कृष्णावतार : भाग-4 - महाबली भीम - कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी Krishnavtar : Vol-4 - Mahabali Bheem - Hindi book by - Kanhaiyalal Maniklal Munshi
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कृष्णावतार : भाग-4 - महाबली भीम

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2433
आईएसबीएन :9788171788767

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प्रस्तुत है कृष्णावतार का चौथा खंड जिसमें महाभारतकालीन योद्धाओं में भीम का चरित्र का वर्णन किया गया है...

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Mahabali bheem

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कोई दृष्टा साहित्यकार जब इतिहास को देखता है तो उसे उसकी समग्रता में दिखाता भी है, और ऐतिहासिक-पौराणिक चरित्रों को आधार बनाकर गुजराती में अनेक श्रेष्ठ उपन्यासों की रचना करने वाले सुविख्यात उपन्यासकार क. मा. मुंशी भारतीय कथा-साहित्य में ऐसे ही दृष्टा साहित्यकार के रूप में समादृत हैं।

कृष्णावतार मुंशी जी की कई खण्डों में प्रकाशित और कई भाषाओं में अनूदित वृहत औपन्यासिक कृति है। हिन्दी में इसके तीन खण्ड पूर्वप्रकाशित हैं और महाबलि भीम इसका चौथा खंड है।

महाभारतकालीन योद्धाओं में भीम का चरित्र सर्वाधिक रोमांचक है और इस खण्ड में उसके विभिन्न आयामों का अविस्मरणीय अंकन हुआ है। यों समूचे उपन्यास की तरह यह भी कृष्ण-सरीखे नीतिज्ञ और महायोद्धा की उपस्थिति से अछूता नहीं है, पर द्रौपदी स्वयंवर से महाभारत युद्ध-पूर्व तक का राजनीतिक परिदृश्य भीम से जिस तरह अनुप्राणित है उससे उसका रुक्ष और कोमल, विनोदी और गम्भीर तथा सर्वोपरि यौद्धेय स्वभाव मुग्धकारी रूप में सामने आता है। साथ ही तत्कालीन राजनीति को समाज की जिस विस्तृत पटभूमि पर चित्रित किया गया है और उससे पाठक के सामने अनेकानेक सुपरिचित चरित्रों का एक नया ही रूप उदघाटित होता है और वे अपने साथ जुड़ी तमाम पौराणिकता के बावजूद अपनी ऐतिहासिकता में ज्यादा वास्तविक और विश्वसनीय लगते हैं।

 

प्रस्तावना

 

हमारे प्राचीन पूर्व-पुरुषों के युग में नागों के साथ विवाह-सम्बन्ध करते, उनसे या अपने ही लोगों से युद्ध करते तथा राज्यों की स्थापना अथवा विध्वंस, करते हुए प्रबल पराक्रमी आर्य सारे भारत में फैल रहे थे।

ज्ञान और आत्मसंयम में लीन आर्य-ऋषि अपने आश्रमों में रहते थे। वे देवताओं से सम्पर्क स्थापित करते और सत्य स्थापित करते और सत्य, यज्ञ तथा तपस पर आधारित आर्य-जीवन–पद्धति का प्रचार करते थे। इसे वे धर्ममय जीवन कहते थे। साहसिक आर्य राजाओं ने जब उत्तर भारत में उपजाऊ मैदानों में राज्यों की स्थापना की, उससे बहुत पहले ही यादव लोग गंगा-तट तक पहुंच चुके थे। उसमें से सूरों, अन्धकों और वृष्णियों की संघबद्ध जातियाँ प्रबल पराक्रमी थीं।

इन संगठित जातियों ने गंगा की तराई के जंगल साफ किये और वहाँ बस्तियाँ बसायीं। उन बस्तियों का सामूहिक नाम, उनके सर्वाधिक शक्तिशाली मुखिया शूर के नाम पर, शूरसेन पड़ा। कालान्तर में उन्होंने मथुरा को जीता। उनके हाथों में आने के बाद मथुरा की शक्ति, समृद्धि और प्रभाव में बहुत वृद्धि हुई।

मथुरा के अजेय यादवों पर एक पुराना शाप था। उनके यहाँ कोई राजा नहीं हो सकता था। उनका राज-काज नायकों की एक समित के द्वारा चलता था- यद्यपि अन्धक वंश के नायक उग्रसेन को सम्मान देने के लिए ‘राजा’ कहा जाता था।
अन्धक उग्रसेन का पुत्र कंस दुस्साहसी, बर्बर और महत्वकांक्षी था। वह प्रबल पराक्रमी था और उसने मगधाधिपति सम्राट जरासन्ध की अस्ति प्राप्ति नाम की दो कन्याओं से विवाह किया था। जरासन्ध संसार के सभी राजाओं को छल या बल से वशवर्ती करने की अभिलाषा रखता था। कंस अपने श्वसुर का दाहिना हाथ बन गया, उसने मथुरा पर आधिपत्य जमाया और वहाँ के लोगों को सन्त्रस्त करने लगा।
शूरों के शक्तिशाली नायक शूर ने नागों के नायक आर्यक की कन्या मादिषा से विवाह किया था। उसकी सन्तानों में वसुदेव और देवभाग नाम के पुत्र तथा पृथा और श्रुतश्रवा नाम की कन्याएं थीं।

बड़ी बेटी पृथा को कुन्ति भोज ने गोद ले लिया और उसे कुन्ती कहा जाने लगा। शूर की दूसरी बेटी श्रतुश्रवा का विवाह चेदिराज दमघोष से हुआ, जिसने शिशुपाल नाम के पुत्र को जन्म दिया। शिशुपाल हठी और महत्त्वाकांक्षी था और वह भी मगध-सम्राट जरासन्द का कृपा-पात्र बनना चाहता था।
शूर के ज्येष्ठ पुत्र वसुदेव ने राजा उग्रसेन के भाई देवक की पुत्री देवकी से विवाह किया था।
देव-वाणी हुई थी कि कंश की चचेरी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र कंस की हत्या करेगा। उस देव-वाणी को विफल करने के लिए कंस ने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया और उनके छः पुत्रों की, जन्म होते ही, हत्या कर दी।
सातवें भ्रूण को समय से बहुत पहले ही गर्भ से निकालकर, गुप्त रूप से बाहर पहुँचा दिया गया। बड़ा होने पर वह पुत्र संकर्षण बलराम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
आठवें पुत्र कृष्ण थे, जिनके बारे में यह देव-वाणी सुनी गयी थी कि वह यादवों के त्राता होंगे। आधी रात के समय, जन्म होते ही, उन्हें गोकुल ले जाया गया। जहाँ गो पालकों के नायक नन्द के यहाँ उनका पालन-पोषण हुआ।
वसुदेव के छोटे भाई देवभाग के पुत्र उद्धव हुए। शैशव में ही कृष्णसखा के रूप में पाले-पोसे जाने के लिए उनको गोकुल भेज दिया गया।  
बलराम, कृष्ण और उद्धव बड़े होकर अत्यन्त पराक्रमी, रूपवान और साहसी हुए। कृष्ण सर्वाधिक स्नेही और प्रिय थे। वह गोप-समुदाय के स्नेहभाजन और वृन्दावन की गोपियों के प्यारे बन गये। वृन्दावन ही जगह थी जहाँ नन्द जा बसे थे।
कृष्ण जब सोलह वर्ष के हुए तो उन्हें मथुरा लाया गया जहाँ उन्होंने अपने मामा, दुष्ट कंस, का वध किया।
कृष्ण, बलराम और उद्धव यथासमय शस्त्र-विद्या की शिक्षा में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए गुरु सन्दीपनि के विद्यालय में गये। सन्दीपनि के आश्रम में रहते समय कृष्ण ने चमत्कारिक पराक्रम के साथ अपरहणकर्ताओं के हाथ से गुरु पुत्र पुनर्दत्त की रक्षा की।
 
जब जरासन्ध ने सुना कि कृष्ण ने उसके जमाता का वध कर दिया है तो बदला लेने की इच्छा से उसने मथुरा की ओर प्रस्थान किया। ऐसे पराक्रमी शत्रु के घरे का सामना करने में असमर्थ यादवों ने कृष्ण और बलराम को रात्रि के अन्धकार में नगर से बाहर चले जाने का अवसर दिया। साहयाद्रि के उस पार गोमन्तक पहुँचकर के गरुड़ जाति के लोगों के साथ रहने लगे।

जरासन्ध ने गोमन्तक तक कृष्ण और बलराम का पीछा किया किन्तु उन साहसी तरुणों ने उसे और उसके मित्रों को भागने को विविश कर दिया। कृष्ण और बलराम की कीर्ति सारे आर्यावर्त में गूँजने लगी। वे विजयी के रूप में मधुरा वापस लौटे। उनका नेतृत्व प्राप्त कर मथुरा के यादव शक्तिशाली और अनुशासित बने।

मथुरा के यादवों को विनष्ट करने के लिए जरासन्ध ने
विदर्भराज भीष्मक और चेदिराज दमघोष के साथ अपनी मैत्री सुदृढ़ बनाने का निश्चय किया। उसने यह प्रबन्ध  किया कि चेदिराज दमिघोष के पुत्र शिशपाल के साथ भीष्मक की कन्या रुक्मिणी का विवाह कर दिया जाये और स्वयं उनकी पौत्री का विवाह भीष्मक के पुत्र रुक्मी के साथ हो।

इस व्यवस्था को कार्यान्वित करने के लिए विदर्भ की राजधानी कुण्डिनपुर में स्वयंवर का आयोजन किया गया। वस्तुतः यह कार्यों की प्राचीन परम्परा को एक प्रकार से धोखा देना था, क्योंकि रुक्मिणी को चुनाव की कोई स्वत्रन्त्रता नहीं थी, उसे शिशुपाल से ही विवाह करना था। कृष्ण निमन्त्रित नहीं थे। फिर भी वह अनेक यादव नायकों तथा उनके मित्रों के साथ कुण्डिनपुर जा पहुँचे और उन्होंने भीष्मक को स्वयंवर स्थापित करने के लिए प्रेरित किया।
कृष्ण की कीर्ति बढ़ती गयी, और उनके असाधारण साहसिक कार्यों ने उन्हें ईश्वरोपम आभा से मण्डित किया।
मगर जरासन्ध इस पराजय को नहीं भूला। उसने मथुरा के यादवों को नष्ट करने का निश्चय किया। अतः इस बार उसने किसी भी आर्य राजा को साथ न लेने की बात सोची और सिन्धु पार के बर्बर राजा कालयवन के साथ सन्धि की। इस सन्धि के अनुसार पश्चिम की ओर से कालयवयन को और पूर्व दिशा से स्वयं उसे मथुरा पर आक्रमण करना था। वे यादवों को नष्ट करके मथुरा को जलाकर छार-खार कर देनेवाले थे।

इन अदम्य शक्तियों से घिर जाने पर यादवों की रक्षा असम्भव हो जायेगी, ऐसा मानकर कृष्ण उन्हें दलदलों और मरुप्रान्तों के पार सुदूर सौराष्ट्र में ले गये। वहां के कुकुद्भिन के राज्य में जा बसे, जिनकी कन्या रेवती से बलराम का विवाह हुआ था। उनकी राजधानी द्वारका शीघ्र ही एक समृद्ध पोताश्रय बन गयी।
कालयवन मथुरा नहीं पहुंच सका। मार्ग में ही मुचुकुन्द नामक एक वृद्ध ऋषि का कोपभाजन बना, जिसकी हत्या करने का उसने प्रयत्न किया था।

जरासन्ध जब मथुरा पहुँचा तो उसकी निराशा का अन्त न रहा। यादव उससे बच निकले थे। उसने मथुरा को जलाकर छार-खार कर डाला और इस तरह अपनी क्रोधाग्नि को शान्त किया।  
चेदि और विदर्भ के राजाओं के साथ कौटुम्बिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए उसने एक बार फिर कुण्डिनपुर में स्वयंवर-सभा आयोजित करने का आदेश दिया, जिसमें रुक्मिणी को शिशुपाल का वरण करना था।
कृष्ण सहसा कुण्डिनपुर जा पहुँचे, रुक्मिणी का हरण करके वह उसे सौराष्ट्र की राजधानी द्वारका में ले गये और वहां उन्होंने उससे विवाह कर लिया।

 

कुरु

 

आर्य-जगत में भरतों और पंचालों की संख्या बहुत अधिक थी और वे अत्यंन्त शक्तिशाली भी थे।
प्राचीन काल में भरतों ने आर्यावर्त के सभी राजाओं पर अपना चक्रवर्तित्व स्थापित किया था। उनके सम्राट् भरत, परम्परागत सभी सम्राटों में सर्वश्रेष्ठ घोषित किये गये थे। भरत के वंश में हस्ति नामक राजा हुए,  जिन्होंने गंगा के तट पर हस्तिनापुर बसाया।

 कालान्तर में भरतों को कुरु कहा जाने लगा, जिन्होंने बहुत-से राज्यों पर प्रभुत्व स्थापित करके चक्रवर्तित्व बनाये रखा।
कुरुओं और उनके प्रतिद्वन्द्वी पंचालों का जिस भूमि पर अधिकार था, वह आर्यावर्त का केन्द्रीय भाग था, जिसे विद्या और शौर्य के क्षेत्र में विशिष्टता प्राप्त थी। सर्वश्रेष्ठ आर्य-ऋषियों ने वहाँ अपने आश्रम बनाये थे और वहाँ के राजे धर्म-मार्ग का अनुमोदन करते थे।

हस्ति के वंशज शान्तनु एक महान् राजा थे। उनके पुत्र गांगेय अत्यन्त बलशाली, पराक्रमी और न्यायपरायण हुए।
वार्धक्य में राजा शान्तनु को एक धीवर-कन्या से प्रेम हो गया। जो कालान्तर में सत्यवती के नाम से प्रसिद्ध हुई। किन्तु उसका पिता केवल इसी शर्त पर राजा के साथ अपनी कन्या का विवाह करने के लिए राजी हो सकता था कि यदि उसकी कन्या के कोई पुत्र हुआ तो वही राज्य का अधिकारी बने। अपने पिता को सुखी बनाने के लिए गांगेय ने प्रतिज्ञा की कि वह आजीवन अविवाहित रहेंगे और कभी राज-पद का अधिकार न चाहेंगे। यह प्रतिज्ञा बड़ी भीषण थी, इसलिए गांगेय भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए।
सत्यवती से शान्तनु को दो पुत्र हुए-चित्रांगद और विचित्रवीर्य। बड़ा पुत्र युद्ध में मारा गया। भीष्म ने हस्तिनापुर की राजगद्दी पर विचित्रवीर्य को बैठाया और काशिराज की कन्याओं का हरण कर ले आये, जिसमें से दो का विवाह उन्होंने बालक राजा विचित्रवीर्य से कर दिया।
विचित्रवीर्य बालक ही था कि का काल-कवलित हो गया। उसके कोई सन्तान नहीं थी। भीष्म ने तो विवाह करना और न ही राज्य-पद सँभालना स्वीकार किया। फलतः कुरुओं का राजवंश मिट जाने का खतरा उपस्थित हो गया। भीष्म के परामर्श से सत्यवती ने कृष्णद्वैपायन व्यास को बुलवा भेजा। कष्णद्वैपायन पराशर ऋषि से उत्पन्न उसी के पुत्र थे। प्राचीन प्रथा के अनुसार उनसे विचित्रवीर्य की विधवाओं से पुत्र उत्पन्न करने का अनुरोध किया गया।

कृष्णद्वैपायन व्यास का पालन-पोषण उनके पिता ने वैदिक ऋषियों की उन कठोरतम परम्पराओं के अनुसार किया गया था, जिनके संस्थापकों में से एक, उन्हीं के प्रपितामह वसिष्ठ थे।

अपने ज्ञान और संयम के द्वारा कृष्णद्वैपायन ने आर्यावर्त के ऋषियों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। उन्होंने दैवी वेदों का भी लिखित रूप में संकलन किया था, जिसे देवताओं के प्राचीन काल के चिरस्मरणीय ऋषियों को सुनाया था। उन ऋषियों में कृष्णद्वैपायन के एक पूर्वज का भी विशिष्ट स्थान था।
कुरुओं के वंश को बनाये रखने के लिए ऋषि ने अपनी माता का आदेश स्वीकार किया। अम्बिका से धृतराष्ट्र उत्पन्न हुए जो जन्मान्ध थे। अम्बालिका ने पाण्डु को जन्म दिया, जो जन्म से ही रोगी थे। एक श्रद्धालु दासी ने भी अपने को कृष्णद्वैपायन को अर्पित किया था। जिससे विदुर जन्मे।
भीष्म ने तीनों बालकों का बड़ी सावधानी और बुद्धिमत्ता के साथ पालन-पोषण किया। अन्धता के कारण धृतराष्ट्र राजसिंहासन पर नहीं बैठ सकते थे, अतः छोटे पुत्र पाण्डु ने कुरु साम्राज्य पर बड़ी कुशलता और सूझबूझ के साथ शासन किया। वह अत्यन्त लोकप्रिय हुए। दासी-पुत्र विदुर बड़े होकर चतुर और सन्त स्वभाव वाले मन्त्री बने।
अन्धे धृतराष्ट ने गन्धारी से विवाह किया, जिससे उनके दुर्योधन दुःशासन और अन्य अनेक पुत्रों का जन्म हुआ। पाण्डु का विवाह कुन्ती और माद्री से हुआ। कुन्ती, कृष्ण के पिता वसुदेव बहन थीं और माद्री मद्रदेश की राजकुमारी। एक शाप के कारण अपने शरीर-सुख से वंचित राजा पाण्डु अपनी पत्नियों के साथ हिमालय चले गए ये अपने पति की अनुमति और विभिन्न देवताओं की कृपा से उन दोनों के पाँच पुत्र हुए- युधिष्ठिर, भीष्म, अर्जुन, नकुल, और सहदेव।


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