रमा बाई - ज्योत्स्ना देवधर Rama Bai - Hindi book by - Jyotsna Devdhar
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रमा बाई

ज्योत्स्ना देवधर

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1996
पृष्ठ :236
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2366
आईएसबीएन :00000

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यह उपन्यास रमाबाई के संघर्षमय जीवन की प्रेरणादाई गाथा है...

Rama bai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

महाराष्ट्र में उन्नीसवीं शती में सर्वसाधारण आम स्त्री अबला मात्र थी। घर की चाहरदीवारों के बीच उस पर नाना अत्याचार-अन्याय किये जाते थे ! विधवा का केशव-पन होता था और उसकी स्थिति अनेक घरों में पशु-तुल्य थी। स्त्री को पढ़ने-लिखने का अधिकार नहीं था। वह सिर्फ गुलाम थी-दासी थी ! कोल्हू का बैल मात्र थी।

बहुतांश मराठी स्त्री की यह दुर्दशा देखकर महात्मा ज्योतिबा फुले, महर्षि कर्वे, रानाडे, गोखले आदि महर्षियों ने स्त्री के उत्थान का महत् कार्य किया है। पंडिता रमाबाई इस श्रेय-मात्र में एक तेजस्वी सितारा रही हैं। इस तेजस्विनी महिला ने विधवा स्त्री के सफेद ललाट पर साक्षरता का चाँद उगाया। परित्यक्ता, विधवा, दलित, कुचली हुई स्त्री को जीने की राह दिखाई। स्वावलम्बन्, आत्म-प्रतिष्ठा, आत्म-सम्मान की सीख पीड़ित स्त्रियों को दी। कूड़े-कचरे में फेंके बच्चों को माँ का प्यार दिया। उस जमाने में यह काम सहज सुलभ नहीं था, समाज के कठोर प्रहार झेलने पड़े। स्त्री-कल्याण, स्त्री-उद्धार इस तेजस्विनी रमा का व्रत जीवन-कार्य था-श्रद्धा थी। निजी जीवन में मृत्यु ने उनके सब के सब अपने उनसे छीन लिए लेकिन रमाबाई के पैर लड़खड़ाए नहीं। उन्होंने अनेक बालक तथा महिलाओं को मृत्यु-पाश से छु़ड़वा कर उन्हें जीवन दान दिया। अकाल-पीड़ित लोगों को अपरिमित सेवा-सहायता से बचाया। रमाबाई एक विद्वान शास्त्री पंडित की कन्या थी। उन्हें महाभारत के हजारों श्लोक मुखोगत थे। कलकत्ता की विद्वान सभा ने रमाबाई को ‘पंडित सरस्वती’ उपाधि से विभूषित किया।

यह उपन्यास रमाबाई के संघर्षमय जीवन की प्रेरणादायी गाथा है। एक परोपकारी पुण्य शील महिला की कहानी है। उन्नीसवीं सदी के महाराष्ट्र के महिला-उत्थान की, उस समय समाज के जीवन का रोचक तथा चित्रमयी शैली में लिखा यह उपन्यास लेखिका के अनेक वर्षों के शोध तथा अभ्यास का फल है।



भूमिका



‘रमाबाई’ उपन्यास का आस्वाद लेने से पहले मेरे विचार में, उस समय महाराष्ट्र की सामाजिक तथा पारिवारिक परिस्थिति से परिचित होना आवश्यक है।
रमाबाई की जीवन-गाथा उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पहले पचीस साल में समाई हुई है। रमाबाई की कार्यकुशलता उनका कर्तृत्व अथक परिश्रम अपूर्व लगन और तकदीर के बेदर्द आघात देखकर लगता है, अपनी चौंसठ साल की उम्र में इस महान महिला ने पूरा भारतीय स्त्री जीवन मथ कर रख दिया है। आज हम धर्मातीत मानवता के सपने दोहराते हैं और आए दिन उसके नारे लगाते हैं, लेकिन आज से सौ-सवा सौ साल पहले रमाबाई ने अपनी कृतिशीलता से यह सपने सत्य में बदल दिये थे।

भारत के अन्य प्रान्तों की तरह महाराष्ट्र में भी स्त्री जीवन हजारों बंधनों में बद्ध था। वह घर की लक्ष्मी नहीं दासी थी, पति की गुलाम थी। उसे सब अधिकारों से और सुखों से वंचित रखा जाता था। घर और समाज में उसे अत्याचार, अन्याय सहने पड़ते थे। लिखना-पढ़ना उसे मना था। बाल विवाह प्रचलित था। बाल प्रौढ़ विवाह सरेआम होते थे। विधवा स्त्री को केश-वपन की सजा दी जाती थी। नाना त्रासदी से वह जवानी में ही मर जाती थी। यहाँ तक कि पैरों में जूते पहनना भी स्त्री को मना था। धर्म के ठेकेदारों ने उस समय स्त्री जाति पर नाना व्रत उपवास ढोंग ढकोसले रूढ़िग्रस्तता, पारंपरिकता, छुआछूत थोप दिए थे। पापी स्त्री को जंगल में हिंस्र पशुओं के बीच छोड़ा जाता था।

महाराष्ट्र एक दृष्टि से बड़ा भाग्यशाली रहा। उन्नीसवीं शती की ऐसी सामाजिक परिस्थिति में स्त्री शूद्र तथा उपेक्षितों के लिए अपनी वाणी तथा अपनी कलम से आवाज उठाने वाले अभूतपूर्व समाज-सुधारकों की आकाश गंगा अवतरित हुई, जिसके मधुर फल आज महाराष्ट्र की महिला अन्य प्रांतीय महिलाओं से अधिक मात्रा में चख रही हैं। सर्वश्री महादेव गोविंद रानडे, गोपाल हरिदेशमुख, रामकृष्ण गोपाल भांडारकर, जोतिबा फुले, बाबा पदमन जी, गोपाल गणेश आगरकर बालगंगाधर तिलक आदि महानुभावों ने स्त्री-शिक्षा, स्त्री-समता, स्त्री-अधिकार, स्त्री स्वातंत्र्य के लिए अपनी पूरी ताकत से समाज को झकझोर कर रख दिया। स्त्री पर होते हुए अत्यचार, उसके प्रति अन्याय के विरोध में आवाज उठाई।
ऐसे समय में इस रंगभूमि पर रमाबाई का, एक स्त्री का आगमन एक अनोखी बात थी। हजारों श्रृंखलाओं में बद्ध स्त्री-समाज में यह विद्रोहिनी अपनी पूरी ताकत, हिम्मत लगन और प्रखर बुद्धि वैभव से चमक उठी। इंग्लैण्ड, अमेरिका जाकर इस प्रगल्भ, कर्तृत्वपान महिला ने महाराष्ट्रीय स्त्री की वेदना भरी जिंदगी श्रोताओं के सामने रखी। यह तो कोई पुरुष भी नहीं कर सका था।

सन् 1889 में बंबई में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में पहली स्त्री प्रतिनिधि के नाते रमाबाई ने बाल विवाह तथा केश-वपन के विरोध में अपनी बुलंद आवाज उठाई थी।
नियति ने रमाबाई के साथ बड़ा बेदर्द खेल खेला, युवावस्था में ही माता-पिता, बहन-भाई तथा पति यहाँ तक कि अंतिम दिनों में इकलौती बेटी को भी भगवान ने अपने पास बुला लिया। जीवन के इस दुःखद नाट्य ने रमाबाई को थका तो डाला लेकिन टूटने नहीं दिया। उनका पूरा जीवन एक यज्ञ-कर्म बन गया। समाज का कड़ा विरोध, प्रतिकार, बहिष्कार निंदा, उपहास आदि से जूझते हुए रमाबाई ने अपनी पूरी जिंदगी दाँव पर लगा दी। अंध नियति का खुले आँखों सामना किया।

ऐसे संघर्षमय फिर भी समर्पित जीवन ने मेरे मन को झकझोर कर रख दिया। रमाबाई की जीवन गाथा लिखे बिना मेरी कलम को चैन न मिला। सौ साल पहले का समाज जीवन जानने के लिए काफी पढ़ना पड़ा। रमाबाई के मन की तह में उतरने का लगाव चुंबकीय था। यह उपन्यास लिखते हुए रमाबाई का अस्तित्व मैंने अनुभव किया है। उनके शरीर की, उनके हाथ से बुने मोटे वस्त्र की गंध महसूस की है।
मेरे पाठकों के मन में रमाबाई उपन्यास पढ़कर अगर इस आत्मा के प्रति श्रद्धा से हाथ जुड़ जाए तो वही मेरे लिए प्रशस्ति होगी।


1205/1-9, शिवाजी नगर,
पुणे-4110004

ज्योत्स्ना देवधर

1


‘‘रमा ! रमा बेटी ! उठ रही हो ना ?’’ लक्ष्मीबाई अपनी पुत्री को जगा रही थीं।
‘‘उँ ऽ ऽ ....’’ करते हुए रमा एक करवट से दूसरी करवट हो गयी। ओढ़ी हुई गाढ़े की चादर उसने सिर पर खींच ली। पास बैठी हुई अपनी माँ का हाथ उसने दबाकर पकड़ा और फिर से नींद में खो गयी।
‘‘लाडली, उठ री। देख, भोर के चार बजने को हैं। आँखें मलते हुए रमा उठ बैठी। अभी चारों ओर अन्धकार ही छाया हुआ था। पूजाघर में जल रहे समई-दीपक का प्रकाश द्वार की देहली लांघकर चुपके से बाहर खिसक गया था-जैसे माँ की आँख बचाकर कोई नन्हा शिशु धीरे से बाहर चला गया हो। बाहर भोर जम्हाई ले रही थी-पूर्व दिशा में कुछ उजाला-सा उभर आया था-मानो पूर्व दिशा के कपोल पर एक लुभावना गढ़ा अंकित हो आया हो ! हाँ-भोर हो रही थी, प्रतिदिन नित नूतन जन्म धारण करने वाली भोर निर्मल और आह्लादकारी भोर।

लक्ष्मीबाई अपनी गोरी चिट्टी नीली कंजी आँखोंवाली ठिंगने से कद वाली बेटी की ओर एकटक देखती रह गयीं। उसके घने घुँघराले बालों में उँगलियाँ फेरने लगीं। उसके बालों को सहलाते-सहलाते सोचने लगीं-कैसी है यह बच्ची ! पाँवों में सनीचर लेकर जनमी है-कहीं पाँव टिके ही नहीं इसके ! सिर्फ छः मास, की थी, जब इसे टोकरी में रखकर मैं उनके पीछे पगचिह्न नापती हुई गंगामूल के टीले पर बसे आश्रम से नीचे उतरकर तलहटी में बसे मालहेरंज गाँव में चली आयी थी। तब से भाग्य में बस भटकना ही बदा है। नट के समान सारा साज-सामान, बोरिया-बिस्तर कंधे पर उठाये हुए मैं घूमती ही रही। यह भटकन तो संभवतः मेरी जनमघूँटी में ही मिला दी गयी थी। चलते-चलते पाँव अकड़ जाते थे, पिंडलियाँ पथरा जाती थीं, कमर की नस-नस ढीली हो जाती थी। इसी प्रकार झंझा-आँधी तूफान सहते और धूप में तपते भीगते बड़ी हुई यह बच्ची ! ऐसी गुणवत्ती बेटी को कितने लाड़-दुलार से पालना चाहिये था-पर करती क्या ? खुले में रखू तो कौआ उठा कर ले जाय, जमीन पर रखूँ तो चींटी काट ले-ऐसी नजाकत से पालना असंभव था।

हम दोनों की आखिरी सन्तान है यह शाखा के छोर पर उगा अन्तिम फल। गंगामूल की सघन प्रकृति से सजी वन देवी ने मुझे गर्भवती के सारे दोहद पूरे किये थे। एक-एक कर छः सन्तानें हुईं। उनमें से भगवान ने अपना हिस्सा माँग लिया-तीन उसकी थीं उठा ले गया। तीन अपने भाग की थीं, बची रहीं। अवश्य ही पिछले जनम का कोई पुण्य था, जो इसके चरणों की शरण मिली-और शायद बीते जनमों का कोई पाप था, जो घर के आँगन में खेलने बढ़ने से पहले ही तीन सन्तानें भगवान के दुआरे जा खड़ी हुईं।-कितना पीछे छूट चुका है, गंगामूल, परन्तु भुलाये नहीं भूलता। पर्वत के शिखर पर बसी पूरी एक मील की भूमि पर मैं ही तो राजरानी थी। इन्होंने झाड़-झंखाड़ काटकर भूमि साफ-सुथरी बनायी थी। वहाँ अपने लिए तो घर बनाया ही, शिष्यों के लिए कई कमानदार कमरे भी बनाये। कुछ घर भी थे-आते-जाते यात्रियों के लिए तो जैसे एक छोटा-सा गाँव ही बसा लिया था। सौ-सवा सौ गाय बैल थे, सात आठ परिवारों के मिलकर कुल बीस मनुष्य थे। कितना आनंद था। कैसा सुख बरसता था ! मैं ही तो सारे काम काज की कर्ता-धर्ता थी।

 चंपा, गुलाबल, मोगरा, चमेली, जूही, बकुल आदि वृक्षों की फूलों के सुगंध से सारा वातावरण ऐसा महकता रहता था, मानो किसी ने सब ओर इत्र ही छिड़क दिया हो। फलों से लदे आम, कटहल, काजू, केला और सहिजन के वृक्ष सब ओर झूमा करते थे। गोमय से लिपी स्वच्छ निर्मल भूमि-उस पर रंगोली का चौक पूरा जाता था। बाड़े में बछड़े रंभाते थे-दूध घी की तो भरमार थी। आने-जाने वाला बटोही धान, गेहूँ, ज्वार और बाजरे की बालियों के मृदु मधुर सुवास को सूंघकर प्रफुल्लित हो उठता था। पहर दोपहर दिन हो या रात, कोई न कोई पाहुना घर में होता ही था। इनका तो स्वभाव ही दानी था-दोनों हाथ भर-भरकर दान धर्म करते थे। अतिथि देवो भव मंत्र के उपासक थे-सो अतिथि को हमेशा खुद उठकर आसान देते थे, परन्तु सहना पड़ता था मुझे। झाड़ना-बुहारना, लीपना-पोतना, रसोई बनाना, धोना-माँजना पशुशाला का प्रबन्ध करना-कितने ही तो काम थे-ऊपर से रात-रात जागकर विद्याभ्यास करना पड़ता था, सो अलग। इस काम में शिथिलता इनसे सही नहीं जाती थी। क्रोध भड़क उठता था। पत्नी को पढ़ाई लिखाई-सिखाने के कारण ‘इन्हें’ लोगों के विरोध का क्या कुछ कम सामना करना पड़ता था। ये गाँव जाते थे, तो विद्यार्थियों को पढ़ाना भी मुझे ही पड़ता था। कितना बड़ा परिवार था-कैसा फैला हुआ झमेला था सारा।’’
‘‘बाई1.........................’’
‘‘क्या है री ?’’
‘‘बाई मैं पाठशाला जाऊँगी .......’’ रमा ने कहा।
‘‘ना बेटी, पाठशाला का नाम भी मत लेना। दसियों जात के लोग होते हैं वहाँ-व्यर्थ ही छूत-छात हो जायेगी।-भ्रष्ट होना पड़ेगा।

तेरे पिता जी तो तेरी ऐसी बातें सुनेंगे तक नहीं।.....’’
‘‘आखिर क्यों न जाऊँ ? चाहे तो मैं पाठशाला से लौटकर नहा लिया करुँगी-बस। तब तो कोई हर्ज नहीं है ना ?’’
    ‘‘ना ना, रमा। मेरी बात मान। लड़की जात है तू, एक बार कह दिया, तो बात समझ में आ जानी चाहिये। मुझे बचपन से ही उपास नियम करने के व्रत रखने के
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1.    बाई=महाराष्ट्र में माता के लिए अथवा बहन के लिए आदरवाचक अथवा स्नेहावाचक सम्बोधन।
संस्कार उत्तराधिकार के रूप में मिले, परन्तु इनका इन व्रत उपवासों पर थोड़ा भी विश्वास नहीं। अरी ‘ये’1 तो मुझे हरितालिका और वटपूर्णिमा के व्रत भी नहीं रखने देते-सुहागिन को यह दो व्रत तो रखने ही चाहिए ना ? अपने घर के द्वार के सामने हीवट का कितना बड़ा वृक्ष है, पर तूने कभी देखा है मुझे उसकी पूजा करते ? इन्हें परंपरा में से क्या भा जाय और नये में कौन दोष निकाल बैठें-यह तो बस वह परमेश्वर ही जाने।’’

 

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