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पुल कभी खाली नहीं मिलते

सुधांशु उपाध्याय

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :151
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2300
आईएसबीएन :81-8031-061-4

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सुधांशु उपाध्याय की ये कविताएँ भविष्य को जिस रूप में वर्तमानित करती हैं उससे वर्तमान एवं भविष्य और व्यतीत का चेहरा त्रिशिरा की तरह दिखाई पड़ने लगता है...

pul kabhi khali nahin milte

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


सुधांशु उपाध्याय की ये कविताएँ भविष्य को जिस रूप में वर्तमानित करती हैं उससे वर्तमान एवं भविष्य और व्यतीत का चेहरा त्रिशिरा की तरह दिखाई पड़ने लगता है। वैसे तो कविता अपने समय की संवेदन शून्यता को पहचाने और उसे पूरने का काम कर ही सकती है बल्कि ऐसा करके ही वे कविताएँ बनती हैं। सुधांशु की इन कविताओं में यह तत्व जिस मुहावरे में व्यक्त हुआ है उसे भाषा की सहज लाक्षणिकता कहा जा सकता है सुधांशु की विशेषता यह है कि वे घटना को काव्य वस्तु में बदलते समय उसकी वास्तविकता का निषेध नहीं करते हैं बल्कि उसके ‘देश’ को कभी-कभी काल के आयाम से मुक्ति कर देता हैं फलतः मनुष्य की पीड़ा, बेचैनी, खीझ, कुढ़न और घृणा आदि चिंतनशीलता से भावित होकर ही कविता का रूप ग्रहण करती है। यह संकलन इसका प्रमाण है।

गीतों की प्रमुख विशेषता मुहावरों का निर्माण और विकास है। इस संकल्प में कवि ने नये मुहावरों को अन्वेषित किया है। मुहावरों का प्रयोग कविता नहीं बनाता बल्कि मुहावरों का विकास कविता बनाता है। सामान्य शब्द जब अपना कोशीय अर्थ छोड़कर, ‘संकेत’ बन जाते हैं तो गीत की निर्वचन क्षमता ग्रहीता प्रति ग्रहीता बदलती रहती है। इस संग्रह की कविताओं को काव्य रूढ़ियों से मुक्त होकर इस अर्थ में पढ़ा जाना चहिए। ‘वाह’ और ‘आह’ के तत्वों से रहित होने के कारण इन कविताओं का महत्व बढ़ जाता है। लगभग सभी गीतों में मनुष्य को प्रति गहरी संसक्ति है और इसीलिए मार्मिक चिन्ता भी। सुधांशु अपने पहले संग्रह से ही निरर्थक शब्दों के प्रयोग-प्रवाह से बचते रहे हैं। इस संग्रह में अब वह कवि की आदत हो गया है। इसलिए मैं मानता हूँ कि उनकी कविताओं में ‘उक्तिवैचित्र्य या अनूठापन’ के बजाय विम्बविधान की क्षमता है। इस अर्थ में वे कतार से कुछ भिन्न हैं और इसे उनके इस संग्रह से भलीभाँति समझा जा सकता है।

प्रो. सत्यप्रकाश मिश्र

आभार


इन नवगीत-कविताओं पर गहरे विश्वास के लिए संवेदनशील रचनाकार और प्रसिद्ध समीक्षक डॉ. भवदेव पाण्डेय एवं प्राख्यात समालोचक, साहित्य अध्येता प्रो. सत्यप्रकाश मिश्र के प्रति सादर कविताओं के चयन एवं पाण्डुलिपि तैयार करने में अप्रतिम सहयोग के लिए ज्योत्सना श्रीवास्तव और आभा, अनुभूति के प्रति सस्नेह।


भावात्मक और वैचारिक उत्पादकता की लय



‘पुल कभी खाली नहीं मिलते’ नवगीतों का एक ऐसा नव-संकलन है जिसमें पुराने समय और नये समय के द्वन्द्वात्मक उत्पादों को नवगीतों में ढाला गया है। इसके कवि सुधांशु उपाध्याय हैं, जिन्हें किसी दूसरे द्वारा लिखी भूमिका की कोई आवश्यकता नहीं है फिर आलोचकीय हैसियत से कहा जा सकता है कि सुधांशु 21 वीं सदी के प्रयोगशील नवगीतकार हैं। प्रयोगशील इस अर्थ में कि इन्होंने दिक्-विस्तार और काल की समग्रता के अन्वेषण क्रम में जो गीत लिखे हैं वे आज के काव्यधर्म के यथार्थवादी नमूने हैं। आज समय ऐसा आ गया है जिसमें ‘कवि-धर्म’ से अधिक ‘कविता-धर्म’ का महत्त्व बढ़ गया है। इस संग्रह के नवगीत इस तथ्य के गवाह हैं कि अक्षर-जगत की सृजन चेतना का केन्द्र कविता है। कवि की अभिव्यक्ति कविता में ही होती है, विधा चाहे जो भी हो।

नवगीत कविता की ही एक विधा है। कविता की अनेक संज्ञाओं में एक संज्ञा। अगर देखा जाय तो सुधांशु उपाध्याय के नवगीत संज्ञात्मक कविता के नए अभिलेख हैं। इनमें काल-सापेक्ष संज्ञा का नया अधिकार विवृत हुआ है। नया अधिकार इस अर्थ में कि इन नवगीतों में प्रयुक्त संज्ञाओं को क्रियाओं के अधिकरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सुधांशु, प्रस्तुति द्वारा पाठ की भावना विकसित करने में शब्द-सिद्ध कवि हैं। इनके कवि का बहुलतावादी बहुरूपत्व कबीर की तरह बाजार में खड़ा मिलता है और मुनादी द्वारा पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इनके नवगीतों को पढ़ कर मुझे तो ऐसा लगता है कि ‘राम बिना मेरी सूनी अजोधिया’ की तरह सुधांशु को ‘पाठक बिना मेरे सूने नवगीत’ का रोना नहीं रोना पड़ेगा। मुनादी करते हुए, ताशा बजाते हुए, सावधान करते हुए सुधांशु कहते हैं- ‘ग्रहों, नक्षत्रों, सूर्य-तारों, दिशाओं, दिग्पालों सावधान ! एक अक्षर कह रहा है, खून फालतू बह रहा है, गोलियों, बंदूक, बरछों, तलवार, भालों सावधान !!’ कहना न होगा कि जब शताब्दी को सावधान करने की मुनादी की जा रही हो तो कौन श्रोता या पाठक इसे नज़र अन्दाज कर सकता है !

अज्ञात नहीं है कि नवगीत-लेखन में संज्ञाएं ‘यति’ की भूमिका निभाती हैं जबकि क्रियाएं ‘गति’ का संवाहक होती है। संज्ञा और क्रिया, यति और गति का सम्यक विन्यास ही आज के नवगीतों का निजी सौंदर्यबोध होता है। इसके प्रति सुधांशु की रचनात्मक केन्द्रीयता कभी विचलित नहीं होती। ‘मालविकाग्निमित्र’ में रचना की इस केन्द्रीयता को ‘पदन्यास’ को लय का अनुगत न बनाकर 21 वीं सदी के समय की मांग का अनुगत बनाया है। आज की लोक-मानसिकता इसी का पर्याय है। उदाहरण के लिए ‘पुल कभी खाली नहीं मिलते’ शीर्षक नवगीत को ही देखा जा सकता है –

पुल कभी खाली नहीं मिलते
क्या हुआ बच्चे यहाँ पर
दौड़ते-दौड़ते, लड़ते-झगड़ते, चिढ़ते-चिढ़ाते
बजाते ताली नहीं मिलते
लोग मिलते हैं
मगर कतराते हुए, बचते हुए
हाथ सब मशगूल हैं, मनहूसियत रचते हुए
दोस्त मिलते हैं मगर कन्धे नहीं छूते
हंसते हुए-
देते हुए गाली नहीं मिलते।।

उक्त नवगीत संकलन का शीर्षक होने के साथ ही संकलन का ‘प्रवेशक’ और ‘प्रवाचक’ गीत भी है। अगर 21 वीं सदी की विखंडन-शैली के अन्तर्गत इस गीत को जांचने परखने का प्रयत्न किया जाय तो कहना पड़ेगा कि सुधांशु उपाध्याय ने इसके पदन्यास में पुराने गीतकारों की अपेक्षा समकालीनता को अधिक महत्व दिया है। कवि ने गीत में क्रिया-पदों का बहुल परिवेश संगठिक करके समकालीन रचना-प्रवृत्ति का परिचय दिया है। हालांकि इसमें पदों का विन्यास सम्यक और पूर्ण है परन्तु लय का विधान गीत की तरह अचूक नहीं है। यह जानबूझकर किया गया रचना प्रयास है। अगर ‘पुल कभी खाली नहीं मिलते’ के बाद दौड़ते-भागते, लड़ते-झगड़ते, चिढ़ते-चिढ़ाते में लय का अनुसंधान किया जाय तो देखा जा सकता है कि इसमें लयात्मक संगठन के स्थान पर लयात्मक विगलन का पलड़ा भारी है। नवगीत को लेकर जो लोग शुद्धतावाद के खूंटे से बंधे हुए हैं वे इस नवगीत में यति और गति दोनों में दोष ढूंढ़ सकते हैं, परन्तु रचना की समकालीन टेक्नालॉजी को देखते हुए यह कहना असंगत न होगा कि सुधांशु उपाध्याय ने एक सर्जक इंजीनियर की तरह जानबूझ कर डिवाइडरों द्वारा गीत-पथ की समतलता में अवरोध पैदा किया है। यह आज इंजीनियरिंग तकनीक है क्योंकि पुल-पथ पर अवरोध सृजित करने के कारण तमाम दुर्घटनाओं के खतरे टल जाते हैं। आज के रचनाकार का इस प्रकार लयात्मक अवरोध पैदा करना रचना शिल्प के रूप में स्वीकार किया जाता है। आज जरूरी हो गया है कि हर नवगीतकार अपने समय की अभियांत्रिकी को पहचानने की कोशिश करे तथा नवगीत और कविता में विधागत दूरी कम करने के लिए पद-विन्यास का नया पुल बनाए।

किसी रचनाकार की दृष्टि ‘वक्त-मुकाबिल’ होना ही कही जा सकती है। ‘पुल कभी खाली नहीं मिलते’ संग्रह में सुधांशु उपाध्याय ने वक्त की नब्ज पकड़ने की बार-बार कोशिश की है। सुधांशु ने अपने नवगीतों की रचना में समय के प्रति अटूट निष्ठा व्यक्त की है। वे रचना करते समय ‘समय की निदानशाला’ में बैठकर नये-नये प्रयोग करना इनकी खास विशेषता है। अगर सच पूछा जाये तो एक रचनाकार का प्रयोगशील बने रहना ही आकांक्षा तो हो सकती है परन्तु यह उसके जीवंत बने रहने का सबूत नहीं हो सकता। अगर ध्यान दिया जाये तो ‘पारंगतता’ मृत्यु का मोहक पर्याय है। सुधांशु उपाध्याय पारंगत-मोह से बचते हुए न तो पुल के बीचोबीच चलते हैं और न गलत ढंग से दाहिने हाथ ही चलते हैं। नवगीत पथ पर बांयें चलना नवगीतकार की सजातीयता तो है ही, साथ ही पथ बंधुता और पथ-धर्मिता भी है। ‘लोकानां बंधु कृतम’ ही रचनाकार का संकल्प होता है। सुधांशु उपाध्याय इस संकल्प का सम्यक पाठ करने के बाद ही सृजनात्मक कर्म में प्रवृत्त होते हैं। संकल्पात्मक प्रवृत्ति के इनके सभी नवगीत लोकशक्ति के प्रति आस्था व्यक्त करते हैं और साहस के साथ शोषण का प्रतिरोध भी करते हैं। सुधांशु के गीत आशावाद का आवाहन-स्वर हैं। सुधांशु आवाहन के हर स्वर को भरपूर तवज: देते हैं। इस संदर्भ में ‘जो है होने वाला’ नवगीत देखा जा सकता है –


आधी दुनिया काजल पीती
आधी पिये उजाला
उस मंजर को देख रहा हूं
जो है होने वाला !
खिड़की तोड़ नया अब सूरज
भीतर आएगा
बादल बंजर धरती पा आ
नदी बिछाएगा
रामरती ने घर के बाहर
बायां पांव निकाला !!

अपने निकटस्थ समय में शक्ति समुदय करना, ‘जो है होने वाला’ का प्राक्कथन करना और तमाम संभावनाओं के विकल्प प्रस्तुत करना सुधांशु उपाध्याय के नवगीतों का लक्ष्य है। केन्द्र की तलाश करते हुए इन नवगीतों को पढ़ने से अज्ञात नहीं रह जाता है कि ये गीत केवल मनोरंजन-गुटिका ही नहीं बल्कि चिन्तन में उत्तेजना पैदा करने के पिल्स भी हैं। 21 वीं सदी में प्रेम और सौंदर्य के गीत भी पाठकों के मन को कुरेदते हैं, केवल भावुक ऐन्द्रियता को नहीं बल्कि क्रियाशील यथार्थ को भी। मसलन-नये सूरज का भीतर आना और रामवती द्वारा बायां पांव बढ़ाना अपने संकेतों में दुहरे अर्थ के प्रक्षेपक बनते हैं। यहां ‘जाकी रही भावना जैसी’ की मिसाल बिलकुल संगत कही जा सकती है।

सुधांशु उपाध्याय नवगीत को बहुभुज कविता की एक भुजा मात्र मानते हैं। इसलिए अपने नवगीतों को आकर देने के लिए वे सभी उपादान भी अपनाते हैं, जो गीत ग्राह्य नहीं माने जाते थे यानी जिन्हें कविता- परिधि तक ही सीमित मान लिया गया था। उनके नवगीतों के कथ्य-चयन में आदिम वासना से लेकर भूमंडलीकृत बाजारधर्मी उदारतावाद और सांस्कृतिक संपर्कों  के बदलाव तक की अभिव्यक्तियां उपलब्ध हैं। ‘पुल कभी खाली नहीं मिलते’ का नामकरण अपने आप में इसका साक्ष्य है। ‘शायद दुनिया बच जाएगी’ कविता में पुरानी दुनिया की भावात्मक सत्ता के टूटने और नयी दुनिया द्वारा असंवेदित इंसान का भारी पैमाने पर प्रोडक्शन करने की परिणतियों का जो वर्णन मिलता है, वह सुधांशु की सामाजिक-सांस्कृतिक जिम्मेदारी कै सबूत बनता है। इस संग्रह की प्रस्तावना है ‘शादय दुनिया बट जाएगी’ ! ‘भरतवाक्य’ है, ‘बन्नू मियां का मज़ार’ ! प्रस्तावना की ‘टेक’ पंक्ति में प्रयुक्त ‘शायद’ शब्द केवल संभावना सूचक ही नहीं है बल्कि इसमें 21 वीं सदी के रचनाकारों का दायित्व-बोध भी ध्वनित हुआ है, जैसे –


चेहरों पर मुस्कान बचा लो
शायद दुनिया बच जाएगी।
पत्ती, फूल, किताबें, धूप, तितली, बच्चे, धूल, हंसी
ये थोड़े समान बचा लो
शादय दुनिया बच जाएगी।।


उक्त पक्तियों में ‘शायद’ पद के विन्यास ने हर पाठक के लिए अर्थ की नयी भूमिका प्रस्तुत की है। ‘शायद’ जैसा फारसी का अव्यय पद संस्कृत के ‘कदाचित’ से हजार गुना काव्यात्मक है। एक रचनाकार की यह विशेषता है कि वह साधारण से साधारण शब्द को भी ‘सरस्वती के भंडार की बड़ी अपूरब बात’ बना देता है। शब्दशास्त्रियों ने अव्यय की बड़ी प्रशंसा की है - ‘सहश त्रिषु लिंगेषु सर्वासु च विभक्तिषु वचनेषु च सर्वेषु यत न व्ययेति तद अव्ययम्’। सुधांशु ने ‘शादय’ पद को पदार्थवाची कोष बना दिया है। परन्तु आश्चर्य यह है कि वे ‘शायद’ की ‘विविक्षा’ का विस्तार प्रस्तावना के अन्य शब्दों में नहीं कर सके हैं। पत्ती, फूल, किताबें, धूप, तितली, बच्चे, धूल, हंसी जैसे पद-न्यास रचना-चेतना के खंडित सोपान से लग रहे हैं। कविता हो, गीत हो, प्रगीत हो अथवा नवगीत हो सबमें पदविन्यास के ‘उपक्रम’ का महत्व सबसे अधिक होता है। ‘उपक्रम’ शब्दों के न्यास की महत्वपूर्ण कला है। नवगीत में ‘उपक्रम’ आरंभ का दर्शन तो है ही साथ ही यति और गति का नियंत्रक भी है। ‘उपक्रम-विन्यास’ पर और ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है यहां।

‘शायद दुनिया बच जाएगी’ समकालीन मानवीय चिन्ता का अहं सवाल है। सुधांशु इस सवाल का उत्तर अपने अधिकांश गीतों में ढ़ूढ़ते मिलते हैं। वे प्रेम और सौंदर्य चित्रणों में समाजिक-सांस्कृतिक जवाबदेही से कतराते नहीं हैं। इस संकलन का ‘पुल’ इसी जवाबदेही का प्रतीक है। ‘पुल’ केवल दो अलहदा जगहों को ही नहीं जोड़ते बल्कि मन, बुद्धि, अहंकार, भाव, विचार, कल्पना, साहित्य, संस्कृति आदि के छिन्न पड़े तारों को भी जोड़ते हैं। जिस दिन यह वैचारिक पुल खाली पड़ जाएगा उस दिन इंसान की जगह केवल हैवान ही हैवान रह जाएंगे। सुधांशु की इसी चिंता ने उन्हें ‘गीत’ और ‘कविता’ के बीच पुल बनाने की प्रेरणा दी है। आवा-जाही बनाए रखना ही पुल की सार्थकता है। वास्तव में रचना की विविध काव्य-विधाओं में पुल बांधने का संकल्प अपने युग का विचार-साध्य उपादान है जिसकी अभिव्यक्तियां सुधांशु के नवगीतों में ‘बहुत अधिक मिलती’ हैं। वे गीत में कविता और कविता में गीत तलाशने के पंजीकरण का सिद्धान्त खूब जानते हैं।
सुधांशु उपाध्याय की एक खास विशेषता है कि वे अपने समय के हर लम्हे को अपने पाठकों, श्रोताओं के साथ मिल-बांट कर जीना चाहते हैं।

 ऐसे क्षणों में वे ऊर्ध्वकालिक रचनाकार लगते हैं। निराला ने लिखा था, ‘पर अलौकिक थे सकल पल्लवित पल’। सुधांशु ने निराला के ‘पल’ का पल्लवन किया है, परन्तु उसको अलौकिक न बना कर लौकिक बनाने की कोशिश की है। हर रचनाकार की नियति हो गई है कि वह अपनी सदी की समाजशास्त्रीय लौकिकता का निजी स्वरूप निर्धारित करे। इसी सिलसिले में सुधांशु का कहना है ‘‘कुछ बातें लगभग साथ हुई, कुछ लम्हे आए गुजर गए’’ अर्थात सुधांशु – नवगीतकार लम्हों के आने और गुजर जाने की अनुभूति को निकष पर रेखांकित कर लेने के बाद जो परीक्षण फल प्राप्त होता है, उसी को नवगीत बनाता है – ऐसा नवगीत जो ‘छोटे लम्हो’ का ‘बड़ा संवाद’ प्रस्तुत कर सके। सुधांशु उपाध्याय को काल के लघु क्षणों को पकड़ने और उन्हें पैमाना बनाकर नापने के तरीके मालूम हैं। एक दूसरी विशेषता यह भी है कि वे एक सर्जक के रूप में आटोइज्म के शिकार कभी नहीं होते। ‘झुकी डाल में कविता है’ अथवा ‘खुले पाल से कविता है’ जैसी उक्तियां अर्थ की वासना कहलाती हैं यानी अर्थ-क्रांति, अर्थ-विवर्तन और अर्थ-विस्तार। ‘खुले पाल में कविता है’ यानी काल-संरक्षण, विचारों की मुक्तावस्था, कविता के नियंत्रण का प्रयत्न और वांछित गति की अवाप्ति। सुधांशु के गीतों में रचना के ऐसे अनेक नपने हैं।

सुधांशु के नवगीतों में मुक्त विचार और निबद्ध संवेदना का अद्बुत सामंजस्य है। कवि के इसी गुण को ‘पूर्वापरौ तोयनिधि वगाह्य’ का सिद्धान्त कहा जाता है। पूर्व तोयनिधि ‘संवेदना’ और उत्तर तोयनिधि ‘विचार’ के प्रतीक हैं। यही रचना का यात्रा-पथ होता है। इसमें इतिहास और समाजशास्त्र दोनों निबद्ध होते हैं। सुधांशु उपाध्याय के ‘बेटियां’ शीर्षक गीत में संवेदना की सघन अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति को लोक-समर्पण नवगीत-लेखन में तत्व और सत्व के अंतरावलम्बन का आकर्षक दृष्टान्त है। इसमें सौंदर्य की चाक्षुस-प्रतिमा के उपादान तो बनते ही हैं साथ ही लोक परिचित रूपक-विधान भी निर्मित होता है। यह पूरा नवगीत पारिवारिक संवेदना को पूर्व-पुराण है, जो घर-घर में पढ़ा सुना और व्यवहृत किया जाता है-


बड़ी बेटियां/बेटी कम
अधिक सहेली हो जाती हैं !
अपना हिस्सा नहीं मांगतीं
खुद हिस्सा बन जाती हैं
मां की आंखें वो छननी हैं
जहां बेटियां छन जाती हैं
मां को/घर मे कैद देखकर
खुली हवेली हो जाती हैं !
उन्हें पता है दर्द कहां हैं
किस शीशी में दवा कहां हैं
धूप कहां बीमार पड़ी है
और रो रही हवा कहां है,
मां को/चेहरा जब हंसता है
खिली चमेली हो जाती हैं !!


समय के धरातल पर दूर-दूर तक फैले सुधांशु उपाध्याय के नववगीत बीसवीं सदी के भावात्मक और विचारात्मक खंडहरों का उत्खनन भी करते हैं और इक्कीसवीं सदी के समानुकुलताओं को टेक और अन्तरा की सन्निधि भी प्रदान करते हैं। उन्होंने आज की जीवनानुभूतियों का संसक्तिपूर्ण चित्रण करके ‘विष्टरं देहि’ संसकृति की समकालीन कसौटी बनाई है। वे कबीर की तरह अपने पाठकों के सामने ‘घर जलाकर’ चलते की शर्त नहीं रखते क्योंकि वे जानते हैं कि नवगीत के साक्ष्य प्राय: स्थूल और ऐन्द्रिय होते हैं। सच तो यह है कि आज की लोक अदालत में नवगीतों का हाजिर हो जाना ही काफी है, न साखी की जरूरत है न गवाह की। नवगीत अगर गूंगे नहीं हैं तो वे बोलेंगे ही। सुधांशु के कई-कई गीत ऐसे हैं जो दबंगई से बोलते हैं, सलन –  


मौसम का हर तौर-तरीका क्यों मंजूर करें
बर्फ हो गए चेहरों पर, थोड़ी-सी आग धरें।


लेकिन इस बोलने को ‘हल्ला बोल’ नहीं कहते। इस बोलने में संकल्प के ‘कृतिकार-शब्द’ मुखरित हुए हैं। अगर ध्यान दिया जाय तो आज के प्राय: सभी नवगीतकवि ‘कृतिकार-शब्द’ का अत्यंत सुलझा संविधान बनाने में लगे हैं। सुधांशु उपाध्याय आज के प्रतिनिधि नवगीतकवि हैं। इसलिए इनमें कथ्य का वैविध्य और विस्तार है। और ‘कृतिकार-शब्दों’ का सघन विन्यास है।

सुधांशु उपाध्याय के ‘नवगीत-कविता’ की एक अन्य विशेषता यह है कि वे रचनाओं में निषेध क्षणों को आने से रोकते हैं। नवगीत में तुक-विधान, अन्तराओं में ध्वनि-साम्य और टेक की अन्विति बनाए रखने के प्रयास में शब्दों से लेकर वस्तु तक में ‘निगेटिविटी’ की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। परन्तु सुधांशु की सृजन-मानसिकता निषेधात्मक काल-खंडों से जूझती है। इस प्रयास में वे कभी-कभी परंपरागत रचना बंधनों को तोड़ देते हैं। मसलन वे ‘उंगली’ और ‘फिसली’ का तुक विधान तो कर सकते हैं परन्तु ‘किसने ये बन्दूक बनायी और बनायी गोली, आसमान से गिरती चिड़िया मरते-मरते बोली’ की समकालीनता को निषेध के खाते में नहीं जमा कर सकते, ‘रदीफ’ और ‘काफिया’ की शरण में जा सकते हैं लेकिन समय के स्वीकार को इन्कार नहीं कर सकते। साहित्य का अर्थ ही है रिक्त की अरिक्ति। कविता में अरिक्ति की तलाश करते समय सांवादिक सांद्रता (मृदुता) बनाए रखना बेहद जरूरी है। सुधांशु नवगीतों की इन जरूरतों को भलीभांति पहचानते हैं। इस पहचान ने ‘पुल कभी खाली नहीं मिलते’ को सोद्देश्य और सार्थक बना दिया है। कहने का मतलब कि अपने समय की कोई न कोई ‘अपेक्षा’ पुल पर हमेशा उपस्थित रहती है ‘नीरवता’ हो या ‘मुखरता’। सुधांशु के रचनाकार में दूसरों के साथ मुड़ने-जुड़ने की भौतिक कोशिशें बहुत ज्यादा हैं। ‘पुल’ उसी का प्रतीक है। सुधांशु स्वयं, उनका कवि और उनकी कविता सभी पुल हैं। यदि वे प्रिंट मीडिया से न जुड़े होते तो शायद वे अपने नवगीतों को सामाजिक सरोकारों से रचा-बसा पुल नहीं बना पाते।

आज भू-मंडलीकृत उत्तर-आधुनिक बाजारवाद के काल-खंड में कविता को लेकर काल्पनिक उड़ान भरने अथवा उदात्त आनन्दानुभूति की कोमल अंगुलियों से पाठकों को गुदगुदाने का समय नहीं है। समाज के हर कृतित्व का निकष बाजार हो गया है। यही कारण है कि सुधांशु उपाध्याय अपने नवगीतों द्वारा अध्यात्मवाद, धर्मवाद, स्थिर राष्ट्रवाद और फासिस्ट मनोवाद के पाठ नहीं पढ़ाते। उनके नवगीतों ने बाजार के उत्पाद और उनमें निहित उत्पादकता की लय के समानान्तर रचना में भावात्मक और वैचारिक उत्पादकता की लय की स्थापना की है। सुधांशु के इस प्रयत्न को पदार्थवादी तद्रूपता की नयी व्यंजना, कार्य का कारण में (रचना का उत्पाद में) समावेश तथा गति और यति का ‘मिश्रित काल-बोध भी’ कहा जा सकता है। शब्दार्थ-संपृक्ति का समकालीन आवाहन करने में सुधांशु के नवगीत न्यायालय में पुकार करने वाले अर्दली जैसी भूमिका निभाते हैं। ‘पुल कभी खाली नहीं मिलते’ के पाठक बेहिचक कह सकते हैं कि सुधांशु उपाध्याय ‘नवीस’ तो हैं लेकिन नकलनवीस नहीं हैं क्योंकि नकलनवीसी आजकल सरकते-सरकते समकालीन कविता में जा घुसी है ! नवगीतों में यह महामारी नहीं फैली है।

‘पुल कभी खाली नहीं मिलते’ में संकलित नवगीतों की भाषा सेतुधर्मी है, यानी वक्ता-श्रोता को जोड़नेवाली। विन्यास-ऋजुता और संप्रेषण की सकुरता सुधांशु की भाषा सहज धर्म है। इन्होंने लगभग सभी काव्योपकरणों-उपादानों का प्रयोग किया है – अप्रस्तुत विधान, मिथक और बिंब विनियोजन लेकिन वे पद-पदार्थ के संयोगत्व के प्रति अधिक सचेत दिखते हैं। एक पैमानेदार नवगीतकार की तरह इनका कहना है–
 

हम शब्दों के फूल/रोज सिरहाने रखते हैं
छोटी पंक्ति के बयान भी माने रखते हैं।
छीज रहे शब्दों पर करना गौर जरूरी है
ऐसे नाजुक दौर में कविता और जरूरी है
लेकिन ऐसे नहीं/कि ज्यों नजराने रखते हैं।।


स्पष्ट है कि सुधांशु नवगीत और उसकी भाषा को उस पुल पर खड़ा करना चाहते हैं जो पुराने और नये दोनों को जोड़ता है।
ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए कि ‘पुल कभी खाली नहीं मिलते’ पाठकों को दिक् और काल-बोध के गन्तव्य तक ले जाने में एक जरूरी उपादान का दायित्व निभाएगा।

26 जनवरी, 2005

भवदेव पाण्डेय
प्रेमघन मार्ग
मीरजापुर

हुसैन के घोड़े



भाग रहीं हैं सांसें या
हंसों के जोड़े भाग रहे,
तस्वीरों से उछल-
हुसैन के घोड़े भाग रहे !

हर लम्हे में
नदी टूटती
दूर गगन में तारे
ठंडी भोर, उबलता पानी
छूने लगा किनारे
आस्तीन ऊपर तक-
बादल मोड़े भाग रहे !

देवदार को
आंधी के
आने की खबरें हैं
छप्पन छुरी, जानकी बाई
गाने की खबरें हैं
दुहरे होते पेड़
हवा के कोड़े भाग रहे !

संथालों की
सोई बस्ती
जलती हुई मशालें हैं
और तांबई पिण्डलियां
सांपों के हुई हवाले हैं
चम्पावन में आग लगी है
फूल भगोड़े भाग रहे !

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