सुमिरन को बहानो - केशवचन्द्र वर्मा Sumiran ko Bahano - Hindi book by - Keshavchandra Verma
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सुमिरन को बहानो

केशवचन्द्र वर्मा

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2312
आईएसबीएन :00000

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इसमें केशव जी ने अपने संस्मरण सूत्र प्रस्तुत किए है...

Sumiran Ko Bahano

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

केशव के संस्मरणों में संस्मरण सूत्र की प्रकृति के अनुसार प्रयोग मिलते हैं। व्यक्ति विशेष के सृजनात्मक अवदान,-मानवीय संबंध और समझौता न करने की प्रवृत्तियों को रेखांकित करने के कौशल के साथ ही साथ केशव अपने को भी स्थापित-विश्लेषित करते चलते हैं। इस अर्थ में ये संस्मरण, जीवनी, आत्मचरित्र, इतिहास संस्कृति और साहित्य तथा कुछ अन्य के मिश्रण से बने हैं। यह कुछ अन्य हर लेखक के अपने समग्र अनुभव की सृजनात्मकता से निर्मित होकर रचना और रचनाकार की निजता और विशिष्टता का वाचक हो जाता है।

वर्मा जी के इन सभी संस्मरणों के शीर्षक कविताओं, कृतियों या प्रसिद्ध पंक्तियों के हैं। सजग रूप से प्रयुक्त ये शीर्षक रचनाकार की छवि का प्रारम्भिक चित्र ही नहीं निर्मित करते हैं उसकी विशेषता और कभी-कभी कुछ संस्मरणों में अवरुद्ध सृजनशीलता का भी संकेत करते हैं।

व्यक्ति क्या कर सकता था, उसे क्या मिला था, कितनी उसमें क्षमता या संभावना थी और उसने क्या किया यह केशव जी के रेखांकन का प्रमुख गुण है। यह प्रतिमान आत्मबोधी प्रतिमान भी है और वस्तुपरक भी, इस प्रकार की व्यवस्था निर्मित करते हुए केशव जी उस दौर की उर्वरता और जड़ता का संकेत नहीं भूलते। समकालीन क्या कर रहे थे, कैसी गहमा-गहमी थी। इसका संकेत दूसरे संस्मरणकर्ता भी करते रहे हैं, परंतु केशव जी के संस्मरणों का यह व्यवच्छेदक लक्षण है। मसलन परिमल और प्रगतिशील रचनाकरों के वाद-विवाद, तीखी परंतु बौद्धिक बहसों का साहित्यिक पर्यावरण केशव जी के अधिकांश संस्मरणों में हैं।


सत्यप्रकाश मिश्र


केशव जी का जीवनवृत्त यदि देखा जाए और उसमें छेड़े गये प्रश्नों को ध्यान से समझा जाए तो वह हिन्दी का पिछले पचास वर्षों का इतिहास सहज ही दिखाई पड़ता है। जिन लोगों का इस संस्मरण क्रम में जिन विवरणों का विवेक हुआ है वे अपने में इतने सम्पूर्ण हैं कि पुराने संदर्भों के साथ नये को बराबर जोड़ते रहते हैं। संस्मरण की विधा हिन्दी साहित्य में अपेक्षाकृत नयी विधा है। इसके पहले भी केशव जी ने संस्मरण की दो-तीन पुस्तकें लिखी हैं, जो अपने ढंग की इस पुस्तक से भिन्न हैं, इनमें केशव जी ने अपने अन्तरंग साहित्यिक मित्रों की ऐसी दृष्टि से पकड़ की है कि वे संस्मरण सजीव और जाग्रत हो उठे हैं।


भूमिका


नाटक, माहाकाव्य, गाथा, नाराशंसी, स्तोत्र दानस्तुतियों, जैसे विधात्मक रूपों का प्रारंभिक विभाजन माना जा सकता है। परन्तु दृश्यत्व और श्रव्यत्व को आधार बनाकर पहला व्यवस्थित विभाजन भरत ने नाट्यशास्त्र में किया है। यह विभाजन लगभग प्लातोन की ही तरह का किया गया विभाजन है, जिनमें सिर्फ अन्तर अनुकरण के आधार का है। विधाओं के विभाजन का एक आधार गद्य पद्य और दोनों के मिले-जुले रूप चम्पू का भी है। इस प्रकार का विभाजन पश्चिमी दुनिया में भी किया गया है। प्रबन्धात्मकता और प्रबन्धात्मकता से मुक्ति को केन्द्र में रख कर महाकाव्य और मुक्तक तथा गद्य में आख्यायिका और कथा विधाओं का वर्गीकरण संस्कृत की विशेषता रही है। इन विधाओं के संघटनात्मक स्वरूपों को भी ध्यान में रखकर ही इस प्रकार के वर्गीकरण किए गए थे।

‘संस्मरण’ विधा के रूप में छापाखाना और हिन्दी गद्य के विकास के साथ पश्चिमी साहित्यिक विधाओं के प्रभाव के कारण हिन्दी में विकसित हुआ माना जाता है परन्तु इससे यह निषकर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि इस प्रकार की शैली थी ही नहीं। ‘स्मृति’ की सर्जनात्मकता काल के चक्रीय अवधारणा की अनिवार्यता है।

स्मृति का लिप्यंतरण कल्पना के बगैर संभव नहीं है, भारतीय आख्यान परम्परा में संस्मरण का प्रयोग अनेक रूपों में वैसे ही पाया जाता है जैसे टिस्टम शैण्डी और यूलिसस ‘शेखर एक जीवनी’ जैसे कृतियों में पत्र, डायरी, जीवनी, आत्मकथा फिल्म आदि का प्रयोग पाया जाता है। तर्कशः तो हर प्रकार के कथा विधानों और जीवन चरित्रों में संस्मरणों का प्रयोग युक्तियों या शैलियों के रूप में किया जाता रहा है। महाकाव्यों में संवादात्मकता स्वयं स्मृति विधायी है। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस प्रकार के ऐतिहासिक संस्मरणात्मक प्रयोग किसी उद्देश्य के लिए संकेत ही होते थे। रीति नीति, आदर्श, मर्यादा पुरुषार्थ आदि की रक्षा के लिए प्राण विसर्जन या समर्पण के उल्लेख किसी चरितनायक के गुण स्मरण मात्र ही नहीं माने जा सकते हैं।

इस प्रकार इनके संस्मरण विधा के रूप में ही नहीं बल्कि एक शैली, प्रवृत्ति या कथा संकेत के रूप में प्रयोग की परम्परा अनवरत मिलती है। संकेतात्मकता, ऐतिहासिकता और मूल्यात्मकता संस्मरण विधा के अनिवार्य लक्षण हैं। ये लक्षण जीवनी, आत्मकथा और रेखाचित्र में भी मिलते हैं परन्तु विधा के रूप में बहुतों में से किसी एक विशिष्ट देशकाल में किसी विशिष्ट झलक, चमक या चारित्रिक दीप्ति को समकालीन संदर्भ में स्मृति के विषय के रूप में इस प्रकार भाषाबद्ध करना कि वह विशिष्ट और मूल्यवान होकर सांकेतिक और व्यंजन हो जाय यह संस्मरण विधि की विशिष्टता है।

भारतेन्दु युग हिन्दी में अनेक विधाओं के उद्भव, विकास और प्रयोग के रूप में जाना जाता है। रेखाचित्र, यात्रा वृत्तान्त और संस्मरण मूल रूप में ‘स्मृति’ संचारी के भावात्मक रूप ग्रहण करके या क्षण मात्र को रचनाकार के मन में स्थायी भाव जैसा बनकर भाषा के संकेतात्मक प्रयोगों के द्वारा जब अभिव्यक्त होते हैं तो वे मूलतः रूप व्यक्ति, स्थान काल, निबन्ध के दायरे में भी आते हैं। चित्रात्मकता, सूक्ष्म परंतु मार्मिक संकेतात्मकता, बेधकता आदि के साथ विधा का रूप धारण करती है। कुछ आलोचक रेखाचित्र, संस्मरण और यात्रा संस्मरण आदि शब्दों का प्रयोग अपरिभाषेय विशेषता के कारण नहीं, इन विधाओं के प्रकृतिगत अपरिभाषेयता के कारण ही करते हैं। बालकृष्ण भट्ट, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालमुकुन्द गुप्त, बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन आदि के व्यक्ति और स्थान केन्द्रित निबन्धों को संस्मरण माना जा सकता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ‘सरयूपार की यात्रा’ ‘लखनऊ यात्रा’, बालकृष्ण भट्ट का देवकी नन्दन तिवारी पर लिखा लेख या बालमुकुन्द गुप्त के द्वारा अनेक लेखकों पर लिखे लेख संस्मरण ही माने जा सकते हैं। भारतेन्दु बाबू ने अपने परिवार का जो संस्मरण लिखा है वह आत्मवृत्त होने के साथ ही साथ संस्मरण भी है क्योंकि जो कुछ भी लिखा जाता है वह आत्मचयनित है। यात्रा, घटना, प्राकृतिक दृश्य और व्यक्ति द्वारा जो अमिट छाप मनुष्य के चित्त पर छोड़ी जाती है वह प्रभावान्वित और तादात्म्य के तर्क से देशकाल रहित होती है। व्यक्ति अपने इस अनुभव से साझा करने के लिए या उस अद्वितीय को दूसरे तक पहुँचाने के लिए संस्मरणों का सहारा लेता है। इस अर्थ में यात्रा संस्मरण और व्यक्ति संस्मरण तर्कशः एक ही हैं।

दूसरे तक पहुँचने के क्रम में पहुँचाये जाने वाले ‘संदेश’ या अनुभूति के अनुसार ही संकेत विधान का होना आवश्यक है। फलतः साहित्य में भाषा के प्रयोग की विधि बदल जाती है और हर रचनाकार के तर्क में वह बदलती रहती है। साहित्य बनने के लिए या होने के लिए यह संकेतात्मकता या लाक्षणिकता अनिवार्य है। निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, अज्ञेय, महादेवी वर्मा आदि सबके तरीके अलग हैं परंतु सबने संक्षिप्तता, संकेतात्मकता और अमूल्य रेखांकन का प्रयत्न अवश्य किया है। कृष्णा सोबती ‘हम हशमत’ के प्रारंभ में एक प्रकार से संस्मरण का ही नहीं सृजन मात्र का अर्थ मूल्यानुसंधान या मूल्यों की स्थापना माना गया है। ‘‘कोई भी अच्छी कलम मूल्यों के लिए लिखती है, मूल्यों के दावेदारों के लिए नहीं।’ कृष्णा सोबती का यह कथन ‘हम हशमत’ के संदर्भ में ‘संस्मरण’ की मूल्यवत्ता को ही निर्धारित करता है। मूल्य आत्मानुभूति और कतृत्वाभिमान का विषय है। जब प्रचलन, फैशन और रीति से भिन्न तथा आचरण और भाषा की दृष्टि व्यक्ति को महसूस करते हैं तो उसे अनुभव करने के साथ ही आँकते भी हैं और इस प्रक्रिया में मुक्तिबोध के शब्दों में दूसरे क्षण में ही हम उस उपलब्धि को माननीय दृष्टि से मूल्यवान मानते हुए दूसरे तक पहुँचाना चाहते हैं। निश्चय ही इस साझेपन में ऐसा ही होना चाहिए का भाव भी निहित हो सकता है। ‘संस्मरण’ मूलतः इसी प्रकार की सर्जना है। वह जीन या चरित का परिचय नहीं है और न इतिवृत्त है बल्कि वह स्थिति विशेष और काल विशेष में अनुभूत है। जिससे अनुगत तादात्म्य ही उसकी उपलब्धि है। इस अर्थ में वह मुक्ति है—कामनारहित। ‘संस्मरण’ भी इस अर्थ में प्रपंचात्मक बंधनों से मुक्ति का माध्यम है। चित्त की द्रुति अन्य दीप्ति विधाओं की तरह उससे भी संभव है—इस अर्थ में वह यथार्थ नहीं बल्कि निर्मित है, संकेत है।

केशवचन्द्र वर्मा हिन्दी के उन लेखकों में हैं जिनका संपर्क हिन्दी, मराठी, गुजराती और बंगला के प्रसिद्ध लेखकों से रहा है। हिन्दी और मराठी के अधिकांश प्रतिष्ठित लेखक तो उनके पारिवारिक सदस्य जैसे रहे हैं। साहित्य और संगीत में केशव जी की केवल अभिरुचि नहीं थी। वे अभिरुचि का निर्माण और विस्तार करने का प्रत्यत्न करने वाले लेखक रहे हैं। विजय तेन्दुलकर, पंडित यशराज, मानिक वर्मा, रघुवीर सहाय, श्रीलाल शुक्ल, सर्वेश्वर आदि अनेक लेखकों और संगीतकारों को मैंने उनके यहाँ न केवल देखा है बल्कि उनको सुना भी है। इलाहाबाद में शास्त्रीय संगीत की अभिरुचि विकसित करने, अनेक नवोदित संगीतकारों को पहली बार विकसित और आदर्श मंच प्रदान करने में उनकी संस्था ‘रंगराजन’ की वे ही भूमिका रही है जैसे ‘परिमल’ की साहित्य में। और इन सबमें केशव अकेले ही नहीं पूरा परिवार शामिल रहता था। उनकी पत्नी सरोजनी जी न केवल मराठी से हिन्दी की प्रतिष्ठित अनुवादिका थीं संगाती, कला और साहित्य की उन्हें जौहरीवत पहचान थी मैंने ऐसी सुरुचि सम्पन्न महिला नहीं देखी है। ये संस्मरण भी उस पारिवारिकता और लगावट से युक्त है। इनमें जो खीझ, हलका क्रोध और साथ ही साथ आंतरिकता मिलती है वह उस पारिवारिकरता के कारण ही है। स्वतंत्रता के बाद के इलाहाबाद के साहित्यिक और बौद्धिक वातावरण में रचे-बसे केशव जी से अधिक जानकार दूसरा कोई नहीं है। इसलिए कि वे इसके उपादान और निमित्त दोनों रहे हैं।

और यही कारण है कि उनके संस्मरणों में एक खास बात जिसे केशव के समग्र लेखन का स्थायी भाव माना जा सकता है वह है ‘लेखक सोई जो हाट न चढ़ा।’ ‘संतन को कहा सीकरी सो काम’ केशव जी के सभी संस्मरणों में मान और मूल्य के रूप में विद्यमान है। श्री नारायण चतुर्वेदी, नरेश मेहता और साही पर लिखे संस्मरणों को पढ़कर इसे अधिक स्पष्ट ढंग से समझा जा सकता है।

केशव जी के प्रारंभिक हास्य व्यंग्य लेखों और व्यंग्यभावित उपन्यासों—‘काठ का उल्लू और कबूतर’, ‘आँसू की मशीन’ तथा ‘मुहब्बत मनोविज्ञान और मूंछ दाढ़ी’ तथा प्रारंभिक कविताओं में असंलगन्ता का या समान दूरी का तत्व खोजा जा सकता है। सामाजिक जीवन की विसंगति के साथ ही साथ केशव में मनुष्य के छोटे होते जाने की चिन्ता अधिक मिलती है। पाखंड और आदमी से एक बालिश्त नीचे रहने का दर्द उनकी समस्त रचनाओं में तो है ही इन संस्मरणों में भी एक मानदंड के रूप में मिलता है। साहित्य उनकी दृष्टि में जब तक ‘सत्ता’ के मन में बेचैनी न पैदा करे, प्रतिष्ठानों को विचलित न करे, और अतिमूल्यांकित को उनकी साइज न बताए तब तक केशव जी को किसी भी भाषाण और लेख में मजा नहीं आता है। इसीलिए वे इलाहाबाद को या जिन पर संस्मरण लिखा उनको पसंद करते थे कि उनमें कुछ नया करने की बेचैनी थी। इलाबाहाद को तो वे न केवल अफलातूनों का शहर मानते रहे हैं थे बल्कि इसी को उसकी चारित्रिक विशिष्टता भी मानते हैं। शार्टकट की संस्कृति के वे खिलाफ थे मुक्तिबोध के शब्दों में चक्करदार जीने पर चढ़ने वालों से उन्हें घृणा थी और वे इसे अभिव्यक्त करने से चूकते नहीं थे। उनके द्वारा लिखी हुई उन अनेक असंकलित टिप्पणियों और ‘शार्टकट की संस्कृति’ के साक्षात्कारों से इसे समझा जा सकता है। यथास्थिति के वे सख्त विरोधी केशव जड़ता, एक स्वरता सिरे से नापसंद है। तेवर, विद्रोह, देहातीपन, ठसक, विवेकपूर्ण तर्कसंगत मूल्यांनक और बहस उन्हें नापसंद है। और इस स्तर पर नया पुराना, युवक-वृद्ध, प्रतिष्ठित-अप्रतिष्ठित मंचीय कवि या अकवि का कोई भेद नहीं है। केशव का प्रमुख गुण ही है लकीर से, रीति से हटकर कुछ लिखने के लिए निरंतर प्रेरित करते रहना। मैंने उनके साथ रहकर देखा है, यह बात मैं 35 वर्षों के अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ उन्होंने कभी जाति, आयु और प्रतिष्ठागत भेद नहीं माना। अब आप उनके अन्य संस्मरणों को पढ़ते हैं तो वही दृष्टिकोण और चिंता और वही जिंदादिली आपका भावात्मक और दोनों रूपों में हर संस्मरण में तस्वीर की तरह कौंधेगी। केशव का  पूरा लेखन और शायद हर लेखक का उसके होने से अधिक क्या होना चाहिए के जद्दोजहद से भावित होता है। चाहिए कि छाया से मुक्ति लेखक के लिए संभव नहीं। नैतिक और साहित्यिक दोनों ही स्तरों पर केशव के इन संस्मरणों में वह दृष्टि सर्वत्र है।

‘है’ के प्रति असन्तोष का यह भाव व्यंग्य और विद्रूप के रूप में ही नहीं अपने सम पर टिप्पणी के रूप में भी पाया जाता है। उनके प्रायः सभी संस्मरण अपने सम को जो गुजरा है परिभाषित करने और मूल्यांकित करने के प्रयत्न भी हैं। इस प्रत्यत्न में वे साहित्यिकता के मूल्यांकन के अधकचरेपन पर टिप्पणी करने से कभी चूकते नहीं हैं। शमशेर का संस्मरण इसका प्रमाण है। उनके संस्मरण इसी आधार पर और संस्मरणों से भिन्न हैं। केशव के संस्मरण एक तो विशुद्ध अर्थ में अपने दौर को काफी शिद्दत के साथ उसे पूरे परिवेश और तेवर के साथ प्रस्तुत करते हैं। दूसरे वे उस परिवेश को प्रदूषित करने वाले उन तत्त्वों और रसायनों की ओर भी ध्यान आकर्षित करते चलते हैं। और कभी-कभी तो बहुत तल्ख बेधड़क और सटीक नैतिक टिप्पणियाँ भी करते हैं जो निर्मल वर्मा, मोहन राकेश और महादेवी वर्मा के संस्मरणों में नहीं हैं।

 व्यंग्य अपनी प्रकृति के पाखंड-विखंडन, उद्घाटन और मूल्य-स्थापन की विधा है और संस्मरणों में उसका प्रयोग अपनी प्रकृति से संकेत का कार्य करता है। अज्ञेय अपने संस्मरणों में सूक्ष्म सांकेतिकता के द्वारा मानवीय प्रवृत्ति और उसकी सीमाओं का ही नहीं उसके बड़प्पन का एक साथ संकेत करते हैं। ‘स्मृति लेखा’ में मैथिलीशरण गुप्त और बालकृष्ण शर्मा के संस्मरण इस दृष्टि से संकेतक हैं परन्तु यात्रा संस्मरणों की दृष्टि से जो कलात्मक संयोजन चमत्कारिक स्तर पर ‘अरे यायवर रहेगा याद’ और ‘एक बूंद सहसा उछली’ में है वह उनमें दुर्लभ है। एक बूँद सहसा उछली’ में अज्ञेय सांस्कृतिक और बौद्धिक चरित्र को उजागर करने के साथ आधुनिक सभ्यता की भौतिक प्रगति उसके द्वारा उत्पन्न संकट की ओर भी संकेत करते हैं। ‘स्मृति के गलियारों से’ में मानवीयता की उपस्थिति का संकेत बीनू में जिस सहजता के साथ है, वह अत्यंत मार्मिक है।


केशव के संस्मरणों में संस्मरण सूत्र की प्रकृति के अनुसार इन सब के प्रयोग मिलते हैं। व्यक्ति विशेष के सर्जनात्मक अवदान, मानवीय संबंध और समझौता न करने की प्रवृति को रेखांकित करने के कौशल के साथ ही साथ केशव अपने को भी स्थापित-विश्लेषित करते चलते हैं।

इस अर्थ में में ये संस्मरण जीवनी, आत्मचरित, इतिहास, संस्कृति और साहित्य तथा कुछ अन्य के मिश्रण से बने हैं। यह कुछ अन्य हर लेखक के अपने समग्र अनुभव की सर्जनात्मकता से निर्मित होकर रचना और रचनाकार की निजता और विशिष्टता का वाचक हो जाता है। मेरे मित्र रामकमल राय के ‘स्मृतियों के शुक्ल पक्ष’ में व्यक्तियों के उस मानवीय चेहरे को उपस्थित करने का प्रयत्न है जो चेहरा धीरे-धीरे या तो गायब हो जा रहा है या मुखौटों में बदलता जा रहा है। इसीलिए उसकी मूल्यवृत्ता उसी शुक्लाता की पोषणीयता में ही है। संस्मरण में लेखकों के पतन या कमजोर पड़ने के कारणों का संकेत अवश्य है और यह संकेत रचनाकार की विशिष्टता तथा सहजता रेखांकित करने की डायलेक्टिक्स का हिस्सा है। जगदीश गुप्त के ताश खेलने, साही के साथ शतरंज की बिसात पर घंटों बैठने और इन सबके बीच से पारिवारिकता के रसायन की परिपुष्टता पारिवारिकता और मैत्री को एक मूल्य के रूप में स्थापित करती है।

केशव जी के संस्मरणों की शुरुआत व्यक्ति के परिचय गुण और प्रभाव के उल्लेख से होती है और क्रमशः परिचय के संदर्भ के साहित्यिक सांस्कृतिक उल्लेख तथा व्यक्ति विशेष के रहने के नगर और मुहल्ले के साहित्यिक सांस्कृतिक महत्त्व के वर्णन से होती हुई व्यक्ति और रचनाकारों की समकालीनता में पसर जाती है। शाही के शब्दों का प्रयोग करके कहूँ तो इन संस्मरणों में आत्मरक वस्तुपरकता है—वस्तुपरकता आत्मपरकता नहीं।

निश्चय ही इस रचनात्मक कौशल में केशव सिद्ध हैं। टैगोर टाउन जहाँ लेखक रहता रहा है उसका संस्मरण वैसे तो इस इतिहास से कम नहीं परंतु रचनाकार ने यथाशक्ति वस्तुपरकता निर्मित करने का प्रयत्न किया है। मैं यह मानकर चलता हूँ कि रचना में जो कुछ भी है वह विधाता की ही सृष्टि है। जैसे कालिदास ने कहा है कि कोई भी सर्जना बिना ‘सत्वयोग’ के नहीं होती है। पार्थिकता और दिव्यता का विशिष्टाद्वैत ही रचना का कारण है। कामोवेश या लाक्षणिक अर्थ में प्रत्येक सृजनात्मक विधा के संदर्भ में सत्य है। वैसे तो विधागत विभाजन भी एक प्रकार का ठाट ही है जो शास्त्रीयता के अतिरिक्त कोई मूल्य नहीं रखता उसकी निर्मिति में भूमिका भले ही हो।



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