संदेशिनी - कल्पनाथ राय Sandeshini - Hindi book by - Kalpnath Roy
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संदेशिनी

कल्पनाथ राय

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :100
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2297
आईएसबीएन :00000

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ये कविताएँ लोक व्यवहार देश के आर्थिक,राजनीतिक और सामाजिक धरातल को उजागर करती है...

Sandeshini

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘संदेशिनी’ भक्ति, ज्ञान और लोक व्यवहार की कविताओं की त्रिवेणी है। एक ही स्थान पर कविता की इन तीन धाराओं का अवलोकन, अवगाहन, आनन्द एंव संदेश मिल जाता है। भक्ति और ज्ञान की पुरानी परम्परा से हटकर नयी विधा में दर्शाया गया है। कबीर, सूर, तुलसी, मीरा भक्ति और ज्ञान की प्रतीक हैं। कथन की उनकी शैली है। उन्होंने अपने इष्ट को राम, कृष्ण आदि नामों से उद्बोधन किया है। ‘संदेशिनी’ की अपनी अलग शैली है जिसमें इष्ट को प्रिय, प्रियतम, वह आदि कहा गया है। साकार-निराकार का झमेला नहीं है। संज्ञा की जगह सर्वनाम और विशेषण से इष्ट का उद्बोधन हो जाता है। हिन्दी-उर्दू के चुटीले शब्दों के मेल से भक्ति और ज्ञान का प्याला छलकने लगता है। एक अजीब तन्यमयता में पाठक अभिभूति हो उठता है।

लोक व्यवहार की कवितायें देश के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक धरातल को उजागर करती हैं। हमें अपने उत्थान-पतन का बोध कराती हैं। हम क्या थे, अब क्या हैं और क्या होना चाहिये को स्पष्ट दृष्टिगोचर करती हैं। चित्त में विचारों का प्रवाह और ह्रदय में तत्समबन्धी भावों की धाराओं का अतिरेक उठकर हमें कुछ करने के लिये विवश करता है। यही ‘संदेशिनी’ का लक्ष्य है।

अपनी बात


आत्म प्रकाशन मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। आदिकाल में जब भाषा का सृजन नहीं हुआ था वह संकेतों द्वारा आत्म प्रकाशन करता था। कालान्तर में सांकेतिक भाषा का क्रमिक विकास हुआ। भाषा या बोली को सामान्य स्वरूप मिला। बाद में विकास की प्रक्रिया पर चलकर भाषा ने सूक्ष्म भावों और विचारों को व्यक्त करने की क्षमता प्राप्त की। अब आत्म प्रकाशन की संतुष्टि करने के लिए व्यापक आधार मिल गया। तत्पश्चात् भावों-विचारों को सुन्दर प्रभावशाली ढंग से प्रकट करने के लिए भाषा में अनेक विधाओं का सृजन हुआ। शब्द शक्तियों अभिधा लक्षणा और व्यंजना की पहचान हुई। भाषा को अलंकृत किया गया। भावों विचारों की अभिव्यक्ति को कलात्मक शिवरूप मिला। काव्य-कला इस विकास की परिणति है। कविता का जन्म तो करुणा से हुआ, किन्तु भाषा का विकास विकसित स्वरूप उसको मुखरित किया और उसमें कला एवं सौन्दर्य बोध का आधार प्रदान किया।

इस सन्दर्भ में आदि कवि वाल्मीकि का प्रसंग समाचीन है। क्रीड़ारत क्रौंच पंक्षी के जोड़े में से एक का वध होते उन्होंने देखा। उनका हृदय संवेदना और करुणा से अभिभूत हो उठा। भावों का उद्रेक कविता के रूप में प्रवाहित हुआ और वाणी में मुखरित होकर गुनगुनाने लगा। कवि उन्मत होकर दौड़ने लगा। यह क्या हुआ, वह स्वयं से पूछने लगा। इसी बीच नारद जी आय और उन्होंने आदि कविवर आज तक मानव पतित होकर दानव बना है। आप को कविता मिली है, इससे मानव का उत्थान करें और देव बनायें।

काव्यानन्द को ब्रह्मनन्द का सहोदर कहा गया है। काव्यानन्द तो तात्पर्य यहाँ केवल कविता की भावधारा में बहना नहीं है, बल्कि तैरना भी है। जो बहता है उसे केवल आनन्द मिलता है जो तैरता वह आनन्द के साथ कवि के संदेशों को भी पाता है। देव ऋषि नारद ने कवि के माध्यम से कला और सन्देश को जोड़ने की विधा आदि कवि को बतायी। कविता की धारा कला और संदेश दोनों किनारों को आलोड़ित करती है, जोड़ती है। दोनों की समवेत शक्ति ही मानव को देव बनाती है। अतएव कविता में संदेश का होना अनिवार्य है।

मैंने पूज्य गुरु जी के संदेशों को अपनी कविता में पिरोया है। यही कारण है कि पुस्तक का नाम संदेशशिनी रखा है। संदेशशिनी गुरु की धरोहर है। मेरा अपना कुछ नहीं है। हरपिज रोग की पीड़ा के अतिरेक में मैंने ‘हरपिज’ शीर्षक कविता लिखी। उस समय मुझे तुलसी के इस कथन के सत्यार्थ का बोध हुआ कि ‘‘कवित विवेक एक नहि मोरे-सत्य कहौं लिखी कागद कोरे।’’ यह मुझ पर भी चरितार्थ होता है।

संदेशिनी में अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्तियों का भरपूर प्रयोग हुआ है। यह काव्य-सौन्दर्य की विधा है। लक्षणा, व्यंजना क्लिष्टता का द्योतक नहीं है। मैंने सरल सुबोध भाषा में लिखने का प्रयास किया है। ‘कल्पना के दर्शन’ शीर्षक कविता की भी भाषा कुछ क्लिष्ट है। जो पहले की लिखी हुई है और सन्दर्भित होने के नाते इस संकलन में आ गयी है।

एक बात और है। मैंने ‘वतन’ शब्द का प्रयोग किया है जिसको आध्यात्मिक रूप में लिया गया है। वतन जीव का आदि स्थान है, जहाँ से ब्रह्म से अलग होकर उसके अंश के रूप में विश्व में आया है। वह अपने अंशी (ब्रह्म) से जुड़ने के लिए बेचैन रहता है। यहाँ भी वैश्विक नियमानुसार मनुष्य आब्रजन करता है। अपना देश छोड़कर दूसरे देश में जाता है। वही देश अब उसका वतन कहलाता है, परन्तु वह अपने पुराने वतन की स्मृति को नहीं भूलता है।

सूर, तुलसी और मीरा आदि के अपने प्रभु के साकार रूप को ग्रहण किया है और गुणगान किया है। उन्होंने अपने इष्ट को अपनी पसन्द का नाम दिया है। मेरा साकार और निराकार अभेद रूप में अभिहित है। मैंने उसे वह, तुम, प्रिय या प्रियतम कहा है जो स्वाभाविक है।

अन्तिम बात, संदेशिनी भक्ति-ज्ञान और व्यवहार की कविताओं की त्रिवेणी है। तीनों धाराओं का संगम है। एक काव्य धारा में तीन है या तीन में एक है, एक ही बात है। अपने प्रयास में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ इसका निर्णय तो विद्वान पाठक करेंगे। यदि त्रिवेणी पाठक को सीप या मोती जो भी मिले मुझे अवगत कराने की कृपा करें। मैं उनके दर्पणों में झाँककर अपने को देखूँगा। आत्म निरीक्षण करूँगा।
संदेशिनी के प्रकाशन में लोकभारती प्रकाशन, 15-ए, महात्मा गाँधी मार्ग, इलाहाबाद-1 का विशेष रूप से आभार मानता हूँ एवं अपने छोटे भाई चन्द्र भूषण शर्मा, पुत्री उषा और प्रिय अरविन्द के सहयोग के लिए प्यार और धन्यवाद ज्ञापन करने में मुझे प्रसन्नता होती है।

ग्राम/पो. काझाखुर्द
जनपद-मऊ (उत्तर प्रदेश)

-कल्पनाथ राय

भूमिका


किसी भी पुस्तक की भूमिका पुस्तक की पृष्ठभूमि अथवा उसकी आधारशिला को स्पर्श करना मात्र नहीं है। वह पुस्तक की सम्यक् समालोचना भी नहीं है। पुस्तक में लेखक के सभी पुस्तक के सभी पहलुओं को जाँचना, परखना संक्षेप में अभिमत देना होता है। कवि की काव्य विधा को, कलात्मक स्वरूप को, पुरातन और नूतन समीकरण को, नवीनता की दिशा बोध को और उसके संदेशों को अभिव्यक्त करना भूमिका लेखक को अनिवार्य है।

उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में मैंने ‘संदेशिनी’ का अवलोकन, विवेचन और संक्षिप्त समीक्षा की है। मूल्यांकन तो सभी पाठक करते हैं और करेंगे; किन्तु मैंने भूमिका लेखक होने के नाते पुस्तक के हर पहलू को गम्भीरता से जानने और और परखने का प्रयास किया है।
‘संदेशिनी’ भक्ति, ज्ञान और लोक व्यवहार की कविताओं की त्रिवेणी का अन्यतम संगम है। भक्ति और ज्ञान की काव्य धारा का अध्यात्म से ओत-प्रोत है। वहीं पर व्यवहार कविताओं की धारा भी संसार के सत्यार्थ को निकट से छूती है। इस प्रकार गंगा, यमुना की श्वेत शायामल धारा में सरस्वती की अरुण धारा भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। यह संगम पुरातन, नूतन, दृश्य, अदृश्य और शान्त एवं मुखर का समन्वय है। अध्यात्म को प्रयोगात्मक स्वरूप मिला है। सरिता के दोनों किनारों अध्यात्म एवं व्यवाहर को काव्यधारा आलोड़ित करती है, जोड़ती है। लौकिक अलौकिक प्रेम का सिलसिला परिलक्षित होता है।

शब्द शक्तियों अभिधा, लक्षणा और व्यंजना का यथास्थान प्रयोग करके कवि ने भावों, विचारों (संदेशों) को सुन्दर एवं प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है। प्रयोगों के प्रतीक से कविता की धारा प्रखर एवं मुखर हुई है। कवि ने नये शब्दों को गढ़ा नहीं है; किन्तु पुराने शब्दों को नया स्वरूप दिया है, जो स्वाभाविक है ‘वतन’ को आध्यात्मिक रूप मिला है। जीव को आदि स्थान जहाँ ब्रह्म से अलग होकर उसके अंश के रूप में संसार में वह उसका वतन है यह एक नया प्रयोग है।
कवि ने अलंकारों से भी कविता के भाव और भाषा में निखार लाया है। उसने अलंकारों को बुलाया नहीं है, वे स्वत: आ गये हैं। कविता और रमणी अधिक अलंकारों के बोझ से अपनी रमणीयता खोती है। आवश्यकतानुसार अलंकार आये।


‘‘काम करना मगर काम नहीं करना
काम का खेल तो खेल बेमेल है।’’
‘‘भारती का अचल मंदर बचा जो है शेष लेकर,
ज्ञान का सागर बिलोड़े एकता का बल सजोकर।।’’

‘‘स्निग्ध सागर से निचोड़ें रत्न संकुल ज्योत मनहर
अमृत का घट पुन: लायें लक्ष्मी आयें निकलकर।।’’


यमक और रुपक सुन्दर उदाहरण है।
‘आत्मचिन्तन’ शीर्षक कविता में कवि ने देश के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक धरातल पर जिस तन्मयता से प्रकाश डाला है, वह उसकी आत्मीयता और सत्यार्थ बोध को दर्शाता है।

‘‘खो गया यदि वह चिरंतन तो बचेगा शून्य केवल।’’

देखता हूँ आज चारों ओर जो कुहरा घना है
राहु अथवा केतु कोई विमल शशि को निगलता है।

अर्थशास्त्र पुनीत जो चाणक्य ने हमको दिया है
आज के परिवेश में क्या विज्ञजन ने पढ़ लिया है।

पूर्ण भारत एक सिंहासन तले उसने बनाया
होड़ जो सिंहसानों की थी उन्हें जड़ से मिटाया

आज अपना घर बनाने लगी है होड़ सबमें
चक्रवर्ती देश की परिकल्पना की सोच किसमें
सोच में जब साधना जुड़ती तभी है साध्य मिलता
एक सूखे सरोवर में क्या है कमल खिलता।’’


‘मानव: उत्थान पतन’ में कवि ने आज के नूतन आविष्कार और उसके विकास को बहुत निकट से देखा है। निर्माण की मनमानी दौड़ और उसकी परिणति का सही आकलन किया है।


‘‘आज मानव बन रहा विधि का विधाता
किन्तु विधि से दूर होता जा रहा है।
छोड़कर पथ हाँकता रथ जा विजन वन में
कंटकों में वह भटकता जा रहा है।।’’


कवि प्रारम्भिक पंक्तियों में ही पूरी कविता का और अपनी सोच का परिचय दे देता है।
इक्कीसवीं सदी’ में कवि के कथन की विधा उसकी अपनी कहानी है। देश और समाज की दुर्दशा पर स्वयं यह सदी रो रही है। आज हम एक भटकाव की राह पर चले रहे हैं। पुरातन् मूल्यों को भूल रहे हैं और दिशाहीन हो गये हैं। आज हमारी दशा इतनी शोचनीय है कि एक गांधी जैसा युग पुरुष ही हमें प्रगति की राह पर चलाकर दिशा बोध करा सकता है। कवि को गहरी सोच का परिणाम ‘इक्कीसवीं सदी’ है।


‘‘आज क्या हो गया हम कहाँ जा रहे
या दिशायें हमें भूल कर जा रहीं।
खो रहे हम धरोहर युगों की धरी
या हमारी धरोहर हमें खो रही।।

अब तो इक्कीसवीं की सदी रो रही
आचरण के चरण को वरण कर रही

यह सदी माँगती हाथ को जोड़कर
जग नियन्ता से प्राचीनता गुमशुदी।
वह सदी जबकि इंसान इंसान था
आचरण एक था तब नहीं थी सदी।।’’


‘नारी’ के उत्पीड़न, उसके प्रति समाज की सोच और नारी के हक की कोरी बात ऐसे प्रकरण हैं जिन पर कवि ने दो टूक कहा है।

‘‘जौहर की ज्वाला में जो जलती पद्मिनियाँ
पुरुषों की हवस में आज जलती नारियाँ।

नारी के हक की बात तो सभी करते हैं
लेकिन वे सभी हाथी के दाँत बनते हैं।’’


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