मनुष्य के रूप - यशपाल Manushya Ke Roop - Hindi book by - Yashpal
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मनुष्य के रूप

यशपाल

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1996
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2351
आईएसबीएन :00000

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इसमें मनुष्य की हीनता और महानता के यथार्थ का क विशद् चित्रण किया गया है...

Manushya ke roop

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 ‘‘लेखक को कला की महानता इसमें है कि उसने उपन्यास में यथार्थ से ही सन्तोष किया है। अर्थ और काम की प्रेरणाओं की विगर्हणा उसने स्पष्ट कर दी है। अर्थ की समस्या जिस प्रकार वर्ग और श्रेणी के स्वरूप को लेकर खड़ी हुई है, उसमें उपन्यासकार ने अपने पक्ष का कोई कल्पित उपलब्ध स्वरूप एक स्वर्ग, प्रस्तुत नहीं किया,... अर्थ सिद्धांत की किसी यथार्थ स्थिति की कल्पना इसमें नहीं।
समस्त उपन्यास का वातावरण बौद्धिक है। अतः आदि से अन्त तक यह यथार्थवादी है।... मनुष्यों की यथार्थ मनोवृति का चित्रांकन करने की लेखक ने सजग चेष्ठा की है।... यह उपन्यास लेखक के इस विश्वास को सिद्ध करता है कि परिस्थितियों से विवश होकर मनुष्य के रूप बदल जाते है ।
‘मनुष्य के रूप’ में मनुष्य की हीनता और महानता के यथार्थ के चित्रण का एक विशद् प्रयत्न किया गया है।’’

डॉ. सत्येन्द्र

पहाड़ी सड़क पर

अंग्रेजी सरकार ने निश्चय कर लिया था कि पठानकोठ से आगे पहाड़ी प्रदेश में भी रेल चलाई जाये। काँगड़े की पहाड़ों की पसलियों की चीर-चीर कर उन पर लोहे के रास्ते बना दिये गये। छोटे-छोटे इंजन अपने पीछे छोटी रेलगाड़ियाँ बाँधे, हाँफ़ते, दम तोड़ते, छक-छक शोर मचाते और बहुत-सा धुँआ उगलते, लोहे के रास्तों से पहाड़ों के विशाल शरीरों पर कनखजूरों की तरह रेंगने लगे।
पहाड़ों की गर्वित प्रकृति ने मनुष्य के इस अहंकार और दुस्साहस का विरोध किया। जैसे भैंस सुध आने पर अपने शरीर पर रेंगने वाले कीड़ों को गिरा देने के लिये अपना शरीर थिरका देती है, वैसे ही यह विराट पहाड़ रेलगाड़ियों के रेंगने की सरसराहट अनुभव करके अपना शरीर हिला देने लगे। कभी पहाड़ का कोई भाग भराभरा कर लाइन पर आ गिरता या दरार फट जाती। लोहे की लाइनें और शहतीर कच्चे धागे की तरह तड़क जाते। सरकार ने अपनी रेल-लाइन को बैजनाथ से समेट कर नगरोटा तक ही सीमित कर लिया।

अब भी पठानकोठ से कुल्लू-मणाली तक मुसाफिरों और माल का यातायात सवा दो सौ मील से अधिक दूरी तक, सड़क की राह मोटरों द्वारा ही होता है। सड़क यह ऐसी है कि यात्रियों को ‘मोटर’ लग जाती है। मैदानों के निवासियों के लिये ‘मोटर लग जाना’ एक पहेली हो सकती है परन्तु भुक्त भोगी के लिये नहीं। मोटर लग जाने की तुलना ऊंचे हिंडोले में बहुत देर तक लगातार झूलने के परिणाम से की जा सकती है।

इस सड़क में अधिकांश आड़ी चढ़ाइयाँ, फिसलती ढलवानें और कदम-कदम पर कोहनी के से मोड़ हैं। एक ओर हरियाली और फूलों से छाई चट्टाने ऊँचे किलों की दीवारों की तरह खड़ी हुई हैं। इन चट्टानों की चोटी देखने के यत्न में सिर से टोपी गिर जाती है। सड़क के दूसरी ओर पत्थरों से भरी पहाड़ी खड्डें या पचास-साठ हाथ की गहराई पर श्वेत झाग उगलती नीली धारायें हैं। सड़क के घूमते जाने के कारण कभी सामने, कभी दाहिने, कभी बायें और कभी पीछे पहाड़ों की चोटियों पर पड़ी बरफ ऐसे दिखाई देती जाती है जैसे धूप से बचने के लिये पहाड़ों ने फिर सफेद अँगौछे डाल लिये हों।
कहीं-कहीं सड़क के किनारे से छोटे-छोटे पहाड़ी खेत, चौड़े-चौड़े जीनों की तरह उतरते या चढ़ते चले जाते हैं। इन खेतों में या ढलवानों पर चरते पहाड़ी पशु, तेज चाल से चली जाती, घुरघुराती मोटरों की ओर कौतूहल से फैली, चमकती आँखें उठाकर स्तब्ध दृष्टि से देखते रह जाते हैं। कभी यह भेड़-बकरियाँ, छोटे कद की गायें या खच्चरें सड़क के किनारे बनी हुई मुँडेरें लाँघ कर सड़क पर आ जाते हैं और मोटरों से परिचय परिहास करने के लिये क्षण भर मोटरों के सामने झिझक जाते हैं। यह पशु मोटरों को और मोटर ड्राइवर इन पशुओं को भाँप चुके हैं। पल भर को मोटर से आँखें मिलाईं, झिझके सहमें, जरा सींग दिखाये; मोटर ने ज़रा घुड़की देकर तनिक-सी राह काट ली और वह पशु मुँडेर फाँद कर खेत या ढलवान में कूद जाते हैं।

सड़क से दिखाई देने वाले इन दृश्यों का आनन्द मुसाफिर प्राय: नहीं ले पाते। वे चक्कर खाती मोटर की चाल से चकराता हुआ सिर दोनों हाथों में थामे, कपड़े के छोर मुँह पर दबाये रहते हैं। यदि मोटर दाहिने या बायें एक इंच भर जगह भी चूक जाये तो उनका कहीं पता भी न चले। वे ये सफर जोखिम में पूरा करते हैं। नित्य ही इन सड़को पर चलने वाले मोटर ड्राइवरों की क्या अवस्था होती होगी ? वे अपनी चौकस, स्थिर दृष्टि सड़क पर जमाये; कोई गीत गुनगुनाते या सिगरेट फूँकते-पीते चले जाते हैं। उन्हें इसका आभास हो गया है।

धनसिंह प्राय: डेढ़ बरस से इस सड़क पर मोटर चला रहा था। जाड़े के दिन थे। वह दोपहर से कुछ पहले कुल्लू से चला था। ‘मण्डी’ पार करके वह अपेक्षाकृत सीधी ढलवाँ सड़क पर ‘बैजनाथ’ की ओर निश्चिन्त, केवल अभ्यस्त सावधानी से चला जा रहा था। उसकी अपलक और स्थिर दृष्टि सड़क पर लगी हुई थी। सड़क तेजी से उसकी लारी के पहियों के नीचे से फिसलती जा रही थी जैसे मशीन के पहिये पर पट्टा फिसलता जाता है। मोटर के स्टियर पर टिकी उसकी उँगलियाँ, सड़क की अवस्था के अनुसार स्टियर को गति दे देतीं और संभल जाती थीं।

सड़क के बायीं ओर फैली हुई घाटी के किनारे-किनारे मोटर पहाड़ियों की पसलियों पर से चली जा रही थी। घाटी की हरियाली जाड़े-पाले से पीली पड़ कर पीली-सुनहरी आभा ले चुकी थी। सूर्य ढल रहा था जैसे घाटी की पश्चिम सीमा पर रखे हुए, चीड़ के पेड़ों से छाई पहाड़ियों के तकियों पर अपना सिर टिका देना चाहता हो। धनसिंह को केवल नौ मील आगे, बैजनाथ तक ही पहुँचना था। सवारियों की चें-चें और चख-चख की कोई चिन्ता न थी। लारी में आलू की बोरियाँ लदी थीं।
धनसिंह का सहायक, लारी का क्लीनर कर्मू लारी के पिछवाड़े आलुओं की बोरियों में घोंसला बनाकर लेटा हुआ था। वह मुँह ऊपर उठाये, कानों में उँगलियाँ दिये, गले की पूरी शक्ति और हृदय के उच्छ्वास से एक पहाड़ी झिंझोटी अलाप रहा था :


‘‘दिलां दियां कुण्डियां खुलाई कने बो,
प्रीता दियां रीतां भुलाई कने बो
दित्ता बिछोड़ा बंदिया दो।’’
(मन के किवाड़ों की साँकल खुला करके)
प्रीत की रीतें भुला करके,
दिया बिछोड़ा दासी को रे।


कर्मू की आवाज़ सुरीली थी और उसमें दर्द भी था। लारी की थिरकन से उसमें कम्पन भी आ रहा था। लारी की चाल और इंजन का शब्द साज बनकर गीत के लिये ताल दे रहे थे। ऊँचे स्वर से गीत का अधिकांश स्वर गाड़ी की तेज चाल के कारण पीछे उड़ जाता था। धनसिंह को गीत कोमल होकर दूर घाटी में से आता हुआ सुनायी दे रहा था। धनसिंह को गीत स्टियर पर, पाँव ब्रेकों को छूते हुए, आँखें उड़ती हुई सड़क पर, कान गीत के स्वर में और मन गीत के विषय में डूबा हुआ था। उसकी सतर्क दृष्टि में तरलता और चेहरे पर मग्नता का भाव था।

सड़क पर मोटर के सामने कुछ बकरियाँ और मेमने दिखाई दिये। धनसिंह की उँगलियों ने स्वत: भोंपू बजा दिया। बकरियाँ और मेमने कुछ मटके और सड़क की मुँड़ेरों की ओर हो गये परन्तु दो छोटे-छोटे मेमने सहसा अपनी दोनों टाँगें उठाकर फिर मोटर के सामने कूद आये। उनके ऊपर छाया की तरह आ गिरी एक औरत।

यंत्र की स्वाभाविकता और अचूक फुर्ती से धनसिंह का हाथ क्लच और पाँव ब्रेक पर जा पड़े। गाड़ी अपनी गति से प्रवाह में अलंध्य बाधा पाकर सड़क पर उछल कर खड़ी हो गयी। गाड़ी का पुर्जा-पुर्जा चर्रा गया। धनसिंह के रोम-रोम से पसीना छूट गया। औरत गाड़ी के मडगार्ड का धक्का खाकर गिर पड़ी थी। एक छटपटाते मेमने की टाँगें अब भी उसके हाथ में थीं और दूसरा मेमना उछल कर सड़क पार की चट्टान पर खड़ा होकर, इस खेल में प्रसन्न होकर, मिमिया रहा था। औरत ने हाथ के मेमने को सुरक्षित देख उसे छोड़ दिया। उठने के यत्न में उसने आँचल संभाल कर ड्राइवर की ओर देखा।
धनसिंह का क्रोध उबल पड़ा था। आँखों में खून उतर आया। दायें हाथ से गाड़ी का दरवाजा खोल, सड़क पर कूदकर वह गाड़ी के सामने पहुँचा। बड़ी कठिनाई से उसने अपनी फड़फड़ाती हुई बाँहों को औरत को पीट देने से रोका। आखिर औरत जात थी; परन्तु गालियाँ उसके मुख से कितनी ही निकल गयीं.....तेरी माँ.....फाँसी लगवायेगी हमें ? बहन.....तू फालतू हैं घर में ?’ क्रोध में वह कितनी ही गालियाँ बक गया।

वह स्त्री एक हाथ से चोट खायी कमर को दबाये और दूसरी वाँह सिर को चोट की आशंका से बचाने के लिये उठाये आतंक से फैले हुए नेत्रों से मौन धनसिंह की ओर देखती रही। धनसिंह अपनी विवशता में खीझ गया। वह इतनी भयंकर शरारत करने वाले व्यक्ति को पीट कर अपना क्रोध भी न उतार सका।

जवान स्त्री या लड़की की आसमानी रंग की बड़ी-बड़ी तरल आँखें मूढ़ता से स्थिर हो गईं थीं। घबराहट के कारण साँस गहरा और जल्दी चल रहा था। उभरे हुए सीने फटे हुए कुर्ते से झाँकने लगे थे। लड़की को घबराहट में सीना आँचल में छिपा लेने की भी सुध न रही थी। उसकी इस मूढ़ता ने धनसिंह के उफनते हुए क्रोध को छींटा मारकर बैठा दिया।
कर्मू सहसा गाड़ी रुकने के झटके से गिरते-गिरते बचा था। वह भी उतर कर सामने आ गया। जवान लड़की को यों भयभीत, उघाड़ी और खोयी हुई अवस्था में देखकर खीसें निकालकर धनसिंह को सम्बोधन किया- ‘‘वाह उस्ताद, खूब माल है।’’ और लड़की को पुचकारने के लिए होंठों से सीटी बजा दी। धनसिंह भी हँस पड़ा।

धनसिंह ने लड़की को सम्बोधन किया- ‘‘तेरे बाप को तेरे लिये मर्द नहीं मिलता हो तो यों ही किसी के साथ चल दे ! हम गरीबों का गला क्यों कटवाना चाहती है चुड़ैल !’’ धनसिंह लड़की को समझाने के लिये पहाड़ी बोली में बोल रहा था।
लड़की चोट से स्तम्भित हो जाने के कारण धनसिंह की कुद्ध और तीव्र दृष्टि से भी संकोच न कर पाई थी। अब अपनी बोली में बात सुन कर और कर्मू का संकेत समझकर उसने घिसे-पिटे, मैले कुर्ते से झाँकते अपने शरीर के उभार को आँचल में छिपा लिया और उसकी लम्बी-लम्बी पलकें, आँखों की जल मिले कच्चे दूध की सफेदी पर झुक गयीं, संकोच से गर्दन भी झुक गयी।

कर्मू ने अपनी कुचेष्ट फिर दोहराई। धनसिंह भी हँसकर बोला- ‘‘भागवाने, अब उठ ! सड़क छोड़ घर जा !....नहीं तो गाड़ी में बैठ जा, तुझे भी ले चलूँ !’’
लड़की चोट से काँपती हुई उठी और सड़क किनारे मुँडेर के पास चली गयी। धनसिंह गाड़ी में बैठ गया। उसने मोटर का स्विच और स्टार्टर दबाये। इंजन ने संकेत का कोई उत्तर नहीं दिया।
‘‘ले भाई कर्मू !’’ धनसिंह ने क्लीनर को पुकारा, ‘‘आ गयी मुसीबत ! शायद बैटरी के तार टूट गये !’’ धनसिंह फिर मोटर से उतरा। इंजन का पर्दा खोलकर देखने लगा।

कर्मू ने लड़की की ओर संकेत कर सुझाया-‘‘अरे भाई, खूबसूरत औरत की नजर बुरी होती है। आदमी हलाक हो जाता है। यह तो लोहे की मोटर ही है, देखा न, इंजन मचल गया है !’’
धनसिंह ने लड़की की ओर देखा-‘‘यह क्या जादू कर दिया कालिका माई ? अब रात यहीं काटनी पड़ेगी तो कुछ चना-चबैना, रोटी का टुकड़ा खाने को देगी या ऐसे ही मारेगी ?’’
लड़की ने कुछ जवाब न दे सिर झुकाये सड़क पार करके समीप की चट्टान के साथ की पगडंडी से ऊपर चढ़ गयी और दृष्टि से ओझल हो गयी।
धनसिंह इंजन का पर्दा खोलकर कभी एक पुर्जें को टटोलता कभी दूसरे को। मोटर ऐसे निस्पन्द थी जैसे हृदय की गति रुक जाने या फेफड़ा फट जाने से कोई जीव निश्चल हो जाता है। धनसिंह अपनी पूरी समझ और योग्यता से इंजन को ठीक करने का यत्न कर रहा था।

क्लीनर कर्मू अपना धूल से भरा सिर खुजा कर बड़बड़ाने लगा-‘‘रात आ रही है। इस वक्त पीछे से कोई मोटर भी तो नहीं आ रही। तुमने मुझे ‘मण्डी’ में खाना भी नहीं खाने दिया। दो पैसे के आलू लेकर पानी पी लिया था। मेरे पास कम्बल भी नहीं है।’’
धनसिंह ने उसे डाँट दिया-‘‘क्या बक-बक कर रहा है। पम्प लाकर कनेक्शन में हवा दे।’’
धनसिंह मोटर के नीचे चित्त लेटकर देखने लगा कि गाड़ी के न हिल सकने का कारण क्या था ? उसने वहीं से पुकारा-‘‘भाई कर्मू, मारे गये ! अरे रीढ़ ही टूटी पड़ी है। यूनीवर्सल जाइंट टूट गया है साली का।’’
धनसिंह चित्त लेटा हुआ सरक कर बाहर आया। सब यत्न व्यर्थ थे। उसने गहरी साँस ली और कमर पर हाथ रखकर खड़ा हो गया-‘‘अब ?’’

सामने थकावट से निस्तेज सूर्य घाटी की सीमा पर खड़े चीड़ के जंगलों के पीछे फिसल रहा था और विश्राम के लिए छाया और अन्धकार की चादर अपने शरीर पर खींच रहा था। नीचे फैली विस्तृत घाटी श्यामल हो गयी थी। केवल ऊँचाई पर से गुजरती सड़क पर सूर्य की अन्तिम, फीकी-फीकी, झिल-मिल सी किरणें शेष रह गयी थीं।
धनसिंह ने चिंतित और गंभीर स्वर में कहा-‘‘भाई कर्मू, मैं तो मालिक की गाड़ी छोड़ कर जा नहीं सकता। शाबाश बहादुर जवान, तू चला जा। तू भूखा भी है, यहाँ रात में जाड़े से परेशान होगा। पैसे नहीं हैं तो मैं देता हूँ। यहाँ से दो मील आगे सड़क पर ‘पटोला’ की दुकान है। वहाँ कुछ खा लेना। तेरे जैसे जवान आदमी के लिए क्या है; जरा लम्बे कदम रखता चला जा। बस, आठेक मील होगा। दो घण्टे की मार है। बैजनाथ में पहली सर्विस में बैजनाथ से मिस्त्री को भेज दें। इधर पीछे मण्डी से तो कल तड़के पाँच बजे तक कोई सर्विस नहीं आयेगी।’’       

कर्मू खीझ और क्रोध में भुनभुनाता हुआ बैजनाथ की ओर चला गया। धनसिंह सड़क पर अकेला रह गया। सूर्य अस्त हो चुका था। मैदानी देशों की भांति पहाड़ों में सूर्यास्त और रात के बीच का संधिकाल देर तक नहीं चलता। घाटी से उठा अँधेरा शीघ्र ही आकाश पर भी जाता है।

धनसिंह को प्यास अनुभव हुई। वह सड़क के सिवा उस इलाके से बिल्कुल अपरिचित था। सड़क के दायीं ओर छोटी सी चट्टान दीवार की तरह खड़ी थी और ऊपर वृक्षों के अतिरिक्त कुछ दिखायी नहीं देता था। बायीं ओर घाटी में खेत बड़े-बड़े, चौड़े जीने की भाँति दूर तक उतरते, फैलते चले गये थे और दूर की पहाड़ियों पर चढ़ गये थे। घाटी की यह अंजली कई खेतों में गेहूँ की अधपकी फसल सँभाले थी। कई खेत खाली पड़े थे। दायीं ओर चट्टान से एक पगडंडी उतर कर सड़क को पार करके बायीं ओर खेतों में उतर गयी थी लेकिन कहा नहीं जा सकता था कि दोनों ओर की बस्तियाँ कितनी-कितनी दूर हैं।

घाटी में पैठते जाते अँधेरे में दूर धुआँ-सा उठता दिखाई देने से बस्ती का आभास होता था लेकिन धुँधलेपन के कारण दूरी का अनुमान करना कठिन था। पहाड़ों में जो चीज एक पहाड़ी से सामने दूसरी पहाड़ी पर पुकार की पहुँच में दिखायी देती है, पगडंडियों की राह दो कोस दूर हो सकती है। धनसिंह ने उस अनिश्चित स्थान की ओर जाने का विचार छोड़ कर चट्टान की ओर पगडंडी पर चढ़ कर देखना ही उचित समझा।

     


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