देवकी का आठवाँ बेटा - योगेन्द्र प्रताप सिंह Devki Ka Aathvan Beta - Hindi book by - yogendra pratap singh
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देवकी का आठवाँ बेटा

योगेन्द्र प्रताप सिंह

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :104
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2386
आईएसबीएन :00000

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इस उपन्यास में श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया गया है....

Devki Ka Aathava Beta Yogendr Pratap Singh

श्रीकृष्ण की कथा अब तक प्रायः नन्द तथा यशोदा के पक्ष से देखी जाती रही है। संस्कृत तथा हिन्दी साहित्य ने यशोदा के पक्ष से इस कथा को इतनी बार दुहराया है कि कृष्ण की मूल जननी देवकी तथा वसुदेव दोनों साहित्य एवं इतिहास के हाशिए पर पहुँच गये हैं। इस उपन्यास में श्रीकृष्ण कथा को देवकी-वसुदेव के पक्ष से देखा गया है और यहाँ पूरी चेष्ठा की गई है कि उन्हें हाशिए से उठाकर भारतीय साहित्य तथा इतिहास के मुख्य पृष्ठ पर स्थापित किया जाय। देवकी की कथा अगाध दुःख से भरी करुणा के उन्मेष की कथा है और कारागार के प्राचीरों से घिरी असह्य पीड़ा भोगने वाली देवकी की जिजीविषा ही श्रीकृष्ण जैसे महान भागवत व्यक्तित्व के निर्मित करने का मुख्य कारण और भारतीय संस्कृति को तेजोमय व्यक्तित्व-श्रीकृष्ण-प्रदान करने वाली देवकी व्यथा को उभारना ही इस उपन्यास का मन्तव्य है।

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


पूर्वकथन


देवकी का आठवाँ बेटा उपन्यास श्रीकृष्ण की पौराणिक तथा ईषद् ऐतिहासिक कथा की प्रतिच्छाया है। भारतीय संस्कृति में इतिहास का मन्तव्य पुराणों में छिपा है और ऐसा छिपा है कि खोजने से केवल उसका नैतिक धरातल ही मिल पाता है। मानवीय चरित्र पुरागाथात्मक आवरण है, लेकिन यह आवरण कपोल कल्पना मात्र नहीं है। पौराणिक कथाओं के मन्तव्य अनेक मिथकीय एवं निजंधरी आख्यानों से ढँके हैं और उनको मात्र कल्पना का विषय मानना हमारी समझ की विसंगति है। इन पुरागाथाओं की काल्पनिक रूढ़ियाँ कथात्मक अभिप्राय, मिथकीय, सन्दर्भ तथा निजंधरी कथाओं में जीवन के स्थायी तथा शाश्वत् मूल्य छिपे हैं। ये मूल्य देश, काल के परे हैं और उनको प्राय: कोरी कल्पना मात्र कहकर उपहास का विषय बनाते हैं। वस्तुत: इन पुराकथाओं के मिथकीय सन्दर्भों रूढ़ियों एवं अभिप्रायों आदि को पुन: समझने की जरूरत है। आधुनिक वैज्ञानिक चिन्तन के विकास काल में भी कुछ ऐसे सनातन प्रश्न है, जिनका उत्तर न विज्ञान के पास है और न नव्य दर्शन के पास। इसी सत्य का एक पक्ष नियति का नियंत्रण विहीन होना है। नियति पर किसी का और कभी भी नियंत्रण नहीं रहा है, और न भविष्य में होने की सम्भावना है। नियति का नियंत्रण विहीन होना है। नियति पर किसी का और कभी भी नियंत्रण नहीं रहा है, और न भविष्य में होने की सम्भावना है। नियति अज्ञेय है। अगले क्षण क्या घटित होगा, वह घटित किस दिशा की ओर हमारे जीवन की धारा को मोड़ देगा-कौन जानता है। श्रीकृष्ण की इस कथा में नियति के इस प्रश्न को बल देकर उठाया गया है। इसी प्रकार का प्रश्न आज दु:ख का है। दु:ख एक दर्शन है और इससे मुक्ति की छटपटाहट में भारतीय दर्शन के विविध धरातलों का जन्म हुआ है। योग, पूर्व मीमांसा, सांख्य, उत्तर-मीमांसा, बौद्ध, जैन आदि सभी-के-सभी चिन्तन दु:ख की छटपटाहट में जन्मे हैं और अन्त में, मुक्ति की अवधारणा की स्थापना में उनका समापन हुआ है। दु:ख देता है, दु:ख माँजता है, दु:ख दृष्टि निर्मल करता है-दु:ख विवेक को साधता है-सही सोचने सही करने की दिशा की ओर इंगित करता है दु:ख अर्थवान अवधारणा है और उसका आत्यन्तिक वरण ही आत्म मुक्ति है। दु:ख जीवन की यातनाभरी दृष्टि के बीच सनातन बिन्दुओं की ओर इंगित करता है। कृष्ण माता देवकी की कथा भारतीय दर्शन की अगाध दु:ख भरी करुणा के उन्मेष की कथा है।

इन्हीं दो शाश्वत् बिन्दुओं के साथ मूल प्रश्न कृष्ण कथा का भी है। यद्यपि एक दृष्टि यह भी है कि कथाओं के माध्यम से श्रीकृष्ण में निहित मनुष्य का उद्घाटन किया जाए, किन्तु मनुष्य का यह पक्ष पौराणिक वृत्त में इतना घुलमिल गया है भगवान श्रीकृष्ण की कथा में मानव कृष्ण को खोजना एक दुष्कर कार्य है। स्वयं महाभारत जो उनके पक्ष को उद्घाटित करने पर बल देता है, वह एक स्थान पर कहता है कि-

न भूत संघ संस्थानो देवस्य परमात्मन:,
यो वेत्ति भौतिकं देहं कृष्णस्य परमात्मन:।

स सर्वस्मात् वहिष्कार्य: श्रौतस्मार्तविधानत:,
‘‘मुखं तस्यावलोक्यापि सचैल: स्नानमाचरेत।।

-महाभारत

परमात्मा का शरीर भूत समुदाय से नहीं बना हुआ है। जो मनुष्य श्रीकृष्ण परमात्मा के शरीर को भौतिक मानता है, उसका समस्त स्मार्त कर्मों से बहिष्कार कर देना चाहिए। यहाँ तक कि उसका मुँह देखने पर भी सचैल (वस्त्रसहित) स्नान करना चाहिए।’’
श्रीकृष्ण में मनुष्य तत्त्व को खोजने के जो प्रयास हुए हैं उनमें भी अतिरंजित तत्त्वों के बिना (जो मानवीय सम्भावनाओं के इतर हैं) काम नहीं चल सका है। इससे बचने का एक दूसरा उपाय है-अतिरंजित मिथकीय चरित्रों के मूल में पुराणकारों ने जो अभिप्राय छिपाये हैं, उनको उद्घाटित करना और सचमुच इन मिथकीय कल्पनाओं में निहितार्थ संकेत की यदि सही-सही ढंग से व्याख्या कर सकें तो उनसे निकलने वाले अर्थों द्वारा उनमें निहित भागवत-मर्म की रक्षा की जा सकती है।

इस प्रकार इस उपन्यास की मूल चिन्ता यही है कि श्रीकृष्ण के पुराण व्यंजित भागवतमर्म की पूरी रक्षा की जाए, क्योंकि उनका दैवत् व्यक्तित्व जिस विशिष्टार्थ का सृजन करता है-यदि क्षरित हो गया तो भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण को फिर से नहीं प्राप्त किया जा सकता। श्रीकृष्ण की प्रस्तुति के पीछे भारतीय चिन्तकों यथा-व्यास, पराशर, शुकदेव आदि की जो मूल चिन्ता रही है, वह अकारण नहीं है-और यह उपन्यास इसीलिए परम्परा के उन सभी ऋषियों का ऋणी है, जिन्होंने इस महनीय तेजोमय श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व को रचा है।
अन्त में इस, उपन्यास की मूल प्रेरणा के लिए लोकभारती के व्यवस्थापक श्री रमेश जी तथा दिनेश जी के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।
गंगा दशहरा, रविवार, 15 जून, 1997
-योगेन्द्र प्रताप सिंह

देवकी का आठवां बेटा


‘‘अवतरित हों, भगवान श्री हरि ! सर्व भुवन व्याप्त ! अवतरित हों; जगन्नियन्ता ! मेरे रक्षक प्रभु-श्रीहरि। आप कहाँ हैं, देखें, मेरे सृजनहार ! मुझे रचकर आश्वस्त करने वाले महाप्रभु श्री नारायण ! अवतरित हों। म्लेच्छ भाराक्रान्त मैं दबी जा रही हूँ। क्रूरकर्मी वेदमार्गों को रौंदते जा रहे हैं, अपनी संस्कृति की धरोहर को जलाते, ध्वस्त करते ये दुर्मद स्वच्छ विचरण कर रहे हैं। नाथ ! अखिलेश्वर ! अवतरित हों, सदाचरण लुप्त हो रहा है, नीति पथ कलुषित है-हे आधार नियन्ता नारायण ! महाप्रभु ! अवतरित हों। महाप्रभु ! आपने मुझे रचकर आश्वस्त किया था पुत्री धारित्री ! मैं तुझे रचकर धारण करता हूँ। हे जगन्नियन्ता ! आपने ही आश्वस्त किया था और कहा था; पुत्री पृथ्वी ! तुम मेरे मंत्रों द्वारा रक्षित होगी। वे मंत्र कहाँ गए अखिलेश्वर ! त्राहि माम्-त्राहि माम्। श्री अखिलेश्वर त्राहि माम्’’ कहती हुई पृथ्वी आर्त्तनाद करती पागल की भांति कभी देवताओं के पास जाती, कभी देवाधिपति इन्द्र के पास। सभी असमर्थ थे। वे सभी पृथ्वी के स्वर में स्वर मिलाकर आर्त्त प्रार्थना करने लगे। सभी को सूझा-वे पितामह के पास गए। पितामह सभी को लिवाकर शिव के पास। सभी जानते थे, बिना सृजन तथा संहार के मिले-अलौकिक का उपजना सम्भव नहीं है। सभी ने मिलकर स्तुति की उस जगन्नियन्ता की, गुहार लगाई। हे निष्पाप ! हे निरालम्ब भावन ! हे महाविभूति संस्थान ! देखें, यह छिन्नाधार निर्बल दम्भियों की सताई हुई आपकी पुत्री धरती आपकी शरण में आई है। इस धारित्री पृथ्वी को स्थापित करने के बाद आपने निर्घोष किया था। पुत्री ! यह तुम्हारा सर्जक पिता ही तुम्हारा अन्तिम रक्षक है और तुम्हारी नित्य रक्षा के निमित्त मैं तुझे धर्मवृषभ प्रदान करता हूँ हे श्रीहरि-उस धर्मवृषभ में आप स्वयं निवास करते हैं। आपने ही कहा था-इसका प्रथम चरण सत्य है। आपने द्वितीय चरण को अपरिग्रह कहा था। आपका तीसरा चरण सदाचरण है और चौथा चरण आर्ष चिन्तन है। देखें ! श्रीहरि ! आज चारों चरण लुप्त हैं। यह जर्जर धर्मवृषभ काँप रहा है, आपके अतिरिक्त कौन-अब इसकी रक्षा करे। श्रीहरि ! अवतरित हों-आर्त्त कातर, विनयभरी-श्रद्धा समर्पित ध्वनि गुंजार से आसमान एक क्षण के लिए ध्वनि संकुलित हो उठा। सभी ने देखा-समूचा- का- समूचा ध्वनि गुंजार आकाश में सिमटकर एक विद्युत रेखा में स्तम्भित हो उठा। एक दिव्य पुंज दिपा,-आलोक बिखरा- साक्षत् बैखरी प्रज्ञा का गुंजार हुआ। सभी निर्भय हों; पृथ्वी मत डरो, पुत्री ! भय विरहित हो, देवगण ! स्वस्थ चित्त सुनें, ब्रह्मा तथा शिव। आप एकभूत हों-दुर्मत्त से न डरो, हिंसक से न डरो, अन्यायी से न डरो-अविवेकी से न डरो और मैं निरन्तर सदमूल्यों के रूप में अवतिरत होता हूँ, होता रहूँगा इनका दलन होगा। पितामह मंगल का आवाहन करें, मैं पुन: अवतरित हूँगा। शिव ! धर्मवृषभ पुन: पुष्ट पुत्री पृथ्वी की मर्यादा की रक्षा करेगा। पुत्री धारित्री ! तू निर्भय रह, देवि ! इस बार अवतरित होकर कुछ अद्भुत करूँगा-देवगण ! पितामह, महाभव !!!

मातृस्वरूपा कृतिकाओं से निवेदन करें कि वह मुझे पृथ्वी लोक में धारण करने के लिए जाएँ वे मेरे मन्तव्य से परिचित हैं। इन मातृकाओं के अतिरिक्त मेरा तेज कौन वहन करेगा ? उनका जन्म मुझे धारण करने के लिए ही हुआ है। पितामह ! आप अवगत हैं-तात ! उनसे जाकर प्रार्थना करें-मैं अवतरित हूँगा, जाकर निवेदित करें। जगन्नियन्ता पृथ्वी पर उतरेंगे, सप्तर्षियों को बताओ-मेरे मन्तव्य को सुनाओ-पुत्री पृथ्वी। तुम्हारा संकट दूर होगा और धीरे-धीरे नील विद्युत विलास की वह लेखा एक दमक के साथ विलीन हो गई-अनन्त-अनन्त ब्रह्मांड के क्रोड में।

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महर्षि ध्रुव के आश्रम के और सुदुर उत्तर सप्तऋषियों से रक्षित मातृ स्वरूपा कृतिकाएँ अचल समाधि से जाग्रत हो गई थीं। उन्हें अंगिरा ऋषि की हुं,हुं, की ध्वनि सुनाई पड़ीं। मातृ कृतिकाएँ सजग हो उठीं ! कौन-सी विपदा आ पड़ी। महर्षि भृगु ने समाचार सुनाया-जगन्नियन्ता ब्रह्मा और देवाधिदेव शिव पधारे हैं। मातृकाएँ आश्रम से बाहर निकलीं गैरिक परिधान लपेटे, मातृस्वरूपिणी जगत रक्षिका मातृकाएँ। ब्रह्मा ने चरण छूकर-आशीर्वाद पाया, देवाधिदेव भगवान शिव ने जगज्जननी पार्वती की इन सहचरियों का अभिवादन किया। सप्त मातृकाएँ शान्त तथा निश्चल थीं। ब्रह्मा ने पुन: कहा- अखिल मातृस्वरूपा प्रकृति धारिणी ! आप शान्त हैं, उत्तर दें। श्री हरि के अनुरूप आज्ञा दें।

अस्तिरूपा मातृका ने कहा-विधाता ! मैं हूं और सर्वत्र हूँ। सूर्य के वाम पक्ष में, चन्द्र के वाम पक्ष में, अहर्निश के वाम पक्ष में। मैं सावित्री स्वरूप सम्पूर्ण सचराचरण के वाम पक्ष में सदा स्थित हूँ। वत्स ! मैं क्या करूँ बताओ।
श्रद्धारूपा मातृका ने कहा, मैं तो सृष्टि का नियंत्रण कर रही हूं और इसलिए मैं सर्वत्र हूँ, श्री हरि नारायण ने मेरे लिए विशेष क्या कहा है ! आज्ञा दें !
कामनारूपा मातृका ने कहा-मैं इस नटखट सृष्टिरूप शिव को बहलाए हुए हूँ, श्रीमन्नारायण ने मेरे लिए क्या कहा !
भावनारूपी मातृका ने पूछा-मुझे श्रीहरि ने क्या कहा। मैं तो सृष्टि को उन्हीं की आज्ञा से अनादि वासनाओं से तिरोहित किए बहकाए रहती हूँ।

सृजा मातृका जो अब तक शान्त बैठी थी, बोली-उस निर्लेप ने क्या कहा-उसको भी बराबर अपने सृजन जाल में बुनने की कोशिश करती हूँ। पूरी सृष्टि को मुझसे जोड़कर अलग हो जाता है, श्रहरि छलिया है, पुत्र ! स्रष्टा बोलो-उस छली ने क्या कहा !
भवा मातृका पार्वती स्वरूप थी। शिव को लक्षित करके बोली-महेश्वर ! उमापति ! पालन तथा संहार के बीच से पुनरकुरित के पुनर्पालन का दायित्व सौंपने वाला वह ‘बीज’ रूप सनातन कहाँ है। क्या आज्ञा है, उसकी और कह कर शिव की ओर लास्यभाव में मुस्कराई।
योगमाया मातृका विमोहित करती हुई, अँगड़ाई लेती हुई शिव में क्षोभ संचेष्टित करती हुई हँसी-हे वर्सिष्ठ ! हे शिव !! मृगमरीचिका से किसे छलूँ भगवान् शिव अन्नपूर्णा रूप उस अविद्यामाया मातृका को दुलारते हुए बोले-भगवती ! समय आ गया है, कल्प बीत रहा है। सब मातृकाएँ मिलकर एक स्वरूप धारण करके अवतरित हों। भगवान विष्णु ने यही प्रार्थना की है ! वे एक बार पुन: माया योनि में अवतरित होकर वामता को उपकृत करेंगे, श्रद्धा को उपकृत करेंगे, कामिता का स्वाद चखेंगे, वासना की गंध में अपने चन्दन चर्चित कलेवर को डुबो देंगे। मातृ देविकाएँ अवतरित हों। वह निर्लिप्त एक बार तुझमें लिप्त होना चाहता है। देवि, वह सृष्टि गर्भित होगा, अंकुरित करेगा, पालन तथा पोषण करेगा और हे योनिमायिन ! तुम्हारी माया के गहन कुहर से वह संसार को ठगेगा और स्वयं ठगा जाएगा।

मातृकाएँ विहसित हो उठीं-श्रीहरि का यह कौन सा रूप होगा महेश्वर ! एक बार तो हम कौसल्या रूप में थी। अदिति को उपकृत करने के लिए चौदह वर्ष की वात्सल्य वेदना तिल-तिल करके बिताई। अब क्या होगा ! कौन-सा अवतरण होगा, महाप्रभु !
ब्रह्मा बोले; शोभने ! तुम्हारे अनन्त रूप रहे हैं। तू सृष्टि की प्रतिबिम्ब धारिणी मूल प्रकृति है, तू बीज स्वरूपा देवमयी है, तू ही विनय सम्पन्न लज्जा है तथा और तू ही बोधगर्भा प्रज्ञा है; तू स्वाहा है, स्वधा है, विद्या है, सुधा है, आकाशस्थिता ज्योति है।
मातृकाएँ हँस पड़ीं। चाटुकार वाक् कुशल ! सृष्टा ! हमें स्पष्ट निर्देश करें। हमारे लिए महाविष्णु की क्या आज्ञा है। ब्रह्मा ने आदि विष्णु का मनतव्य सुनाया। सुनकर मातृकाएँ बोलीं-हमारे मातृत्व क्षरित न हों, आप प्रतिश्रुत हों।
शिव ने उत्तर दिया-एवमस्तु, मातृत्व क्षरित होने पर भी अनन्तकाल तक वह लोक लीला के ब्रह्मानन्द का पर्याय होगा।
मातृकाएँ बोलीं हम पर समर्पित श्रद्धा अक्षय भावरूप हों।

शिव ने आशीर्वाद दिया-तथैव भूयात् समस्रों-सहस्रों वर्षों तक भावरूपिणी भक्ति के साथ सृष्टि के उल्लास के साथ जुड़ी रहोगी।
शिव ने आशीर्वाद दिया—शक्तिरूपिणी भव, तेजरूपिणी भव, कामरूपिणी भव, श्रद्धारूपिणी भव, लीलारूपिणी भव, भक्तिरूपिणी भव, आह्लादरूपिणी भव !
भाव विह्वल सप्त मृतकाओं ने पूछा—माहेश्वर ! कहाँ स्थापित हों।
ब्रह्मा ने उत्तर दिया—जम्बूद्वीप में भारत वर्ष के मध्यदेश में अंधक सम्राट उग्रसेन के भाई देवक की पुत्री देवकी के रूप में। मातृके ! स्वयं देवाधिदेव भगवान क्षीरशायी श्रीहरि तुम्हारे कुक्षि से अवतरित होंगे।
सम्पूर्ण सृष्टि पुलक भरे मातृत्व के कम्पन से सिहर उठी। विधाता ने हाथ उठाकर उस एकीभूत मातृ तेज को प्रेरित करते हुए कहा—‘देवकी भव’।
माहेश्वर मुस्करा उठे—सृष्टि कामना स्वरूपिणी हे सप्तमातृकाओं !
कृष्ण माता भव !
कृष्ण माता देवकी भव !!

(3)


कार्तिक पूर्णिमा की रात में अन्धक यादवों की राजनगरी मथुरा चाँदनी से नहाई हुई थी किरणों का मादक जाल मधु तन्तुओं से बुनकर श्वेत चादर की तरह लहरा रहा था और रात्रि के तृतीय पहर में सोती हुई राजा आहुक के द्वितीय पुत्र की पत्नी चित्रा सत्त्वस्थ आर्द्ध जाग्रत अर्द्ध-स्वप्न की निद्रा में देवक का हाथ पकड़ कर बोली आर्थ ! देखें यह दीप्ति देखें..देखें..देखें—और जैसे वह हठात् किसी अज्ञात प्रेरक शक्ति के द्वारा सहलाई जाती हुई जाग पड़ी। निद्रित देवक जाग पड़े। प्रिये ! क्या कोई स्वप्न देख रही थी, उन्मीलित नयनों से प्रिया चित्रा को देखा—वह श्वेद श्लथ थी। क्या हुआ प्रिये ! बोलो ! बोलो ! चित्रा की सासें थह्म नहीं रही थीं—देवक उसके गालों को सहलाते हुए वस्त्रों में फंसी वेणियों को ठीक करने लगे। चित्रा को चेतना आई। देवक ने फिर पूछा—प्रिये ! कुशल तो है ! सत्त्वस्थ चित्रा देवक की हथेली को अपने हाथ में थाम कर रोमांचित हो, बोली—नाथ ! वह स्वप्न अद्भुत था। मैंने अभी-अभी वह स्वप्न देखा। वह सत्य लगा, स्वप्न नहीं था। देवक ने उत्सुकता भरी नेत्रमुद्रा से इंगित करते हुए कहा—देवि ! भ्रम जिनता ही गहरा होता है, असत्य उतना ही सच लगता है। स्वप्न तो गहन सुषुप्ति है— फिर भी, स्वप्न बताओ ! तब तक चित्रा आशा्वस्त हो चुकी थी। उसने कहा— सरोवर से स्नान करके निकल पड़ी और वस्त्र बदले। तभी एक अरुण तनु कमल लेखा सामने आकर खड़ी हो गई। मैं उसे एकटक देखती रही। तब तक महेश्वर शिव माँ पार्वती के साथ अवतरित हुए। मेरे सिर पर हाथ रख कर बोले—यह अरुण सहस्रदल लेखा देख—पुत्रि ! इसको आलिंगित करो। यह जगत माता—समवेत मातृका हैं। मैं शिव चरणों पर झुकी ही थी कि माँ पार्वती ने उस लेखा को मेरे वात्सल्य से भरे वक्ष पर अंकित कर दिया—ओ आर्य अद्भुत स्नेह, अद्भुत ममत्व, अद्भृत वात्सल्य-मुझसे रहा नहीं जाता, सहा नहीं जाता नाथ ! मुझे सम्हालो और कह कर चित्रा पुनः देवक के अंकाभिमुख हो गई। उग्रसेन के अनुज देवक उसके माथे को सहलाते रहे। थोड़ी देर बाद चित्रा पुनः सत्तवस्थ हुई। देवक के अंकों में पड़ी हुई उस चित्रा ने सहस्रदल लेखा को अपनी वात्सल्य ममता से चिन्हित किया। उसके पुलक से पुलकित थी। दस माह बाद एक बालिका उत्पन्न हुई कमल दल की प्रथम लेखाश्री की भाँति। यह देवक की अन्तिम कन्या देवकी थी। सप्तमातृकाएँ ही जैसे देवकी के रूप में अवतरित हुई हों, वैसे देवकी को लेकर उसकी सात बहने थीं। देवकी उग्रसेन के समस्त पुत्र-पुत्रियों तथा देवक की सन्ततियों में सबसे छोटी थी। अतः सभी के लिए यह प्रिय हुई।

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पराशर के पुत्र महर्षि व्यास का मध्यदेश के इस हृदय प्रदेश में बड़ा आदर था। वह हस्तिनापुर, पंचनद, मथुरा, मधुवन, कुरुक्षेत्र आदि प्रदेशों के एकमात्र ऋषि थे। सत्यवती पुत्र व्यास नितान्त श्याम वर्ण, दीर्घ काय, अजानु बाहु, कुरुक्षेत्र के पार्शववर्ती प्रान्त के एकान्त में रहते थे। वे त्रिकालज्ञ थे और अपनी साधना से, ज्ञान से, तपश्चर्या से निरन्तर भास्वर तथा दीप्त राजाओं में पूज्य थे। वे आज मथुरा आ रहे हैं और मथुरा का जनजीवन अस्त-व्यस्त है। आज की रात शूर यादवों ने मथुरा में बड़ा-ही उपद्रव किया है। मथुरा नगरी मूलतः शूर यादवों की थी, किन्तु वासुदेव के पिता अनु से अन्धक राजा यादव राजा आहुक ने यह नगरी छीनी थी। आहुक पराक्रमी एवं सबल राजा थे। गण व्यवस्था में ही इन्होंने बलात् राजा की उपाधि धारण की और गण व्यवस्था छिन्न-भिन्न कर डाली। अनु शूरवंशी यादव थे। अपने प्रपितामह शूरसेन द्वारा स्थापित राज्य के छिन जाने से ये केवल शूरसेन प्रदेश तक ही सीमित रह गए थे। उनके मन में यह बात सालती रही कि अन्धक यादवों ने उनके प्रबल साम्राज्य को छिन्न-भिन्न करके केवल एक छोटे-से उप प्रान्त में ले आकर सिमटा दिया था। अनु के पराक्रमी दसों पुत्र देवभाग, देवस्रवा, आनय, श्यामक आदि में वृक्क अन्तिम पुत्र बराबर मथुरा पर प्रच्छन आक्रमण करता और यह आक्रमण इतना आकस्मिक होता कि जब तक अन्धक सावधान होते तब तक वृक्क अनेकानेक भवनों को लूटकर, भस्मसात् करके लौट जाता था। शूरवंशियों के इस उपद्रव से त्रस्त अन्धक बराबर परम्परा की इस शत्रुता तथा कलह से परेशान थे और आज भी शूरशेनवंशी वृक्क ने मथुरा पर दस्युवकत् आक्रमण किया था। धर्मात्मा उग्रसेन विचलित थे, किन्तु कंस कसमसा रहा था और ऐसे में आगमन हो रहा था—महर्षि व्यास का। महाराज उग्रसेन को सूचना मिली ऋषि व्यास देवार तक आ चुके हैं। अपने पुत्रों तथा रानियों सहित वे अगवानी में आए—श्यामवर्ण, उन्नत उदीप्त प्रभा वलयित ललाट। तेजोमयि तपः प्रतिभा—सहज ही मन कर्षित कर रही थी। राजा तथा रानियों ने मिल करपाद प्रच्छालन किया। चरणामृत लिया—पुत्रों को, पुत्रियों को भाई देवक को। सभी में चरणामृत प्रसाद वितरित करके अन्तःपुर तक छिड़क कर पवित्र किया गया। अन्तःपुर में सिंहासन से पृथक् एक उच्च आसन पर प्रतिष्ठित होकर महर्षि व्यास से आज्ञा लेकर उग्रसेन सिंहासन पर आसीन हुए। महर्षि व्यास ने उग्रसेन को देखा, आशीष की मुद्रा में देवक को देखा, आत्मीय वात्सल्य की मुद्रा में कंस को देखा, वितृष्ण हुए—कंस कसमसा रहा था, ऋषि बोले, क्यों वत्स कंस ! उद्विग्न क्यों हो। कंस ने उत्तर दिया—ऋषि श्रेष्ठ ! शूरसेन वंशीय मथुरा चाहते हैं, उग्रसेन की मथुरा और युद्ध करते हैं, दस्युओं की भाँति। क्षत्रिय बाहुबल से भूमि का भोग करते हैं, दस्यु कर्म से नहीं। ऋषि ने समाधान किया—पुत्र ! किन्तु जितना उत्पीड़न, अग्निकांड, हत्याएँ हो रही हैं, विद्वेष व बदले की भावना से हो रही हैं और यह बाहुबल कैसा ! तुम उनसे सीधे युद्ध नहीं कर सकते, शैन्य एवं पराक्रम कम नहीं है, किंतु क्या आपस में तुम लोग एक नहीं हो सकते ! एक कैसे हो सकते हैं, महर्षि ! उग्रसेन ने पूछा—उसके लिए उपाय है, आप सब मिलकर इस प्रदेश को निर्विघ्न बनाएँ। मैं स्वयं उपाय रचना करूँगा। इसी बीच उग्रसेन के समस्त पुत्र तथा पुत्रियों ने आकर मुनि की प्रदक्षिणा की। महर्षि ने सभी को एक क्षण के लिए देखा और सबसे अन्त में प्रदक्षिणा के लिए समस्त परिवार की प्रिय सर्वाति अनुजा वत्सला देवकी आई। देवकी ने प्रदक्षिणा की, व्यास के चरण स्पर्श के लिए बढ़ीं। देवकी मुख को महर्षि व्यास देखते रहे। पुत्री, पैर न छू—शान्तं पापं। देवकी स्तम्भित रह गई। ऋषि देखा जा रहे थे देवकी का दीप्त मुख मंडल, जगज्जननी का अरुणाभ ललाट जिस पर सम्पूर्ण मातृकाओं का तेज दीप्त हो रहा था। देवकी ने पुनः ऋषि के चरणों की ओर बढ़ते हुए कहा—महर्षि क्या कोई अपराध हुआ पुत्री से। महर्षि उठ खड़े हुए और देवकी को एकटक देखते रहे। देवमाता गायत्री, अदिति, ऋचा, ज्ञानगर्भा, ऋषि शुश्रुषा—जैसे देवकी को सम्बलित किए हों। ऋषि देख रहे थे वह काममयी इच्छा, सन्तोषमयी तुष्टि, बोधगर्भा प्रज्ञा और धैर्यधारिणी धृति लगी। ऋषि श्रेष्ठ व्यास स्तम्भित हो उठे, कंठ अवरुद्ध हो उठा, नेत्र अश्रुपूरित हो उठे, एकटक देखते रहे। सम्पूर्ण अन्तःपुर स्तब्ध था। उनके हाथ उठते रहे, सब देख रहे थे, अश्रुपूरित श्रद्धांजलि ऋषि किस दशा में थे। सभी जड़वत् देख रहे थे, ऋषि मन-ही-मन बुदबुदाए-

मातृस्पदा सत्यवती देवकी जगज्जननी देवकी
शरणम् देहि शरणम् देहि शरणम् देहि माम् तु।

ऋषि की स्फुट वाणी किसी ने सुनी नहीं। देवकी अन्तःप्रासाद में चली गईं और सभी ऋषि की आत्मीयता एवं श्रद्धा संवलित मोह में डूबे भावमग्न मुद्रा देखते रहे। ऋषि प्रकृतस्थ हुए। उग्रसेन ने ऋषि की अभ्यर्थना की। व्यास ने समझाया-समय आ रहा है उग्रसेन मैं आगत देख रहा हूँ। दोनों कुल एक होकर रहें तथा विकास करें यही मेरा आशीर्वाद है। कंस ने जानना चाहा—यह नित्यशः घटित दस्युकर्म क्या शान्त नहीं होगा ? भगवन् ! व्यास ने उत्तर दिया—तुम अपने को शान्त तथा उद्वेग रहित रखो, बाकी बातें अज्ञात सत्ता पर छोड़ दो, वत्स !

(5)


महर्षि द्वैपायन वेदव्यास की देवकी के सम्बन्ध में हुई इस घटना की चर्चा धीरे-धीरे फैलने लगी। उग्रसेन ने देवकी को बुलाया और बड़े प्यार से अपनी गोद में बैठाकर उसका सिर सूँघा। उन्हें अद्भुत संस्कार गन्ध का अनुभव हुआ। वे परम वात्सल्य से भीग उठे। स्तम्भित देवकी की केशरासि को सहलाते हुए बोले ! पुत्री ! अद्भुत है और पिता बाहुक को बुलाकर कहा—मेरी सभी कन्याओं में यह प्रिय है और मैं ही इसका कन्यादान करूँगा और इसी बीच कंस आ पहुँचा। देवकी को देखकर वह भ्रातृत्व ममता से मोम की भाँति गल उठा। पिता के पास बैठते हुए बोला—भगिनी ! देवकी तुम मेरी सभी बहिनों में प्रिय हो और तुम मुझे इतनी प्रिय हो कि मैं तुम्हें विवाह के बाद अपने हाथों से घोड़ों की रास खींच कर पति के भवन पहुँचाऊँगा। भाई कंस तुम्हारा सारथि होगा। तुम्हारे लिए स्वर्ण जटित अन्तःपुर बनवाऊँगा, स्वर्ण जटित चन्दन काष्ठ की पर्यक और चीनांशुक और तुम्हारे भावी पति के नगर को दीपावली की भाँति सजा दूँगा। मेरी प्रिय भगिनी ! पुष्पहारों से तुम्हारे अंग-अंग को गूँथ कर रति की प्रतिकृति बना दूँगा। मेरी बहिन देवकी ! तू मुझे सबसे प्रिय है। देवकी ! देख तेरा भाई कंस सिर पर बिखरे पुष्प रजों को अपने वक्ष पट से स्वच्छ कर रहा है और यह कह कर प्रिय, वत्सला भगिनी देवकी की उलझी हुई केश राशियों को कंश ने सँवारना शुरु किया। देवकी रोमाँचित थी-अग्रज, पितृतुल्य बड़े भ्राता ! मैं तो आपकी प्रिय बहिन देवकी ही हूँ। बचपन से आज तक तुम्हारी छाया में पड़ी रही, तुम्हारे स्नेह में बढ़ी। यह देवकी तुम्हें छोड़कर पराए घर नहीं जाएगी। उद्धत कंस स्तम्भित होकर बोला—नहीं-वत्सला भगिनी ! तुमसे प्रिय मेरे पास कुछ भी नहीं है, किंतु चाचा देवक जहाँ तुझे अर्पित करेंगे; वह मुझे जैसा ही होगा और तुझे यहाँ जैसा ही रखेगा। दोनों भाई उग्रसेन और देवक भाई-बहिनों के इस अगाध स्नेह की वार्ता से पुलकित परमानन्द में डुबकी लगा रहे थे। देवकी भ्रातत्व प्रेम से शिथिल डग भरती चली जा रही थी, लगता था उसके भाई कंस के स्नेह एवं भातृत्व की आत्मीयता के पुष्पहार से बँधे उसके पैर उठ नहीं पा रहे थे।

(6)


आज कुरुक्षेत्र का पर्व था। यदु का सम्पूर्ण कुल वैर-भाव भूलकर यहाँ एकत्रित था। वृष्णि, अन्धक, भोज, मधु, शूर, सात्वत् आदि सभी यादव कुल कुरुक्षेत्र में एकत्रित थे। हजारों वर्षों पहले की एक पिता ययाति के पुत्र यदु की सन्तानों का यह सम्मिलन प्रतिवर्ष भगवान भूतभावन शिव के पूजन के निमित्त एकत्र होता था। संयोग की बात थी अन्धकों तथा शूरों के पड़ाव पास-पास थे। यह भी संयोग ही था कि अन्धकों के पड़ाव से देवकी तथा शूरों के पड़ाव से वसुदेव एक ही साथ निकले। ब्रह्मा मुहूर्त गड़ना कर रहे थे, सप्तर्षि लग्नपत्र बैठा रहे थे। वसुदेव देवकी देख रहे थे। वसुदेव जिन्हें ‘आनन्द दुंदुभि’ नाम से पुकारा जाता था और जब देवताओं को यह ज्ञात हुआ कि भगवान् श्री हरि के लोकपिता वसुदेव जन्मे हैं तो उन्होंने आकाश से दुदुंभी बजायी और उस आकस्मिक ध्वनि को सुनकर अनु ने ऊपर देखा—देव दुंदुभी बजा रहे थे। पुत्र जन्म के उपलक्ष्य में उन्होंने हर्ष भरे स्वर में कहा—नाम संस्कार मैं अभी किए देता हूँ। मेरे पुत्र का नाम ‘आनन्द दुंदुभि’ होगा। आनन्द दुंदुभि वसुदेव के नेत्र देवकी के नेत्रों से मिले तो मिले ही रह गए। एकटक दोनों देख रहे थे न लज्जा, न भय, न ग्लानि, न अपमान, वसुदेव देवकीमय होते जा रहे थे और देवकी वसुदेवमय। इसी बीच कंस कहीं से निकला, वसुदेव देवकी के प्रथम दर्शन में भावभग्न खड़े-लोक संज्ञा विहरित और देवकी जैसे चातकी कुमारिका ने श्यामल मेघ खण्ड को देख लिया है। नेत्र तृप्त ही नहीं हो रहे थे। कंस इस अद्भुत् लीला को देख कर स्तम्भित था। उसने देवकी को सचेष्ट किया—प्रिय भगिनी ! अपने भाई को देखो, तुम्हारे पास खड़ा है। प्रकृतस्थ देवकी लज्जा से सिमट गई और भाई के कंधे पर अपनी ग्रीवा लगा दी। उसने बताया—यह उदार पुरुष शूरसेन का प्रपौत्र, अनु का प्रथम पुत्र वसुदेव है और वसुदेव विघ्न पड़ने से आहत, व्यग्र, कुम्हलाए, सिर झुकाए गंगा तट की ओर चल पड़े। उनके चित्त की डोर उनके हाथ से छूट चुकी थी। देवकी कौंधती रही, देवकी दिपती रही, देवकी सिमटती रही। दीप्ति आनन अपूर्वा किंचित गंभीर, स्मिति लेखा जैसे ओष्ठों के बीच से फूटने-फूटने को ही देवकी के मुख और गंगा तट पर उतरते, गंगा में प्रवेश करते-डुबकी लगाते-रेत पर, जल पर, जल में, लहरों में शून्य में, दिग्प्रान्तर में जाह्नवी जलाभिषिक्त कनक पुष्पवर्णी लता की भाँति वसुदेव को देवकी दिपती रही,
ततोऽखिल जगत्पद्म बोधायाच्युत भानुगा
देवकी पूर्व सन्ध्यायामाविर्भूतं महात्मना।।

पूर्व सन्ध्या रूपा यह देवकी वासुदेव के चित्त में शुक्ल पक्ष की रात्रि में द्वितीया की चन्द्रलेखा की भाँति फाँस बनकर उलझ गई थी।

(7)


सम्पूर्ण क्षेत्र में यह आम चर्चा का विषय था कि आज महर्षि व्यास भी तीर्थ पर पधार रहे हैं। जन समूह उनके दर्शन के लिए लालायित तथा उतावला था। मृगचर्म लपेटे जटा संकुलित प्रदीप्त मुख महर्षि आ रहे हैं, सम्पूर्ण क्षेत्र का उल्लास दर्शनीय था। सभी ने ऋषि के दर्शन किए, आशीर्वाद लिए किन्तु महर्षि का मन कहीं और था। उन्होंने पड़ावों को देखा और अन्त में वसुदेव के पिता अनु को सूचित किया कि महर्षि व्यास पधारेंगे। राजा अनु जैसे श्रद्धा के चन्दन में डूब गए। अपने पुत्रों को बुलाया। ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते वसुदेव को सर्वप्रथम उनके समक्ष होना पड़ा पूर्व राग विहरित तेजहीन वसुदेव के मुख को देख कर—अनु बोले—क्यों वसु ! तुम निस्तेज कैसे दिख रहे हो। वसुदेव ने उत्तर दिया—तात ! अस्वस्थ हूँ-अनु ने आज्ञा दी, देवर्षि व्यास आज इस कुटी को पवित्र करेंगे, व्यवस्था कर। मैंने सुना है, उन्होंने माता सत्यवती तथा शान्तनु भीष्म को आदेश दिया है कि आप शूर सेन के वंशजों के हितैषी तथा प्रिय हैं और उनके मित्र बने रहें, इसी में आपका कल्याण है। जो प्रकृत्या शीरों के हितैषी हैं, ऐसे दिव्य दृष्टि सम्पन्न महर्षि व्यास का किसी भी दिशा में असम्मान न हो-पुत्र ! जाकर व्यवस्था देखो।

ऋषि आए, जैसे तूफान के बाद हलचल शान्त हो। निस्तब्ध ऋषि के लिए श्रद्धा में डूबे सभी जन राजा अनु के साथ असीम पूज्यभाव से उठ खड़े हुए। भगवान महर्षि द्वैपायन वेदव्यास की वन्दना की, चरणों की धूलि का प्रसाद लिया। सम्पूर्ण पुत्रों तथा रानियों ने उनके चरणों के नीचे लेटकर आशीर्वाद प्राप्त करते हुए गर्व का अनुभव किया। प्रसन्न चित्त महर्षि मृग चर्म पर विराजे और शेष सभी उपहरण पर। अनु अत्यन्त श्रद्धा विगलित भगवान् वेदव्यास की ओर अंजलिबद्ध बोले—स्वामिन ! सेवक की इस पर्ण कुटीर को पवित्र एवं स्पृहा का विषय बनाकर मेरे कुल पर आपने बड़ी कृपा की, हम आपके दास हैं, आपके आश्रित। महर्षि मुस्कराए—इसीलिए तो मैं यहाँ आया—प्रभु की माया है, वही प्रेरित करके ले आई है, नियन्ता की इच्छा के विमुख तो कोई आचरण नहीं है वत्स अनु ! अंजलिबद्ध अनु ने कहा—आज्ञा दें प्रभु ! महर्षि व्यास बोले-सम्पूर्ण मध्यदेश खण्डों में बँट गया है, अन्ततया यह गंगा तथा यमुना के बीच का अन्तर्वर्ती प्रदेश तो यदु का ही था और तुम एक ही गोत्र, एक ही वंश परम्परा के होकर आपस में छिन्न होते जा रहे हो। अनु पुत्र वक्र कुछ कहना चाहता था, किन्तु साहस नहीं कर पा रहा था। ऋषि पुनः बोले, अनु यदि अन्धक एवं शूर एक शौहार्द श्रृंखला में बँध जाएँ तो आकस्मिक हिंसा, उत्पीड़न तथा घटित अनर्थ की घटनाएँ रुक जाए। महर्षि ! सौहार्द श्रृंखला कैसी ? अनु बोले। ऋषि ने आदेश दिया तुम्हारे यदु वंश में अन्तवर्ती परिणय मान्य है। अपने ज्येष्ठ पुत्र वसुदेव को देवक की सर्वाति कनिष्ठ कन्या देवकी से परिणय करके। वक्र से न रहा गया—वह उठ खड़ा हुआ। ऋषि द्वैपाय


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