं,
जीवन नरक बनाती हैं,
रोती रहती सोनाबाई।

 

‘‘नाग देवता, मेरी भाभियों ने मुझे लकड़ियाँ लाने जंगल भेजा है। बाँधने को रस्सी नहीं दी है। लकड़ियाँ कम हुईं तो बरजेंगी।’’
इस दर्दभरी कथा से साँप का दिल पसीज गया। उसने सोना को धीर बँधाई।
‘‘बेटी, मैं सीधा लेट जाता हूँ। रस्सी बन जायेगी। मेरे तन पर तू गट्ठर रख देना। मैं उसे कुंडल मार कर कस लूँगा। लकड़ियाँ बँधी रहेंगी। तू गट्ठर उठाकर घर ले चलना।’’
सोना ने वैसे ही किया।
जब उसने गट्ठर लाकर घर के आँगन में रखा, भाभियों के लिये यह पहेली बन गई कि रस्सी बिना लकड़ियाँ बँधी कैसे रहीं। गट्ठर धरती पर रखते ही साँप रेंगकर बाहर निकल गया था। भाभियाँ उसे देख नहीं पाई थीं।
सोना ने मन-ही-मन नाग देवता को धन्यवाद किया।

यह शुरूआत थी। सोना को अभी और परीक्षाओं से गुज़रना था।
घर में एक दुलाई थी। बिलकुल चीकट। सारी घी और तेल में पुती हुई।
भाभियों ने कहा, सोना समुद्र के किनारे ले जाये और उसे बिलकुल साफ धोकर लाये। कहीं मैल न रहे। सोना ने साबुन माँगा। उसे झिड़क दिया। अपने हाथों से कूटे।
दुलाई भारी थी। सोना से उठाये न उठी। वह उसे घसीटती हुई समुद्र तक ले गई। रास्ते की कीचड़ और धूल उसमें और समा गई। उसे पानी में डाल दिया। रास्ते में उसने लकड़ी का एक डंडा उठा लिया था। उससे दुलाई को पीटने लगी। मैल निकलनी न थी, न निकली। हथेलियों में सिर भरकर और कोहनियों को घुटनों पर टेककर वह बिलखने लगी।
उधर से सारस पक्षियों का एक झुण्ड उड़ता हुआ जा रहा था। सोना को बिलखते देखकर धरती पर उतरा। उसके बिलखने का कारण पूछा। सोना विलाप करने लगी :
बड़ा व्यापारी था दान्ता सेठ।

 

सेठ के थे सात बेटे,
अन्त में जन्मी एक बेटी...

 

सोना ने दुलाई धोने की बात बताई। सारस पक्षियों को दया उमड़ी। उनका मुखिया बोला : ‘‘तुम्हारा काम हम कर देंगे। तुम बस, दुलाई को पानी में खींच दो और फिर किनारे पर बैठकर देखो।’’
सारस पक्षी दुलाई को अपने डैनों से पीटने लगे। अपनी चोंचों में भर कर दुलाई को उलटते, पलटते जाते। थोड़ी देर में काम पूरा हो गया।
मुखिया सोना के पास आया। बोला, ‘‘बेटी, दुलाई को पानी से खींचकर अब रेत पर सुखा दो। और हाँ, रो तो बहुत लीं। अब एक बार हँसो। हम तुम्हारे मोती से दाँत तो देखें।’’

वह खिलखिला पड़ी। सारस पंछी उड़ गये। उसने मन-ही-मन धन्यवाद दिया।
दुलाई नयी-सी चमक रही थी। हलकी भी हो गई थी। सोना ने उसे सिर पर लादा और उछलती-कूदती घर आई।
भाभियों ने और कठोर दण्ड देने की ठानी।
धान की नयी फ़सल आई थी। बड़ी भाभी चावल बीन रही थी। उसने छोटियों को इशारे से बुलाया। कान में कुछ कहा। सबने सिर हिलाकर हामी भरी। छोटी भाभी एक बोरी में एक पसेरी चावल लाई और दूसरी एक पसेरी दाल। सोना को आवाज़ दी।

‘‘देखो, इन बोरियों में एक-एक पसेरी चावल और दाल हैं। इन्हें बाहर बाड़े में ले जाओ और सूरज डूबने से पहले बीन लाओ। एक भी दाना इधर-उधर न हो। सब गिने हुए हैं। भूल-चूक पर दण्ड मिलेगा।’’
सोना ने अपने जीवन में दो दाने नहीं बीने थे। वह दो पसेरी कैसे बीनती ? बोरियाँ उठा कर बाहर बाड़े के एक छायादार पेड़ के नीचे रख दीं और वहीं बैठ गई। बोरियाँ के मुँह खोले। पेड़ पर बैठी चिड़ियाँ चहचहा उठीं। वह उन्हें देखने लगी। कभी वह भी मुक्त चिड़कोली थी। इसी बाड़े में चहचहाती थी। आज पंख कट गये हैं, गीत सूख गये हैं। उसका गला भर आया। वह फूट-फूटकर विलाप करने लगी :

 

बड़ा व्यापारी था दान्ता सेठ।
सेठ के थे सात बेटे
अन्त में जन्मी एक बेटी....

 

चिड़ियों का चहचहाना थम गया। एक चिड़िया उड़कर उसके पास आई।
‘‘क्यों रो रही हो सोनाबैन ?’’
‘‘तुम मुझे जानती हो ?’’
‘हम तुम्हारे बाबुल की बगिया की चिड़ियाँ हैं। इस पेड़ पर हमारा बसेरा है। तुम्हें कैसे नहीं जानेंगी ? किन्तु आज तुम्हारे कण्ठ में रुदन कैसा ?’’

सोना ने अपनी पीड़ा सुनाई। चिड़िया ने ढाढ़स बँधाया : ‘‘सोनाबैन आप चिन्ता न करें। आप बस, इन बोरियों के दाने बिखेर दें। यह काम अभी हुए जाता है। आप के गले में शहद है। जितने हम काम करें, आप कोई गाना सुनाती रहें।’’
चिड़िया ने एक हूक भरके अन्य चिड़ियों को भी नीचे बुला लिया। सोना गा रही थी :

 

बाबुल तेरे अम्बुआ की चिड़िया,
मेरे बीर गये परदेस।

 

चिड़ियाँ दाल-चावल बीन रही थीं। जैसे ही गाना समाप्त हुआ उन्होंने अपना काम पूरा कर लिया था। दाल-चावल के बीने हुए ढेर अलग-अलग रखे थे। सोना ने झटपट बोरियों में भरे और घर लाकर भाभियों के सामने रख दिये।
बड़ी भाभी ने बिना गिने शोर मचाया : ‘‘इनमें दाल के सौ दाने कम हैं। उन्हें ढूँढ़कर लाओ।’’
सोना बाहर जाने को मुड़ ही रही थी कि चिड़ियाँ फरफराती हुई अंदर आईं और चोंचों में भरे दाने ज़मीन पर बिखेर गईं। सोना ने गिने। वे पूरे सौ थे, एक कम न ज़्यादा। बड़ी भाभी का मुँह बंद हो गया।
सोना ने चिड़ियों को मन-ही-मन धन्यवाद दिया।

भाभियाँ हैरान थीं। उनका कोई वार नहीं बैठ रहा था।
मँझली भाभी की कमर में दर्द रहता था। वैद्य ने बताया था, शेरनी के दूध से मालिश की जाये तभी ठीक हो सकता है। यह काम सोना को सौंपा गया। उसके हाथ में एक गागर थमा कर शेरनी का दूध लाने जंगल में भेज दिया गया।
भाभियों के अत्याचार से सोना तंग आ गई थी। उसे जीवन से कोई मोह नहीं रहा था। वह निडर जंगल में घुस गई। इस छोर से उस छोर तक चक्कर लगा आई। कोई शेरनी नहीं मिली। भूख-प्यास सताने लगी थी। थक भी गई थी। एक छायादार कोने में सुस्ताने लेट गई। विलाप के बोल होठों से फूटने लगे :

 

बड़ा व्यापारी था दान्ता सेठ।
उसके थे सात बेटे,
अन्त में जन्मी एक बेटी....

 

पास की झाड़ी में एक शेरनी अपने बच्चे को दूध पिलाना शुरू ही करनेवाली थी कि सोना का विलाप सुनकर, उसकी हृदय करुणा से भर आया। वह दबे पंजे सोना के पास आई। ममता भरे स्वर में पूछा : बेटी, तुझे क्या कष्ट है ?’’
सोना की कथा सुनकर शेरनी ने गागर में अपना दूध चुआया और फिर चुपचाप झाड़ी के पीछे ओझल हो गई। उसका बच्चा भूखा रहा।
सोना ने शेरनी को मन ही मन धन्यवाद दिया।
शेरनी के दूध की गागर मँझली भाभी के सामने लाकर रख दी।
भाभियों की समझ में नहीं आ रहा था कि यह छोटी-सी लड़की जादूगरनी है या उसके सिर पर विधाता का हाथ है। सर्प, पशु, पक्षी सभी उसकी सहायता कर रहे थे। फिर भी भाभियाँ हार मानने को तैयार नहीं थीं। अब तक तो वे उसे सता रही थीं, अपनी दबैल बनाना चाहती थीं अब उससे छुटकारा पाने का उपाय सोचने लगीं।

रात तेज़ आँधी आई थी। अभी तक थमी नहीं थी। भाभियों ने खिड़की से देखा, समुद्र में ऊँची पहाड़-सी लहरें उठ रही थीं। किनारे से टकरातीं तो फेन बनता। यहाँ से वहाँ तक फेन-ही-फेन था।
उन्होंने सोना को एक कपड़ा दिया। कहा, समुद्र तट जाकर उसमें फेन भर लाये। मन में सोचा, जैसे ही सोना फेन पकड़ने पानी में उतरेगी, कोई बड़ी लहर आयेगी और उसे अपने अंक में भरकर बहा ले जायेगी।
सोना को समुद्र प्रिय था। अक्सर भाइयों के साथ नाव में सैर करने जाती थी। बड़ा आनन्द आता था। आज समुद्र का रूप डरावना था। काला और राक्षसी। उसने बड़ी भाभी से बिनती की, तूफान कम हो जायेगा तब चली जाऊँगी।
भाभी चण्डी बनी हुई थी। डाँटकर बोली : ‘‘तूफान कम हो जायेगा तो फेन कहाँ से आयेगा ? अभी जाना होगा।’’
सोना लाचार हो गई।

हिम्मत बाँधकर पानी में उतरी। जैसे ही लहरें किनारे से टकराकर वापिस होतीं, सोना के पैर उखड़ने लगते। जब उनके उतार-चढ़ाव की आदी हो गई, तब कपड़े में फेन पकड़ने की कोशिश करने लगी। फेन कपड़े में भरते और पानी हो जाते।
फेन कपड़े में न भरने थे, न भरे।
सोना पानी से निकल आई। घर लौटने का साहस नहीं था। वहीं बैठ गई, और बैठी रही। दिन ढलने लगा था। आँधी बंद हो गई थी। जल शान्त हो गया था। लहरें सो गई थीं। सोना दूर, पानी के उस पार, आँखें गड़ाये थी। देखे जा रही थी। न जाने क्या ?

सहसा उसे लगा, दूर पानी से कोई चीज़ ऊपर उठ रही है। उसका आकार बड़ा होता जा रहा है। वह चल रही है। वह उसी की ओर आ रही है। उसमें ऊँची-ऊँची बल्लियाँ हैं, जिनमें कपड़े बँधे हैं। वह पालदार नौका है। जैसे ही वह निकट आई, सोना खुशी से उछल पड़ी। उसके मुँह से चीख़ निकली :
‘‘यह तो हमारी नौका है। मेरे भाई, आ गये मेरे भाई।’’
उसे खेल सूझा। वह एक चट्टान के पीछे छिप गई। जैसे ही भाइयों ने किनारे पर पैर रखे, वह गाने लगी :

 

घर लौट के आये मेरे बीरा,
मैं उनपे बलि-बलि जाऊँ।

 

भाई पहचान गये। ऐसे कूकनेवाली तो उनकी बहन ही हो सकती है। किन्तु यहाँ इस निर्जन तट पर ? इधर-उधर आँखें दौड़ाईं, कहीं नज़र नहीं आई। बड़े भैया ने पुकारा :
‘‘सोना, सोना।’’
‘‘बताओ मैं कहाँ हूँ ?’’ वह उनके साथ लुकाछिपी खेल रही थी।
‘‘जहाँ भी हो, सामने आओ सोना। तुम्हें देखने को हम अधीर हो रहे हैं।’’

वह खिलखिलाती हुई चट्टान के पीछे से निकली। दौड़कर भाइयों से चिमट गई। उन्होंने उसे अंक में भर लिया। फिर देखा, उसके कपड़े मैले मुसे हुए थे। बाल रूखे, बिखरे हुए थे। चेहरा कुम्हलाया हुआ था। पूछा :‘‘यह क्या हाल बना रखा है सोना ?’’ उसका जी भर आया। जब से भाई गये थे, उसने प्यार के बोल नहीं सुने थे। वह फूट पड़ी। भाइयों ने कभी सोना को रोते नहीं देखा था। उन्हें चिन्ता हुई।
‘‘क्या हुआ सोना, बोलो तो।’’
वह चुप रही। आँखें झर रही थीं।
बड़े भैया ने दुलार से फिर पूछा : ‘‘बोलो सोना। हमसे मत छिपाओ।’’ उसने अपनी बीती सुना दी। भाइयों के चेहरे तमतमा गये। आँखें लाल हो गईं। बोले कुछ नहीं। वे सीधे घर नहीं गये। रात नौका में बिताई। सोना उनके पास रही।
हवेली में भाइयों के आने का समाचार पहुँच गया था। बन्दनवार लगाये गये। तिलक के लिये चंदन घिसा गया। आरती उतारने के लिये चाँदी के थालों में घी के दीप जलाये गये। पथ पर गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखेरी हुईं। पत्नियाँ प्रवेश द्वार पर खड़ी हो गईं।

अगले सवेरे भाई आये। मझले भैया ने मोटा लबादा पहना हुआ था। उसमें कुछ छिपा हुआ था। स्वागत रीति पूरी हुई। भाई गुमसुम रहे। किसी के अभिवादन का उत्तर नहीं दिया। बैठक में अपना स्थान ग्रहण किया। भोजन परसा गया। सबने थाल एक ओर सरका दिये। बड़ी भाभी ने मनुहार की। बड़े भैया ने पूछा :
‘‘सोना कहाँ है ?’’
बड़ी भाभी चुप रहीं। बड़े भैया ने फिर पूछा : ‘‘सोना नहीं दीखी। वह कहाँ है ?’’ उनका स्वर भाभियों को दहला गया।
कल सवेरे से, जब सोना को उस आँधी तूफ़ान में समुद्र से फेन लाने भेजा गया था, किसी ने उसे नहीं देखा था। भाभियों ने तो चाहा था कि वह समद्र में समा जाये। वे यह भी जानती थीं कि सोना भाइयों की आँखों का तारा है। एक-दूसरे को देखने लगीं। वे क्या उत्तर देतीं ? बड़े भैया की कठोर दृष्टि बड़ी भाभी पर टिकी हुई थी।
उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

नौकरों को बुलाया गया। सात पालकी लाने को कहा गया। पत्नियों को आदेश हुआ, बिना अपने साथ कुछ लिये, जैसी खड़ी हैं वैसी ही, पालकी में बैठकर अपने-अपने मायके चली जायें और वहीं रहें। हवेली के द्वार उनके लिये सदा को बंद हो गये।
‘‘भैया, इतना कठोर दण्ड नहीं। नहीं, नहीं।’’
मझले भैया के लबादे में सोना छिपी थी। वहीं से उसकी आवाज़ आई। वह बाहर निकली। उसे जीवित देखकर भाभियाँ चकित रह गईं। सोना ने बड़े भैया के पैर पकड़ लिये।

‘‘भैया, आप बाबू की सीख भूल गये ? वह सदा कहते थे, ‘क्षमा बड़न को चाहिये ।’ जो बीत गया, उसे बिसरा देना चाहिये। बड़ी भाभी और अन्य सब भाभियों की ओर से मैं आपसे क्षमादान माँगती हूँ। वे इसी हवेली में रहेंगी और आपका स्नेह पायेंगी।’’
भाभियों को अपने कानों पर विश्वास करना कठिन हो रहा था। बड़ी भाभी आगे बढ़ी। सोना की बलैयाँ लीं। बोलीं: ‘‘सोनाबैन, तुम वास्तव में सोना हो। हम सब पापिन हैं। तुमने हमारा उद्धार कर दिया।’’
हवेली फिर हँसी-खुशी से भर गई।


 

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