रूपतिल्ली की कथा - श्री प्रकाश मिश्र Rooptilli ki Katha - Hindi book by - Sri Prakash Mishra
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रूपतिल्ली की कथा

श्री प्रकाश मिश्र

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :335
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2299
आईएसबीएन :81-8031-070-1

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यह उपन्यास मेघालय में बसनेवाली खासी जनजाति के सांस्कृतिक जीवन पर आधारित है....

Roop Tilli Ki Katha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हिन्दी साहित्य में आदिवासियों का जीवन बहुत कम रेखांकित हुआ है और उसमें पूर्वोत्तर भारत के आदिवासियों के जीवन तो नहीं के बराबर। इसके चलते जहाँ उनका जीवन हमारे लिए अभी भी अबूझ है, उनकी एक सही शिकायत यह है कि भारत के अंग होने के बावजूद विकसित भावनाओं का साहित्य उनसे कोई सरोकार नहीं रखता। श्रीप्रकाश मिश्र का यह उपन्यास इस कमी को बड़ी शिद्दत से पूरी कर रहा है।

‘रूपतिल्ली की कथा’ उपन्यास मेघालय में बसने वाली खासी जनजाति के सांस्कृतिक जीवन पर आधारित है। इसका कालखण्ड वह समय है जब एक तरफ अंग्रेज उन्हें इसाई बनाने में लगा था, तो आस-पास का हिन्दू नेतृत्व उन्हें हिन्दू बनाने में। जनजाति दोनों से बचकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाये रखना चाह रही थी। उससे उत्पन्न संघर्ष की गाथा इस कृति में एक बढ़िया कहानी के माध्यम से उभर कर आयी है। इसके पन्नों से गुजरते हुए लगता है कि हम उस जीवन को न केवल देख रहे हैं वरन् उसे जी भी रहे है वहाँ की धूप, पानी, पहाड़, वायु, धरती, पेड़ पशु अपने समस्त सौंदर्य, तेज, वेग और जीवन्तता के साथ यहाँ मौजूद हैं, जिन्हें हम अपनी प्राणवायु में भरते चलते हैं। कवि होने के नाते लेखक का गद्य हमें बहुत आकृष्ट करता है।

आमुख


यह उपन्यास उन पाठकों को पसंद आयेगा, जिन्हें गप्प पसंद आता है, क्योंकि यह निरा गप्प है। फिर भी यह पूर्वोत्तर भारत की समस्या को, खासकर खासी जनजाति को समझने में वही भूमिका निभायेगा, जो मेरे पिछले उपन्यास ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’ ने मिज़ो लोगों को समझने में निभाया था। अन्तर यह है कि उस उपन्यास का नायक जहाँ एक राजनीतिक समस्या थी, इस उन्यास का नायक संस्कृति है-एक जाति की एक विशेष कालखंड की संस्कृति, जब उस जाति को अंग्रेजों द्वारा गुलाम बनाया जा रहा था। वह कालखंड 18वीं सदी के कुछ अन्तिम और 19वीं सदी के कुछ आरम्भिक दशकों का है।

इस उपन्यास के प्रकाशन के वक्त उन तमाम व्यक्तियों की याद आ रही है, जिनके साथ इस जीवन को देखा जाना था, जैसे पैट्रिशिया माउरी, रिंडम बहनें आयोना और जूलिया, खसिया कवि स्व. स्टेन, मेरे सहकर्मी मार्खम ड’ खार, एडविडिस नानग्रुम, माहम सिंह, जी. जी. स्वेल, ए.सी पीटर, अखौरी परिवार अजित व नलिनी सिंहा प्रो. गिरीश सिंह, ए.के. बनिक और उनका परिवार, ए.के. महन्ता और उनका परिवार...और जाने कितने लोग।

इस उपन्यास का कच्चा तैयार करते वक्त अहमदाबाद में कई लोगों का बड़ा सहयोग मिला था। दफ्तर में मेरे बॉस श्री विश्वरंजन, सहकर्मी ज्योति प्रकाश पुरोहित और आर.के. रावत, दफ्तर के बाहर कौमुदी राठौर, अवधेश कुमार पांडेय, भटनागर दंपत्ति अनिल और स्वाती। पक्का करते वक्त बांदा में कवि नरेन्द्र पुंडरीक ने इसका एक-एक पन्ना पढ़ा। उन्होंने तो इसका पूरा प्रूफ भी पढ़ा है। इस तरह वे इस उपन्यास के प्रथम पाठक हैं। इसे प्रकाशित करने के लिए लोक भारती प्रकाशन के मालिक श्री दिनेश ग्रोवर ने बड़ी तत्परता दिखाई है। इन सभी का मैं बहुत आभारी हूँ।


भारद्वाज निवास
मनोहरीगंज, बांदा (उ.प्र.)

-श्रीप्रकाश मिश्र


रूपतिल्ली की कथा

:1:


बूँदें तड़ातड़ गिर रही थीं। गिर क्या रही थीं कोड़े की तरह बरस रही थीं। घने पेड़ों के चौड़े पत्तों पर उनका टपर-टपर जैसे सूखी पथरीली ज़मीन पर घोड़ों के टापों की मार हो। घोड़े ही तो थे आसमान में जो हवा के इशारे पर इधर से उधर रूप बदलते भागे जा रहे थे। पता नहीं उन्हें कोई मार रहा था कि लगाम से ही इशारा कर रहा था कि वे गिरि, वन, कंदराओं में पटे जा रहे थे। जैसे वे घाटियों में भाप की तरह उड़ रहे थे, वैसे ही वे डगर पर भी उड़ रहे थे। राफताब के कानों में उनकी आवाज़ घनघना रही थी। उनकी स्पर्श से उसके दाँत किटकिटा रहे थे। फिसलन से सम्हलने के लिए उसने अपनी लकुटी टिकाई तो वह फिसल गई। गनीमत थी कि बरसाती घास से रास्ता अटा पड़ा था। चोट नहीं लगी। एक विचित्र सी आवाज़ ज़रूर हुई। उसके साथ ही उसके मुँह से गाली निकल गई। यह गाली जमीन को थी, आसमान को थी, बादल को थी, बरसात को थी, अपनी लकुटी को थी, या स्वयं अपने को राफताब के मन में कुछ भी स्पष्ट नहीं था। हाँ, इतना अवश्य था कि इतनी आवाज़ों के बीच मनुष्य द्वारा उत्पादित यह एकमात्र आवाज़ थी, जिसको सुनने के लिए उसके कान कब से तरस गये थे।

ऐसे मौसम में गाँव के पुरुष पहाड़ की तलहटियों, ढलानों, ढाड़ों तथा चोटियों पर आबाद खेत देखने जाते हैं। किन्तु राफताब कोपिली नदी को पार करने के लिए बढ़ा जा रहा था। नदी बहुत दूर नहीं थी, उसे पार करने से पहले साथ में जो चावल था उसे खा लेना था। न खाया जाये तो साथ के तमाम खाद्य-पदार्थों के साथ फेंक देना था। नदी के उस पार गाँव बहुत दूर था। सूखा मौसम होता तो सुबह से शाम तक दुलकिया चाल चलकर कोई भी आदमी उस गाँव तक पहुँच जाता था। गाँव के लोग बड़े भले थे। बिना नाम-ठिकाना पूछे ही अच्छा से अच्छा भोजन कराते थे। जानते थे कि जो भी आया है, भूखा-प्यासा है। किन्तु इस बरसात में क्या दिन भर में वहाँ पहुँचना संभव होगा ! और क्या इस बरसात में कोई दिन होता भी है ! वह दनादन बीतता चला जाता है-पता ही नहीं चलता कब दिन हुआ, कब रात। इसका भेद अँधेरे के झीनेपन गाढ़ेपन में ही सिमट कर रह जाता है।

कीचड़ और घास का रंग घुला तो वह एक छाया तलाशने लगा जहाँ बैठकर वह अपनी पोटली का चावल खा सके। नदी की ढलान होने वाली थी। कटानों के चलते काम लायक वृक्ष वहाँ बच ही नहीं पाते थे। दूर एक नाटा सिलवर ओक चमक रहा था। वहाँ पहुँचते-पहुँचते शाम हो गयी। और दिन होता-यानी बरसात का दिन न होता-तो वह चावल को नमक मिला कर रांध लेता। लेकिन आज यह संभव न था।

कच्चा चावल ही चबाने लगा। बीच-बीच में नमक चाट लेता और मिर्च काट लेता। ये गुरतार, हल्का नमकीन और तीखा स्वाद उसकी लार को इतना गाढ़ा कर दे रहे थे कि निगलना कठिन हो रहा था और कड़ा चावल चबाते-चबाते दाँत दुःखने लगे थे। तो भी वह ज्यादे से ज्यादे खा लेने चाहता था। खाते-खाते ही कई बार सोचा कि बचा चावल फेंक दे। लेकिन कल लगने वाली भूख का एहसास आज ही होने लगा था। इसलिए खाये ही जा रहा था। पूरा खा लिया तो पेड़ के छाये से बाहर आया। सिंगे में बरसते पानी को इकट्ठा कर कई बार पीआ। फिर भी सिंगे भर पानी से क्या प्यास बुझती है ? इतने बरसते पानी के बावजूद कहीं साफ पानी नहीं दिख रहा था। और नदी दूर थी। संतोष कर गुड़ी-मुड़ी मारकर उसी पेड़ के नीचे सो गया। पर ऐसे में क्या सोया भी जा सकता है ! हाँ ऐसे लेटे रहने का उसे काफी अभ्यास है। पेट जो न करा दे !

राफताब बढ़ता जा रहा था। यह बारिश तो आये दिन होती है और जब होती है तो महीनों होती है। यह जाने कितने बरसों से हो रही है। तो क्या ऐसे में आदमी अपनी दिनचर्या रोक दे ! अंधेरा घिरा आ रहा था। पवन पीछे ढकेल रहा था-जन्मभूमि की ओर। लेकिन पाँवों को तो जन्मभूमि से दूर जाना था। पकड़ लाओ, नहीं तो खुद चढ़ो। और यह कोई धमकी नहीं थी। नौकर पाले ही इसीलिए जाते थे कि जब कोई और विकल्प न हो तो उन्हें ही पकड़कर बलि चढ़ा दिया जाय। भला यह कैसे होता है कि अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए दूसरों को काट चढ़ाया जाय उस जिम्मेदारी को धारण करने के लिए ! और ऐसा भला कैसे हो जाता है कि मरने वाला दूसरे को जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर उसे मुक्त कर देता है ! तभी ठोकर लगी। राफताब को लगा कि खाली मन जाने क्या-क्या सोचने लगता है। पर क्या मन खाली होता है कभी वह तो लगता है गात से भी अधिक भरा होता है, सक्रिय रहता है। बंगाली तांत्रिक कहता है कि जब तक साँस चलती है, तब तक मन चलता है। का ब्लेङ1 को पाना है तो या तो साँस को रोक कर मन को रोको, या फिर मन को रोक कर साँस को रोको। पहली क्रिया कठिन है, इसलिए दूसरी क्रिया करो। उसके लिए खैचरी विद्या साधो।

तभी दूसरी ठोकर लगी। लड़खडाता हुआ राफताब कई कदम पीछे चला गया। तो भी गिरा नहीं। अंधेरा और गहरा हो गया था। सुबह का गहरा अंधेरा रात की दृष्टिरोपी कालिमा से कम नहीं था। फिर भी खसिया होने के कारण ही उसके पाँव नदी-कटान
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1. का ब्लेङ-देवी। खासिया समाज के मातृ-सत्तात्मक होने के कारण देवता की अवधारणा भी अधिकतर नारी रूप में ही है।


की संधि-संधि पर मिलने वाली फाटों, पिच्छल चट्टानों और करारी कगारों वाली कटानों में अडिग सीधे पड़ रहे थे ऊपर से नीचे की ओर। पनियाई ठंड से अंग-अंग थर्रा रहे थे। छुद्र नदी को थोड़ा पानी क्या मिल गया था, बौराई जा रही थी। उस बौराहट में शोर मचाए जा रही थी कि मेरा हौसला तो देखो दरियाव का सारा पानी अकेले ही ढोये जा रही हूँ आकाश से, पहाड़ से। दुनिया का यही नियम है जो जितना ही कम करता है उतना ही शोर मचाता है। ड’ खार1 इसे कहता है मूतों कम हिलाओ ज्यादे कि लगे कि बस वही सब मूत रहा है : सब वही कर रहा है लेकिन मैं भी जानता हूँ कि इस नदी में ऐसी कौन सी जगह है, जिसे यूँ ही चलकर पार किया जा सकता है।

राफताब वहीं पहुँचा। पानी में पाँव डाला तो छन्न से रह गया जैसे जलते तवे पर कोई पानी की बूँदे डाल दे। दो कदम आगे बढ़ा तो लगा बर्फानी पानी कह रहा है कि जा कहाँ रहे हो, मैं ही तुम्हें घसीट कर ले चलूँगा। कानों में किसी प्रबल प्रचंड अंधड़ का शोर बज रहा है कि थोड़ी दूर पर उछल कर गिरता पानी जैसे चिग्घाड़-चिग्घाड कर कहा रहा है कि जावोगे कैसे-मैं उछाल कर, पटक कर, कुचल कर चूर-चूर कर दूँगा और बहाकर किसी और देश ले जाऊँगा। राफताब भीतर तक काँप उठा बाहर छूती ठंड से कम, भीतर उपजते भय से अधिक। ऊपर से देखने पर लगता था कि पानी स्थिर है, पारदर्शी। एक-एक छोटे पर मजबूत पत्थर दिखाई दे रहे हैं, पानी से मार खा कर चिकने बने कि जैसे कभी उन पर काई चढ़ी ही न होगी। उन्हीं पर पाँव रखता राफताब टटोल-टटोल कर आगे बढ़ रहा था कि सामने से कुछ आता हुआ दिखा-सिरहीन साँप सरीखा ऐंठ-ऐंठ कर उछलता। इससे पहले कि वह सम्हलता, वह उससे टकरा गया। वह साँप जैसा चिकना न था, लिजलिजा भी न था, टकराई वस्तु के अनुसार शरीर-मुद्रा अख्तियार कर लेने वाले रस्से जैसा लचीला कोई जीवधारी भी न था। वह सुपारी का तना था जो थपेड़े खा-खा कर कई हिस्से में टूटने के बजाय गतर-गतर से पुचक गया था और अनेक होने से पहले एक बना प्रचंड लहरों पर उछलता-कूदता चला जा रहा था किसी अनिश्चित गंतव्य की तरफ। गन्तव्य तक पहुँचने से पहले वह हर बाधा को स्वयं ही मार कर, तोड़ कर, लपेटकर दूर कर लेना चाह रहा था। राफताब के पाँव उसके लिए बाधा ही थे जिनसे टकरा कर उसने पहले उन्हें तोड़ देना चाहा। न टूटे तो उन्हें लपेट कर उखाड़ देना चाहा। इस प्रबलता से राफताब जब तक सम्हले, उसके पहले ही उसका एक पाँव उखड़ गया। सुपारी का गाछ तो बह गया, किन्तु राफताब छपाक से पानी में गिर कर सरक गया धार के साथ। राफताब ने सोचा कि लो वह अंत आ गया। जिसकी ओर जीवन जन्म के क्षण से ही क्षण-क्षण चलता-सरकता आ रहा था।

ऊपर आसमान तड़तड़ाया। पल भर के लिए दिन भर का उजाला छा गया। आँखें इसे बरदाश्त न कर पायीं। मुँद गयीं। कानों में मृत्यु का कराल रणडंका बज उठा।
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1.ड’ खार-गैर खासी (non-khasi outsider)

दो हाथी जितना ऊँचा पानी बड़े-बड़े पत्थर शिलाएँ उखाड़ता-पछाड़ता ठेलता-पटकता उसे पीस देने के लिए आगे बढ़ा। ‘‘हे कोपिली माई ! रख्खा करो। तुम्हें बलि नहीं दे पाया, यह मेरा दोष है। लाचार था, लौट कर दे दूँगा। माई रख्खा करो...’’ राफताब का आर्तनाद गूँज उठा। लेकिन उस अरण्य-रोदन को सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था। कोपिली माई भी नहीं। कोपिली माई-कोपिली नदी की देवी; जिसे पार करने से पहले हर खासी को चावल समेत सभी खाने के पदार्थ फेंक देना होता है। नदी में पाँव डालने से पहले बलि चढ़ानी होती है-हो सके तो आदमी की, नहीं तो बकरे की, नहीं तो मुर्गे की। राफताब ने खाने के बाद बंधा चावल फेंक दिया था, अदरक फेंक दिया था, मिर्च फेंक दिया था, यहाँ तक कि नमक फेंक दिया था; बस बलि नहीं चढ़ा पाया था। आदमी कहाँ से पाता; बकरा कहाँ से पाता ! मुर्गे के लिए उ1 कालीचरण से माँगा था। लेकिन उसने दिया नहीं। राजा अपने कारज के लिए खरचा नहीं देता। प्रजा उसकी अपनी होती है। उसके कारज के लिए वह जो भी करेगी, वह स्वयं राजा कर रहा होगा-चाहे इसी न्याय की बिना पर राजा का करना प्रजा के लिए करना न हो। राजा का पाप प्रजा के लिए चाहे जितना हो, उसका पुण्य प्रजा के लिए नहीं होता। प्रजा का सारा पुण्य राजा के लिए होता है, लेकिन प्रजा का पाप राजा के लिए नहीं होता। रास्ते में कहीं मुर्गा दिखा ही नहीं, नहीं तो हड़प लिए होता। कौन देखता कि बलि दिया जाने वाला मुर्गा चोरी का है ! कोपिली माई तो देखतीं। लेकिन मजबूरी तो उन्होंने मेरी देखी है। फिर भी मदद नहीं करतीं।

क्यों नहीं-आर्त होकर अभी पुकारा ही नहीं। ‘‘क्षमा करो माई ! दया करो माई !!’’ कहकर राफताब चीख उठा। माई ने सुना कि नहीं कि कौन जाने; लेकिन राफताब के हाथ एक चट्टान से चिपक गये। हर पशु जिंदा रहने का ढब जानता है। जहाँ पाँव काम नहीं करते वहाँ हाथ से काम लेता है। यूँ भी बाज वक्त हाथ का काम पाँव और पाँव का काम हाथ करने लगते हैं। अपार पानी की बलशाली लहरों का थप्पड़ खाता यह पत्थर अनादि काल से नदी के पेट में जड़ जमाये मस्तक ताने खडा था। हाथों के सहारे राफताब उसके मस्तक पर चढ़ बैठा। दाँत किटकिटा रहे थे। आँखों में कीचड़ और कींचर भर आया था। कँपकँपी मिटाने के लिए घुटनों में सिर दिया तो कींचर भी पोंछ लिया। हाथ से चट्टान का सिरा छोड़ नहीं सकता था साफ तरल पानी कठोर गंदे चट्टान से टकरा कर जैसे बल्लियों उछल रहा था फौव्वारे की शक्ल में और किनारे की मृदा में गिर कर तिरोहित हो जा रहा था। कुछ देर बाद आश्वस्त होने पर राफताब ने आँखें खोल कर देखा तो लगा कि चट्टान पेटी में नहीं बगली पर है। फटी धाराएँ कुछ अधिक ही वेग से उसके इर्द-गिर्द से निकल भागी जा रही हैं। उनमें पाँव डालना सीधे मृत्यु के मुख में कूद जाना है। लेकिन एक बाजू में धारा कूदने की आँवक में ही है-उसकी कूद से शायद थोड़ी चौड़ी। उतना तो कूद कर पार करने के जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा। और उसी
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1. उ - खासी पुरुष के लिए सम्मान सूचक शब्द, श्रीमान


उत्साह का राफताब ‘हे कोपिली माई दया करो, गुनाह माफ करो।’ चिल्लाता कूद पड़ा। और लो ! वह पार आ गया।



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