अरण्या - श्रीनरेश मेहता Aranya - Hindi book by - SriNaresh Mehta
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अरण्या

श्रीनरेश मेहता

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1985
पृष्ठ :70
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2401
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है कविता-संग्रह.....

Aranya a hindi book by Naresh Mehta - अरण्या - नरेश मेहता

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


काव्य का स्थान समस्त वैचारिक सत्ता में न केवल सर्वोपरि है बल्कि अपनी भाववाची सृजनात्मक प्रकृति के कारण परमपद भी कहा जा सकता है अन्य वैचारिक सत्ताएँ भाववाची सृजनात्मक न होने के कारण किसी न किसी कारण से सीमाएँ हैं। इस अर्थ में काव्य ही एक मात्र निर्दोष सत्ता है। काव्य का भी प्रयोजन है कि मनुष्य मात्र को उसके भीतर जो अनभिव्यक्त ‘पुरुष’ है उसको रूपायित तथा संचरित किया जाए।

काव्य में शब्द को माध्यम बनाना ही शब्द-यज्ञ है। हमारे उत्सर्गित व्यक्तित्व की उत्कटता और सार्थक शब्द की शक्ति जिस क्षण तदाकृत होती है, तभी हममें विराट छन्द जन्म लेता है। ऐसे शब्द-यज्ञ से उत्पन्न छन्द को हो गायत्री नाम दिया गया है। राम और सूर्य के बीच यह गायत्री-छन्द ही अनाहूत भाव से शब्द-यज्ञ कर रहा है। हम चाहे तो कह सकते हैं कि समस्त जैविकता के लिए किये गये शब्द-यज्ञ का नाम ही काव्य है। वैसे ‘यज्ञ’ शब्द से चौकने की आवश्यकता नहीं है। शब्द का उच्चारित होना ही यज्ञ है। किसी भी काल, किसी भी देश, किसी भी भाषा की कविता हमारे न जानने और न चाहने पर भी शब्द यज्ञ कर रही है। सृष्टि में जो कुछ भी तथा जैसा कुछ भी जिस किसी रूप में है, वह काव्य है। विराट में जिस प्रकार पंक्ति पावनता नहीं है क्योंकि वह अपांक्तेय है इसलिए काव्य भी अपांक्तेय है और कवि को भी सपांक्तेय होना होगा।

-भूमिका से उद्धृत


।। काव्य, एक शब्द-यज्ञ ।।



काव्य का स्थान समस्त वैचारिक सत्ता में न केवल सर्वोपरि है बल्कि अपनी भाववाची सृजनात्मक प्रकृति के कारण परमपद भी कहा जा सकता है अन्य वैचारिक सत्ताएँ, भले ही वे धर्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, या अध्यात्म की ही क्यों न हों, भाववाची सृजनात्मक न होने के कारण किसी न किसी कारण से सीमाएँ हैं। इस अर्थ में काव्य ही एक मात्र निर्दोष सत्ता है। वैचारिक विराटता जब सृजनात्मक तथा संकल्पात्मक होती है तब उस ऋतम्भरा मधुमती भूमिका की प्रतीति सम्भव है जिसके लिए धर्म दर्शन, ज्ञान-विज्ञान या अध्यात्म विभिन्न माध्यम और मार्ग सुझाते हैं। सामान्यतः तो प्रयोजन एक ही है, अतः काव्य का भी प्रयोजन है कि मनुष्य मात्र को उसके भीतर जो अनभिव्यक्त ‘पुरूष’ है (जिसे दर्शन, योगमाया, सुप्त की संज्ञा देता है) उसको रूपायित तथा संचरित किया जाए, साथ ही जितनी भी पदार्थिक सत्ताएँ हैं उनको महत् रूप ‘प्रकृति’ के साथ तदाकृत किया जाए। विराट पुरुष और महत् ‘प्रकृति’ की यह युगललीला, जिसे आज की वैज्ञानिक भाषा और विगत कल की आध्यात्मिक दर्शन-सूत्रता में जो कुछ भी कहा जाए, ही काव्य का प्रेय है।

काव्य ही शब्द-शक्ति और प्राण-शक्ति दोनों की पराकाष्ठा है। काव्य, न तो विज्ञान की पदार्थिक खण्ड दृष्टि है और न ही अध्यात्म की अनासक्त तत्व-भाषा और योग-मुद्रा। यदि काव्य की कोई मुद्रा सम्भव है तो वह अर्धनारीश्वर जैसी ही होगी। लग्न में जिस प्रकार ‘मिथुन’ और राशियों में जिस प्रकार ‘कन्या’ है प्रतीति और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में वही स्थिति काव्य की है। कहा जा सकता है कि सृष्टि, सृष्टि का कारण और सृष्टि की क्रिया का यदि कोई नाम सम्भव है तो वह काव्य है। जब काव्य किसी का तिरस्कार नहीं करता तब भला मनुष्य का तिरस्कार कैसे कर सकता है ? सच तो यह है कि काव्य तिरस्कार नहीं, संस्कार करता है, समस्त जैविकता का। जहाँ अन्य वैचारिक माध्यम मानवीय जगत और इतर जैविक-जगत के बीच चेतना और संप्रेषण के स्तर-भेद देखते हैं, स्थितियों का द्वन्द्व देखते हैं वहाँ काव्य-‘पुरुष’ की विराटतम महासत्ता और ‘प्रकृति’ की आणविक नगण्य सत्ता में चेतना शक्ति और स्थिति की समरसता का छन्दगान करता दिखलायी देता है। देश और काल दोनों के सामरस्य स्वरूप का नाम ही काव्य है। आकाशी सूर्य और पृथ्वी के सूर्यवंशी राम दोनों के लिए काव्य के पास मंत्र और छन्द हैं। यह सामरस्यता ही काव्य की आत्मा है, और वस्तुतः काव्य का अयन भी यही है।

यह ठीक है कि चेतना के स्तर पर मनुष्य ही श्रेष्ठ रचना है, लेकिन प्रकृति द्वारा प्रदत्त इस श्रेष्ठता का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य अपने से इतर जैविकता को नगण्य या अपयोग के रूप में देखे। जब हम मनुष्य शब्द का व्यवहार करते हैं तब उसका तात्पर्य शारीरिक मनुष्य होना नहीं है। केवल शरीर से मनुष्य होना मनुष्य होना नहीं कहा जा सकता। चेतन के स्तर पर जब हमने शारीरिकता से परे इस दृष्टि को अभिधानित किया तब हमारे ऋषि-व्यक्तित्व ने कुछ पशुओं, वनस्पतियों और पदार्थिक सत्ताओं में भी देवत्व अनुभव किया और हम प्रणम्य हुए। हमारी इस संकल्प दृष्टि ने हमें शेष सारी जैविकता से ऐसा जोड़ा कि यह घोषित करना पड़ा, कि जो कुछ है वह ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ है। यदि यह भाव है, तो यह यज्ञ-भाव है, और यदि यह सृष्टि है तो यह काव्य-दृष्टि है। इस भाव और दृष्टि को निःसंकोच शब्द-यज्ञ कहा जा सकता है। इसलिए कि मनुष्य, चेतना नाम है, शरीर की उपाधि नहीं। इस मनुष्य की चेतना का देशकालातीत, विस्तृतम आयनिक स्वरूप, गुण और प्रकृति ही वह ‘पुरुष’ है जो-‘क्रियान्वित’ है और ‘क्रिया-रत’ भी है।

ऐसा पुरुष न केवल सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान ही होता है बल्कि समस्त देश और गणनातीत काल के जीवन मात्र की मुक्ति का प्रतीक होता है। पौराणिकता ने इसके लिए ‘अवतार’ संज्ञा का आविष्कार किया। ऐसा प्रतीक पुरुष, अपनी शारीरिकता में भले ही बीत जाता हो, क्षरा जाता हो परन्तु नाम रूप बनकर काल में सदा-सदा के लिए अक्षर हो जाता है। राम या कृष्ण, बुद्ध या ईसा की नामरूप शक्ति ही वास्तविक शक्ति है। स्वयं वे समयबद्ध थे परन्तु नामरूप में वे काल के उल्लंघन है। जब तक ऐसे प्रतीक-पुरुष समय-बद्ध होते हैं तब तक वे हमसे पृथक होते हैं, वे अपनी क्रियाओं में रत रहते हैं परन्तु नामरूप बनते ही वे हममें अनुस्यूत हो जाते हैं, उनकी क्रिया हमारी प्रक्रिया बन जाती है। व्यक्तित्व का यह शक्त्यान्तरण लोकोत्तर जैसा लगता है, पर ऐसा नहीं है। प्रत्येक मनुष्य को ऐसी ही लोकोत्तर सत्ता या काल का उल्लंघनकर्ता बनने का आमंत्रण सनातन से काव्य देता आ रहा है। ऐसा शब्द यज्ञ संसार की सारी भाषाओं और सारे काव्यों द्वारा अपनी-अपनी भौगोलिकताओं के अनुकूल सम्पन्न हो रहा है, केवल प्रतीति की आवश्यकता है। मुक्ति का तात्पर्य मनुष्य की मुक्ति न होकर जीवन मात्र की मुक्ति होना चाहिए। काव्य की यह उदार-दृष्टि ही उसे धर्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान और अध्यात्म के निकट भी ले जाती है, और अपनी स्वतन्त्र सृजनात्मक दृष्टि के बने रहने के लिए आवश्यक दूरी की सम्यकता भी बरतती है।

इतिहास, सभ्यता और राजनीति की कृपा से हम देख चुके हैं कि शारीरिक मनुष्य होना, एक प्रकार की दासता ही है। और जो (चाहे वह कोई हो) स्वयं दास होगा वह भला किसी दूसरे को क्या और कैसे मुक्त कर सकता है ? इसलिए मनुष्य होने के क्रम में हमें सबसे पहले स्वयं का ही उल्लंघन करना होता है। अपने व्यक्तित्व की विस्तृति इस उल्लंघन की आरम्भिक दिशा है। इसलिए काव्य का सम्बोधन, व्यक्तित्व की विस्तृति है। यह एक प्रकार से अपने को देना है, प्रक्रिया है। इसे यज्ञ की भाषा में आहुति देना कहा जाएगा। चूँकि शब्द हमारे, संकल्पित व्यक्तित्व के सम्प्रेषण को मूर्त करता है इसलिए हम अपनी विस्तृति में शब्द को माध्यम बनाते हैं, और शब्द को माध्यम बनाना ही शब्द-यज्ञ है। हमारे उत्सर्गिक व्यक्तित्व की उत्कटता और सार्थक शब्द की शक्ति जिस क्षण तदाकृत होती है-तभी हममें विराट छन्द जन्म लेता है। ऐसे शब्द-यज्ञ से उत्पन्न छन्द को ही गायत्री नाम दिया गया है। राम और सूर्य के बीच यह गायत्री छन्द ही अनाहूत भाव से शब्द-यज्ञ कर रहा है। जब तक यह काव्य का शब्द-यज्ञ सम्पन्न होता रहेगा तब तक यह सृष्टि, पुरुष और प्रकृति की मिथुनमूर्ति बनकर लीला करती रहेगी। अत: हम चाहे तो कह सकते हैं कि समस्त जैविकता के लिए किये गये शब्द-यज्ञ का नाम ही काव्य ही काव्य है।

शारीरिक विकास-क्रम में प्रकृति, नाम और ध्वनि के सम्प्रेषण-स्वरूप में सन्तुष्ट न रह सकी। जैविकता के विकास में सम्भवत: यह इच्छा ही मूलाधार रही हो। इस विकास-प्रक्रिया में शरीर के मेरुदण्ड का सीधा होना एक क्रान्ति कारी घटना थी। इसे प्रकृति का ऊर्ध्व रेतस् होना कहा जा सकता है। इस विकास के कारण मृत्युन्मुखी देशगत जीवन, कालगत अमरता के सम्पर्क में आया। उन्नत तथा प्रलम्ब मेरुदण्ड वाले इस मनुष्य के पैर तो पृथ्वी पर रहे पर हाथों से वह ग्रहों-नक्षत्रों को छूने की कोशिश में लगा। शरीर से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में या विराट की पुकार में खिंचा यह मनुष्य नामधारी प्रतीक-व्यक्ति से संज्ञा, संज्ञा से प्रतीक और प्रतीक से मिथक उत्तरोत्तर होता ही चला गया। वस्तुत: यह जैविकता की चेतना-यात्रा ही थी बल्कि भाषाहीन और अक्षरहीन थी। संलापहीन स्थिति में पर्वत से नदी निकलकर मैदानों को पार करती समुद्रशायी होती थी पर यह सारा व्यापार प्रतीतिहीन था।

देवदार के महावृक्ष थे, धूप भरी द्रोणियाँ थीं, पक्षियों की द्वीपान्तरण यात्राएँ भी हुआ करती थीं, हिम के अवधूत व्यक्तित्व वाले ध्रुव भी थे पर सब अनभिव्यक्त थे और मनुष्य ने इन विभिन्न सत्ताओं से वर्ण-गन्ध और ध्वनियाँ लेकर कितने काल-अन्तराल में तथा कितने सोपानों से होते हुए अक्षर से साक्षात किया होगा इसे भी हम कभी नहीं जान पाएंगे। तब ये शब्द न जाने कितने अनुभवों के बाद भाषा बने होंगे। उसके बाद यह भाषा, छन्द और मन्त्र तक किस कठिन काव्य-तपस्या के बाद पहुँची होगी इसकी भी कोई कल्पना हमें नहीं है। उस में जब हर बार अर्थ और विचार जुड़ते गये होंगे तब के भाषा आनन्द को क्या किसी दिन जाना जा सकेगा ?

देशगत प्रकृति मात्र की मुक्ति तथा जैविक विकास के लिए जब पहली बार उस अक्षर प्रधान भाषा अर्थ और विचार की आहुति रूप में प्रयुक्त कर शब्द-यज्ञ में आहूत किया होगा तब की उत्सवी मांगलिकता की क्या कोई कल्पना हमें है ? वैसे ‘यज्ञ’ शब्द से चौंकने की कोई आवश्यकता नहीं है। शब्द का उच्चरित होना ही यज्ञ है। किसी भी काल, किसी भी देश, किसी भी भाषा की कविता हमारे न जानने और न चाहने पर भी शब्द यज्ञ कर रही है। हाँ, यदि हम काव्य की इस शब्द-शक्ति उसकी इस याज्ञिकता को नहीं जानते हैं तो इस शब्द-यज्ञ के महात्म्य का न तो यज्ञकर्ता कवि को और न देश-काल रूपी यजमान किसी को भी फल या पुण्य नहीं मिला करता। मेघ वर्षा बनें इसके लिए पृथ्वी को उठकर पर्वत बनना होता है। स्वयं मेघ संज्ञा से क्रिया प्राय: कठिनाई से ही बना करते हैं और इसके लिए वर्षों वर्षा से वंचित तक रह जाना पड़ता है।

काव्य के सन्दर्भ में अक्षर की महत्ता को रेखांकित किया जाना चाहिए क्योंकि वही भाषा-बीज है। अक्षर ही शब्द, शब्द से वाक्य, वाक्य से भाषा भाषा से रचना की यात्रा करता हुआ अन्त में महाक्षर प्रणव किस प्रकार बनता है इसे भी जानना चाहिए। चूँकि यह स्वतन्त्र विषय है, इसलिए यहाँ इतना ही संकेत काफी है, पर इस सन्दर्भ में एक और विचारणीय बात है, वह है अक्षर और अंक का अन्तर। अक्षर, संज्ञात्मक होते हैं और अंक, संख्यात्मक। अक्षर पदार्थ की सत्ता, क्रिया और उसके आयामों को व्यक्त कर सकता है। परन्तु अंक के पास ऐसी कोई अभिव्यक्ति नहीं है। अक्षर, विद्या है और अंक ज्ञान। विद्या, विधान होती है, जबकि ज्ञान सूचना। विद्या स्वयंसिद्ध होती है परन्तु अंक को सिद्ध करने की आवश्यकता पड़ती है इसलिए उसे स्थूल का भी माध्यम स्वीकारना पड़ता है। अक्षर तो अंक को व्यक्त कर सकता है परन्तु अंक अक्षर को नहीं।

भाषा बनकर अक्षर, सत्तामुक्त अनाकृत रूप में भी सम्प्रेषण की क्षमता रखता है परन्तु अंक के लिए आकृति या स्वरूप की आश्यकता होती है। अक्षर, मुक्त करता है अंक, बाँधता है। अक्षर, बोध जगाता है इसलिए आकृति या स्वरूप से मुक्त करता है परन्तु अंक को प्रस्तुत करना होता है इसलिए वह आकृति और स्वरूप में बाँधता है। अंक की इस आकृति निर्भरता ने रेखाओं की आकृति वाले तन्त्र और स्वरूप प्रधान यन्त्र को जन्म दिया। प्रकृति को जानने की इस प्रक्रिया में तंत्र और यन्त्र स्वयं में प्रकृति के समानान्तर प्रतिप्रकृति की भाँति व्यवहार करने लगे। जब यह प्रतिप्रकृति, मूल प्रकृति के समानान्तर नियमों और क्रियाओं के स्तर पर टकराने लगी तो अनेक प्रकार के व्यतिपात उत्पन्न हुए। फलत: तब मूल प्रकृति इस प्रतिप्रकृति को लील गयी। जब तन्त्र ने प्रकृति के सिद्धान्तों में हस्तक्षेप करना आरम्भ किया तो वह ज्ञान ही लुप्त हो गया। जब मन्त्र ने आणविक सत्ता को जगाया तो अकल्पनीय विस्फोट हुआ। जब प्रकृति अपने कण तक में इतनी शक्तिरूपा है तो शेष के बारे में क्या कहा जा सकता है ?

एक ही देश और काल में दो विपरीत शक्तियाँ या सत्ताएँ न तो विद्यमान रहा करती हैं और न ही व्यवहार किया करती हैं। कैसी ही क्रिया महाक्रिया से स्वतन्त्र नहीं होती। अंक-प्रधान विज्ञान इसीलिए पदार्थ को छोड़ने के लिए बाध्य हुआ। ठोस, तरल और शून्य सब तरंगमय है। ये तंरगें ध्वनि की भी हैं और प्रकाश की भी। परन्तु अंक-प्रधान विज्ञान को अभी भी सत्ता के चेतानात्मक स्व की कोई प्रतीति नहीं है। इसलिए चेतना और स्व के लिए कोई अंग भाषा भी नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्य के सन्दर्भ में काल की अवधि निर्णायक होती है। चूंकि यह अवधि इतनी नगण्य है कि निरवधि काल या सत्य को किसी प्रकार जाना तो जा सकता है परन्तु किसी अन्य के निकट सिद्ध नहीं किया जा सकता। सिद्ध करने के लिए शास्त्र उपकरणों को कर्म-काण्ड तथा विभिन्न प्रकार के विरोधी तत्वों के समीकरण आदि की आवश्यकता होगी और यह मानवीय काल की अवधि में सम्भव नहीं। काव्य इसीलिए सिद्ध नहीं करता बल्कि वह तो केवल सम्प्रेषित करता है। वैसे मान भी लिया जाए कि एक दिन विज्ञान, प्रकृति के गुण, स्वरूप और धर्म को सूत्र रूप में प्रस्तुत और सिद्ध भी कर दे, पर क्या वह उपलब्धि होगी ?

क्योंकि उसके बाद से ही तो प्रकृति का वह गुणातीतता, स्वरूपातीतता और धर्मातीतता वाला ‘स्व’ आरम्भ होता है जो ध्वनि की भी ध्वनि है, जो प्रकाश का भी प्रकाश है और जो शून्य की भी यात्रा को भेदकर उस अ-शून्य की ओर धावित है जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता है या सिद्ध कैसे किया जा सकता है ? कोई विरल ही उस अनुभव के शक्तिपात को क्या कर पाता है—यह भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उतना भी वह इन्द्रियातीत है। इस परम भाववाचिता को जब काव्य नाना-बिम्बों, प्रतीकों और मिथकों के द्वारा आभास भर दे पाता है तब भला विज्ञान किस प्रकार अंक भाषा के द्वारा व्यक्त या सिद्ध कर सकता है ? मानवीय शारीरिकतंत्र को तो विज्ञान अंक-भाषा में व्यक्त कर सकता है परन्तु भावनाओं के लिए कोई अंक-भाषा नहीं, तब परम भावनात्मकता के लिए कैसे सम्भव है ? हम जानते कि मनुष्य, शरीर ही नहीं चेतना भी है और चेतना अक्षर भी हो सकती है, प्रकाश हो सकती है पर वह अंक नहीं है। चेतना, अनाकृत है, उपकरणातीत है।

चेतना-गुण, स्वरूप और धर्म से भी स्वतन्त्र है। यदि कुछ है तो आत्मरूपा है। अंक की सीमा यह भी है कि न केवल पदार्थ बल्कि पदार्थ के परिवर्तित होते तरल और वाष्प स्वरूप के साथ उसका गणित-रूप या तो भिन्न हो जाता है या उक्त रूप परिवर्तन को अपनी भाषा में व्यक्त ही नहीं कर पाता। साथ ही अंक का गणितीय निदान क्या ठोस, तरल और वाष्प के सन्दर्भ में सत्य सिद्ध किया जा सकता है ? इसके अतिरिक्त अंक कोई बोध नहीं करवा पाता। जब वह कहता है—‘एक’, तो यह कुछ भी हो सकता है। जब किसी अभिव्यक्ति के द्वारा कुछ भी समझे जा सकने की विस्तृति की अविश्वसनीयता हो तो क्या कुछ भी निश्चयात्मक समझा जाना सम्भव है ? क्योंकि कुछ भी समझा जाना भ्रम होगा, सत्य नहीं। अंक की अनेक सीमाए हैं— वह वस्तु का भी तो आकार, प्रकार और क्रिया कुछ भी तो व्यक्त नहीं करता। चींटी भी ‘एक’ है और हाथी भी ‘एक’ है, कण भी ‘एक’ है और पर्वत भी ‘एक’ है। ठोस की एकता के लिए भी ‘एक’ है और तरल की एकता के लिए भी ‘एक’ है; और वाष्प रूप की एकता के लिए तो उतना भी ‘एक’ उसके पास नहीं है। संख्यात्मक के बीच ‘कुछ’ और ‘बहुत’ की जो अपरिभाषित मात्रा हुआ करती है उसके लिए अंक पास क्या कोई अभिव्यक्ति है ? वही स्थिति आयाम के बारे में है। इसीलिए अंक कभी भी समग्र को तथा उसकी समग्रता को अभिव्यक्त नहीं कर सकता।

वस्तुतः कविता एक सत्ता है, सनातन। वह कवि ही नहीं बल्कि भाषा के आविष्कार के पूर्व ही विद्यमान थी। वास्तव में तो वह जीवन क्या बल्कि सृष्टि-संरचना के भी पूर्व थी। भला ऐसी काव्य-सत्ता को अभी भी पूर्ण विकसित न हो सकने वाली भाषा कैसे अभिव्यक्त करे ? सत्य और उसका अनुभव अनन्त आयामी होता है। सत्य निरपेक्ष सत्ता है, अनुभवकर्ता मन कई बार इन्द्रियातीत भी अनुभव करता है, भला इस विषम प्रक्रिया को क्या भाषा उसी रूप में अभिव्यक्त कर सकती है ? यह जिज्ञासा, भाषा को लेकर हमारे मन में अनेक प्रश्न खड़े करती है।—शब्द और अर्थ में आधारभूत सत्ता किसकी है ? शब्द और अर्थ में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध होने पर भी अर्थ का वाहक कौन है—शब्द को प्रायोक्ता या सम्बोधित व्यक्ति ?

निश्चिति किसकी है—शब्द की या अर्थ की ? सम्प्रेषित क्या होता है—शब्द या अर्थ ? शब्द में यदि अर्थ है, तो कितना और अर्थ में यदि शब्द है तो कितना ? जन्म कौन किसको देता है—शब्द, अर्थ को या अर्थ, शब्द को ? क्या शब्द, अर्थ के बिना और अर्थ, शब्द के बिना सम्भव है ? क्या कोई ऐसा शब्द अभी तक भाषा में बचा रह गया है (ध्वनि के स्तर पर) जिसका कोई अर्थ अभी निर्धारित ही न हो पाया हो ? या कोई अर्थ ऐसा है जिसके लिए उपयुक्त शब्द निर्मित न हो पाया हो ? अर्थ सम्प्रेषित कर देने के बाद शब्द का क्या होता है ? क्योंकि कोई ध्वनि-तरंग नष्ट नहीं होती। मानवीय मन की जिसे ‘स्मृति’ कहा जाता है वह शब्द-प्रसूत है या—अर्थ-निर्मित ?

अर्थ के सहीपन को इन्द्रियों द्वारा जाना जा सकता है परन्तु शब्द के सहीपन की पहचान के लिए क्या कोई बाह्य उपकरण सम्भव है ?—ऐसे अनेक प्रश्न हैं और हो सकते हैं जिनकी गहरी पड़ताल आवाश्यक है। चूँकि यहाँ विषयान्तर का भय है इससे हम और अधिक चर्चा इस बारे में नहीं करेंगे, पर इतना हम जानते हैं कि शब्दों के रूप जिस प्रकार स्थायी नहीं होते उसी प्रकार उनके अर्थ भी स्थायी नहीं होते या सर्वमान्य नहीं होते। इसी प्रकार अर्थ का भी कोई एक स्थाई शब्द नहीं हुआ करता फिर भी भाषा का एक मानक-रूप होता ही है। व्यवहार-जगत में भाषा के इस व्यहृत रूप में काफी-कुछ स्थायित्व लम्बे समय तक बना रहता है, परन्तु रचनात्मकता के स्तर पर शब्द और अर्थ दोनों परिवर्तित होते रहते हैं। कवि के व्यक्तित्व, अनुभव-संसार और सृजनात्मकता तीनों का दबाव शब्द और अर्थ पर पड़ता है। जब सृजनात्मकता की प्रक्रिया पर विचार करते हैं तो हमारा ध्यान जाता है कि शब्द सीमित और अर्थ अनन्त। शब्द ‘हरा’ तो केवल एक है जबकि हरापन तो एक से कहीं अधिक है। यह उस एक ‘अन-एक’ या ‘बहु-एक’ को कैसे व्यक्त करे ? इस एक में किस प्रकार ‘बहु-एक’ का भिन्न हरापन व्यंजित किया जा सकता है ? क्या एक शब्द में विभिन्न अर्थ सम्भव हैं ?

और हों भी, तो हमने किस हरेपन को व्यक्त किया इसको सामने वाला कैसे जानेगा ? एक ‘हरा’ सम्पूर्ण हरेपन को किस प्रकार सब सन्दर्भों और स्थितियों में सटीक तरीके पर व्यक्त कर सकता है ? अभिव्यक्ति की सम्पूर्णता, समग्रता और सहीपन, भाषा की भी सम्पूर्णता, समग्रता और सहीपन होना चाहिए। भाषाई सम्पूर्णता, समग्रता और सहीपन, भाषा की भी सम्पूर्णता, समग्रता और सहीपन की यह समस्या सबसे मुखर कविता में ही है क्योंकि उसकी तलाश और सम्बोधन का दायरा समस्त सृष्टि है, समस्त देश और काल है। कविता में उस समय और भी समस्या आती है, जब अनाम संज्ञाओं, सर्वनामों और विशेषणों के लिए सही शब्द खोजा जा रहा हो। जब शब्द, न केवल संज्ञा, न केवल सर्वनाम और न केवल क्रिया हो बल्कि बिम्ब, प्रतीक और मिथक बनकर सर्वथा भिन्न वस्तु, देश और काल को अभिव्यक्त और व्यंजित कर रहा हो तब समस्या और भी गहरी हो जाती है। काव्य के साथ सबसे बड़ी कठिनाई यह होती है कि उसमें गद्य की भाँति देश और काल नहीं होते। ‘राम थे’—यह गद्य है, पर ‘राम हैं’—यह कविता है। काव्य में ‘राम’ से तात्पर्य रामत्व से होता है और ‘है’ कालवाची न होकर क्रियावाची है। अतः काव्य में शब्द और अर्थ को देश और काल का उल्लंघन करते समय कई बार शब्द को अर्थ और अर्थ को शब्द की भाँति आचरण करते देखा जा सकता है।

यही कारण है कि शब्द के स्तर पर काव्य-भाषा उस अर्थ में सरल नहीं होती जिस अर्थ में व्यवहार-जगत और गद्य में होती है। काव्य में सृजनात्मकता का अर्थ पर इतना संवेग होता है कि शब्द भी शब्द न रहकर अर्थ हो जाता है और तब समस्या उस अर्थ को समझने की होती है जो शब्द में नहीं था पर जिसे सृजनात्मकता ने सिरजा। सामान्यतः गद्य में अर्थ नहीं होता, बल्कि कई बार तो भाषा भी नहीं होती। विभिन पात्रों, चरित्रों, कथानक और घटनाओं को जोड़ने वाले वाक्य भर होते हैं। गद्य में शब्द, अर्थ, पात्र या घटनाएँ किसी का भी विपर्यय नहीं होता। काव्य को हम चाहें तो उस हिमनद की भाँति आचरित होते देख सकते हैं कि वह ठोस हिमनद जल बनकर पिघला, नद बना और समुद्र में विलीन होकर पुनः मेघ बना और वापस अपने शिखरवास पर पहुँचकर हिम बन गया। काव्य ही यह अखण्डित सृजनात्मक चक्रियता न तो आरम्भ होती है, न समाप्त होती है। हाँ, उसे घटित (खण्ड रूप में ही) होते देखा जा सकता है। वह तो शाश्वत संज्ञा और शाश्वत क्रिया दोनों ही है इसलिए न कभी ऐसा देश सम्भव है और न कभी ऐसा काल, जब काव्य उपस्थित न हो या क्रियाशील न हो। जिसे हम आरंभ और समाप्ति समझते हैं वह कविता की नहीं बल्कि हमारे अपने कवि, दृष्टा या अनुभव कर्ता की होती है।

काव्य के जिस रूप की हम चर्चा ‘शब्द-यज्ञ’ के सन्दर्भ में कर रहे हैं, वह वस्तुतः उसका ‘चिद्’ रूप है। समझने के लिये यह कहा जा सकता है कि काव्य का यह चिद् रूप, आध्यात्म के ‘ब्रह्म’ जैसा ही है। अभी हम पहले कह आए हैं कि वह अनित्य है इसलिए अब हम चाहें तो उसे अजन्मा भी कह सकते हैं। ऐसा अनित्य, अजन्मा काव्य-विभिन्न कवियों द्वारा अपनी सर्जनात्मक क्षमता और व्यक्तित्व की पात्रता के अनुरूप केवल अभिव्यक्त होता है। जिस प्रकार किसी आदिम-युग में जब मनुष्य तो था पर उसमें कवि नहीं था तब भी काव्य की उपस्थिति थी और आगामी किसी भविष्यत् में मनुष्य के न रहने पर (तब भला कोई कवि सम्भव है ?) भी काव्य यथावत अप्रतिहत उपस्थित रहेगा।

ऐसी अनाक्षरा, शाश्वत सत्ता, किसी अन्य सत्ता से जो कि देश-काल बद्ध है, क्या ग्रहण करे ? वह तो समस्त क्रियाओं से अच्युत, बस ‘है’। समस्त ब्रह्माण्ड में नित्य प्रकाश बिम्ब है पर पृथ्वी नामक पिण्ड के सम्पर्क में आकर ही वह धूप रूप में अभिव्यक्त होता है, उदित होता है, अस्त होता है—जबकि शेष प्रकाश तो कल्पनातीत विस्तार और कालातीत संज्ञा-भाव से असंज्ञ और अव्ययी बस ‘है’। यही काव्य की स्थिति है, जिसे इसी प्रकार के महाबिम्ब के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। इसलिए काव्य, उपस्थित तो सारे देश, सारे काल और समस्त सृजनात्मक अयनों में सर्वदा होता है परन्तु वह अपने को अभिव्यक्त यदा-कदा ही करता है। विभिन्न अवतार विभिन्न कला और अंशों को अभिव्यक्त करते हैं, उसी प्रकार विभिन्न कविता उस अनित्य काव्य को अभिव्यक्त करती है। पूर्ण, चाहे वह कोई हो, कभी पूर्णता से अभिव्यक्त नहीं हुआ करता।

इस दृष्टि से रामायण तथा महाभारत भी पूर्णता को नहीं अभिव्यक्त करते। पृथ्वी जिस धूप को अभिव्यक्त करती है वह पूर्ण प्रकाश नहीं है। रामायण और महाभारत अपनी कलात्मकता की पूर्णताएँ हैं, शाश्वत काव्य की नहीं। मंगल या किसी अन्य ग्रह के संपर्क में आये प्रकाश के स्वरूप, गुण और प्रकृति में तथा हमारे ग्रह की धूप में निश्चित ही अन्तर होगा क्योंकि सबके अपने वायुमण्डल और भौगोलिकताएँ होते हैं। पर विभिन्न अभिव्यक्त प्रकाशों में अन्तर आ जाने पर भी अपनी तत्वता में प्रकाश, प्रकाश ही रहता है, उसी प्रकार काव्य-देश, काल और कवि के माध्यम से अभिव्यक्त होने के कारण विभिन्न हो जाता है परन्तु अपनी तात्विकता में काव्य ही रहता है। अतः कहा जा सकता है कि काव्य, कवि में अवतरित या घटित होता है। इस घटना के समय कवि-व्यक्तित्व जितना ही काव्य के निकट होगा, कविता उतने ही वेग से उसके शिव को गंगाधर बनाएगी।




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