यशपाल की सम्पूर्ण कहानियाँ - भाग 2 - यशपाल Yashpal ki Sampoorna kahaniyan - Part 2 - Hindi book by - Yashpal
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यशपाल की सम्पूर्ण कहानियाँ - भाग 2

यशपाल

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :482
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2357
आईएसबीएन :00000

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यशपाल के पाँच विख्यात कथा संकलन इसमें वे सामाजिक कुरितियों, अंधविश्वासों तथा पाखण्डों पर प्रहार करते है......

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Yaspal ki sampurnya kahaniyan-2

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत खण्ड में ‘फूलों का कुर्ता’, ‘तर्क का तूफान’, ‘धर्मयुद्ध’, भस्मावृत, ‘चिनगारी’, ‘तुमने क्यों कहा था मैं सुन्दर हूँ’ यशपाल के पाँच विख्यात कथा संकलन की भूमिका के अन्तिम हिस्से में यशपाल लिखते हैं, ‘बदली स्थित में भी परम्परागत संस्कार से ही नैतिकता और सज्जा की रक्षा करने के प्रयत्न में क्या से क्या हो जाता है। हम उड़ते चले आ रहे हैं और नया लेखक हमारे चेहरे से कुर्ता नीचे खींच देना चाहता है।’ तात्यर्य यह है कि यशपाल सामाजिक संदर्भों के विकास के साथ-साथ लेखकीय दृष्टि के विकास की माँग करते हैं। अपने ‘इस पाँच संकलनों में सामाजिक कुरीतियों अंधविश्वासों तथा पाखण्डों पर वे मर्मांतक प्रहार करते हैं। वे समाज के जड़ीभूत स्वभाव और नैतिकता का विरोध कर उसे बदलने का प्रयास करते है इन संकलनों तक पहुँचते उनकी कथा-रचना का एक प्रौढ़ तथा सुनिश्चित स्वरूप एवं प्रतिभूतियाँ हिन्दी जगत में स्थापित हो जाती हैं।

प्रकाशकीय

हिन्दी कहानी की विकास परम्परा में वस्तु और शिल्प दोनों दृष्टियों से यशपाल की कहानियों के वैशिष्ट्य के लिए आज भी कोई चुनौती नहीं है। वे अपनी तरह के अकेले सर्जक हैं जिनका समस्त साहित्य जनता के लिए समर्पित है। उनकी मान्यता भी यही थी कि सामाजिक विकास की निस्तरता से उत्पन्न वास्तविकताओं को अनावृत्त और विश्लेषित करते रहने से श्रेष्ठतर दूसरा मन्तव्य साहित्य का नहीं हो सकता। 1939 में उनका पहला कहानी संग्रह ‘‘पिंजड़े की उड़ान’’ प्रकाश में आया तब यशपाल जीवनानुभवों के मार्ग का एक पूरा घटना बहुल सफर तय कर चुके थे। वैचरिक प्रयोगों की सफलता-असफलता से जूझते हुए, वहाँ पहुँच चुके थे जिसके आगे शायद मार्ग अवरुद्ध था।

1919 में रौलेट एक्ट का प्रभाव उन पर पहला माना गया है। तब तक वे अपनी पारिवारिक आर्य समाजी परम्परा के साथ जुड़े हुए थे और ट्यूशन करके परिवार की आर्थिक स्थित में अपना अंशदान देने लगे थे। फिरोजपुर छावनी में उस समय भी काँग्रेसी आन्दोलन चला उसमें यशपाल की सक्रिय भूमिका का उल्लेख किया जाता है। इतना ही नहीं 1921 में चौरी-चौरा काण्ड के बाद गाँधी जी द्वारा आन्दोलन की वापसी से देश के अनेक नौजवानों की तरह यशपाल को भी भारी निराशा हुई। वे सराकरी कालेज में पढ़ना नहीं चाहते थे। इसी कारण लालालाजपत राय के नेशनल कालेज में भर्ती हो गए।

यहीं उनका परिचय भगत सिंह, सुखदेव और भगवतीचरण से हुआ। जिन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिए गाँधीवाद मार्ग से अलग क्रान्तिकारी रास्ते पर चलकर स्वतन्त्रता के निमित्त अपना जीवन अर्पित करने का निश्चय लिया था। वे लोग तो कुछ ही दिन बाद भूमिगत हो गए लेकिन यशपाल नेशनल कालेज में पढ़ाते हुए दल सूत्र संभालने लगे।

भगत सिंह और यशपाल दोनों की साहित्य में गहरी दिलचस्पी थी। उदयशंकर भट्ट उसी कालजे में अध्यापक थे। और उन्हीं की प्रेरणा से यशपाल की पहली कहानी हिन्दी के मासिक पत्र में प्रकाशित हुई। कानपुर के ‘प्रताप’ ने भी उनकी कुछ भावात्मक गद्य की तरह की रचनाएँ छापीं लेकिन इसे यशपाल के लेखकीय जीवन की शुरुआत मानना भूल होगी। वे तो दिन पर दिन क्रान्तिकारी आन्दोलन की भारी जिम्मेदारियों में व्यस्त होते जा रहे थे। जहाँ कुछ निश्चय थे और उनसे निसृत कार्यक्रमों का व्यस्तता भरा दौर था।

1928 में लाला लाजपत राय पर आक्रमण करने वाले सार्जेण्ट साण्डर्स को गोली मारी गयी। 1929 मार्च में भगत सिंह ने दिल्ली असेम्बली में बम फेंका। 1929 में लाहौर में एक बम फैक्ट्री पकड़ी गई। तनाव इतना बढ़ा कि यशपाल भूमिगत हो गये। कहते हैं 1929 में ही वायसराय की गाड़ी के नीचे क्रान्तिकारियों ने जो बम विस्फोट किया वह यशपाल के हाथों हुआ था।

जाहिर है कि यशपाल को एक लम्बे समय का भूमिगत जीवन बिताते हुए ‘हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातन्त्र सेना’’ का काम सम्भालना पड़ा। 1931 में इस सेना के कमाण्डर इन चीफ चन्द्रशेखर आजाद को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में गोली मार दी गयी। यशपाल सेना के कमाण्डर इन चीफ बनाये गये इसी समय लाहौर षड्यन्त्र का मुकदमा चल रहा था। यशपाल उनके प्रधान अभियुक्त थे। 1932 में यशपाल और दूसरे क्रान्तिकारी भी गिरफ्तार हो गये। उन्हें चौदह वर्ष का सख्त कारावास हुआ। 1938 में कांग्रेसी मन्त्रिमण्डाल आने पर राजनैतिक कैदियों की रिहाई हुई और यशपाल 2 मार्च 1938 को जेल से छूट गये। उन्हें लाहौर जाने की मनाही थी इसलिए लखनऊ को उन्होंने अपना निवास स्थान बना लिया। विप्लव का प्रकाश और उनके साहित्यिक जीवन के शुरुआत का यही काल है।

ध्यान देने की बात है कि ऊपर दिया गया एक विहंगम विवरण यशपाल के महान समरगाथा जैसे जीवन का मात्र एक ट्रेलर है। जिसके अन्यत्र अन्तर मार्गों में न जाने कितना कुछ ऐसा होगा, जिसमें भावात्मक और संवेदनात्मक तनावों के साथ वास्तविक अनुभवों के एक विराट संसार छिपा होगा—चरित्रों और घटनाओं की विपुलता के साथ मानवीय प्रकृति के बारीक अनुभवों के उल्टे-सीधे तन्तुओं का महाजाल फैला होगा जो उनके विशाल कहानी साहित्य में फैला हुआ है।

हमारे लिए उनके कथा-संकलनों को कुछ एक भागों में संकलित करते हुए अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा अन्ततः निश्चय यह हुआ कि 1939 से 1979 के बीच प्रकाशित उनके 18 कथा संकलनों को काल-क्रमानुसार चार भागों में बाँट कर प्रकाशित किया जाय। कथा साहित्य के मर्मज्ञ आलोचकों और विद्वानों ने भी इसी को उचित बताया। इससे उनके रचनात्मक विकास का एक सम्पूर्ण चित्र हिन्दी पाठकों को प्राप्त हो सकेगा। इन संकलनों के बारे में आपके सुझाव और सम्मति की हमें सदा प्रतीक्षा रहेगी।

-प्रकाशक

आतिथ्य



रामशरण को भारत सरकार के अर्थ-विभाग में क्लर्की करते तीन वर्ष बीत चुके थे। इतनी बड़ी सरकार की व्यवस्था में जगह और उसका आश्रय पाकर रामशरण ने अनेक ऐसी सुविधाएँ पाईं थीं जो जन-साधारण के लिए स्वप्न मात्र थीं। प्रतिवर्ष मैदानों को तड़पा देने वाली गर्मी से भागकर छः मास तक शिमला शैल पर निवास और छः मास तक देहली के शाही शहर की रौनक।

रामशरण का जन्म हुआ था मेरठ के एक जिले के एक गाँव में, जहाँ भूमि ऋतु-ऋतु में अपने उदार पर हलके फले का प्रहार सहकर, तटस्थ उदारता से बीज ग्रहण करने के लिए प्रस्तुत रहती है। हरी -भरी फसलों के आवरणों से उस भूमि की नग्नता कुछ ही दिन ढक पाती है कि किसान फसल को काट कर अपने खलिहानों में समेट लेते हैं। जमीन बेचारी बेरौनक और उदास हो जाती है और अपने को ढक पाने की आशा में फिर हल का फाल सहने के लिए तैयार हो जाती है। उन उपजाऊ प्रदेशों का रूप मनुष्य के उपयोग से घिस-घिसकर प्रौढ़ा गृहस्थिन की भाँति हो गया है जिसे काम -काज और उलझन के बोझ से दब कर कभी सिंगार करने या मुस्कराने का अवसर नहीं मिलता। उसकी ओर निगाह जाने से किसी रसिक युवक का मन गुदगुदा उठता।

रामशरण अपने घर से कनस्तर में लाया घी खाता था और दफ्तर में सरकार के आय-व्यय का हिसाब, करोड़ों की संख्या तक करके अपने मस्तिष्क को थका देता था। अवकाश के समय वह आस-पास की पहाड़ियों पर उन्मुक्त वायु में सीना फुला, गहरे साँस लेकर, मीलों तक दूर निगाहें दौड़ा कर प्रकृति का आन्नद लेता रहता। अप्रैल और मई के महीनों में शिमले की घाटियाँ फलों के रंग लेकर, खिलखिलाकर होली खेलती जान पड़तीं। वर्षा के महीनों में आकाश पर निरंतर गहरापन बना रहता, बादल आकाश से बरस-बरस कर संतुष्ट न होते। वे उमड़-घुमड़ कर घरों के भीतर चले आते।

धरती धूप की मुस्कुराहट के लिए प्रतीक्षा में अकुल हो जाती पर बादल नवोढ़ा रूप गर्विता माननी की भाँति मान किये रहते। उस मान का अंत प्रेमी के व्याकुल हो जाने पर नहीं होता।..और फिर जब प्रकृति चौमासे के मान की घटाटोप उदासी को छोड़ कर मुस्कुरा उठती तो सितम्बर बीतते-बीतते घाटियों पर फूलों का पागलपन छा जाता। रामशरण का मन पुलक कर व्याकुल हो उठता। सोचता—इस चमत्कारिक देश में दृष्टि के परे न जाने क्या-क्या है।

रामशरण ने उन पहाड़ी देशों में दूर-दूर तक घूम आये अनेक साहसी व्यक्तियों से पूछ-पूछ कर बहुत-सी अद्भुत कथाएँ, वृत्तान्त और वहाँ की प्राकृतिक छटा, नारी रूप और विचित्र आचार-व्यवहार की बातें सुनी थीं। सुना था, उस देश के उदार और भोले निवासी भटक कर अपने गाँव में आ गए अतिथि के सत्कार का अवसर पाने के लिये आपस में झगड़ बैठते हैं। वहाँ चम्पा के रंग की गृह-वधुएँ अतिथि की थकावट मिटाने के लिये उसके शरीर को अपने हाथों से दबाती हैं ! अपने सामर्थ्य भर अतिथि के लिए कोई सुविधा दुर्लभ नहीं रहने देतीं। वह देश देखने के लिए रामशरण का मन विकल उठता था। उस बरस जब अक्तूबर में सरकारी दफ्तर शिमला से देहली जा रहा था, रामशरण ने तीन मास की छुट्टी ले ली। उसका विचार था, दूर-दूर तक पहाड़ों में घूमेगा और जाड़ों में शिमले को बरफ की रजाई ओढ़ कर सोते हुए देखेगा।

रामशरण एक झोले में मामूली सा सामान, एक कम्बल और बल्लम लगी लाठी लेकर शिमला से चल पड़ा। वह ‘मशोब्रा’, ‘ठियोग’, ‘नार-कण्डा’, और ‘बागी’ होता हुआ चलता जा रहा था कि ऐसी जगह पहुँचे जो आधुनिक सभ्यता के प्रपंचपूर्ण प्रभाव से मुक्त और स्वाभाविक रूप से सरल हो। वह ‘रामपुर बुशैर’ से आगे निकल गया।

रामशरण थक जाने के कारण सड़क पर गिरते एक छोटे से पहाड़ी झरने के समीप बैठ गया था। झोले में से निकाल उसने कुछ सूखा मेवा खाया और पानी पीकर विश्राम करने लगा। उसकी पीठ के पीछे पहाड़ी चट्टान थी। ऊँचे वृक्षों से छनकर आती चितली धूप सुखद जान पड़ रही थी। सम्मुख घाटी से उतरते ‘तोष’  के जंगलों पर तैरती उसकी दृष्टि नीचे तलहटी में छिटके गाँवों की ओर लगी हुई थी। ‘बीथू’ की फसल पक कर पत्ते पीले पड़ गये थे और अनाज की सुर्ख बालें धूप में दहक रही थीं। कुछ दिन पहले कटी मक्का के भुट्टे मकानों की ढलवा छतों पर सुखाने के लिए फैला दिये गये थे। इससे छतें केसरिया चादरों से ढकी जान पड़ रही थीं। रामशरण की आँखों के सामने तो यह था परन्तु उसकी कल्पना कुछ और ही देख रही थी।

सड़क के पिछले मोड़ पर, नीचे के खेत से मनुष्य के गले का शब्द सुन कर उसने घूमकर देखा था तो दिखाई दिया कि दो पहाड़ने उसकी ओर निगाहें किये आपस में हँस रही थीं। उसने सोचा—कितनी सरलता है इन लोगों में...अच्छा होता यदि वह दो बातें उनसे कर लेता। अब की चूक गया, फिर ऐसा अवसर आने पर सही..।
झरने के समीप ही एक पगडण्डी पहाड़ी से उतर सड़क पार कर रही थी। कदमों की आहट मिली। पगडण्डी से चल कर रंगीन टोपी पहने एक बूढ़ा उसके समीप आ गया। बूढ़ा हाथ की लाठी एक ओर रख कर जमीन पर बैठ गया। उसने मुट्ठी होंठों पर रखकर ‘बाबू’ से एक सिगरेट माँग ली। रामशरण सिगरेट-तम्बाकू के प्रति पहाड़ियों की उत्सुकता से परिचित था। चलते समय कई डिबिया सिगरेट उसने झोले में रख ली थीं। एक सिगरेट निकाल कर उसने बूढ़े को भेंट कर दी और समाने तलहटी में तथा आस-पास के गाँवों के नाम पूँछने लगा।

रामशरण ने पहाड़ी पर चढ़ती पगडण्डी की ओर संकेत करके पूछा—‘‘यह रास्ता कहाँ जाता है ?’’
‘‘लँगोड़ी को।’’ बूढ़े ने तम्बाकू के धुएँ से खाँसते हुए उत्तर दिया, ‘‘आगे तिल्ला है फिर शोपा। ऐसे ही गाँव-गाँव चीनी तक चला जाता है। उसके आगे छोटा तिब्बत है। हम लोग इन्हीं रास्तों से आते-जाते हैं। सड़क तो बहुत घूमकर जाती है। इन पगडण्डियों से दो दिन की मंजिल एक दिन में हो जाती है।’’
‘‘रास्ते में घने जंगल होंगे।’’ रामशरण ने पूछा, ‘‘आदमी राह भूल जाय तो ?’’
‘‘जंगल भी है, ग्राम भी है। सब बसा हुआ इलाका है।’’
‘‘जंगल में क्या जानवर मिलता है ?’’
‘‘घुरड़ है, रीछ है, कभी बाघ भी होता है, चीता बहुत है।’’
‘‘जानवर आदमी को नहीं मारता ?’’
‘‘आदमी को कम छेड़ता है, जानवर पर पड़ता है।’’

बूढ़ा सिगरेट समाप्त कर राम-राम कह अपनी राह चल दिया और रामशरण पगडण्डी पर चढ़ने लगा। मन में सोचता जा रहा था—अपने को राह भूलने का भय क्या ? जहाँ पर पहुँच गये, वहीं अपने को जाना है; कोई नयी जगह हो। कुछ दूर चढ़ कर वह उस टीले की चोटी पर पहुँच गया। अनेक टीलों की पीठों पर बैठे उस टीले की चोटी पर खड़े होकर, वह अपने आपको साधारण पृथ्वी से बहुत ऊँचे अनुभव कर रहा था। उसने पीठ पीछे घूम कर देखा—सूर्य पश्चिम की ओर पहाड़ों की ऊँची दीवार की चोटी छू रहा था। संध्या आ जाने से उसे भय नहीं लगा। सामने तोष और खर्शू के पेड़ों से छाया एक ओर छोटा-सा टीला था और उसके पार ऊँचे पहाड़ की ढलावन पर छोटा सा गाँव सूर्य की पीली पड़ती किरणों में चमक रहा था। रामशरण रात में उसी ग्राम में एक अनजान अतिथि के रूप में बिताना चाहता था। कितनी ही कल्पनाओं से उसका मस्तिष्क भरा हुआ था।

रामशरण जंगल से छाये टीले पर चढ़ रहा था तो सूर्य की किरणें लोप हो गयीं और चढ़ाई अधिक आड़ी होने लगी। उसके सीने की धड़कन के प्रत्येक श्वास के साथ अँधेरा गहरा होता जा रहा था। झाड़ियों और वृक्षों के रंग-बिरंगे पत्ते और आकार सब काजल के खिलौने बनते जा रहे थे। घने पेड़ों के नीचे घनी घास में पगडण्डी कभी की छिप जा चुकी थी। प्रकाश की आशा में आँखें ऊपर की ओर उठाने से सिर पर केवल काले पत्तों का घना छाजन दिखाई देता था। रामशरण केवल दिशा के अनुमान से चल रहा था। अनुमान से टीले की चोटी बहुत दूर पीछे छूट चुकी थी।

रामशरण सामर्थ्य भर तेजी से चलने लगा। उसके शरीर के रोम किसी भी आहट से बार-बार सिहर उठते थे—यदि इस समय कोई भालू या चीता आ जाय ! उसने साहस बनाये रखने के लिये निश्चय किया—जानवर के मुँह खोलकर झपटने पर वह जानवर के मुँह में बल्लम डाल कर धँसा देगा। खर्शू के कँटीले पत्ते बार-बार उसके गालों और हाथों को खँरोच देते थे। चढ़ाई पर उसके आगे बढ़ने वाले कदम के लिये जमीन मौजूद रहती थी परन्तु उतराई शुरू हो जाने पर आगे बढ़ना और भी कठिन हो गया। वह बार-बार गिरते-गिरते बचता। गिर पड़ता तो जाने कहाँ पहुँच जाता ? अगला कदम बालिस्त भर नीचे पड़ेगा या गज भर या पचास हाथ, कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उसके पाँव लड़खड़ाने लगे और चोटी से एड़ी तक पसीना बहने लगा।




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