ये कोठेवालियाँ - अमृतलाल नागर Ye Kothevaliyan - Hindi book by - Amritlal Nagar
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ये कोठेवालियाँ

अमृतलाल नागर

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :198
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2295
आईएसबीएन :00000

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आज के भारतीय समाज में वेश्याओं के जीवन का हिन्दी या किसी भी अन्य भारतीय भाषा में, यह पहला विश्लेषणात्मक अध्ययन है...

Ye Kothevaliyain

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आज के भारतीय समाज में वेश्याओं के जीवन का हिन्दी या किसी भी अन्य भारतीय भाषा में, यह पहला विश्लेषणात्मक अध्ययन है। श्री अमृतलाल नागर ने बहुत समीप से और बहुत ही सहानुभूनि से इस जीवन को देखा है, जिसे आमतौर पर रंगीन और ऐयाशी से पूर्ण समझा जाता है, लेकिन जो संघर्ष और निराशाओं से वैसे ही भरा है, जैसे कि अन्य सामान्य जीवन। इस अध्ययन में किसी उपन्यास से भी अधिक रोचकता है और सत्य पर आधारित होने के कारण इसकी प्रामाणिकता अद्वितीय है।
भारतीय समाज के अध्येताओं और नेताओं के लिए यह पुस्तक अत्यन्त महत्व की सिद्ध होगी।

प्रस्तावना

सन 1950 ई. में, राष्ट्रपति देशरत्न राजेन्द्रप्रसादजी ने यह इच्छा प्रकट की थी कि वेश्याओं से भेंट करके कोई व्यक्ति उनके सुख-दुख का हाल लिखे। वे स्वयं ही इनके सम्बन्ध में लिखना चाहते थे, परन्तु अवकाशभाव के कारण ऐसा न कर सके। मेरे मित्र पण्डित रुद्रनारायण शुक्ल उस समय पत्रकार थे, उन्हें लगा कि यह काम किसी हिन्दी लेखक को ही करना चाहिए और अपने इस तर्क से प्रभावित होकर उन्होंने ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ के संवाददाता को यह सूचना दे दी कि नागर देशरत्न राजेन्द्रबाबू की इच्छापूर्ति के लिए यह काम करेगा। अपनी इस नयी जिम्मेदारी की सूचना मुझे भी आम जनता के साथ-ही-साथ दैनिक समाचार-पत्रों से प्राप्त हुई।
जब किसी के बाल-बच्चे बड़े हो जाते हैं तब वह आमतौर पर भद्र-पुरुषों की श्रेणी में आ जाता है। अपने सम्बन्ध में भी मेरी यही धारणा थी और इसीलिए यह समाचार पढ़कर मुझे अनख लगी। बन्धुवर रुद्रनारायण ने यह समाचार मजाक में नहीं बल्कि पूरी गम्भीरता के साथ प्रकाशित कराया था। प्रतिदिन शाम को हमारी गोष्ठी जमती है। आदरणीय भाई भगवतीचरणजी वर्मा उसके स्थाई अध्यक्ष हैं। चूँकि भगवतीबाबू पेशे से वकील भी रह चुके हैं इसीलिए हममें से कोई भी मित्र, जिसे अपने किसी गम्भीर अथवा अगम्भीर प्रस्ताव को मित्र मण्डली से पास कराना होता है, भगवतीबाबू को अपने साथ करने का प्रयत्न करता है, और भगवतीबाबू जिस मुकदमें को अपने हाथ में ले लेते हैं उसे जीते बिना छोड़ते नहीं-यदि तर्क से न जीतेंगे तो अपने ज्येष्ठत्व की डिक्टेटरी से तो जीत जाएँगे। इसीलिए हम लोग उन्हें अपना नेता कहा करते हैं। रुद्रनारायण ने नेता को अपने साथ में कर लिया। शाम की बैठक में मेरे संकोच का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाने लगा। बन्धुवर ज्ञानचन्द जैन, रुद्रनारायण शुक्ल और भगवतीबाबू ने यह तय कर दिया कि मुझे यह काम करना है और पूरी गम्भीरता के साथ करना है। इस पुस्तक में वर्णित कुछ घटनाएँ मैं प्रसंगवश पहले कभी इस नित्य की गोष्ठी में सुना चुका था और यही मेरी इस विषय की योग्यता का प्रमाण माना गया।
इस सूचना के प्रकाशित होने पर हिन्दी के अनेक समाचार-पत्रों ने टिप्पणियाँ भी प्रकाशित कीं, हास्य-व्यंग्य के कालमों में और यही मेरी इस विषय की योग्यता का प्रमाण माना गया।
इस सूचना के प्रकाशित होने पर हिन्दी के अनेक समाचार-पत्रों ने टिप्पणियाँ भी प्रकाशित कीं, हास्य-व्यंग्य के कालमों में भी इस समाचार का रसीला स्वागत हुआ, जन-जनार्दन के कुछ पत्र भी इधर-उधर से आए। इस काम के लिए मेरी तैयारी और संकोच दोनों ही साथ-साथ चलते रहे। खैर, काम आज पूरा हुआ, इसका मुझे सन्तोष है। इसकी अच्छाई-बुराई की विवेचना विद्वान और अनुभवी पाठक ही कर सकेंगे। अपनी ओर से इतना ही कह सकता हूँ कि इस विषय पर क्षेत्रीय खोज-कार्य (फील्ड-वर्क) के रूप में हिन्दी में यह शायद पहली ही पुस्तक है। इसकी अपनी सीमाएँ भी हैं।

वेश्याओं के सम्बन्ध में उनकी निन्दा के अतिरिक्त और कुछ भी लिखना आमतौर पर निन्दा का विषय माना जाता रहा है। स्कॉट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ए हिस्ट्री ऑफ़ प्रॉस्टिच्यूशन फ्रॉम एन्टिक्विटी टु द प्रेजेंट डे’ की भूमिका में इस विषय पर लिखने वालों के संकोच का इतिहास भी दिया है। सन् 1951 में फ्रेंच विद्वान लेक्रॉक्स ने दो भागों में वेश्या-जीवन का इतिहास प्रस्तुत तो किया, परन्तु उसके लेखक के रूप में अपना असली नाक देने में वे सकुचा गए। अमरीकी विद्वात् सेंगर महोदय को भी अपनी इस विषय की इतिहास पोथी की भूमिका में बड़ा तकल्लुफ़ बरतना पड़ा। सन् 1857 ई. में एक्टन नामक एक अंग्रेज विद्वान को भी अपनी पुस्तक की भूमिका लिखते हुए बड़ी झेंप भरी सफ़ाई देने की आवश्यकता महसूस हुई। डाइसन कार्टर ने अपनी पुस्तक ‘सिन एण्ड सायन्स’ की भूमिका में यह प्रकट किया है कि बहुतों ने उन्हें वह पुस्तक लिखने से रोका था।
वेश्याओं के प्रति आकर्षण और वेश्यागामिता के प्रति संकोच-भाव दोनों साथ-ही-साथ मानव-सभ्यता के इतिहास में चलते रहे हैं। मेरा अपना विचार तो यह है कि इस सामाजिक संकोच ने वेश्याओं के प्रति मानव-आकर्षण को बढ़ावा दिया है। जो हो, अब तो दुनिया-भर में करीब-करीब हर जगह सरकारें वेश्यावृत्ति के खिलाफ़ ज़ोरदार जेहाद बोल रही हैं।
सबसे बड़ी समस्या चकलेखानों की है। अगर इन चकलेखानों के खिलाफ़ सावधानी से पक्की-पोढ़ी छानबीन करके फिर उन पर जगह-जगह मुकदमें चलाये जाएँ तो जन-चेतना पर असर पड़ेगा। स्त्रियों को खरीदने-बेचने का धन्धा करने वाले स्त्री-पुरुषों को आजीवन कारावास की सजाएँ देनी चाहिए। हमारे सरकारी समाज-कल्याण केन्द्रों का मुख्य काम एक तरह से केवल दूध के डिब्बे बाँटना ही रह गया है। लोकतन्त्रीय शासन में ऐसी बहुत गुंजाइश होती है, जिससे कि जनता और जनता की सरकार साथ-साथ पूरे जोश से कई समाज-व्यापी आन्दोलन चलाकर सफलता प्राप्त कर सकती हैं। इस सिद्धान्त-पालन की लकीर तो बराबर पीटी जाती है, मगर बड़ी बे असर है, वरना मैं सुझाव देता कि यह नैतिक आन्दोलन चलाकर जनता और जनता की सरकारें व्यावहारिक रूप से एक-दूसरे के अति निकट आ सकती हैं। हमारे सरकारी समाज-कल्याण-विभाग यदि सन् 30 के कांग्रेस-संगठन के समान नगरों और ग्रामों के प्रत्येक क्षेत्र को अपने संगठन से बाँध लें, अपने क्षेत्र के हर घर से समाज-कल्याण-केन्द्रों का लगाव हो, तो सचमुच बड़ा काम बन सकता है।
इस पुस्तक को लिखने से पहले इतने वर्षों में मैं वेश्यावृत्ति के सम्बन्ध में धीरे-धीरे करके कई किताबें पढ़ गया। पहले योजना बनाय थी कि शास्त्रीय ढंग की किताब लिखूँगा; बड़े-बड़े नोट्स बनाये, पर जब लिखने बैठा तो मेरे कलाकार ने मेरे शास्त्री को अपने से आगे न बढ़ने दिया। खैर, यह हुआ तो उचित ही, इसलिए अपने से शिकायत नहीं, पर उन लोगों के लिए जो इस विषय के पंडित बनना चाहते हैं, मैं पुस्तक के अन्त में उन ग्रंथों की सूची दे रहा हूँ। शायद किसी के काम आ जाए।
पाण्डुलिपि लवकुश दीक्षित ने लिखी। सहयोग बहुतों का मिला, पर यह सच है कि यह पुस्तक अपनी पत्नी के सहयोग के बिना मैं न लिख पाता। पिछले अक्तूबर मास में आगरा में मिलने पर मेरे अनन्य बन्धु डॉक्टर रामविलास शर्मा ने इस किताब में लिखे जाने की बात सुनकर मुझसे कहा था, ‘‘इसे तुम प्रतिभा जी को ही समर्पित करना।’’ बात मुझे भी सरस रीति से जँच गई। कोठे-वालियों के भेद भला घरवाली को न सौंपूँ तो किसे सौंपूँ ! परम मित्र की इच्छा को मान देते हुए यह पुस्तक मैंने अपनी जीवन-संगिनी को ही समर्पित की है।
अमृतलाल नागर

बचपन, महफिलें और वेश्या का बेटा

झूठ का रंगीनमिज़ाजी और वेश्यागामिता की लत से घना नाता है, इसलिये विषय को छूते हुए उसकी हुचकियाँ आ जाना स्वाभाविक ही है। दर्पण मेरे सामने नहीं, कमरे में अकेला हूँ, दृष्टि कागज पर है, दृष्टि अक्षरों से शब्द और शब्दों से वाक्य रचती हुई लेखनी के प्रवाह पर है, फिर भी, या शायद इसीलिये, मैं अपने समझदारी ज़िम्मेदारी-भरे अधेड़ चेहरे पर बार-बार तीव्र दौरों में शरम की लाली को आते-जाते देख रहा हूँ, उस लाली को लीलने वाली झूठ की कलौंस भी याद आ रही है, हम सफ़ेदपोशों की सभ्यता का वही तो एक सहारा है।
पर उस बात के लिये झूठ क्या बोलूँ जिसे मेरे मुँह पर तमाचे मारकर एक से अधिक जन सत्य सिद्ध कर सकते हैं। और अब झूठ की आवश्यकता भी क्या रही; जो बीत गया सो रीत भी गया। विगत क्षणों के रस रीते घटों को बांधकर उस पर अब मेरे अनुभवों का पुल पैरता है।
मैं आत्मकथा लिखने नहीं बैठा। मेरे जीवन से वेश्या-प्रसंग इतना नहीं आया कि आत्मकथा द्वारा वेश्या-जीवन का सम्पूर्ण अनुभव बखान कर सकूँ। जिस लखनऊ में मेरा होश जागा वह नवाबी ज़माने की विलासजन्य प्रवृत्तियों से मुक्त नहीं हुआ था। आस-पास के वातावरण में वेश्याओं की चर्चा समायी हुई थी। आरम्भ में जिस कोठी में हम रहते थे उसके नीचे बनी हुई दूकानों में बसी हुई तरकारी वाली कबीड़ने आपसी वाक्-युद्ध में कामेन्द्रियों से सम्बद्ध शब्दों का प्रयोग करते हुए एक-दूसरी के परकीय सम्बन्धों का यथार्थ उद्घाटन किया करती थीं। उनकी लड़ाइयों में चूँकि सर्वाधिक ऐसी ही गालियों और घटनाओं का समावेश होता था, इसलिये वे शब्द और वे बातें बरसों तक मेरे मन का प्रबल कौतूहल बनी रहीं। घर के संस्कार शुद्ध थे। अभिभावकों का नियंत्रण कठोर था। मैं अपने बचपन में कभी गली-सड़क पर लड़कों के साथ खेल नहीं सका, पतंग, ताश कुछ भी न जाना। घण्टे-सवा-घण्टे के लिये कम्पनी बाग में खेलने की आज्ञा कुछ बड़े होने पर अवश्य मिल गई थी, परन्तु उसके साथ ही-साथ यह आदेश भी था कि ‘चिराग़ घर पर जलें’। इतना नियन्त्रण होने पर भी बात का ज्ञान अटपटे ढंग से होने लगा।

मेरे साथ एक हिन्दू व्यक्ति के दो लड़के पढ़ते थे। उनमें से एक लड़का स्कूल के मौलवी साहब के घड़े से भी अक्सर पानी पीता था। स्कूल में तो नहीं, परन्तु बाहर मैंने उसे दो-तीन फैज़ टोपी लगाये पूरे मुसलमानी लिबास में भी देखा था। बड़ा अजब-सा लगता था। उसके बारे में लड़कों से कुछ विचित्र-सी बात भी सुन रखी थी। एक दिन मैं अपना कौतूहल दबा न सका; उस लड़के के दूसरे भाई से मैंने प्रश्न किया कि तुम्हारा भाई हिन्दू होकर भी ये हरकतें क्यों करता है और क्या वह बात सच है जो कि लड़के अक्सर तुम्हारे भाई के सम्बन्ध में कहते हैं। मेरा यह सहपाठी अच्छे लड़को में गिना जाता था। उसने बड़े संकोच के साथ मेरी सुनी हुई बात का समर्थन कर दिया। मुसलमानी लिबास पहनने और मौलवी साहब के घड़े से पानी पीने वाला उसका भाई वेश्या-पुत्र था। पिता पैसे वाले थे; वे अपनी मुसलमान वेश्या के पुत्र को हिन्दुआने ढंग से रखना चाहते थे इसीलिए उसे अपने घर में रखते थे। परन्तु बीच-बीच में वह अपनी माँ के घर पर भी जाया करता था और जब वहाँ जाता था तो मुसलमानी वेश धारण करता था। उसका एक मुसलमानी नाम भी था। बच्चों की बातों से धीरे-धीरे बड़ों का रहस्य बड़े अटपटे ढंग से मेरे सम्मुख प्रकट होने लगा। मेरे सहपाठी के पिता यों तो अपने व्यावसायिक कार्यवश प्राय: बाहर ही रहते थे, उसकी प्रिय वेश्या वहाँ भी उनके पास रह आती थी और अब यहाँ रहते थे तो भी वह अधिकतर अपनी वेश्या के घर पर ही रहते थे। वेश्या-पुत्र का लाड़-दुलार भी अधिक होता था। वह वेश्या अपने समय में लखनऊ की सरनाम गायिका थी। अपने घर में रहते हुए भी मेरे सहपाठी की माता अपने बच्चे से अधिक अपने पति की वेश्या के बच्चे का ध्यान रखने के लिए बाध्य थी। वेश्या-पुत्र के तनिक-सी शिकायत कर देने पर मेरे इन दोनों सहपाठियों के पिता अपनी पत्नी को इस बुरी तरह से फटकारते थे कि कोई घर की नौकरानी को भी न फटकारेगा। कभी-कभी वह वेश्या उनकी कोठी में भी आठ-दस दिन के लिए रह जाया करती थी। यद्यपि वह मरदाने भाग में ही रहती थी, परन्तु उसका शासन उन दिनों घर के अन्दर तक चलता था। पत्नी अपनी सौत वेश्या की दासी-मात्र रह जाती थी और उससे उत्पन्न दोनों बच्चे भी स्वयं अपने ही घर में गौण हो जाते थे। मुझे आज भी अपने सहपाठी की एक बात ज्यों-की-त्यों याद है। मैंने पूछा, ‘‘तुम्हारे पिताजी तुम्हारी माता के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं ?’’ मरे मित्र ने उत्तर दिया, ‘‘भाई वो तवायफ़ हैं, मेरी मदर से उनका मुक़ाबला ही क्या ? सभी लोग अपनी तवायफ़ों की इज्जत करते हैं। घर की औरतों को कौन पूछता है !’’
मेरे मन में इस बात के साथ आज तक वे पुरानी महफ़िलें और उनमें नाचती-गाती, आदाब बजाती-मुस्कराती, कभी किसी बात से महफ़िल को हँसाती-लुटाती हुई तवायफ़ें झाँक जाती हैं। ठीक याद है, उस समय भी सहपाठी की वह बात सुनकर मेरे सामने उन अनेक छोटी-बड़ी महफिल़ों के चित्र आ गये थे जो उस ज़माने में चौक के बड़े-बड़े रईसों-साहूकारों की हवेलियों में विवाहादि शुभ-संस्कारों के अवसर पर प्राय: हुआ करती थीं। बाज महफ़िलें तो कई रोज़ तक हुई करती थीं। हिन्दुस्तान की नामी तवायफ़ें आती थीं। उनके गुणों की धूम मचती थी। इसलिये सहपाठी की बात मन के रहस्य को और भी गहरा कर गई। वेश्या के सम्बन्ध में दोहरे भाव मेरे कच्चे मन में समा गए।
बड़ों के आदेशानुसार चिराग़ भले ही घर पर जलते रहे हों, मगर आयु बढ़ने के साथ-ही-साथ मेरी स्वतन्त्रता भी डिग्रियों में बढ़ने लगी। रहस्य यदि सक्रिय रूप में नहीं तो भी बातों में बहुत-कुछ समझ में आने लगा था। नई उम्र का रोमान समान वयवालियों के प्रति गुदगुदी उठाने लगा। महफिल़ों में सजी-बजी नाज़-नखरे दिखाती, नाचती-गाती वेश्या मेरे भी आकर्षण का केन्द्र बनने लगी। मेरे साथियों में भी अधिकतर ऐसे ही परिवर्तन होने लगे थे। हम लोग मोहल्ले के बड़ों में होने वाली वेश्या-सम्बन्धी बातों की चर्चा करते और प्राय: हममें से सभी के मन में यह बात घर कर गयीं कि तवायफ़ें प्रेम करना जानती हैं और घरेलू स्त्रियाँ इस कला में नितान्त अनभिज्ञ होती हैं। प्रेम की महिमा है, इसलिये तवायफ़ की महिमा है, यह व्यवस्था अजब तरह से मन को बाँध गई।

इन्हीं दिनों विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक लिखित हिन्दी के अमर उपान्यास ‘माँ’ और रतननाथ दर सरशार-लिखित तथा मुंशी प्रेमचन्द द्वारा अनुवादित उर्दू के अमर उपन्यास ‘आज़ाद कथा’ में वेश्याओं की धूर्तता और बनावटी प्रेम के वर्णन भी पढ़ने को मिले। वेश्याओं की चालबाज़ियों पर यों भी अक्सर बातें सुनने को मिला करती थीं। नवयुवा-काल की अबूझ यौन पहेली कभी इस पक्ष को लेकर आदर्शवाद के सहारे वेश्या के प्रतीक में प्रेम देवता की प्राण-प्रतिष्ठा करने से हिचक जाती और कभी रस-प्रवाह में बहते हुए, इस दृष्टिकोण पर अविश्वास करते हुए वेश्या द्वारा अपना सुलझाव प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के रंग मन में भरती थी। मेरे दो-एक सहपाठी वेश्यागामी हो चुके थे। वे शेखी और रंगबाजी के साथ अपने अनुभवों का वर्णन कर बहुत से साथियों की प्यास भड़काया करते थे। तभी पड़ोस की एक घटना ने मुझे ऐसा प्रभावित किया कि उसके बाद दो-तीन वर्ष तक दृढ़तापूर्वक मन वेश्याओं की कल्पना तक से विमुख रहा। हमारे पड़ोस में एक खत्री सज्जन रहते थे। वे सर्राफे में दलाली का काम करते थे और खाते-पीते खुश थे। घर में उनके वृद्ध पिता थे और पत्नी थी। दलाल महोदय और उनकी पत्नी दोनों ही स्वरूपवान और भले थे। दलाल महोदय का किसी वेश्या से प्रेम हो गया। वे प्राय: उसी के घर पर रहने लगे। पिता और पत्नी के लिये आर्थिक संकट के दिन आये। पिताजी पहले स्वयं भी सर्राफे की दलाली करते थे, परन्तु पुत्र के सब लायक हो जाने के बाद उन्होंने अवकाश ले लिया था। अब लड़के के नालायक हो जाने पर उन्होंने फिर काम करने का हौसला दिखलाया। साल-डेढ़ साल बाद ही वेश्या के जाल में कोई नया पंछी फँस गया। वह पैसेवाला था। वेश्या ने दलाल महोदय को दुतकारना आरम्भ किया, परन्तु ये उनके प्रेम में ऐसे बावले हो गये थे कि उसे छोड़ना न चाहें। शायद उनके मनमें यह भी हो कि इतने दिन तक घर से अलग रहने के बाद अब किस मुँह से वहाँ जाएँ। बहरहाल, एक दिन उनकी वेश्या ने कुद्र होकर उनके ऊपर तेजाब की पूरी बोतल उलट दी। वे दो-तीन दिन में तड़प-तड़पकर मर गये। वेश्या पकड़ी गई।
सौभाग्य से मेरी किशोरावस्था और नवयुवा-काल के दिन राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक जागरण के दिन थे। यह बड़ी लहर मुझे अपने साथ ऊँची कल्पनाओं, विचारों और कामनाओं की मन्दाकिनी में बहा ले गई। फिर भी इतना तो कहना ही पड़ेगा कि बड़ों की दुनिया की हलचल का प्रभाव बच्चों की मानसिक दुनिया पर अवश्य पड़ता है। जो बातें जम जाती हैं वे कभी-न-कभी किसी-न-किसी रूप में फलती-फूलती भी हैं।

लूलू की माँ : वेश्या-जीवन का आदि

सन् ’40 की बात है। बम्बई के शिवाजी पार्क नामक मुहल्ले में रहता था। मोहल्ला तब नया-ही-नया बस रहा था। शिवाजी पार्क के तीन ओर इमारतें खड़ी हो चुकी थीं और चौथी ओर समुद्र तट के पास ही कुछ पुराने बंगले और नई इमारतें भी इधर-उधर दिखलायी पड़ती थीं। मोहल्ला विशेष रूप से संभ्रान्त महाराष्ट्रियों एवं कतिपय गुजरातियों का था; फ़िल्म वाले भी वहाँ बस गये थे। उस ज़माने के कई छोटे-बड़े फ़िल्म स्टार वहाँ रहते थे। संगीत-निर्देशक, लेखक और फिल्मी पत्रकार भी थे। मैं भी कुछ महीने पहले एक फ़िल्म कम्पनी से नाता जोड़कर ही वहाँ रहता था। मेरे साथ आज के ख्यातनामा फ़िल्म-निर्देशक और निर्माता श्री महेश कौल भी रहते थे। नई चार मंजिल की इमारत थी; नीचे ईरानी चाय वाले की बड़ी दूकान थी और उसके ऊपर ही पहली मंजिल पर हमारा फ्लैट था। महेशजी नागपुर से आये थे। उस ज़माने के एक बड़े बैंक के मैनेजर का पद छोड़कर फ़िल्म-क्षेत्र के लिए अपनी अटूट लगन और गहन अध्ययन की पृष्ठभूमि लेकर आये थे। हम दोनों एक ही फ़िल्म कम्पनी से सम्बद्ध थे। मैं उस फ़िल्म कंपनी के थैली-पति की ओर से कम्पनी में एक महीना पहले प्रतिष्ठित हुआ था और वे स्टार प्रोड्यूसर के पुराने मित्र तथा फ़िल्म गाइड थे। महेशजी बड़े शौकीन, दिन में चार पोशाक बदलने वाले, नजाकत-नफ़ासत, ख़ातिर-तवाज़ह-पसन्द, बोलचाल में अंग्रेजी भाषा के लच्छे उछालने वाले, बड़े साहब-मिज़ाज, नवाब-मिज़ाजी आदमी थे। शुरू में दो-तीन रोज हमारे बीच भद्र मुस्कानों या मिठास की कहन-सुनन का ही आदान-प्रदान होता रहा। इसके बाद एक दिन आउटडोर शूटिंग के लिए घोड़ बन्दर जाते हुए बस के ड्राइवर के पास वाली सीट पर हम दोनों का निराले में साथ हो गया। बातें हुई, दिल खुले, मैंने यह समझा कि महेश कोरे साहब ही नहीं, आदमी भी हैं और मेरे बारे में महेशजी की यह गलतफ़हमी भी दूर हुई कि ‘पंडितजी’ लिखते ही नहीं, बोलते भी हैं। मैं उन दिनों आमतौर पर अपनी कम कहने और दूसरों की अधिक सुनने का आदी था। नये वातावरण में यह आदत कुछ और बढ गई थी। खैर !

शिवाजी पार्क का वह फ़्लैट दरअसल महेशजी ने ही लिया था। मैं पहले सुकवि बन्धुवर प्रदीपजी के पड़ोस में विले पार्ले में रहता था। जब हम दोनों का साथ घनिष्ठ हो गया तो प्राय: ऐसा होता कि बातों के फेर में मैं चार-चार छ:-छ: दिन तक अपने घर न जा पाता था। अन्त में हमने तय किया कि महेशजी को पूरे फ़्लैट की आवश्यकता नहीं; एक कमरे में वे रहें और एक कमरे में मैं। हमने फ़्लैट और फर्नीचर का किराया आपस में बाँट लिया। उस फ़्लैट के दोनों कमरों में स्नान-गृह बने थे। हमारे दिन अच्छे बीतने लगे। महेशजी उन दिनों बड़े शाहखर्च आदमी थे। अब भी उनका यह लॉर्डपन तो नहीं गया, हाँ उसके अन्दर का बचपन निकल गया है। दिन भर हमारे यहाँ फ़िल्मी यारों की मजलिस जुड़ी रहती। ईरानी होटल वाले को महेशजी की नवाबी से अच्छा मुनाफ़ा होता था। हम दोनों ही चूँकि उस फ़िल्म कम्पनी के बड़े देवताओं में थे, इसलिए काम चाहने वाले छोटे अभिनेता-अभिनेत्रियाँ हमारी खुशामद करने आते थे। एक ख़बीसनुमा बंगाली बाबू भी आया करता था। उससे हम लोग तंग आ चुके थे। वह आता तो अकेला था और फिर बातें करते-करते अपने साथ आयी हुई भद्र घर की लड़कियों को, जो बेचारियाँ हम जैसे ‘महापुरुषों’ के सामने आने में लाज-शील-संकोचवश नीचे होटल में रुक जाती थीं, हमारे ही छज्जे से गुहारकर बुलाता था। हमें उसकी यह आदत अच्छी नहीं लगती थीं। लड़कियाँ ऊपर आतीं, तो उनकी विनम्रता, शील, भद्रता आदि कमरे में आते हुए कुर्सियों पर बैठते और क्षण बीतते ही क्रमश: ऐसी अदाओं में बदलने लगतीं जो कि भद्रता, शील आदि के विधानानुसार केवल पति-पत्नी के नाते में ही स्त्री द्वारा प्रदर्शित होती है। बंगाली बाबू कहता कि ये सब लड़कियाँ भले-भले घरों से आती हैं, इनको खाली ‘फ़िल्म आर्ट’ का शौक है और वह बंगाली इन सबकी सच्चरित्रता का बीमा लिए हुए थे। शुभचिन्तक बंगाली उन लड़कियों को हर किसी ऐरे-गैरे के पास ले भी नहीं जाता। हम लगों की बात और थी हम लोग ऊँचे क्लास के आदमी थे। हमारे पास ‘आर्ट’ सीखने के लिए वे भले घर की लड़कियाँ यदि दो-चार घण्टों के लिए अकेली भी रह जाएँ तो भी उसे उनकी सच्चरित्रता और हमारी महापुरुषता पर किसी प्रकार का शक नहीं होगा। कभी-कभी महेशजी उसे बुरी तरह झिड़कते थे, परन्तु बंगाली बाबू पर उसका कोई असर न होता था।
बानक ऐसे बने कि हमारी फ़िल्म कम्पनी में विभ्राट हुआ, प्रबन्ध-परिवर्तन हुआ, अनेक लोगों को नोटिस मिला। सेठ और निर्माता में फूट पड़ गई। सुनने में आया कि उस समय की एक सुप्रसिद्ध फ़िल्म स्टार ने सलोने जवान भले-भोले सेठजी पर डोरे डाल रखे हैं। और भनक भी पड़ी कि एक सीमान्तवासी म्यूज़िक डाइरेक्टर साहब ने अपनी नवोदिता फ़िल्म स्टार पत्नी भी सेठजी को ही सौंप रखी है। सेठजी के पिता, चाचा आदि बड़े संस्कारी पुरुष थे; उन्हें इन बातों का पता न था। सीमान्तवासी म्यूज़िक डाइरेक्टर महोदय मामूली नहीं वरन् सीमान्त व्यभिचारी और गहरे चालबाज भी कहे जाते थे। जिस नवोदिता फ़िल्म स्टार के वे पति कहलाते थे उसकी वेश्या माता के साथ भी किसी समय उनका ऐसा ही सम्बन्ध बतलाया जाता था, फिर उसकी बड़ी बहन के साथ भी रहा। उस म्यूज़िक डाइरेक्टर को बरसों से जानने वाले लोग शुरू से ही कहा करते थे कि यह सेठ को अपने यहाँ बहुत बुलाता है, किसी समय उन्हें औघट घाट ही जा उतारेगा। यही हुआ भी। कहते हैं कि उसने अपनी तथाकथित पत्नी के साथ युवक सेठजी के अन्तरंग नाते के कुछ फ़ोटो चित्र उतार लिए थे और उन्हें सेठ के बाप बड़े सेठ को दिखाने तथा परायी पत्नी को अवैधानिक रूप से प्राप्त करने का आरोप लगाकर अदालत में खुलेआम मुक़द्दमा चलाने की धमकियाँ दे-देकर वही सेठजी से रुपया ऐंठता था। निर्माता और सेठजी के बीच में फूट भी उसी के कारण पड़ी, और भी अनेक दन्द-फन्द हुए। कम्पनी आगे चलकर बन्द हो गई।


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