कृष्णावतार : भाग-1 - बंसी की धुन - कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी Krishnavtar : Vol-1 - Bansi Ki Dhun - Hindi book by - Kanhaiyalal Maniklal Munshi
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कृष्णावतार : भाग-1 - बंसी की धुन

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :304
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2436
आईएसबीएन :9788171788750

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प्रस्तुत है कृष्णावतार का प्रथम खंड इसमें श्रीकृष्ण के प्रारंभिक जीवन की कथा कही गई है...

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Banshi Ki Dhun a hindi book by Kanhaiyalal Maniklal Munshi - बंसी की धुन - कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

परम पुरुष श्रीकृष्ण की जीवन-लीला पर देश की किसी भी भाषा में आधुनिक उपन्यास लिखने को शायद यह पहला प्रयास है। पौराणिक परम्पराओं, विविध भाषाओं के काव्यग्रन्थों और लोक-साहित्य ने श्रीकृष्ण का जो बहुविधि व्यक्तित्व और रूप हमारे सामने प्रस्तुत कर रखा है वह अनन्य है, लेकिन उसे उपन्यास की विद्या में बाँध लेने का श्रेय गुजराती कथाकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी को ही प्राप्त है।
‘बंसी की धुन’ श्रीकृष्ण-चरित्र के अनेक खण्डों में सम्पूर्ण होने वाले उपन्यास ‘कृष्णावतार का प्रथम खण्ड है, जिसमें श्रीकृष्ण के प्रारम्भिक जीवन की कथा कही गयी है। अत्यंत सरल और सरस भाषा-शैली में लिखे गये इस उपन्यास की विशेषता यह है कि श्रीमद्भागवत की अलौकिक घटनाओं को बीसवीं शताब्दी के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत विश्वासोत्पादक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यही कारण है कि भक्त-हृदय और वैज्ञानिक दृष्टिसम्पन्न दोनों श्रेणियों के पाठकों में यह समान रूप से लोकप्रिय हुआ है। इसका प्रत्येक खण्ड अपने में सम्पूर्ण और पठनीय है।

 

स्तवन

 

नमोऽस्तुते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र।
येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितों ज्ञानमयः प्रदीपः।।

प्रपन्नपारिजाताय स्तोत्रवेत्रैकपाणये।
ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः।।
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्।
मूकं करोति वाचालं पंगुं लङ्घयतेगिरिम्।
यत्कृपा तमहं वंदे परमानन्दमाधवम्।

 

हे विशालबुद्धि व्यास, मैं आपकी वन्दना करता हूँ। विशाल दृष्टि के स्वामी, आपने भारत-रूपी तेल से जगत् में ज्ञान का प्रदीप प्रज्वलित किया है।
हे भगवान् कृष्ण शरणागतों के कल्पवृक्ष पापियों के नियामक सर्वज्ञान के मूल गीतामृत को दोहनेवाले प्रभु, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
हे वासुदेव, कंस एवं चाणूर का मर्दन करनेवाले, देवकी के परमानन्द स्वरूप, जगद्गुरु श्रीकृष्ण मैं आपकी वन्दना करता हूँ।
जिसकी कृपा से गूँगे वाचाल हो जाते हैं, पंगु पर्वत लाँघ जाते हैं, उसी परमानन्द स्वरूप माधव को मेरा सविनय नमस्कार है।

 

प्राक्कथन

 

प्रिय पाठक,

 

महाकाव्यों और पुराणों की सामग्री पर आधारित श्रीकृष्ण चरित्र पर एक सुन्दर कथा लिखने की मैं बहुत दिनों से सोच रहा था।‘भगवान् परशुराम’ नामक उपन्यास लिखने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण की जीवन गाथा का गान मेरे लिए उपयुक्त ही होगा, ऐसा मेरा खयाल था। यह विषय तो मेरे लिए और भी आकर्षक है, क्योंकि मैं श्रीकृष्ण को अवतार मानता हूँ और गीता के गायक को जगद्गुरु।
इस हृदयग्राही कथा को लिखते समय मेरा अनुमान था कि मुझे सभी सामग्री श्रीमद्भागत से ही मिल जायेगी, किन्तु ‘महाभारत’, ‘हरिवंश’, ‘विष्णुपुराण’ ‘भागवत" और उनके बाद के ‘पद्मपुराण’ ‘ब्रह्ममवैवर्त पुराण’ ‘गीतगोविन्द’ तथा ‘गर्गसंहिता’ का जब मैंने पुनः अवलोकन किया, तो मुझे मालूम हुआ कि इन ग्रन्थों में भगवान् के जीवन से सम्बन्धित घटनाएँ एक-सी नहीं मिलतीं, बल्कि कहीं-कहीं तो एक दूसरे से विरोधी वर्णन भी मिलता है; विशेषकर प्रथम दो ग्रन्थों में, जो अन्य सभी ग्रन्थों के आधार हैं, बिलकुल ही विपरीत परम्पराओं का समावेश है। बाद के सभी ग्रन्थों में अपने-अपने रचनाकाल में लोक मानस पर श्रीकृष्ण के प्रभाव के साथ-साथ उस काल की आध्यात्मिक आवश्यकताओं का भी वर्णन मिलता है।
इस विविध, बिखरी हुई सामग्री में से एक सुगठित कथा-सूत्र पाने, घटनाओं के बीच में आ गयी रिक्तता को पूरा करने और आधुनिक रुचि के अनुसार उनमें तारतम्य बिठाने की मैं महीनों कोशिश करता रहा। मुझे लगा कि इससे जिस रचना का निर्माण होगा, उसे ‘श्रीमद्भागवत’ का भाषान्तर तो नहीं कहा जा सकेगा। मेरा विनम्र प्रयास श्रीकृष्ण-गाथा को एक ऐसे रूप में सुगठित करना होगा, जिससे श्रीकृष्ण के जीवन-काल में ही उनके महान् समकालीन वेदव्यास ने उन्हें जो साक्षात् प्रभु माना है, उसका औचित्य मेरे इस आख्यान से सिद्ध हो सके।
इसलिए यदि मेरे पाठक मुझसे ‘श्रीमद्भागवत’ के भाषान्तर की आशा करते हों, तो मैं उनसे क्षमा चाहता हूँ। मैं तो केवल श्रीकृष्ण के महान् व्यक्तित्व के प्रमुख लक्षणों को समझने की कोशिश कर रहा हूँ और यदि उसकी एक थोड़ी-सी झलक भी दिखाने में समर्थ हुआ तो अपने को भाग्यशाली मानूँगा वैसे अनन्त को कौन शब्दों में सीमाबद्ध कर सकता है।

 

आपका
कन्हैयालाल मुंशी


पूर्व भूमिका

 

श्रीभगवान् नारायण अनन्तकालरूपी शेषनाग पर शयन कर रहे थे। पृथ्वी माता, जो हम सबकी जननी हैं, अश्रुपूर्ण नयनों से उनकी शरण में आयीं और हाथ जोड़कर कातर कण्ठ से कहने लगीं, ‘सर्वशक्तिमान प्रभु, आर्तों के परम आश्रय अपने, दुःख का भार और अधिक वहन करने में मैं अब असमर्थ हूँ।
‘प्रभो ! आपने तो मुझे आज्ञा दी थी कि मैं ऐसे पुत्र पुत्रियों का प्रसव करूँ जो आनन्द का अनुभव करते हुए आपकी भक्ति में लीन हों; परन्तु प्रभु ! मेरी कोख से स्त्री-पुरुषों की एक ऐसी नयी पीढ़ी ने जन्म लिया है, जिसके पापाचार की सीमा नहीं। वह स्वयं आपसे भी विमुख रहना चाहती है। शासक अति स्वार्थी हो गये हैं। उनके विचार भ्रष्ट हो गये हैं। सत्ता के मद में वे मेरी सन्तान को कष्ट देते हैं, उन पर अत्याचार करते हैं और धर्म की अवहेलना करते हैं। पति-पत्नी के बीच वे सम्बन्ध
विच्छेद कराते हैं, सन्तान को माता-पिता के प्रतिकूल बनाते हैं और जहाँ प्रेम तथा शान्ति विराजमान थी वहाँ वैमनस्य व द्वेष के बीज बोते हैं। ये पापाचारी शासनकर्ता जबरदस्ती अथवा छल कपट से लोगों को भटकाते हैं और अपनी समृद्धि व शन्ति का दुरुपयोग कर लोगों को सत्ता की पूजा करना सिखाते हैं। नृत्य, मदिरा तथा व्यभिचार में आसक्त बनाकर वे मेरी सन्तानों की अधोगति करते हैं, और उन्हें भगवान् की अवहेलना करना सिखाते हैं।

‘ये शासक अपनी महत्ता के मिथ्या गर्व में मस्त रहते हैं घरों में फूट डालते हैं, देवमन्दिरों को भ्रष्ट करते हैं, सन्तों की विडम्बना करते हैं और उन्हें नाना प्रकार के कष्ट देकर नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं। प्रभो ! मेरा तो इस कष्ट से बहुत बुरा हाल है।
‘कृपानिधि, अपने वचन का निर्वाह कर मेरा उद्धार कीजिए। मैं आपकी शरणागत हूँ।’
पृथ्वी माता को इस प्रकार दुखी देखकर दीनबन्धु, करुणावत्सल श्रीभगवान् ने स्नेहस्निग्ध वाणी में कहा, ‘पुत्री, तुमने जो कहा वह सब मुझे ज्ञात है। तुम किसी प्रकार की चिन्ता मत करो। निर्भय होओ ! मैंने जो वचन दिया है, उसका निर्वाह में सदा करूँगा। जब-जब भी धर्म की ग्लानि होती है, तब अधर्म का नाश करने के लिए मैं पृथ्वी पर अवतार लेता हूँ। मेरे भक्तों का विनाश कभी नहीं हो सकता। न मे भक्तः प्रणश्यति।’
पृथ्वी माता ने प्रभु से विनती की, ‘प्रभो ! मेरी आपसे यही प्रार्थना है कि आप धरती पर शीघ्र पधारकर मेरी सन्तानों की रक्षा करें।"
और, भगवान् ने उसे अभयवचन दिया, ‘मैं अवश्य आऊँगा।


वसुदेव और देवकी


द्वापर युग के मध्य में यादवों ने यमुना के फलद्रुप तट पर आकर अपनी बस्तियाँ बसायीं। यह स्थान ब्रजभूमि के नाम से प्रसिद्ध था और अत्यन्त मनोहारी एवं रमणीय था। शीतल छाया प्रदान करनेवाले सघन वृक्ष सुन्दर पुष्पों से लदी लताएँ, और दूर-दूर तक फैली हरीतिमा ! विशाल सुन्दर वनों में यहाँ गोकुल विचरते थे। यादवों की वास्तविक सम्पत्ति यही गो-धन था। धन-धान्य से भरपूर इस समृद्धभूमि में गोवर्धन पर्वत सुमेरु के समान सुशोभित था। यादव इसकी पूजा किया करते थे।
कुक्कर, अन्धक, वृष्णि, सात्वत, भोज, मधु, शूर आदि जातियों से यादव संघ बना था। उसे वृष्णिसंघ भी कहा जाता था। शासन व्यवस्था उसकी गणतन्त्रीय थी, फिर भी अन्धक इन सब कुलों में सर्वाधिक शक्तिमान थे और अपने कुलपति को ‘राजा’ की पदवी से विभूषित करते थे।
यादव संघ शक्तिशाली एवं वीर्यवान था। उसे गर्व था कि सृष्टि की सारी प्रजाओं में वही सर्वश्रेष्ठ है और उसकी उत्पत्ति स्वयं ब्रह्मा से हुई है।
ब्रह्मा के दो पुत्र थे-अत्रि और दक्ष। दक्ष को अदिति प्राप्त हुई, जिसके गर्भ से विवस्वत ने जन्म लिया। विवस्वत का पुत्र मनु के नाम से विख्यात हुआ। मनु की पुत्री इला ने सोम से विवाह किया। उसका पुत्र पुरुरवा था, जिसने अपने यौवन काल में देवताओं की प्रिय अप्सरा उर्वशी से प्रेम किया।
पुरुरवा के दो पुत्र थे। ज्येष्ठ पुत्र का नाम आयुष था। आयुष के पाँच पुत्र हुए, जिसमें से नहुष अति बलवान था।
नहुष का पुत्र था ययाति, जो सबसे प्रभावशाली पृथ्वीपति हुआ। उसने देव और दानव दोनों को जय किया था। ययाति की प्रथम पत्नी देवयानी थी। वह भृगुकुलोत्पन्न शुक्राचार्य की पुत्री थी। इस महान् तपस्वी ने देवताओं का मद भी चूर किया था। देवयानी के दो पुत्र थे-यदु तथा दुर्वसु।
यदु के पुत्र ही यादव कहलाये। यदु के पुत्र का नाम कोष्टु था, कोष्टु के पुत्र का नाम देवमिढुष और उसके पुत्र का नाम शूर था।
त्रेता युग में मधु नामक राक्षस ब्रजभूमि में राज्य करता था। जब उसका प्रभाव अधिक बढ़ गया तब इस भूमि को मधुवन कहा जाने लगा। मधु ने जंगलों को साफ कराया और यमुना के किनारे एक नगर की स्थापना की। इसी का नाम मथुरा पड़ा।
मध के पुत्रों ने जब अतिशय अत्याचार करना शुरु कर दिया और लोग उनके नाम से थर्राने लगे, तब भगवान् के अवतार श्रीरामचन्द्र के लघु भ्राता शत्रुघ्न ने क्रोधित हो मथुरा पर चढ़ाई की और पापाचारी मधुपुत्रों का विनाश किया। इसके बाद दूर-दूर तक फैले मधुवन पर इक्ष्वाकु वंश के राजाओं का राज्य हुआ।
बाद में यादवों में अति प्रभावशाली शूर हुआ। उसने मथुरा पर आक्रमण कर शत्रुघ्न के वंशजों को निकाल दिया। तब यादवों ने यमुना के तटप्रदेशों में अपनी स्थापना की और वे वहाँ काफी समृद्धिशाली हुए। उन्होंने गोधन को ही अपनी विपुल सम्पत्ति बनाया। तब से ब्रजभूमि शूरसेन कही जाने लगी।

वसुदेव राजा शूर के वंशज थे। उनके जन्म के समय ग्रहों का योग अच्छा था। उस समय स्वर्ग में दुन्दुभि बजी, इसलिए उनका नाम आनकदुन्दुभि पड़ा। देवताओं ने उन पर पुष्पवृष्टि भी की। वे चन्द्रमा के समान स्वरूपवाले थे और उनकी कीर्ति अक्षय व अनन्त काल तक स्थिर रहनेवाली थी।
वसुदेव के पाँच बहनें थीं। उनमें से एक-पृथा को कुन्तीभोज राजा ने दत्तक लिया। उसका विवाह हस्तिनापुर के राजा पाण्डु से हुआ और वह पाँच पाण्डवों में से तीन की माता बनी।

वसुदेव की दूसरी बहन श्रृतश्रवा ने चेदिराज का वरण किया और उसकी कोख से शिशुपाल का जन्म हुआ।
वसुदेव वीर सूरवंशियों के अग्रणी थे और अनेक गोकुलों के स्वामी थे। किन्तु अन्धक वंश उनसे भी अधिक प्रतापी था और अनेक अग्रणी राजा उग्रसेन उसके नायक थे। उग्रसेन के पाँच पुत्र और नौ पुत्रियाँ थीं। सबसे बड़े पुत्र का नाम कंस था।
राजा उग्रसेन के भाई देवक के चार पुत्र और सात पुत्रियाँ थीं, जिनमें से देवकी परम रुपवान थी।
शूरों और अन्धकों के बीच प्रायः झगड़े हुआ करते। उनके ग्वालों के बीच रोज मारपीट होती। आखिर, दोनों कुलों के मुखियाओं ने निश्चय किया कि इन झगडों का अन्त करने के लिए शूरश्रेष्ठ वसुदेव का देवकी से विवाह कर दिया जाये। राजा उग्रसेन ने बड़ी धूमदाम से यह ब्याह रचाया।
वसुदेव और देवकी ने वेदी के आसपास सप्तपदी की विधि सम्पन्न की। चन्द्रमुखी देवकी का जब पाणिग्रहण हुआ, तब इस शुभ प्रसंग पर शंक और दुन्दुभि के जयघोष हुए।
यादवों के हर्ष का पार नहीं था। ऐसे सुयोग्य दम्पति का संयोग उन्हें सौभाग्य से ही देखने को मिला था।

 

कंस का प्रकोप

 

भारत में उस समय सबसे दुष्ट और अधम राजपुत्र कंस ही था। वह उद्धत अभिमानी कपटी राग-द्वेष से पूर्ण और हठी था। अपने पिता राजा उग्रसेन की भी वह परवाह न करता। देव अथवा मनुष्य किसी का भी नियन्त्रण उसे स्वीकार नहीं था। विद्वानों की वह अवहेलना करता, साधु-सन्तों की हँसी उड़ाता और प्रभुभक्तों से द्वेष रखता। शक्तिशाली राजाओं का समर्थन पाकर वह अति उद्दण्ड हो चला था; शत्रु और मित्र दोनों ही उससे त्रस्त थे।
जिस समय देवकी का पाणिग्रहण वसुदेव के साथ हो रहा था, तभी नारद मुनि कंस के पास पहुँचे। यथोचित सत्कार के बाद कंस ने उनसे आशीर्वाद की कामना की। मुनि ने पाप के मार्ग पर न चलने की सलाह देते हुए उससे कहा कि धर्म की अवहेलना कर आज तक संसार में कोई विजयी नहीं बन सका।

कंस उद्दण्ड तो था ही। एक विद्रूप हँसी हँसकर उसने कहा, "मुनिवर, ऐसी तो कोई शक्ति मुझे दिखायी नहीं पड़ती, जो मेरे मार्ग में बाधक बन सके। मुझे भय किसका ? ईश्वर ! वह तो निर्बल मन के मनुष्यों को डराने के लिए खड़ा किया गया भूत है। किन्तु मैं निर्बल नहीं, समर्थ हूँ। मेरी इच्छा ही मेरे लिए सबकुछ है; वही शासन है, वही नियम है। इसके अतिरिक्त और कोई बन्धन मुझे स्वीकार नहीं। देखता हूँ, मेरी इच्छा के विरुद्ध जाने का साहस किसमें है !"

नारद मुनि किंचित् मुस्करा पड़े। मन्द-मन्द मुस्कराकर उन्होंने कहा, "वत्स, धर्म अविचल है; उसका उल्लंघन कोई नहीं कर सकता। तुम्हारे लिए भी वह सम्भव नहीं होगा। इस सृष्टि का आधार ही धर्म है और जब-जब धर्म की ग्लानि होती है, ईश्वर स्वयं उसकी पुनः स्थापना के लिए धरती पर अवतार ग्रहण करते हैं।
कंस ने इसका उत्तर एक अट्टहास के साथ देते हुए कहा, "मुनिवार, देव अथवा मनुष्य, मेरी राह में रोड़े अटकाने की किसी की क्या मजाल है ? मैं सर्वजयी हूँ।"
इस उद्धत वाणी को सुन नारद मुनि ने कहा, "कंस, यदि तुम्हें अपनी शक्ति का इतना अधिक गर्व है, तो तेरा नाश अवश्यम्भावी है। यही सनातन नियम है। दुष्ट मनुष्यों का उत्थान और पतन मैंने स्वयं युग-युग से अपनी आँखों इसी प्रकार होते देखा है।"
"मेरी ओर अँगुली उठाने का भी साहस किसी में हैं ?" कंस ने तिरस्कारपूर्ण कहा।
नारद मुनि क्षण-भर तो ध्यानमग्न रहे, फिर बोले, "कुमार, तुझे तेरे बल का मिथ्याभिमान है; किन्तु मैं जानता हूँ कि तेरे विनाश की व्यवस्था ईश्वर ने पहले से ही कर रखी है। तेरी चचेरी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र ही तेरा संहारक होगा।"
इतना कहकर भक्तराज नारद कंस के उत्तर की अपेक्षा किये बिना ही अन्तर्धान हो गये।

कंस के क्रोध की सीमा नहीं थी। उसके पिता उग्रसेन तो केवल नाम मात्र के राजा थे, असली सत्ता तो उसी के हाथ में थी। कंस से केवल उसकी अपनी प्रजा ही नहीं, बल्कि आसपास के नरेश तथा उसकी प्रजाएँ भी भयभीत थीं। ऐसा कोई नहीं था, जो उसका विरोध कर सके। इस भविष्यवाणी को सुनकर वह आगबबूला हो गया और सीधा वहीं पहुँचा, जहाँ वसुदेव देवकी का ब्याह रचा जा रहा था। नारदमुनि की वाणी किसी प्रकार सार्थक न हो, इसलिए वह वहीं, तत्काल देवकी की हत्या कर देना चाहता था। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी। जब देवकी ही नहीं रहेगी तो फिर उसकी सन्तान कैसी ? कौन-सा आठवाँ पुत्र फिर उसका संहारक बनेगा।

राजप्रसाद के द्वार पर लाल-लाल आँखें किये कंस जब पहुँचा तो उस समय वर-वधू की सवारी की तैयारियाँ हो रही थीं। विवाहमण्डप में बड़े प्रतिष्ठित एवं सम्माननीय व्यक्ति उपस्थित थे। कंस उन्हें उस समय साक्षात् यम ही दिखायी पड़ा। उसे इस प्रकार कुपित देखकर सभी की खुशी काफूर हो गयी, रंग में भंग पड़ गया। ढोल नगाड़े, शहनाई, शंखध्वनि सभी बन्द हो गये। लोग भयविह्वल, विमूढ़ से खड़े रह गये।

वसुदेव और देवकी जिस रथ पर बैठे थे, वहाँ पहुँचकर कंस ने क्रोध से काँपते हुए हाथों से देवकी की चोटी पकड़ी और उसे रथ से नीचे खींच लिया। राजा उग्रसेन एवं अन्य राजवंशी स्वजन पास ही खड़े, भयभीत हो देखते रहे। क्षण भर पहले सुख सपनों में खोयी राजकुमारी देवकी नयी नवेली दुलहन लाज छोड़ भय से चीख पड़ी।

उग्रसेन अच्छी तरह जानते थे कि उनका पुत्र कंस कितना हठी और स्वेच्छाचारी है। उसके इस दुष्कृत्य से उन्हें गहरा आघार लगा, लेकिन कंस के क्रोधी और तामसी स्वभाव से परिचित होने के कारण वह कुछ कह नहीं सके; मात्र दिग्विमूढ़ से खड़े देखते रह गये। तभी तरुण यादव कुमार वसुदेव रथ से कूदकर कंस के पास जा पहुँचे और उन्होंने उसका वह हाथ थाम लिया, जिसमें तलवार पकड़े वह देवकी की हत्या करने को तत्पर था।

आश्चर्यचकित हो उन्होंने पूछा, "यह क्या ! भोजकुलोत्पन्न उदार चरित राजकुमार। आप चाहते क्या है ? लग्नमण्डप से विदा हो रही, मोदभरी नव वधु अपनी बहन का आप संहार करना चाहते हैं ? लेकिन क्यों किसलिए किस अपराध के कारण ?"
कंस वसुदेव को बलपूर्वक दर हटाते हुए गरज उठा, "हट जाओ सामने से ! मैं कुछ नहीं सुनना चाहता ! "उसकी आँखें क्रोध उगल रही थीं।
राजा उग्रसेन के भाई, देवकी के पिता देवक ने तब लपककर कंस का हाथ पकड़ लिया और कहा, "वत्स देवकी को छोड़ दो ! उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ?"
कंस ने जोर से धरती पर पैर पटककर कहा, "कदापि नहीं ! मैं देवकी को कभी नहीं छोड़ सकता, उसे अभी समाप्त करता हूँ।"
वसुदेव युवक होते हुए भी गम्भीर थे। वह जानते थे कि कंस जब क्रोधित होता है, तब किसी की नहीं सुनता। उसका प्रतिकार करना निष्फल है। इसके अतिरिक्त कंस की सत्ता को स्वीकार कर चलने में ही उन्हें अपनी भलाई दीखती थी। इसलिए हाथ जोड़कर कंस से उन्होंने प्रार्थना की, "भोजकुलोत्तम कुमार, कृपया मेरी बात तो सुनिए। ऐसा कौन-सा अपराध हमसे बन पड़ा है, जो आप हम पर इतने कुपित हो रहे हैं ?"
लाल-लाल आँखों से वसुदेव को घूरते हुए कंस ने कहा, "देवताओं ने मुझे सावधान किया है कि देवकी का आठवा पुत्र मेरा संहार करेगा। लेकिन मैं ऐसा कदापि नहीं होने दूँगा।"
वसुदेव ने तुरन्त समझ लिया कि अपनी मृत्यु के भय से जो निश्चय कंस इस समय कर चुका है, उससे उसे विचलित करने का साहस किसी में नहीं। फिर भी अत्यन्त विनम्रता से उन्होंने विनती की, "हे नरोत्तम परमवीर कुमार, देवकी से तो आपको कोई भय नहीं है न ? देवताओं ने इसके हाथों तो आपके किसी अमंगल की पूर्व सूचना नहीं दी न ? फिर आप इसे बेचारी पर क्यों बिगड़ते हैं ? भविष्यवाणी के अनुसार तो इसके आठवें पुत्र से आपको भय है।

लेकिन आप चिन्ता न करें। मैं आपका स्वामिभक्त स्वजन हूँ। आपकी हर विपत्ति में साथ देना मेरा कर्तव्य है, धर्म है; और उस धर्म का पालन करने की मैं आपसे प्रतिज्ञा करता हूँ। देवकी को आप जीवत रहने दें। मैं आपको वचन देता हूँ कि उसकी कोख से जो भी सन्तान उत्पन्न होगी, वह मैं आपको सौंप दूँगा। फिर आप उसका जो चाहें, सो करें। इस प्रकार जब उसकी कोख सन्तान रहेगी ही नहीं, तो आपको भय किस बात का ? भविष्यवाणी फिर किस प्रकार सत्य होगी ?"

कंस ने अपने पिता उग्रसेन की ओर देखा, चाचा देवक पर नजर डाली भयभीत और संक्षुब्ध देवकी पर दृष्टिपात किया। धूर्त तो वह था ही। उसने सोचा कि देवकी की हत्या इसी समय करने से यादवों से वैर मोल लेना होगा। और यह काम बुद्धिमानी नहीं होगा। देवकी जीवित रही तो भी उसका कुछ अनिष्ट नहीं कर सकेगी। उसके जीवित छोड़ देने में उसे कोई चूक नहीं दिखायी दी, फिर भी सावधानी बरतते हुए उसने एक शर्त रखी, "देवकी को इस समय छोड़ देता हूँ, किन्तु इस शर्त पर कि वह अपने वर के साथ यहाँ से सीधे गजराज महल में जायें और वहीं वे दोनों जन रहें। मेरे विश्वसनीय सेवक दिनरात उनका पहरा देंगे। वसुदेव, तुमने अभी-अभी जो वचन मुझे दिया है, उसे भूल मत जाना। देवकी की कोख से जन्मे प्रत्येक शिशु को तुम्हें मुझे सौंप देना होगा। उसके जन्म लेते ही मुझे सूचित किया जाये। मैं किसी भी अवस्था में देवकी की किसी सन्तान को जीवित नहीं छोड़ना चाहता।"


कंस की योजनाएँ


वसुदेव और देवकी को कंस ने उनके विवाह के तुरन्त बाद ही बन्दी बना लिया; इससे शुर सात्वत तथा कुक्कर कुल के यादवों को गहरा आघात लगा। अन्धक कुल के यादव भी, जो राजा उग्रसेन को अपना अगुआ मानते थे, कंस के इस अमानुपी व्यवहार से क्षुब्ध हो गये। लोगों के रोष की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ती गयी और इसी रोष ने आगे चलकर विरोध का स्वरूप धारण कर लिया। कुछ ही महीनों बाद कंस के गुप्तचरों ने उसे सूचना दी कि विरोध उग्र होता जा रहा है।
शूरश्रेष्ठ वसुदेव पर कंस के अत्याचार के अतिरिक्त उसके अन्य दुष्कृत्यों की चर्चा भी उदार हृदय यादव यदा-कदा एकत्र हो किया करते थे। यादव स्त्रियों के हृदय भी हाहाकार कर उठे। देवकी का दुःख प्रत्येक यादव स्त्री का अपना दुःख हो गया। उनमें से प्रत्येक को यह भी भय था कि पता नहीं कंस आगे चलकर क्या करेगा; वह किसी की भी ऐसी ही दुर्दशा कर सकता था या इससे भी बुरी; और यदि यही हाल रहा, तो कंस के प्रकोप से फिर कौन बचेगा !
इस तरह विरोध उग्रतर होता गया। किन्तु कंस ने इसकी अधिक परवाह नहीं की। उसने तो बस इसे लोगों की उद्दण्डता समझा और निश्चय किया कि आलोचकों और विरोधियों को तत्काल कुचल देना चाहिए। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु, उसने अपने विश्वसनीय सेवकों और सलाहकारों की एक गुप्त मन्त्रणा भी की।
कंस के चाटुकारों और साथियों का वह एक विचित्र जमघट था। उसमें यादव तथा अन्य दुरात्माओं ने भाग लिया। देवताओं अथवा ऋषि-मुनियों द्वारा रचे गये नियम तो उन्हें स्वीकार नहीं थे; वे तो बस कंस के बल पर मौज उड़ाते उसकी आज्ञा शिरोधार्य करते और प्रजाजनो पर अत्याचार करते। चाहे जिस को कंसद्रोही ठहराना, उसको सताना अथवा करावास में डाल देना, उनका काम था। प्रायः परिवार के परिवार उनके द्वार छिन-भिन्न हो जाते और कंस की अथवा अपनी वासना तृप्ति के लिए वे कुलीन स्त्रियों तक को पकड़ मँगवाते।




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