किसी समय में - मत्स्येन्द्र शुक्ल Kisi Samaya Main - Hindi book by - Matsyendra Shukla
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किसी समय में

मत्स्येन्द्र शुक्ल

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :96
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2365
आईएसबीएन :00000

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इन कविताओं में सामाजिक जीवन-दर्शन तथा समय के कटु अनुभवों की अभिव्यक्ति की गई है...

Kisi Samaya

सत्येन्द्र शुक्ल घटनाओं के कवि न होकर मूल्यों के प्रति सतत् आस्थावान बने रहने वाले कवि हैं। इनकी कविताओं में राजनीति उछल-कूद का चित्रण कम है बल्कि सामाजिक जीवन-दर्शन तथा समय के कटु अनुभवों की अभिव्यक्ति अधिक है। कवि के सामाजिक विषयक अनुभव संघर्ष, आस्था जिजीविषा, प्रेम, न्याय तथा स्वतंत्रा जैसे मूल्यों को प्रभावी ढंग से उजागर करते हैं। यह निर्विवाद सत्य है मूल्यों की कविता सतह के नीचे छिपी सच्चाइयों को पहचानने की एक अन्तर्दृष्टि प्रदान करती है। यही कारण है जो पाठकों से धैर्य की माँग करता है और विवेक को क्रमशः प्रभावित कर उनके मन में उचित स्थान बना लेता है। मत्स्येन्द्र की सच्चाई से विधिवत परिचित हैं। वह कविता को दिशाहीन संघर्ष से उबार कर एक नयी मंजिल की ओर ले जाने में सफल हुए हैं। कविता की रक्षा जीवन की रक्षा है। यदि जीवन को सही मार्ग नहीं प्रदान किया जाए तो कविता आगे चलकर जीवन से इस कदर कट जाती है कि फिर वापस लाना रचनाकार के लिए बहुत कठिन हो जाता है। कवि त्रिलोचन की भाँति मत्स्येन्द्र की कविता व्यवहार में जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करती है। इस संदर्भ में यह भी स्मरणीय है कि इनकी कविता में भाषा का अर्थ भाषा ही नहीं, एक सार्थक समझ भी साथ-साथ विकसित हुई है जो आदमी को आदमी से जोड़ती है और वैचारिक जड़ता को समूल नष्ट करती है।

मत्स्येन्द्र जीवन से जुड़े संदर्भों के बीच प्रकृति का अनन्त रूप सुरक्षित बनाए हुए हैं। प्रकृति के मानवतावादी चित्रों में जन-जीवन की चेतना अभिव्यक्ति के उत्कर्ष को पार कर गयी प्रतीत होती है। जब कभी समस्याएँ मानव मन को घेर लेती हैं और घिरा हुआ आदमी कोई निराकरण सामने न पाकर वापिस लौटता है, प्रकृति के आँचल में तब नीरस हो गया जीवन भी सराबोर हो जाता है। आकुल मन इस प्रकार खिल उठता है जैसे वसंत में पेड़ की डालियों पर नयी-नयी कोंपले।

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश



नदी से आगे एक और नदी


वह समय तो वसंत और पतझड़
बदलते मौसम के उत्सवों को कंधे से टिकाये
कई दिन पूर्व आँखों के लगभग सामने से
मद्धिम आहट बुदबुदे स्वर थोड़ा आक्रोश छोड़
खलिहान में छिपी चिड़ियों को हड़ाता

हाझ झाड़ विह्वल फकीर-सा चुपचाप निकल गया
सम्भव है लौट कर आ जाय संवत्सर बाद
भाग्य-लिपि के अनेक रिश्ते जुड़े हैं वक्त के साथ

समय अपने संग तमाम वस्तुएँ दृश्य
सयानी स्मृतियाँ
बच्चों के निमित्त चमत्कार
आंदोलनों परम्पराओं के आधार-चित्र
उत्सुक यात्री-सा लेकर आता है निःसंकोच
गाँव-नगर खेत खलिहान
ठाँव-कुठाँव
जिसके हिस्से में जो बनता बाँट कर देखता—
दिशाओं में टँके आदिम बोध के बिम्ब
यही हैं वे अ-मृत आत्माएँ
जो कल्पना-वीथियों में बुनती रहती निरंतर
दिव्य आकार रत्न-ज्योति प्रखर तेज
हवा सदैव बुहारने को तत्पर पृथ्वी का नग्न वक्ष
जो नहीं उसके सम्मुख कल के लिए प्रश्न-चिह्न

ईश्वर का सम्बोध जब नहीं था तब
आकाश में बनते-मिटते
बादलों के चित्र ही पर्याप्त थे कुछ सोचने
नदी से आगे एक और नदी से बचने के लिए
फूल-पत्तियों झील ताल हिंस्र पशुओं के द्वन्द्व
अज्ञात शक्तियों से टकरा कर खुद पर चकित होना—
धार में नाव की पतवार गुफा में तिनके-सा
कहीं दिखा होगा तब वह
जो है ईश्वर

क्षितिज के रोशनी डोरे उठा आयेगा समय
समय के साथ उभरेंगे कुछ नये संदर्भ
खुलेंगे भविष्य के गर्भ में छिपे अनगिनत अर्थ
नीरव चाँदनी रात में टूटकर झरते जैसे स्वप्नों के छंद

अतीत ने केवल यही दिया


पुराने बोध-सम्बोध चिंतन के आदर्श
काई-तल में विलुप्त यदि सत्वहीन लुगदे बन चुके हैं
इच्छित नहीं दिखता कुछ भी—
प्रकाशहीन परिपथ
अतीत की जड़वत परम्पराओं में
त्याग दो अनगढ़ रुपाकार बीमार यश-गाथाएँ
समय समाज व्यक्ति और सृष्टि के पक्ष में
अनुकूलता का सृजन करो
जो कालिमा उसके विरुद्ध अभियान पर चलो
रास्ते हम बनाते निर्भर नहीं पूर्व पर

अतीत ने केवल यही दिया चुटकी भर राख का प्रसाद
समझ सकें गति-नियति का विनियोजित अर्थ
जो ब्राह्मांड वही संवेदनशून्य
बधिर मौन
प्रार्थना के स्वर मिले जो खण्डित विद्रूप
वर्तमान की नाभि में स्थित उन्हें स्वर दे रहे हम—
साक्षी है पर्वत समुद्र आकाश
अरण्य बूढ़े वृक्ष
खाँसती नदियाँ धुंध भरी घाटियों में पड़ी हैं अचेत
विकलांग औरत के अन्तिम मटमैले स्वप्न
काँटों में फँसे पतिंगे सूर्य की अनुपस्थिति में टूट रहे ऐश्वर्य का कोई मतलब नहीं
जो ब्राह्मंड के त्रिकोण पर सुलग रही हो बीती रात की आग

रात्रि में तारे अदृश्य हुए जो शान्त
भोर में निर्मल उजास लिए दिखा चंदन पुता आकाश
धरती के अंकुरों ने निहार परिवर्तन का व्यास
स्मृति में कल्पान्तरों के प्रतीक
प्रेरक आदि चेतन-शक्ति
ढो रहे प्राणी उत्सहीन उद्गार
निर्माण के प्रतिदर्श निर्मित कर रहा वह
जो अदृश्य अज्ञात अबोझ

कितने दिन तक ढोयें बीते कल का विषाद
आगामी कल भी आ रहा बाज-पंख पर सवार
काँख में धरे असह्य दुख-भार
नोच कर रख देगा जो जीवन में शेष अभी रत्ती भर तेज
चलें क्या उन्हीं शिलाओं की ओर जहाँ अन्तिम टंकार !

वह एक यात्री था


ऊँचे टीलों तक मोहवश आना और आदिम
चक्राकार प्रस्तर-खण्ड का स्पर्श कर
मनौतियाँ बाँटते किसी अन्य दिवस के नाम लौट जाना
सघन पीपल-वृक्षों के बीच जहाँ से दिखता
अग्नि-मुख व्योम
थाप के लय में बजते सजीले कटे-फटे बादल
सूरज टहल रहा दुब्बरपन साधे
धूप छाँव के आयत में

सूर्य-परिधि में उग आये हैं चिकने डिब्बे
सांध्य-धुंध में अड़ियल-सा दिखता स्पष्ट
माघ का अतिरिक्त दर्प
यही दस-पाँच दिन और सुयश के
फिर तो सूर्य समेट देगा सम्पूर्ण दूरियाँ—
औघड़ कंथे से नहीं
बिखरे केश से छितराता है चिनगियाँ
नेत्रों में दहकता अंगार
फाल्गुन के साथ टूट गया शील का हौसला
अलिप्त छिटकती रहीं किरनें सूर्य-वक्ष पर
टीलों के समीप छॅछड़ती हैं अनचाही लताएँ
पीत-पुष्पों के उजास में खिलता मौसम
डगर चौबंद-
दिख रहे गुच्छलसित तीसी जलेबिन के बैगनी फूल

फाल्गुनी हवा के मंद प्रवाह में
भूखी गिलहरियाँ फाँद रहीं डाल के शीर्ष तक
जहाँ चमकते बेर के कत्थई कचौंध फल
किट-किट तानपूरा साध खेलती हैं तृप्त गिलहरियाँ

कृषक-भेष में वह एक अलौकिक यात्री था
जिसने भोर में पूछा नदी की तरंग
सूर्य की सजीली किरनों
गेहूँ की सुनहली बालों
सुगंधित बौर से
कल जब अंधेरे में विलीन हो रहा था सूर्य
कहाँ थे वे जो पुनीत भोर में गा रहे मंगल-पद

जन-विल्पव का इतिहास


बीहड़ों में बसे गाँवों नाराज झोंपड़ों से दूर
तथाकथित बुद्धिजीवी राजनेता सिद्धजन
तलाश रहे अगले समय के लिए सम्भावनाएँ
अघोरी साधना में जरूरी नहीं
एकान्त में नन्हें दीपों का रात भर सुलगना

कठिन है प्रत्येक नया दिन
अतीत की सहमति पर वर्तमान ने कहा—
जमीन और वस्तुओं का बँटवारा आसान नहीं।
चुक जाती स्याही हस्ताक्षर का समय आने पर

मिर्च की चटनी अरहर की रोटी अधजली
युगों तक खाया उपेक्षित समुदाय ने
चोर दरवाजे की शान्ति को विधिवत समझ रहा समाज
सिटकिनी बंद होने पर नंगा नाच करेगा बुद्धिमान—
घूम फिर यही करवट को बेच रहा सोने के भाव

छद्म वेश भाव और शब्दों से डरने लगे हैं ये
जो भीड़-बीच सुना रहे प्रगति का संदेश
संसद के दरवाजे पर भूखों का रेला
बेचैन नेत्रों से रिसता जल देख
रिश्वतखोर पीटता है इमारत का पिछला दरवाजा
कि आग का लहकना धुएँ का बवंडर बन हवा में तैरना
अब कोई रोक नहीं सकता भू-खण्ड में

मान्यताएँ रूढ़ियाँ घुड़कियाँ बंदूक की आवाजें
तर्क भी रोक नहीं पायेंगे उन्हें
जाल काट उड़ जायेंगे मुक्त पंक्षी की तरह
अखाड़े के नगाड़े चुप दिखेंगे जंगल के दौर में

सामाजिक न्याय के उद्घोष के ऊबे लोग
हो रहे परेशान आश्वासनों की मार से
समय को घटनाओं में झाँकना सम्भव अखबार के लिए
जो इसी के बल ले रहा साँस मुलुक में
हुक्के पर धधकती चिलम का गुड़हर स्वाद

इतिहास-नद में अदृश्य अस्ति-पंजर की तरह
नहीं रह सकते चिरकाल तक निष्क्रिय ये गाँव
परिवर्तन का यथार्थ कहाँ है मौन चेहरों के पास
षड़यंत्र में सिमटेंगी अभी कुछ और रातें
दीमक चाट रहे खिड़कियाँ किवाड़ रोशनदान
गर्वीले पहाड़ सीना थाम झुकेंगे एक दिवस
जन-विप्लव का इतिहास रचा जाता वर्षों में।

वह एक टाँग का आदमी


वे समारोह में महज इसलिए आमंत्रित थे
कि देखें जमीन पर भूरी चीटियाँ वृत्त बना
किस शैली में सूँघती हैं
धूल की निर्गन्ध देह
कैसे सूक्ष्म छिद्रों से तापमान का अनुमान ले
क्षण में बदल देती हैं डेरे का स्थान
कैसे खरी दुपहरी में
नेत्रों के समीप थिरकती है धूल
गाँठ भर धूस में हाँफता उपरहार
पैर की बेवाई में पाव पर बबूल के पत्ते छोप
कैसे सूर्य के तप्त आलोक में भाग्य पर बिहँसता
पीतवर्ण बंजर

प्रकृति के विरुद्ध गाँव नहीं उठाता बवेला
तूफान देख कन्नी काट छिप लेता है मड़ार में
गाथाएँ सुन
सारी विपत्ती चढ़ा देता महामाई की धार में
आयोजक नहीं कहेंगे, हवा में उड़ रहीं तितलियाँ
याकि संसद में प्रकृति की अगम सत्ता पर
पेश किये जायँ सवाल पुरजोर
या लूनी बकुलाही के किनारे खड़े किये जायँ तट बंध
गुप्त संकेतों पर नहीं चाहते वे जूझना
ग्राम-जन देखना चाहते आँखों में गर्माहट का रंग

हाँ यह जरूर पूछेंगे—
कल जो औरत बीमार बच्चे को गोद से चिपकाये
जा रही थी अस्पताल की धमनियाँ परखने
गुलरहा के समीप लुट गयी दिन दहाड़े
गुहार में शामिल जो छिप गये बंदूक की आवाज सुन
क्या हुआ उस औरत का ?

यह भी कहेंगे कि वह एक टाँग का आदमी जो पेट बजाता
तिराहे के पार मौत को खुलेआम दे रहा निमंत्रण
किसी क्षण छू सकता है बिजली के तार
आकस्मिक मृत्यु से कैसे बचा जा जाय देश में—
क्या भूख मिटाने का कोई उपाय है आप के पास

काली आँधी के वेग में


मछलियों के झमेरे में खेलने दो
नृत्य के रौ में तैरने गुनगुनाने दो उन्हें
मुक्त करो श्वेत वर्ण स्नेहिल मछलियाँ
जलपरियों की प्रार्थना पर
लहरें कब से ढो रहीं आस्थापूर्ण ध्वनियाँ
शब्द कहीं गहरे उतर उछल रहे
पवित्र मणि की तरह
तनाव की असाधारण अवस्था में नहीं पढ़ा जाता
टुकड़ों में विभक्त आत्मा का संदेश

जाल में समेट किधर ले जा रहे जल-वैभव
प्रजापति वरुण का आनन्द, मेघ-स्वप्न
छोडो इन्हें सहज मन निर्मिल सरोवर
नदी की धार में
धूम्र जाल-सा दिख रहा वेदना का अदृश्य प्रपात

अन्तिम घाट पर चमक रहा रत्नों का भण्डार
कनक हार पहन नाच रहीं ईंगुरी परियाँ
देख रहीं वृत्ताकार आकाश की लोहित करधनी
स्थिर जल के कठोर कोलाहल में
अकस्मात् लुट गयीं सगुणोपासक मीन-पुत्रियाँ

काली आँधी के वेग में मथ रहा हृदय सरोवर
बच्चों संग दौड़ धूप काई चाट संतोष कर रही मछलियाँ
क्या पता पानी में फैल रहा नियंत्रित जाल—
जल से प्रलय
प्रलय से मृत्यु। मृत्यु से पू्र्वजन्म की गाथा
मीन-पुत्रियाँ समझ रहीं
अग्नि जल और वायु का संतुलनवाद

तप्त रेती में रवि-रश्मि का प्रखर तेज
फट रही मुलायम देह चर्म-विन्यास
जल कन्याएँ कहाँ बर्दाश्त कर पातीं तार का संताप
मछेरे !
सौंप दो इन्हें अगम अनाम जल-राशि को
किसी दिन सागर तक स्वयं पहुँच लेंगी मछलियाँ
समय से निपटने के और भी उपाय हैं दुनिया में


लोगों की राय

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