काले उजले दिन - अमरकान्त Kaale Ujale Din - Hindi book by - Amarkant
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काले उजले दिन

अमरकान्त

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :162
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2420
आईएसबीएन :9788126707744

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इसमें सामाजिक ढाँचें में असंगतियों और विषमताओं पर प्रकाश डाला गया है...

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

वस्तुतः हमारा आज का जीवन कई खंडों में बिखरा हुआ-सा नजर आता है। सामाजिक ढाँचे में असंगतियाँ और विषमताएँ हैं, जिनकी काली छाया समाज के प्रत्येक सदस्य के व्यक्तिगत जीवन पर पड़े बिना नहीं रहती। इसीलिए एक बेपनाह उद्देश्यहीनता और निराशा आज हरेक पर छायी हुई है। स्वस्थ, स्वाभाविक और सच्चे जीवन की कल्पना भी मानो आज दुरूह हो उठी है।  इस कथानक के सभी पात्र ऐसे ही अभिशापों से ग्रस्त हैं। मूल नायक तो बचपन से ही अपने सही रास्ते से भटककर गलत रास्तों पर चला जाता है। उसके माता-पिता और परिजन भी तो भटके हुए थे। लेकिन वह अपने भटकाव में ही अपनी मंजिल को पा लेता है।

 क्या इस तरह इस कथानक का सुखद अन्त होता है नहीं। आँसू का अन्तिम कतरा तो सूखता ही नहीं। संयोग और दुर्घटना का सुखांत कैसा मानव जीवन कोई दुर्घटनाओं और संयोगों की समष्टि मात्र नहीं है ! जब तक सारी सामाजिक व्यवस्था बदल नहीं जाती जब तक हमारा जीवन दर्शन आमूल बदल नहीं जाता, तब तक ऐसी दुर्घटनाएँ होती रहेंगी-चाहे उनका परिणाम दुःखद हो या सुखद। आज की समाज-व्यवस्था के परिवर्तन के साथ नारी की स्वतंत्रता का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। क्रान्ति का त्यागमय जीवन उसके जीवन-काल में क्या मर्यादा पा सका उसके आदर्श को क्या उचित मूल्य मिला ? रजनी का त्याग भी क्या सम्मान पा सका ?  उसकी सहानुभूति, ममता और प्रेम-भावना क्या आँसू से भीगी नहीं हैं क्या उसके जीवन का सुख किसी और के दुःख पर आश्रित नहीं है इन्हीं सब प्रश्नों की गुत्थियाँ अमरकान्त का यह उपन्यास खोलता है।

 

काले उजले दिन

वे दिन कितने काले थे ? आज भी जब उन दिनों की याद आती है तो कलेजा मुँह को आता है। मेरी आँखों के सामने वह मकान उभर आता है, जिसकी छत के किसी एकान्त कोने में बैठकर मैं चुपचाप आँसू बहाया करता था। मेरे पिता जी शहर के मशहूर वकील थे। वह बहुत ही शान-शौकत से रहते थे। गाँव में जगह-जमींदारी अच्छी थी। जिन्दगी सुख से बीतती थी। माँ की मूर्ति मेरे सामने नाचने लगती है। वह भी बहुत खूबसूरत थीं। लम्बी पतली और गोरा-दमकता चेहरा। मैं एकलौता बेटा था, इसीलिए मेरा लालन-पालन बड़े लाड़-प्यार से हुआ। माँ-बाप के प्यार के कारण मैं अत्यधिक मनशोख हो गया था। सचमुच मैं बहुत नटखट था। इससे सब खुश ही होते थे। धनी माँ-बाप का लड़का होने तथा स्वयं सुन्दर होने के कारण दूसरे लोग भी मुझे पसन्द करते थे।

पर जब मैं पांच या छः वर्ष का था तो मेरी माँ की मृत्यु हो गयी थी। सबने मुझसे यही कहा कि वह दवाई कराने दूसरे शहर गई हैं और जल्दी ही वापस आ जाएँगी। परन्तु उनकी जगह पर आयीं एक दूसरी माँ। पिताजी ने कहा कि यह भी तुम्हारी माँ है और यह भी तुमको उतना ही प्यार करेंगी। वह भी गोरी और खूबसूरत थीं, पर उतनी नहीं जितनी मेरी माँ थीं। निश्चय ही नयी माँ ने मुझे उसी तरह प्यार करना आरम्भ किया। वह मेरा बहुत ही खयाल करतीं और मैं जल्दी ही सब कुछ भूल गया और धीरे-धीरे उन्हीं को माँ समझने लगा।

किन्तु यह एक लम्बे सपने की तरह ही था, जो दो-तीन वर्ष बाद सहसा भंग हो गया। जब मेरा नया भाई पैदा हुआ तो नयी माँ के व्यवहार में अचानक बड़ा अन्तर आ गया। वह मेरे साथ उपेक्षा का व्यवहार करने लगीं। मैं तब कुछ बड़ा हो गया था और स्कूल में पढ़ने के लिए जाने लगा था। उनका सारा प्यार, जो कृत्रिम रूप से मुझपर उँड़ेला जा रहा था, अपने खून से उत्पन्न लड़के पर केन्द्रित होता गया और वह धीरे-धीरे मुझसे घृणा करने लगीं। वह मेरे छोटे भाई अशोक को एक-से-एक कपड़े पहनातीं, उसको खूब ढंग से खाना देतीं, उसको चार टाइम दूध पिलातीं, जबकि मैं भर पेट खाने के लिए तरसकर रह जाता। दूध तो मुझे मिलता ही न था, जबकि मुझे दूध बहुत पसन्द था। जब मैं उसके लिए काफी जिद करता तो वह एक बहुत ही छोटी कटोरी जिसमें चटनी के अलावा कुछ नहीं रखा जा सकता था, थोड़ा-सा दूध रखकर मेरी ओर उपेक्षा से खिसका देतीं। मैं रोकर रह जाता था। खाना भी वह मेरे सामने प्रेम से नहीं रखती थीं। वह थाली को दूर से सरका देती थीं, थाली मेरे सामने रखकर मुँह दूसरी ओर फेर लेतीं।

मेरी इच्छा होती कि मैं पिताजी से कहूँ, पर हम लोगों के घर में पिता-पुत्र का संबंध एक स्वप्न ही था। पिताजी भले ही मुझसे प्यार करते, पर वह उसका प्रदर्शन नहीं करते थे। उनको एक तो फुरसत ही नहीं थी, फिर भी संयुक्त परिवार में और पर्दे के वातावरण में एक ऐसी लिहाज की भावना पैदा हो जाती थी जिस पर हैरत होती थी। घर में चाचा-चाची थे, उनके बच्चे थे, इसलिए अपने प्यार का प्रदर्शन एक अनुचित बात समझी जाती थी। अपनी पत्नी से दूसरे के सामने बात करना तथा अपने बच्चों को दूसरे के सामने प्यार करना एक निन्दनीय कृत्य समझा जाता था। परन्तु पिताजी ने तो अकेले में भी मुझको प्यार नहीं किया होगा।

स्कूल से आने पर जब मैं खाने के लिए जिद करता या पैसे के लिए हठ करता तो माँ मुझे डाँटती थीं, गालियाँ देती थीं और मुझ पर हाथ छोड़ती थीं। शाम को पिताजी आते थे तो उनसे शिकायत करती थीं। पिताजी पहले उनकी शिकायतों पर ध्यान नहीं देते तो माताजी मुँह फुला लेतीं। इसके बाद धीरे-धीरे पिताजी ने मेरे प्रति कड़ाई का रुख अख्तियार करना शुरू कर दिया। वह मुझको डाँट देते। कभी कान गरम कर देते। उनका डाँटना या कान गरम करना ही बहुत था, क्योंकि पहले उन्होंने कभी भी मेरे साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया था। मैं देर तक सिसकता रहता था लेकिन मुझे मनानेवाला कोई नहीं था। पिताजी बाहर चले जाते थे और माताजी अशोक को अपनी गोद में लेकर कमरे के अन्दर।
कभी-कभी माता जी कहती थीं, ‘नखरा फैलाते हो ? पर मैं किसी का नखरा बरदाश्त नहीं कर सकती। अभी रहो, मैं तुमको वह मार खिलवाऊँगी कि तुम्हें जनम भर याद रहेगा।’

ऐसी घटनाएँ लगभग रोज ही होने लगीं। माता जी का दुर्व्यवहार बढ़ने लगा और पिता जी मुझ पर हाथ छोड़ने लगें। धीरे-धीरे मेरी आत्मा मरती गयी और मेरे अन्दर एक हीनता भरती गयी। रोज-रोज की डाँट और मार का नतीजा हो भी क्या सकता ? मैंने जिद करना छोड़ दिया। पैसा-वैसा भी माँगना बन्द कर दिया। मैं मामूली गन्दे कपड़े पहनकर स्कूल जाया करता था। अशोक कितने ठाट-बाट से रहता था ! घर पर आने के बाद मुझे अब काम भी करना पड़ता। बाजार जाना पड़ता। और भी घर के अटरम-सटरम काम करने पड़ते। अशोक के ठाट को देखकर अनजान लोग मुझे घर का नौकर ही समझते। मैं चुपचाप काम करता और किसी से शिकायत न करता। शिकायत करता भी किससे ?

पता नहीं पिता जी को क्या हो गया था। वह शहर के अत्यधिक प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से थे। वह नगर की सामाजिक तथा राजनीतिक हलचलों में भी शामिल होते थे। दान-पुण्य के मामले में वह सबसे आगे रहते थे। दूसरो को उपदेश कितना वह देते थे। परन्तु मेरे लिए इनमें से कुछ भी नहीं था। मुझे तो देखते ही उनके तेवर चढ़ जाते। वह मुझसे सीधे मुँह बात ही नहीं करते और जब करते तो कटाह कुत्ते की तरह। मेरे लिए ‘बेटा’ शब्द तो उनके शब्दकोश में था ही नहीं। पर जब वह माँ या अशोक के सामने जाते तो उनकी बाछें खिल जातीं—एक लम्बी-सी गद्गद मुस्कुराहट उनके मुँह पर फैल जाती।

मैं हमेशा डरा रहता था और अधिक-से-अधिक काम करके माता जी को प्रसन्न करने की कोशिश करता, लेकिन माता जी की असन्तुष्टि दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही थी। फिर मेरा आत्मविश्वास एकदम समाप्त हो गया और मुझसे गलतियाँ होने लगीं। कोई काम मुझसे ठीक ढंग से होता ही नहीं। इस पर मुझको काफी डाँट-मार पड़ती। मुझे बड़ा आश्चर्य होता था कि पिता जी क्या एक बार नहीं सोचते थे कि मैं उनका बड़ा बेटा होकर भी, नौकर की तरह रहता हूँ, जबकि अशोक राजसी ठाट-बाट से ? लोग देखकर क्या कहते होंगे ? परन्तु पिता जी को इसकी चिन्ता नहीं थी। कोई शर्म-लिहाज नहीं। यदि दुनिया कुछ कहती है तो कहती रहे, समझती है तो समझती रहे। क्या हो जाएगा ?

कभी-कभी घर से सामान गायब हो जाता तो माता जी नौकर-चाकर रहने पर भी मुझी पर सन्देह करतीं। जब तक माता जी कुछ नहीं कहती थीं, पिता जी चुप रहते थे, लेकिन जब माता जी के मुँह से कुछ भी मेरे खिलाफ निकल जाता था तो पिता जी गरजने तड़पने लगते थे।
‘बोल, तूने सामान कहाँ रखा है ?’ वह चिल्लाकर पूछते थे।
‘मैंने नहीं रखा।
‘सच बता ! सच बताने पर तुझे कुछ नहीं बोलूँगा।’
उनके सच का मतलब मैं समझता था। उनका मतलब था कि मैं उनके झूठे आरोपों को स्वीकार कर लूँ, पर मैं झूठ कैसे स्वीकार कर लेता ? मैं खूब अच्छी तरह जानता था कि यदि मैंने चोरी की होती और उसके बाद अपराध स्वीकार कर लिया होता तो भी वह मुझे उतना ही मारते। शायद उससे भी अधिक, यद्यपि मैं यह नहीं कह सकता कि उससे भी अधिक कोई किसी को मार सकता है।

जब मारकर पिता जी चले जाते थे और मैं चिल्लाना बंद कर देता था तो माता जी एक कटोरे या तश्तरी में कोई खाने की चीज नौकर के हाथ भिजवा देतीं।
वह कहती थीं, ‘ले जाओ... दे आओ खाने को। मैं तो अपनी जान भी निकालकर रख दूँ पर दुनिया यही कहेगी कि यह विमाता है। मेरा दिल तो दूसरों के लिए तड़पता रहता है।’
वह इस वक्त अपने को दयावान सिद्ध करना चाहती थीं, पर मैं जानता था कि यह दया नहीं बल्कि उनकी खुशी थी जो दयालुता के रूप में प्रकट हो रही थी; यह सम्भव है कि अपने अपराध को छिपाने के लिए वह ऐसा कर रही हों। उस समय तो मैं नहीं खाता था, लेकिन जब सभी चले जाते थे तो मैं बर्तन खींचकर खाने लगता था।

कभी-कभी माता जी खुश भी नजर आतीं, यद्यपि ऐसा असल में दो-तीन बार ही होता। ऐसा उस समय होता जब उनके मैके में कोई खुशी की बात होती या अशोक के लिए की गयी किसी मनौती को मनातीं। ऐसे समय वह मुझसे हँसकर बोलती थीं। पर मैं जानता था कि यह हँसी कितनी खतरनाक थी।
जब माता जी खुश होतीं तो पिता जी भी उसी तरह और उतना ही खुश हो जाते। वह उसी लहजे में मुझसे बोलते, जैसे माता जी मुझसे बोलती थीं। इन लोगों की यह खुशी कितनी अस्वाभाविक लगती थी ? मैं प्रसन्न होने की कोशिश करता, लेकिन मेरे दिल पर जैसे बर्फ की सिल्ली रख दी गयी हो। मेरे मुँह पर जरा भी हँसी नहीं उभरती थी।
इसी तरह न मालूम कितने वर्ष बीत गए, एक-एक दिन नीरस और भय तथा आतंक से भरा...

मई के महीने में लू की लपटें उठने लगी थीं। दिन भर गरम-गरम अंधड़ चला करता। पिता जी ने उस दिन मुझे बहुत मारा। मैं नौवीं में फेल हो गया था। उन्होंने कहा था कि वह मुझे अब आगे नहीं पढ़ा सकते, क्योंकि मुझ पर रुपया व्यर्थ बर्बाद करना था। मेरे जैसा अवारा और फिसड्डी लड़का, शहर-भर में कोई होगा ?

मैं बड़ा हो रहा था और सभी बातें समझने लगा था। जवानी ने मुझमें क्रोध और विद्रोह की भावना भर दी थी। मैंने पिताजी की बात का कोई जवाब नहीं दिया, पर गुस्से में वहाँ से हट गया था। मुझे अपने फेल होने का कोई अफसोस नहीं था, बल्कि एक प्रकार की अजीब खुशी हुई थी, जैसे मैंने किसी से बदला ले लिया हो। मैं और फेल होऊँगा, देखें ये लोग क्या करते हैं। अगर नहीं पढ़ा सकते तो न पढ़ाएँ। अगर मुझे घर से निकालना चाहते हैं तो निकाल दें। मैं अब किसी की परवाह नहीं करता।

खैर, गनीमत यही थी कि मेरी पढ़ाई नहीं छुड़ाई गई। पर मैं अब सदा उखड़ा रहता। माता जी अगर कुछ बोलतीं तो मैं उनको घूरता रहता और तब वह मुँह फुला लेतीं। माता जी ऐसा व्यवहार करतीं तो पिता जी भी ठीक वैसा ही करते थे।
उसी समय एक अजीब घटना घटी। मेरे कुछ दोस्त हो गए थे, जिनके यहाँ एक नाटे-नाटे से व्यक्ति आते थे, जिनका नाम वासुदेव सिंह था और जो एक क्रांतिकारी कहे जाते थे। वह अंग्रेजी राज्य को खत्म करने की बात करते। उनकी बातों से ऐसा लगता कि उनके पास बम-पितौल भी हैं। वह कहते थे कि देश के लिए नौजवानों को घर-द्वार भी छोड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए। मुझे इस प्रकार की बातें बहुत प्रभावित करती थीं। यदि मेरे पास बम-पिस्तौल हो तो कितना मजा आए ! तब मैं अपना घर-द्वार छोड़ दूँगा और देश की आजादी की लड़ाई में भाग लूँगा। इस क्रांतिकारी दल में शामिल होने पर मुझे अपने घर और परिवार से मुक्ति मिल जाएगी। पढ़ाई से छुट्टी मिलेगी। डाँट-फटकार नहीं सुननी पड़ेगी। मैं और क्या चाहता था ?

वासुदेव सिंह से मेरी घनिष्ठता बढ़ने लगी और ज्यों-ज्यों मैं उनके निकट आता गया, मुझे उनका जीवन और भी आकर्षक लगने लगा। मैं जल्दी-से-जल्दी अपने पास एक बम और पिस्तौल चाहता था। जब मुझे ये चीजें प्राप्त हो जाएँगी और मैं क्रांतिकारी दल में शामिल हो जाऊँगा तो मुझे इसकी जरा भी परवाह नहीं रहेगी कि मेरे माँ-बाप ने मुझे प्यार किया है या नहीं। पिस्तौल के बारे में मैंने वासुदेव सिंह से बात की थी तो उन्होंने कहा था कि पचपन रुपए लाओ तो पिस्तौल मिल जाएगी।

पर मैं पचपन रुपए कहाँ से लाता ? मैं अत्यधिक व्याकुल हो उठा। मैं किससे माँगू ? मेरा कोई मित्र इतना धनी भी नहीं था कि उसके सामने प्रस्ताव रखता। मैं दिन-रात जैसे इसी उधेड़-बुन में पड़ा रहता। इस बेचैनी में मैं जो कुछ पढ़ता था, वह भी मैंने छोड़ दिया।

नौवीं में मैं फिर फेल हो गया। अब यही उपयुक्त समय था। यह निश्चित ही था कि इस बार पिताजी या तो मुझे घर से निकाल देंगे या पढ़ाई बन्द कर देंगे। परीक्षाफल सुनकर मैं घर आया। पिता जी कचहरी गए थे। माता जी ने मुझसे कुछ न पूछा। ऐसी बातें वे मुझसे नहीं पूछती थीं या मेरे सम्बन्ध में कोई भी बात बहुत ही उपेक्षा से सुनती थीं। उन दिनों सुविधाजनक बात यह थी कि घर में माता जी को छोड़कर कोई नहीं था। चाचा जी और चाची जी अपने परिवार सहित किसी शादी में गए थे। फिर माता जी खाने के बाद आसपास मोहल्ले में किसी के यहाँ गप-शप करने अवश्य जातीं। मैं ताक में था। जब वह चली गयीं तो मैं घर में अकेला रह गया। कुछ देर बाद मैं चुपके से उठा और एक हथौड़े से माता जी के कमरे का ताला तोड़ डाला। मैं जानता था कि माता जी इसमें अपने गहने रखती हैं।

पर गहने लेने की नौबत नहीं आयी, क्योंकि ट्रंक के एक कोने में दो सौ रुपए रखे थे, जिनमें से सौ रुपये मैंने निकाल लिये। फिर ट्रंक को उसी तरह बन्द कर दिया। ट्रंक का ताला तो दबाने से बंद हो गया था, पर कमरे का ताला बन्द न हुआ, क्योंकि वह पूरी तरह टूट गया था। मैंने उसका साँकल बन्द किया और ताले को उसमें लटकाकर दबे पाँव बाहर निकल आया। घर के बाहर का दरवाजा भी मैंने इसी तरह बन्द किया और चुपचाप बाहर आ गया।

मैंने घर छोड़ दिया। मैं अब क्रांतिकारी बन गया था। देश में क्रांति करने के लिए जा रहा था और आजादी के लिए अपने जीवन को कुर्बान कर सकता था। मैं बड़े ही उत्साह में था पर सबसे अधिक खुशी मुझे इस बात की थी कि मुझे अपने घर से छुटकारा मिल गया था, जिसके लिए मैं सदा व्याकुल रहता था। घर पर रहना मेरे लिए कितना अपमानजनक था। मैं वहाँ एक नाली के कीड़े की तरह बिलबिलाया करता था, जिससे मुझे मुक्ति मिल गयी थी और अब किसी की परवाह नहीं करता था।

रास्ते में कुछ दूर जाकर मैं कल्पना करने लगा कि माता जी अब आ गयी होंगी और उन्होंने ट्रंक खोलकर अपने रुपए की चोरी के तथ्य का पता लगा लिया होगा। रुपए तो खैर उनको और भी काफी मिल जाते, पर शायद उनको इस बात से खुशी अवश्य हुई होगी कि उनको मुझसे सदा के लिए मुक्ति मिल गयी। उनको अपने व्यवहार के पक्ष में एक बड़ी दलील मिल गयी थी अर्थात् मैं ही बुरा था, इसीलिए वह मेरे साथ ऐसा व्यवहार करतीं ?
वासुदेव सिंह अपने घर पर ही मिल गए। अनजान स्थिति की आशंका मेरे चेहरे पर अवश्य अंकित होगी, क्योंकि उन्होंने मुझे देखते ही चौंककर पूछा—
‘कहो भाई, क्या बात है ?’

‘मैं अब आ गया हूँ।’ मैंने धीरे से कहा।
‘कहाँ से आ गए हो ?’ वह मेरी बात समझ नहीं पाये थे।
‘मैं क्रांतिकारी बनना चाहता हूँ।’
‘क्रांतिकारी तो तुम हो ही।’ उन्होंने हँसकर आश्वासन दिया था।
नहीं, मैं क्रांतिकारी दल में शामिल होना चाहता हूँ।’
‘ठीक है, समय आने पर मैं तुमको अपने दल में शामिल कर लूँगा।’
‘नहीं, मैं घर छोड़कर आ गया हूँ और अभी शामिल होना चाहता हूँ। और इसकी सच्चाई को सिद्ध करने के लिए मैंने आगे कुछ नहीं कहा, बल्कि सौ रुपए निकालकर उनके सामने रख दिये।
‘यह भारी जिम्मेवारी का काम है। तुमको ठीक से सोच-समझ लेना चाहिए।’ वासुदेव सिंह ने रुपयों को अपनी जेब के हवाले करके कहा।

‘मैंने सोच-समझ लिया है।’
‘अब घर-परिवार का मोह त्यागना होगा।’
‘मुझे दुनिया में किसी का मोह नहीं है।’
‘तुमसे जो त्याग करने को कहा जाएगा, वह करोगे ?’
‘जी हाँ, मैं अभी तैयार हूँ। मेरी परीक्षा आप ले लीजिए और पिस्तौल मुझे अभी दे दीजिए।’

‘पिस्तौल !’ वह चौंके। फिर हँसकर बोले, ‘हाँ, पिस्तौल भी मिल जाएगी। ये रुपए हम इसलिए लेते हैं कि हथियारों को खरीदने में पैसा लगता है। कुछ पैसे तो हम डकैतियों या धनी लोगों की मदद से इकट्ठा कर लेते हैं। फिर भी कमी रह ही जाती है। अब तुम हम लोगों के साथ रहोगे तो खर्चा पड़ेगा या नहीं ? वह कहाँ से आएगा, इस सब का इन्तजाम करना पड़ता है। जब तुम काम करोगे तो तुमको भी पैसे की फिराक में रहना पड़ेगा। कभी-कभी भूखों मरने की हालत आ सकती है। कभी जेल में जाना हो सकता है। जेल में लोग तरह-तरह के अत्याचार करते हैं। पर प्राण ही क्यों न निकल जाय, पर तुम तो राज की एक बात भी नहीं बता सकते। अगर बताओगे तो हम तुमको गोली से अवश्य उड़ा देंगे। इसी तरह फाँसी पर झूलना पड़ सकता है। क्रांतिकारी लोग खुशी-खुशी फाँसी पर चढ़ते हैं। वे किसी चीज की परवाह नहीं करते। फाँसी पर चढ़ने से उनको खुशी होती है और उनका वजन बढ़ जाता है।’

इसी तरह मुझे देर तक समझाते रहे। मैं हुंकारी भरता जा रहा था। मुझे किसी प्रकार के त्याग से एतराज नहीं था, बशर्ते कि मुझे उससे घर एवं परिवार से मुक्ति मिल जाती हो। मैं जल्दी-से-जल्दी महानतम त्याग करके बड़े-से-बड़ा क्रान्तिकारी हो जाना चाहता था। मेरे जवाब से वासुदेव सिंह बहुत खुश हुए और उन्होंने कहा, ‘तुम मेरे साथ कुछ दिनों तक रहो, फिर तुमको एक जगह ले चलेंगे।’

मैं दिनभर और रातभर उनके कमरे में बन्द रहता। सभी रुपए उन्होंने ले लिए थे। मैंने कभी रुपए नहीं माँगे, बल्कि इससे खुश हुआ कि वे वासुदेव सिंह जैसे क्रान्तिकारी के पास सुरक्षित हैं। हाँ, मैं रोज ही पिस्तौल की आशा करता था। जब कभी वे बाहर से आते तो मैं सोचता कि वे पिस्तौल निकालकर मुझे देने ही वाले हैं। पर जल्दी ही मेरी आशा निराशा में परिवर्तित हो जाती। वह उसकी चर्चा ही न करते।

वह एक छोटा-सा मकान लेकर रहते थे। उनके साथ उनका परिवार नहीं था। खाना वह स्वयं पकाते थे पर अब खाना मुझे ही पकाना पड़ रहा है। खाना पकाने का कुछ-कुछ ढंग मुझे मालूम था, क्योंकि माता जी मुझसे कोई-न-कोई कम लेती ही रहती थीं। कभी दाल बैठाने को कहतीं और कभी तरकारी चलाने को। कभी-कभी रोटियाँ भी मुझसे ही बनवाती थीं।

इसलिए इस कार्य में मुझे कोई खास कठिनाई नहीं हुई। परन्तु रात को वह अपने शरीर से मुझसे देर तक कड़वे तेल की मालिश करवाते थे। सिर पर तेल चढ़वाते थे। हाथ-पैर में मुक्की लगवाते थे। यह काम मैंने कभी नहीं किया था, जिससे मुझे बहुत ही तकलीफ होती थी, पर मैं यह सोचकर बर्दाश्त करता था कि यह भारत की आजादी का ही तो काम है। खैर जो हो, यहाँ अपमान तो नहीं था, डाँट-फटकार तो नहीं थी। फिर अभी घबराने की जरूरत क्या थी ? अभी दिन ही कितने बीते थे ? वह मुझे यहाँ से दूसरी जगह ले जाएँगे, तभी शायद वह मुझे पिस्तौल देंगे।
लेकिन एक दिन मैंने उनसे साहसपूर्वक पूछ ही डाला, ‘वह पिस्तौल ?’
उनका मुँह छोटा पड़ गया। फिर हँसने लगे, ‘तुम घबड़ा गए ?’
‘नहीं, घबड़ाने की क्या बात है ? यूँ ही पूछ लिया।’

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