कुछ माटी की कुछ कुम्हार की - गिरीश पाण्डे Kuch Mati ki kuch Kumhar ki - Hindi book by - Girish Pandey
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कुछ माटी की कुछ कुम्हार की

गिरीश पाण्डे

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :151
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2210
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है गिरिश पाण्डे का सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य संग्रह...

kuchh mati ki kuchh kumhar ki

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

.....यदि आस-पास के परिवेश को हम थोड़ी देर के लिये जलती हुई लकड़ियाँ मान ले तो उठती हुई लपट, धुआँ और राख साहित्य का मिला-जुला रूप होता है। उस समय जो निखालिस लपट होती है, उसी का कोई टुकड़ा व्यंग्य होगा। हो सकता है कि वह लपट किसी खास लकड़ी से उठती दिखायी दे किन्तु वह सब की होती है। यदि उसमें एक भी लकड़ी कम होती तो शायद वह लपट वैसी नहीं उठती।
शेर जंग गर्ग की लाइनें है-

मगर सामने की कुर्सी पर बैठा उससे जरा डरो करना है यदि व्यंग्य किसी सज्जन पर व्यंग्य करो
तो इसी डर की वजह से अधिकांश तो अपने उपर ही व्यंग्य किया है। यदि कहीं आप को लगता है कि आप पर व्यंग्य हो गया है तो विश्वास मानिये आप निश्चित रूप से सज्जन होंगे।
जिधर भी ज्ञानियों को देखिए यही क्रम मिलेगा।1 पहले वे आविष्कार करते पाये जायेंगे फिर उनकी आवश्यकता के निर्माण में व्यस्त मिलेंगे। पहले हथियार बनायेंगे फिर दूसरों को डरा-धमका कर उन्हें वहीं हथियार बेचेंगे। इसे आधुनिक अर्थशास्त्र की भाषा में ‘मार्केट का निर्माण’ कहा जाता है।

‘सर ! पहले जो महान होता था वह घास खाता था। महाराणा प्रताप और उनके परिवार ने घास खाई। लेकिन अब जमाना एडवांस हो गया है। अब किंग बनना महानता नहीं है, किंग मेकर बनना महानता है अब घास खाना महानता नहीं है, घास खिलाना महानता है। आप महान है सर आप किंग मेकर की तरह है। आप हम सब को घास जो खिलाते है सर।’
जातियाँ, धर्म, सम्प्रदाय यह सब इसलिए है कि आदमी अलग-अलग खेतों के फसलनुमा, विविध समूहों में बँटा हुआ और गड्डमडु है। जब व्यक्ति गमलेनुमा, विविध हो जायगा, एक जगह से दूसरी जगह आसानी से किसी हिचक और नुकसान के हट जायगा या हटाया जा सकेगा तो फिर कोई समस्या ही नहीं रहेगी। तब कोई यह नहीं कहेगा कि ये देहरादून के चावल है या पंजाब का गेहूँ क्योंकि तब सभी गमले के चावल होंगे और गमले के गेहूँ। न कोई झगड़ा न टंटा।

फोटोग्राफर बोला, ‘साहब आप पूछते है कि शैडो क्यों ? मैंने तो आप पर एहसान किया है और बिना माँगे ही शैडो दिया है। क्या आप नहीं जानते कि आजकल शैडो की कितनी माँग है ? बुरा न मानें तो एक बात कहूँ, आप बहुत पुराने ख्याल के मालूम होते है बल्कि दकियानूसी। नये जमाने में तो हर आदमी शैडो चाहता है, बल्कि बहुतों का तो अकेले एक शैडो से काम नहीं चलता। उन्हें कई-कई शैडो चाहिए। आप पुलिस विभाग में जाकर पूछें, शैडो की कितनी माँग है। अब तो कई प्राइवेट एजेन्सियाँ भी शैडो की माँग पूरी करने में लगी हैं। मैं तो कह रहा था कि आपको मेरा एहसान मानना चाहिए। उलटे आप मुझसे शैडो तैयार करके देने की शिकायत कर रहे हैं....।’

भूमिका


आज भी कभी-कभी सोचता हूँ कि मैं व्यंग्य रचनाकार कैसे हो गया तो यह मेरे ही जीवन का एक बहुत बड़ा व्यंग्य प्रतीत होता है। जब मैं बी०एस-सी० में पढ़ता था और हॉस्टल में रहता था तो हॉस्टल मैगजीन के लिए मैंने एक व्यंग्य रचना लिखी थी ‘‘अकविता पढ़िए नहीं, लिखिये; उसी में अधिक आनंद है।’ उस रचना को छपने के लिए हॉस्टल के साहित्यिक सचिव को दिया। उस समय हॉस्टल में ‘बेस्ट इनमेट’ चुने जाते थे और रचनाएँ छपवाने के लिए बेस्ट इनमेट के प्रत्याशियों में काफी होड़ रहती थी, जाहिर है मैं इस होड़ से बाहर था। इसलिए मेरी रचना नहीं छपी और मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। मैं इस संग्रह में अपनी उस पहली व्यंग्य रचना को देना चाहता था लेकिन आज उसकी प्रति मेरे पास, नहीं है। शायद तत्कालीन साहित्य सचिव के पास पड़ी हो। यदि वे लौटाये तो मैं अनुग्रहीत होऊँगा यद्यपि मैं जानता हूँ कि उन्हें दिक्कत होगी क्योंकि पता लिखा टिकट लगा लिफाफा रचना के साथ नहीं दिया गया था।

फिर दुबारा एक व्यंग्य रचना तब लिखी जब मैं नागपुर में प्रत्यक्ष कर एकेडमी में ट्रेनिंग कर रहा था और उस एकेडमी की मैगजीन का मैं ही सम्पादक था। इसलिए रचना न छपने का सवाल ही नहीं उठता था। यह और बात है कि मैंगजीन भर की रचनाएँ अपने आप नहीं मिल पाती थीं बहुत खींच-तान कर रचनाएँ लिखवानी पड़ती थीं।
जीवन अनेक विविधताओं और विरेधाभासों से भरा हुआ है। उन्हीं को आप निष्ठापूर्वक बयान कर दीजिए व्यंग्य हो जाएगा। जशपाल भट्टी ने दूरदर्शन पर प्रसारित अपने सीरियल में क्या दिया ? जीवन की निहायत सच्चाई को दिखाया। बड़े सफल व्यंग्य सीरियल माने गये। तो क्या सच कह देना ही व्यंग्य है ? सच को सच का नाम देकर कहिये, पूरा जमाना आपके विरोध में आयेगा। मेरी एक कविता है-


‘‘जब मैं अहंकारी था
लोगों ने कुछ नहीं कहा
और जब मैं सच बोलने लगा
लोगों ने कहा
बहुत बड़ा अहंकारी है’’


लेकिन यदि आप सच के व्यंग्य के रूप में कहिए तो लोग तिलमिलायेंगे, मन मसोस-मसोस कर रह जायेंगे और फिर धीरे से कह ही देंगे, ‘‘अच्छा है’’। इसी बात को कहती हुई हाइकू कविता है-

आज के समाज का सबसे बड़ा व्यंग्य
सच को व्यंग्य कहकर
कहना पड़ रहा है

(संग्रह ‘बोलो धर्मराज’ से)

सबसे पहले तो मेरी कविताएं ही प्रकाशित और पुरस्कृति हुईं। लेकिन कविताएँ सुनने के बाद लोगों के चेहरों पर उभरे भावों को जब मैंने ध्यान से देखा तो न जाने क्यों व्यंग्य कहने की इच्छा पैदा हुई। जब मेरी पहली कविता की किताब ‘यथार्थ के आसपास’ छपकर आई थी तो उसे पढ़ने के बाद एक सजग पाठक मुझसे मिलने आये। मैं बहुत खुश हुआ कि वह शायद मेरी कविताओं की तारीफ करेंगे लेकिन उन्होंने कहा ‘‘तुम गद्य बहुत अच्छा लिखते हो, मुझे इस किताब की भूमिका सबसे अच्छी लगी, खासकर के जो व्यंग्य का पुट दिया गया है वह बहुत अच्छा है।’’ मेरी कविता की किताब ‘बोलो धर्मराज’ पढ़ने के बाद हमारे मित्र विनोद विरल ने कहा, ‘‘यार तुम्हारी किताब की भूमिका बहुत अच्छी है, एक सुझाव दूँ। अब तुम कविताएँ न लिखा करो। केवल भूमिकाएँ ही लिखा करो।’’ ठीक यही बात विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर रामकृष्ण मणि त्रिपाठी जी ने मेरी तीनों किताबें पढ़ने के बाद कही। बल्कि उन्होंने सुझाव भी दिया ‘‘तुम अपनी अगली किताब में और कुछ मत लिखना या फिर भूमिकाओं का एक संकलन निकालना और शीर्षक रखना ‘‘मेरी अपूर्ण पुस्तकों की भूमिकाएँ’’। क्या मेरी यह पुस्तक भूमिकाओं का संकलन मात्र तो नहीं बन कर रह गयी है  ?’’

फिर मैंने कई व्यंग्य लिखे और लोगों को सुनाया। लोगों को पसन्द आये आश्चर्य तो तब हुआ जब इन्हें राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में छपने के लिए भेजा तो अधिकांशतः छप गये। यह भी मुझे व्यंग्य ही लगा कि मेरी व्यंग्य रचना हॉस्टल मैगजीन में नहीं छप पायी थी और धर्म युग सरीखी पत्रिकाओं से, अधिकतर वापस नहीं हुई। इसका कुछ कारण हो सकता था। मुझसे जब लोग पूछते तो मैं यही कहता कि भई आजकल जरा पत्र-पत्रिकाओं में रचना का स्तर गिर गया है या फिर व्यंग्यकारों की बहुत कमी हो गई है। इसलिए उन्हें मजबूरीवश मेरी रचनाएँ छापनी पड़ रही हैं।
कई बार तो मैंने काव्य गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में व्यंग्यलेख पढ़ने का साहस किया। बहुधा तालियाँ मिलीं। इन तालियों ने मुझे आत्मविश्वास दिया।

मैं व्यंग्य की लोकप्रियता का कारण सोचने लगा। क्या कारण है कि आज पत्र-पत्रिकाओं में हम व्यंग्य को कविताओं और कहानियों में भी अधिक ढूँढते है ? टी०वी० में कहानी पर आधारित सीरियलों की तुलना में व्यंग्य पर आधारित सीरियलों को अधिक पसंद करते हैं ? मुझे ऐसा लगा की आजकल जीवन इतना गतिशील हो गया है कि कहानियाँ बहुत जल्दी पुरानी लगने लगती हैं। जो कुछ भी कहानी में पढ़ते हैं, लगता है कि, अरे यह तो कल के अखबार में पढ़ा था। अखबार की घटनाएँ भी इतनी त्रासद, इतनी कहानीनुमा हो गईं, कि अखबार पढ़ना भी कहानी की किताब पढ़ने के मनिन्द हो गया है। फिर कहानियाँ पढ़ने की ललक कम हो जाना स्वाभाविक ही है।

हाँ, व्यंग्य में जीवन तो होता ही है लेकिन देखने का नजरिया एकदम अलग होता है और यही बात है कहीं गहरे जाकर पाठक को छूती है। जो जीवन की मूल भावनाएँ हैं, आवश्यकताएँ है, स्रोत हैं उन पर धूल जमने लगती है। व्यंग्य के माध्यम से लेखक उस धूल को साफ करने का प्रयास करता है, चीजों को वास्विकता में जानने का प्रयास करता है। जानना शब्द से ही ज्ञान शब्द बना है। जानने का प्रयास ही ज्ञान की, शिक्षा की शुरुआत है। कहते है कि अर्थशास्त्र की शुरुआत बार्टम सिस्टम यानी अदला-बदली की भावना से बाजार बने। किसी के यहाँ चार लौकी पैदा हुई, किसी के यहाँ चार कद्दू। लौकी वाले ने कद्दू वाले से कहा, ‘‘मेरी दो लौकी ले ले, मुझे दो कद्दू दे दे।’’ और उन्होंने बदल लिया। लेकिन अदला-बदली करते समय उन्हें ध्यान नहीं आया कि बगल में कोई तीसरा भी हो सकता है। जिसके पास न तो लौकी है न कद्दू। कुछ भी नहीं है। यदि उन्हें इसका ध्यान आया होता तो संभव है कि वे जरूरत से अधिक लौकी या कद्दू को उसे समर्पित कर देते। बेचारे का काम चल जाता।

लेकिन यह भी अंतिम सत्य नहीं हो सकता। संभव है कि बगल वाला आलसी हो। फिर उसको दान कब तक ? सामाज में मदद किसे चाहिए ? किसी दैवी आपदा या बीमारी के अलावा सामान्य दिनों में हर व्यक्ति को अपनी मेहनत के आधार पर, अपने पैरों पर तो होना ही चाहिए। हमारी संवेदना आलसियों की मदद के लिए भी तो नहीं होनी चाहिए।
इसलिए फिर प्रश्न उठता है कि हम क्या करें ? अपनी संवेदना को कैसे संतुलित रखें। उसे बहने भी दे और बहने से बचाए भी। इसलिए व्यक्ति की संवेदना तथा न्यायप्रियता दोनों ही विकसित करना होगा। वह राष्ट्र महान नहीं होता जहाँ के मात्र न्यायाधीश ही न्यायप्रिय हों बल्कि वह राष्ट्र महान होता है जहाँ कि जनता भी न्यायप्रिय हो। सम्यक शिक्षा से ही ऐसा संभव है। व्यंग्य का प्रमुख कार्य यह है कि लोग वह दृष्टि पैदा करने की कोशिश करें जिसमें वे सम्यक ज्ञान और छद्म ज्ञान के बीच भेद कर सकें। आज ज्ञान की थाली में परोसे जा रहे अज्ञान और छद्म ज्ञान से अपने को बचा सकें।
समय के साथ धीरे-धीरे निहित स्वार्थ का जो चश्मा लोगों ने पहन लिया है व्यंग्कार उस चश्में को बलात् ही झपट कर, झटक कर उतारने का प्रयास करता है और पाठक तिलमिलाते-तिलमिलाते भी सत्य का साक्षात्कार कर ही लेता है। यही व्यंग्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

व्यंग्यकार को जीवन को समग्रता से देखना पड़ता है। कण-कण में विराट का ध्यान रखना पड़ता है। फिर जीवन के विरोधी से लगने वाले छोर भी मिलने लगते हैं, विरोध पिघलने लगता है। और सब कुछ चक्रीय लगने लगता है। विरोधी भी कहीं गहरे जुड़े हुए     और एक-दूसरे से पूरक दिखने लगते हैं।
जब हम साहित्य में थोड़ा पीछे नजर डालते हैं तो एक प्रकाश स्तम्भ नजर आता है ‘कबीर’। कबीर से बड़ा व्यंग्कार कौन हुआ है ? और हौसला देखिए कि कबीर मरने के बाद भी सिद्ध करता है कि सत्य की विजय होती है। कबीर ने उस जमाने की सत्ता पर आसीन मुसलमानों को ललकारा-

काँकर पाथर जोरि के, मस्जिद लई बनाय,
ता चढ़ि मुल्ला बाग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।

और साथ ही समाज में बहुसंख्यक हिन्दुओ को धिक्कारा-

पाहन पूजै हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार,
ताते तो चाकी भली पीस खाय संसार।

लेकिन आश्चर्य है कि कबीर के खिलाफ कोई फतवा जारी नहीं किया गया, उन्हें किसी सूली पर नहीं चढ़ाया गया। यदि हृदय में विशालता हो, आँखों में पारदर्शिता और समदर्शिता हो एवम् कर्म में पवित्रता हो तो वही होगा जो कबीर के साथ हुआ। जिसको सबने आजीवन ललकारा, धिक्कारा वे लोग उसे सूली पर चढ़ाने को कौन कहे, उसकी लाश के बगल में बैठे रो रहे हैं कि कबीर मेरा है, कबीर मेरा है ! जैसे कबीर मरने के बाद भी समाज पर व्यंग्य कर रहा हो। कबीर की उलटबांसियाँ और उसमें छिपे व्यंग्य सब कुछ कण में विराट और विराट को कण में देखने की उसकी क्षमता के परिणाम हैं।
कुछ विद्वान मानते हैं कि व्यंग्य से संभावनाएँ तो काफी हैं लेकिन उसकी अपनी सीमाएँ हैं। व्यंग्य के माध्यम से आप तात्कालिकता की लड़ाई लड़ सकते हैं। लेकिन साहित्य या जीवन के लिए कहीं न कहीं आपकों गम्भीर होना पड़ेगा। व्यंग्य के द्वारा आप चीजों को, स्थितियों को समाज को, समय को चिकोटी-चुटकी काट सकते हैं मगर सार्थक परिवर्तन का मार्ग प्रस्तुत नहीं कर सकते। शायद कुछ परिस्थितियों में यह बात सच हो लेकिन व्यंग्य प्रभावकारी भी हो सकता है, परिवर्तन का मार्ग भी प्रशस्त कर सकता है। विचारों में चिकोटी काटना, चींटी सा चुभना बहुत महत्वपूर्ण होता है, बिल्कुल  विज्ञान के लीवर के मुआफिक असर होता है। चेतना में हल्की सी कुरेद, हल्का सा परिवर्तन भी काफी अधिक और दूर तक असर करता है। इसी संग्रह का एक लेख ‘चींटी और व्यवस्था’ इसी की तरफ संकेत करता है।
 आचार्य मम्मट के ‘काव्य प्रकाश’ में लिखा है-

इदमुत्तममतिशयिनि व्यड़्ग्ये वाच्याद् ध्यनिर्बुधैः कथितः

अर्थात वाच्य अर्थ में व्यंग्य अर्थ बढ़कर होने पर उत्तम काव्य होता है जिसे विद्वानों ने ‘ध्वनि’ कहा है। वाच्य और प्रतीयमान-काव्य के दो अर्थों में से-प्रतीयमान की परिभाषा आनन्दवर्धन ने ‘ध्वन्यालोक’ में इस प्रकार दिया है।  

प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीसु महाकविनामे।
यत् तत्प्रसिद्धावयवातिरित्तं विभाति लावण्यमिवाङग्नासु

अर्थात काव्य के प्रसिद्ध अवयवों से भिन्न, महाकवियों की वाणी में रहने वाला प्रतीयमान (व्यंग्य) अर्थ कुछ अन्य ही चीज है जो स्त्रियों में (प्रसिद्ध अवयवों से भिन्न) लावण्य की तरह झलकता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि व्यंग्य अलग झलक सकता है, चमक सकता है। व्यंग्य शाश्वत भी हो सकता है। एक बार पुनः कबीर के व्यंग्यों का जिक्र करना चाहूँगा। क्या कबीर के व्यंग्य शाशवत नहीं है ? क्या वे आज भी उतने ही प्रासंगिक नहीं हैं ?
आजकल साहित्य की गंगा भी उतनी ही प्रदूषित है जितनी की संगम में बहने वाली गंगा। तरह-तरह के निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए लिखा गया साहित्य भी प्रचारित हो रहा है, प्रसारित हो रहा है और प्रवाहित हो रहा है। इसलिए अक्सर साहित्य में अवगाहन के बाद चेतना पवित्र होने के स्थान पर और भी गंदी हो रही है। व्यंग्य का एक काम यह भी है कि साहित्य में बह रही ऐसी धाराओं के प्रति लोगों को सचेत करे। व्यंग्य के माध्यम से साहित्य की जमीन पर हल चलाया जाये। व्यंग्य स्वंय में भले ही कभी-कभी असफल या ओझल होता दिखाई दे किन्तु वह भविष्य की किसी सार्थक साहित्यिक और सामाजिक फसल के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

यदि आस-पास के परिवेश को हम थोड़ी देर के लिए जलती हुई लकड़ियाँ मान लें तो उठती हुई लपट, धुआँ और राख साहित्य का मिला-जुला रूप होता है। उस समय जो निखालिस लपट होती है, उसी का कोई टुकड़ा व्यंग्य होगा। हो सकता है कि लपट किसी खास लकड़ी से उठती दिखाई दिखाई दे किन्तु वह सबकी होती है सारी लकड़ियों की होती है। यदि उसमे से किसी एक भी लकड़ी कम होती तो शायद वह वैसी नहीं उठती।
मेरी व्यंग्य रचनाओं को तैयार होने की प्रक्रियाएँ भी अक्सर बड़ी अजीबोगरीब रहीं। कभी-कभी तो कुछ मित्रों ने मेरी कविताएँ पढ़ी तो कविताओं के साथ कुछ पुछल्ले भी जोड़े और उन पुछल्लों के सिलसिलों के साथ व्यंग्य रचना तैयार हुई।
कई बार तो ऐसा हुआ कि सात-आठ लोग बैठे हैं और एक लाइन किसी ने कहा दूसरी लाइन किसी और ने कहा, इस तरह होते-होते एक व्यंग्य रचना का खाका तैयार हो गया। कभी-कभी तो एक ही विषय पर कई लोगों द्वारा कई दिनों तक हुई चर्चाओं और प्रतिक्रियाओं के आधार पर रचना तैयार हुई। एक आध बार तो दो-तीन लोग रात में बातचीत करने बैठे और बातें देर तक चलती रहीं और बात की धारा अन्त में व्यंग्य रचना तक पहुँच गयी। लेकिन ऐसा अक्सर हुआ है कि लोगों से घुलमिकर बातें करने, काफी करीब से बातें करने से ही तमाम व्यंग्य रचनाओं के बीज मिल गये हैं।

जब एक बार लोगों को यह विश्वास होने लगता है कि यह आदमी लिखता है और सही लिखने की कोशिश करता है तो लोग अपनी-अपनी कहानियां लेकर आते हैं और लेखक के पास उसे जमा करके निश्चिन्त हो जाने का भाव प्राप्त करना चाहते हैं; ठीक उसी प्रकार जैसे कि लोग बैंको में जाते हैं और बैंक एकाउन्ट में अपनी-अपनी पूँजी जमा कर देते हैं। मुझे याद आता है मेरे मित्र श्री मिहिर राय चौधरी, जो विश्वविद्यालय में फिजिक्स पढ़ाते हैं, का किस्सा कि एक बार वे घर में पुराने कागजात ठीक-ठाक करने बैठे तो उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। कि अधिकांश कोल दीमकों ने चाट डाला था। उन्हें असीम दुख हुआ। उसी झोक में  उन्होंने बाकी बचे-खुचे कागजातों और किताबों को आग की लपटों के हवाले किया और सब कुछ जलाकर जब स्कूटर उठाकर बाहर घूमने निकले तो उस दिन उन्हें सूरज डूबने की लाली अधिक मोहक लगी, चिड़ियों का चहचहाना अधिक भाया, आसमान में उगता हुआ चाँद और अधिक अपना लगा। और फिर वे भागकर मेरे पास आए कि ‘‘चले अपना अनुभव तुम्हें दर्ज़ करा दें। तुम लेखक हो कही इसका प्रयोग कर लेना।’’

इसी प्रकार तमाम लोग आए हैं और सुझाव दे गये हैं कि इस पर लिखिये या अपना अनुभव सुना गये हैं, कि आप लेखक हैं, इसलिए सुना रहा हूँ कहीं आपके काम आयेगा। अक्सर ऐसा महसूस हुआ है कि मेरे पास जमा अधिक हो गया है और वितरण कम। बहुधा जमा और वितरण का संतुलन डाँवाडोल ही रहा है।
रचनाओं में कहीं-कहीं संभव है कि पुनरावृति दोष आ गया हो, एक ही बात का संकेत कई जगह दिया गया हो। आशा है पाठक इसे अन्यथा नहीं लेंगे। ये सभी रचनाएँ स्वत्रन्त्र रूप से अलग-अलग समय में लिखी गई हैं इसलिए जब संकलित की गयीं तो कुछ विचारों की गूँज का एकाधिक बार आ जाना स्वाभाविक है। और एक बार जब ये संग्रहीत कर ही दिये गये हैं तो अनुरोध है कि पुस्तक को समग्रता में ही पढ़ियेगा और समग्रता में ही अर्थ ग्रहण करिएगा।

एक घटना याद आती है। एक बार मेरी साढ़े तीन साल की बेटी रुनझुन आफिस आ गयी। हर चीज को बड़े गौर से देखने लगी। ‘‘क्या यह आपका क्लास है ? आप यहाँ पढ़ते हैं कि पढ़ाते हैं ? यह ऐसे क्यों है ? यह यहाँ क्यों रखा है ? इतने सारे कलम क्यों है ? क्या एक कलम से काम नहीं चलेगा ‍? कापियाँ (उसका आशय फाइलो से था) इतनी बड़ी क्यों हैं ? वे भूरे रंग की क्यों है ? वे इस तरह क्यों बाँधी जाती हैं ? लालफीते से क्यों बँधी है ? इतनी अलमारियाँ क्यों हैं ? इन अलमारियों में क्या रखा है ? क्या इनमें जो किताब कापियाँ रखी हैं आप सब पढ़ चुके ? कलम रखने में इतनी की जगहें क्यों हैं ? घंटी बजाने से शेषनाथ (मेरा चपरासी) ही क्यों आता है कोई और क्यों नहीं ? आप हमेशा बैठे क्यों रहते हैं, मेरी टीचर तो अक्सर खड़ी होकर क्लास में घूमती रहती हैं।’’ आदि आदि और भी न जाने कितने प्रश्न। सबका यहां जिक्र कर पाना संभव नहीं है। विश्वास मानिये तमाम सारे प्रश्न इतने मौलिक थे कि मैं हतप्रभ रह गया। आश्चर्य हुआ कि ये प्रश्न मेरे दिमाग में पहले क्यों नहीं आये ? लगाकि व्यंग्यकार की दृष्टि छोटे बालकों की तरह होनी चाहिए। तब वह तमाम सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त हो सकेगा और बहुत कुछ ताजा, सार्थक तथा समय व परिस्थिति के अनुकूल सोच सकेगा।

व्यंग्य का एक पक्ष और भी है। एक बार कलकत्ता यूनीवर्सिटी में दीक्षान्त समारोह में भाषण देते हुए लार्ड कर्जन ने कहा कि हिन्दुस्तानी कौम बहुत झूठ बोलती है। सारे लोग स्तब्ध और और दुखी हुए। जब अकबर इलाहाबादी ने यह शोर पढ़ा तो पूरे देश की तबीयत हल्की हुई, तड़प खत्म हुई।

हम झूठे सही पर आप तो हम पर हैं हुक्मराँ
झूठे है हम तो आप हैं झूठों के बादशाह।

इस प्रकार व्यंग्य कभी-कभी बड़ा भारी काम कर जाता है। बहुत सारे तनावों को कम कर जाता है। पाठकों और श्रोताओं को गुदगुदाने और कचोटने के साथ-साथ कहीं गहरे जाकर राहत भी दे जाता है। कुछ सुधी पाठकों के मन में सवाल उठा की संग्रह में अनेक लेख बिगड़ कर व्यंग्य रचनाएँ हो गये हैं या व्यंग्य रचनाएँ बिगड़ कर कहीं-कहीं गम्भीर लेख-सी जान पड़ती हैं। यह सुनकर मुझे अच्छा लगा। आत्म  विश्लेषण करने पर पाया कि यह प्रश्न तो ऐसे ही है जैसे मैं कभी-कभी आदमी से बिगड़कर व्यंग्य रचनाकार हो जाता हूँ या व्यंग्य रचनाकार से बिगड़कर स्वयं रचनाकार हो जाता हूँ या व्यंग्य रचनाकार से बिगड़कर आदमी ?  

इस, संग्रह की व्यंग्य रचनाएँ जिन पत्र-पत्रिकाओं में छपी हैं उनके संपादकों का आभारी हूँ। साथ ही आकाशवाणी केन्द्रों का आभारी हूँ जिन्होंने व्यंग्यों को प्रसारित किया है या जिस पर आधारित व्यंग्य नाटिकाएँ की हैं। उन सभी दोस्तों और परिचितों-अपरिचितों का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने या तो रचनाओं के बीज दिये हैं या उन रचनाओं की तैयारी में किसी भी प्रकार की मदद की है। प्रवीण, बच्चन, इरा, अंकिता, नम्रता, दीनानाथ जी, रामकृष्ण मणि जी, के० के० द्विवेदी जी, नरेश मेहता जी, डॉ० रामआधार सिंह, कृष्ण कुमारा विद्यार्थी जी, मधुर भइया, ऊषा भाभी, आनन्द अग्रवाल, मुहम्मद याकूब अन्सारी जी, प्रमोद कुमार शर्मा जी, राम समुझ, अतुलेश जिन्दल, डॉ० अशोक सक्सेना, राकेश श्रीवास्तव का विशेष रूप से आभारी हूँ। पत्नी रीता ने जिस मनोयोग से मेरी रचना प्रक्रिया को आत्मसात किया है उसे शब्दों में बाँधना संभव नहीं है। इस व्यंग्य लेखों के साथ जो कार्टून धर्मयुग और मनोरमा में छपे थे इस संग्रह में साभार शामिल किया जा रहा है। आवरण एवं अन्य रेखांकनों के लिए गौतम चक्रवर्ती के प्रति आभार।

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