सोने का किला - सत्यजित राय Sone ka Kila - Hindi book by - Satyajit Ray
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सोने का किला

सत्यजित राय

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2431
आईएसबीएन :9788126718825

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सत्यजीत राय का एक जासूसी उपन्यास...

Sone Ka Kila

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सत्यजीत राय ने अपने इस उपन्यास में किशोर पाठकों को बंगाल से राजस्थान तक की यात्रा करायी है-कलकत्ता से जैसलमेर की यात्रा। यह उपन्यास एक ऐसे किशोर बालक की मुकुल कथा है जिसे पूर्व जन्म की बातें याद रहती हैं। साथ ही यह एक ऐसे जासूस की कथा है जिसे इस प्रकार के सारे रहस्य खोज निकालने का शौक है। ये जासूस महोदय फैलू दा हैं जिनका पूरा नाम है प्रदोष मित्तिर।

मुकुल के पूर्व जन्म की बातों की खोज करने निकले फैलू दा। मुकुल के पूर्व जन्म में एक सोने का किला था, एक जगह कहीं गड़ा खजाना और उसके पास ही कहीं लड़ाई चल रही थी। फैलू दा यह सब खोजते-खोजते कलकत्ता से जैसलमेर पहुँच गये। सोने का किला व गड़ा खजाना कइयों को ललचा गया था। गड़ा खजाना कौन खोज निकाले और कौन उस पर कब्जा करे, इस पर दूसरी दौड़ भी शुरू हो गयी थी। फैलू दा जानते थे कि लोग उसका पीछा करेंगे। वे सतर्क थे। पीछा करने वाले बदमाशों में बड़ा जाल रचा, मगर फैलू दा मात खाने वाले नहीं थे। पक्के जासूस थे।

सत्यजीत राय का यह किशोर उपन्यास पाठकों को खूब मजे से राजस्थान के कई शहर किसनगढ़, बीकानेर, जोधपुर, पोकरण, रामदेवरा और फिर जैसलमेर दिखाता है।
सोने का किला उसके चार किशोर उपन्यासों में से एक है। इस उपन्यास के चित्र भी उन्होंने स्वंय बनाए हैं।

 

सोने का किला

 

1

 

फेलूदा ने फटाक से किताब बंद की, दो चुटकी बजाकर एक लंबी जम्हाई ली और बोले, ‘ज्योमेट्री’। मैंने पूछा, ‘ क्या अब तक ‘ज्योमेट्री’ की किताब पढ़ रहे थे ?
किताब पर एक अखबार के कागज का कवर चढ़ा था, इसलिए उसका नाम तो नहीं पढ़ा जा सका लेकिन इतना मैं जरूर जानता हूँ कि यह किताब सिधु ताऊ से माँगकर लाई हुई है। सिधु ताऊ को भी किताबें खरीदने की एक खास सनक है। जितने चाव से खरीदते हैं उतने ही जतन से रखते भी हैं। वे हर किसी को अपनी किताब उधार भी नहीं देते लेकिन फेलूदा को न भी नहीं कहते। फेलूदा भी सिधु ताऊ की पुस्तक घर लाते ही उस पर कवर चढ़ा देते हैं।

चारमीनार सिगरेट पीते-पीते फेलूदा ने फर-फर धुएँ के छल्ले हवा में छोड़े और बोले, ‘ज्योमेट्री की कोई अलग किताब नहीं होती। कोई भी किताब ज्योमेट्री हो सकती है, क्योंकि सारा जीवन ही ज्योमेट्री है। अभी तुमने देखा ही होगा कि धुएँ के छल्ले जब मैंने हवा में छोड़े तो पूर्ण वृत्त बने थे। एक बार ज़रा सोचकर देखो कि ये पूर्ण वृत्त से तुम आकाश का चाँद, तारे और सूर्य देख पाते हो। इसी गोले की यदि तुम सपाट गोले के रूप में कल्पना करो तो यह एक ठोस बुदबुदा है अर्थात ज्योमेट्री है। सौर जगत में सारे ग्रह अंडाकार रास्ते से सूर्य की परिक्रमा करते हैं-यही भी ज्योमेट्री है।

अभी तुमने खिड़की में से सड़क पर थूक फेंका-सड़क पर यूँ थूकना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है, और अगली बार ऐसा किया तो पिटोगे भी, लेकिन जिस रास्तें में से तुम्हारा थूक खिड़की में से होकर सड़क तक पहुँचा वह एक पेरेबोलिक कर्व था-यह भी ज्योमेट्री। तुमने मकड़ी का जाला गौर से देखा है ? जानते हो मकड़ी के जाले की ज्योमेट्री भी कितनी जटिल है। यह जाल एक सरल चतुर्भुज से बनना शुरू होता है। फिर उस सरल चतुर्भुज में दो कर्ण डालकर चार त्रिभुज बनाए जाते हैं। फिर ये कर्म एक दूसरे को जिस बिन्दु पर काटते हैं उसी बिन्दु से गोल जाल की बुनावट शुरू होती है-और वह फैलता-फैलता पूरे चतुर्भुज में फैल जाता है। मामला यह बड़े ताज्जुब का है और इस बारे में सोचने लगे तो सोचते ही रह जाओगे-ओर-छोर कभी मिलने का नहीं.....’

रविवार को सवेरे हम दो लोग मेरे घर पर नीचे की मंजिल के बैठक खाने (बैठक के कमरे) में बैठे थे। बाबा अपने रविवार के नियमानुसार अपने बचपन के दोस्त सुविमल काका के घर गपशप करने गए हुए थे। फेलूदा सोफे पर बैठे थे और अपने पाँव उन्होंने सामने अपनी रखी टेबिल पर टिका रखे थे। मैं तख्त पर दीवार के साथ लगे गोल तकिए का सहारा लेकर बैठा था। मेरे हाथ में प्लास्टिक का वह गोरखधंधा था, जिसमें लोहे की गोलयाँ होती हैं। कोई आध घण्टे से मैं उन गलियों को बीच में ले जाने की कोशिश कर रहा था। तब समझ में आया कि यह भी जटिल ज्योमेट्री का ही एक मामला है।
पड़ोस में ही निहार-पिंटू के घर के पूजा पंडाल में लाउडस्पीकर में ‘कटी पतंग’ फिल्म का गाना ‘ये मोहब्बत है’ बज रहा है। ग्रामोफोन के गोल रेकार्ड में भी कई सूक्ष्म लकीरें खुदी रहती हैं, अर्थात्-ज्योमेट्री।

‘केवल आँख से देखने वाली बात ही नहीं है’ फेलूदा कहते गए ‘मनुष्य के मन के मामलों को भी ज्योमेट्री की सहायता से जाना जाता है। सीधे-सीधे आदमी का मन सरल रेखा में चलता है। खराब आदमी का मन साँप की तरह टेढ़ा-मेढ़ा चलता है। पागल का मन कब किधर चल पड़े यह कोई नहीं कह सकता। यहाँ भी वही जटिल ज्योमेट्री।’
फेलूदा के साथ दोस्ती होने के कारण मुझे सीधे-टेढ़े-मेढ़े, पागल-वागल लोगों से बातचीत करने का मौका मिला है। मैं अभी यह सोच रहा था कि फेलूदा खुद ज्योमेट्री के किस खाने में फिट बैठते हैं। जब खुद उनसे यह सवाल किया तो कहते हैं, ‘एक मेनी-पाइटेंड स्टार या धूमकेतु कह सकते हो।’

‘तो मैं क्या उस धूमकेतु का उपग्रह हूँ ?’
‘तुम एक बिन्दु हो, जिसका अर्थ डिक्शनरी के हिसाब से ‘परिमाणहीन स्थान निर्देशक चिह्न’ होता है।’
मुझे तो अपना ही उपग्रह कहलाना अच्छा लगता है लेकिन अफसोस यही है कि हर समय उपग्रह बने रहना संभव नहीं है। गंगटोक के घोटाले के मामले में मैं उनके साथ जरूर था लेकिन तब तो मेरी छुट्टियाँ थीं। उसके बाद छानबीन के दो मामले और आए थे। एक था धलभूमगढ़ में खून का मामला तथा दूसरा था पटना में एक जाली वसीयतनामे का मामला। इन मामलों की छानबीन में मैं फेलूदा के साथ नहीं जा सका था। अभी पूजा की छुट्टियाँ हैं, मैं कई दिन से सोच रहा था कि इस समय कोई केस आ जाता तो मजा आ जाता। लेकिन सचमुच की ही आ जाएगा, ऐसा नहीं सोचा था। हालाँकि फेलूदा तो कहते हैं कि किसी वस्तु के पाने की मन में प्रबल इच्छा करते रहो तो वह स्वत: प्राप्त हो जाती है। लेकिन आज तो घटा उसे मेरे चाहते रहने का ही फल मान लेने में मुझे कोई एतराज नहीं है।

पिंटू के घर पर लाउड़स्पीकर में अभी ही ‘जॉनी मेरा नाम’ का गाना लगा था, फेलूदा ने सिगरेट की राख ऐश ट्रे में झाड़ते हुए हिन्दुस्तान स्टेंडर्स का पन्ना हाथ में लिया था और मैं एक बार सड़क तक जा आने की सोच रहा था कि बाहर के दरवाजे का कुंडा किसी ने जोर से खटखटाया। बाबा तो 12 बजे से पहले लौटने वाले नहीं थे, अत: लगा कि दूसरे साहब ही होंगे। दरवाजा खोला तो देखा, धोती और नीली कमीज पहने निरीह से लगते हुए एक सज्जन खड़े थे।
‘इस घर में प्रदोष मित्तिर रहते हैं क्या ?’ लाउड़स्पीकर जोर से बज रहा था अत: उन साहब को सवाल काफी ऊँचे स्वर में पूछना पड़ा। अपना नाम सुनकर फेलूदा दरवाजे की ओर आए।

‘कहाँ से आए हैं ?’
‘जी, मैं श्याम बाज़ार से आया हूँ।’
‘भीतर आइए।’
वे साहब घर से चले गए।
‘बैठिए, मैं ही प्रदोष मित्तिर हूँ।’
‘ओह-आप इतने युवा हैं, यह तो मैं ठीक से.....’
वे सज्जन गद्गद् होते हुए सोफे पर बैठे हुए थे। बैठने के साथ ही उनकी हँसी गायब हो गई थी।
‘क्या मामला है ?’ फेलूदा ने पूछा।

वे गला खँखारकर बोले, ‘कैलाश चौधरी से आपकी बहुत तारीफ सुनी है। वे हमारे ग्राहक हैं। मेरा नाम सुधीर धर है। कॉलेज स्ट्रीट में हमारी एक किताबों की दुकान है-‘धर एंड क.,’ आपने शायद कभी देखी भी हो।
फेलूदा ने सिर हिलाकर ‘हाँ’ कहा और मुझसे कहा, ‘तोप्से, खिड़की बंद कर दो।’
रास्ते की तरफ खोलने वाली खिड़की बंद कर देने से बाहर बज रहे गानों की आवाज अंदर आनी कम हो गई थी, अत: वे सज्जन बाकी बात स्वाभाविक स्वर में कह पा रहे थे।
‘कोई सात दिन पहले अखबार में मेरे लड़के के बारे में एक खबर छपी थी- आपने क्या ......’
‘क्या खबर थी, बताइए ?’

‘वह पूर्व जन्म की बात याद रखनेवाला...’
‘वो-क्या मुकुल नाम का लड़का ?’
‘जी हाँ’
‘वह खबर क्या सही थी ?’
‘वह जिस तरह की बात करता है उससे तो....’
पूर्व जन्म की कथा कहने वालों का मुझे पता है। कुछेक लोग होते हैं जिन्हें हठात पूर्व जन्म की बात याद आ जाती है। उन्हें बांग्ला में ‘जातिस्मर’ कहते हैं। लेकिन वास्तव में पूर्व जन्म जैसा कुछ होता है ऐसा फेलूदा भी नहीं जानते हैं।
फेलूदा ने चार मीनार का पैकेट खोलकर उन साहब की तरफ बढ़ाया। उन्होंने मुस्कराकर सिर हिलाया और कहा कि वे सिगरेट नहीं पीते हैं। इसके बाद वे बोले, ‘आपको शायद याद होगा कि मेरे लड़के की उम्र आठ साल है-एक स्थान का वर्णन करता हुआ कहता है कि वह भी वहाँ गया था। लेकिन उस स्थान पर मेरा बेटा तो क्या मेरे बाप-दादे भी नहीं गए थे। कैसे गरीब-गुजरान करते हैं हम लोग, यह तो आप जानते ही हैं। दुकान भी आपने देखी ही है, और इधर तो किताबों का व्यापार दिन-ब-दिन...’

‘आपका लड़का तो एक किले की बात करता है ना ?’ फेलूदा ने बीच में ही उन्हें रोककर पूछा।
‘जी हाँ, कहता है कि-सोने का किला। उस पर तोपें रखी हैं, युद्ध हो रहा है, आदमी मर रहे हैं। यह सब वह देख रहा है। वह खुद पगड़ी बाँधे ऊँट पर बैठा बालू के टीबों पर घूमता था। बालू की बात बहुत करता है। और हाँ, मोर की भी बात बताता है तथा हाथी घोड़ों की बात भी। उसके हाथ पर कोहनी के पास एक दाग है-जन्म से ही। हम तो इसे जन्मदाग की समझते थे लेकिन वह कहता है कि एक बार मोर ने वहाँ चोंच की चोंट मारी थी यह उसी का दाग है।’
‘क्या वह सही-सही बता सकता था कि वह कहाँ रहता था ?’

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