कृष्णावतार : भाग-5 - सत्यभामा - कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी Krishnavtar : Vol-5 - Satyabhama - Hindi book by - Kanhaiyalal Maniklal Munshi
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कृष्णावतार : भाग-5 - सत्यभामा

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :164
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2437
आईएसबीएन :9788171780228

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प्रस्तुत है कृष्णावतार का पाँचवाँ खंड इसमें सत्यभामा के चरित्र पर प्रकाश डाला गया है...

Satyabhama

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कृष्णावतार के पाँचवें खण्ड के रूप में प्रकाशित सत्यभामा एक महत्त्वपूर्ण नारी-चरित्र है। वह बचपन से ही स्वयं को कृष्ण-प्रिया मानती है और फिर उनके योग्य ‘वीर-पत्नी’ बनने का संकल्प लेकर भीषण कठिनाइयों में कूद पड़ती है। उल्लेखनीय है कि ये कठिनाइयाँ उसके धनाढ्य पिता सत्राजित ने ही खड़ी की हैं, जो कृष्ण से घोर शत्रुता रखता है। वह अपनी अकूत सम्पदा को अपने वैभव-विलास में लगा रहा है। कृष्ण इसके विरुद्ध हैं और उसकी सम्पदा का बड़ा भाग राज्य-हित में लगाना चाहते हैं। क्षुब्ध सत्राजित स्यमन्तक मणि के बहाने कृष्ण के विरुद्ध षड्यन्त्र रचता है।

लेकिन सत्यभामा कृष्ण को बिना बताए उनके मित्र सात्यकि के साथ पिता के उस षड्यन्त्र को विफल करती हुई अन्ततः ‘वीर-पत्नी’ का गौरव प्राप्त करती है। वस्तुतः सत्यभामा जैसी साहसी और सौन्दर्यमयी नारी की इस मर्मस्पर्शी प्रेमकथा के सहारे लेखक ने जहाँ सम्पत्ति के धर्म-सम्मत सार्वजनिक उपयोग की आवश्यकताओं को रेखांकित किया है वहीं तत्कालीन जनजीवन के बाह्यचारों, लोक-विश्वासों और वातावरण की भी चित्रण किया है।

 

सत्राजीत की कन्या

 

दिन में दोपहर का समय हो रहा था।
द्वारका में, सफेद रंग से पुती सत्राजित की हवेली बहुत विशाल थी। उसके चारों ओर बरामदा था। उसके निकट, सौराष्ट्र के समुद्र-तट पर, विशाल मैदान में, आश्रितों और सेवकों के लिए छोटे-छोटे मकान और झोपड़ियाँ थीं। घोड़ों के लिए एक बड़ा अस्तबल था और गायों के लिए उससे भी बड़ी एक गोशाला थी।

सत्यभामा- जिसे सामान्यतः सत्या कहा जाता था-पिछवाड़े के रास्ते अपने पिता की हवेली में लौट रही थी। यह द्वार उसके पिता के कुल देवता सूर्य से मन्दिर के आँगन में खुलता था।
सत्या कद में छोटी और गोल-मटोल थी। उसका गोरा और श्वेत कमल के समान चमकता मुख धूप और श्रम से कुम्हला गया था। उसकी गति में विलासपूर्ण लालित्य था और कजरारी आँखों में दमकती हुई दीप्ति थी।
उसका हृदय नाच रहा था। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे यह उसके जीवन का सबसे सुखी क्षण हो। उसने तट से टकराने वाली समुद्र की लहरों को देखा। उसे ऐसा लगा कि उसके हृदय की प्रसन्नता को व्यक्त करने के लिए नाच रही हैं।
उस समय अन्त:पुर में कोई नहीं था। उसने अपनी माता को शैशव में ही खो दिया था। उसकी विमाता तथा परिवार की अन्य स्त्रियाँ, बाहरवाले आँगन में उसके पिता, पिता के अतिथियों और हवेली में हो रहे यज्ञ में भाग लेनेवाले ब्राह्मणों को भोजन कराने में व्यस्त थीं।

सत्या ने चुपके से उस कमरे में प्रवेश किया, जिसमें जल रखने के बर्तन-भाँडे रखे हुए थे। वह अपने साथ जो स्वर्ण-मण्डित पात्र ले गयी थी, उसने यथास्थान रख दिया।
पुरुषों के भोजन के समय, अपनी विमाताओं के पास उसके जीवन की कोई उपयोगिता नहीं थी, क्योंकि उनके निकट जाने से यह स्पष्ट हो जायेगा कि वह घर से बाहर गई हुई थी। वह बरामदे में जाकर झूले पर बैठ गयी, जिसकी जंजीर में सोने का पानी चढ़ा हुआ था। उसने सीटी बजाकर धीरे-से पुकारा ‘‘उरी !’’
उर्वशी, जिसे लोग ‘उरी’ कहकर पुकारते थे, शान से चलती हुई कमरे के अन्दर आयी। वह चार पाँवों से चलते हुए श्वेत पुष्प-गुच्छ के समान लग रही थी। सत्या ने पुचकारकर हाथ बढ़ाया, वह उसके घुटनों पर जा चढ़ी। जीभ निकालकर उसने अपनी चमकीली हरी आँखें सत्या पर टिका दीं।

‘‘उरी, तुझे पता है, कौन आया है ?’’ सत्या ने पूछा। उसे प्यार-भरी ‘म्या...ऊँ’ के अतिरिक्त कोई उत्तर नहीं मिला। उसने दोनों हाथों में बिल्ली का सिर थमाकर फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘आज हमने उन्हें देखा, उरी !’’
बिल्ली ने कोई उत्तर नही दिया। सत्या ने क्या देखा है अथवा क्या किया है, इसमें उरी की रूचि नहीं थी। वह भूखी थी और अपनी स्वामिनी के लौटने की प्रतीक्षा कर रही थी, जिससे सदा की तरह वह उनके भोजन में हिस्सा बटा सके।
सत्या ने उसे एक हल्की-सी चपत लगायी। उरी ने नाराज़ होकर म्याऊँ किया। बिल्ली के कान में फुसफुसाती हुई सत्या ने कहा, ‘‘सुन, मूर्ख ! वह मुझे देखकर मुस्कराये थे और मैं भी उन्हें देखकर मुस्करा पड़ी थी।’’
प्रसन्न उत्तेजना से सत्या बड़ी तेजी से झूलने लगी। उसने उर्वशी को थपथपाना जारी रखा, जो अब आँखें मूँदकर उसकी गोद में आ बैठी थी। जब तक उसकी मालकिन भोजन के लिए उठने का निश्चय न करें, उसे स्वयं भूखी रहने की सम्भावना को स्वीकार कर लिया था।

सत्या सबेरे की घटनाओं को स्मरण करने लगी। उसकी कल्पना उन घटनाओं के विभिन्न चित्र आँकने लगी, जो घटित हुई थीं। वह उन यादव तरुणियों के साथ हो जाने में सफल हो गयी थी, जो सिर पर घड़ा लिये, उस भीड़ में घुल-मिल गयी थीं, जो आर्यावर्त में अपूर्व विजय प्राप्त करके द्वारका लौट रहे कृष्ण, बलराम और अन्य यादव-अतिरथियों का विधिपूर्वक स्वागत करने के लिए नगर-द्वार पर जुटी हुई थी।
उसने सोचा कि यह उसके पिता की गलती थी कि उन्होंने न तो स्वयं इस स्वागत-समारोह में भाग लिया, और न अपने परिवार के लोगों को ऐसा करने की आज्ञा दी। सारी द्वारका में प्रसन्नता की लहर उमड़ रही थी और उसमें उसके परिवार के सम्मिलित न होने का कोई तुक नहीं था।

कृष्ण के पराक्रमों के संबंध में वह कुछ जानती थी। उसने बड़ी उत्कण्ठा के साथ उन विवरणों को सुना था, जिन्हें दुहारते द्वारका में कोई थकता नही था; कृष्ण ने कैसे महाराज पाण्डु के पाँचों पुत्रों को पुनरुज्जीवित कर दिया, जिन्हें दुष्ट दुर्योधन ने जलाकर मार डाला था; कैसे उन्होंने अकेले ही यादवों के प्रचण्ड शत्रु जरासन्ध को द्रौपदी के स्वयंवर से लौट जाने को प्रवृत्त किया था; कैसे उन्होंने राजा द्रुपद की अभिमानिनी कन्या को जीतने में पाण्डवों की सहायता की थी; दुर्योधन की पत्नी भानुमती जब मर रही थी तो उसे उन्होंने वचन दिया था कि उसका पति ही हस्तिनापुर में शासन करेगा, उन्होंने कैसे अपना वचन निभाया; कैसे उन्होंने एक अपूर्व, नया नगर बसाने में पाण्डवों की सहायता की, जिसे इन्द्रप्रस्थ कहा गया।
इन विवरणों को सुनकर द्वारका के अधिकांश लोग कृष्ण को प्रायः भगवान् ही मानने लगे थे, किन्तु उसके पिता, पिता के कुछ मित्र और यादव परिवारों का एक वर्ग, जो उसके पिता को अपना नेता मानता था, ऐसा नहीं मानते थे। वे जो कुछ सुनते थे, उसकी खुलेआम खिल्ली उडा़ते थे। उनकी उपहासपूर्ण टिप्पणियाँ सुनकर सत्या को बड़ा कष्ट होता था।
कृष्ण के प्रति अपने पिता की शत्रुतापूर्ण मनोवृत्ति से भी वह बहुत दुखी थी। वह आदरणीय राजा उग्रसेन के प्रति भी अवज्ञा का भाव रखते थे और उसे छिपाते भी नहीं थे।

उसने सोचा कि इन गर्वीले नायकों से घृणा करने के बहुत अच्छे कारण भी उसके पिता के पास थे। वे सभी उनकी सम्पत्ति, और अनके यादव नायकों पर उनका जो प्रभाव था उससे, ईर्ष्या करते थे।
उच्च पदस्थ यादव नायकों और अपने बीच के बन्धन को सुदृढ़ करने के लिए उन्होंने सात्यक-पुत्र युयुधान से अपनी कन्या के विवाह का प्रस्ताव किया था। सात्यक एक शक्तिशाली नायक थे और कृष्ण के परिवार के साथ सम्बद्ध थे। उन्होंने उनके प्रस्ताव को रुखाई के साथ अस्वीकार कर दिया। उसके पिता के स्वाभिमान को गहरा धक्का लगा और तभी से वह उच्च परिवार के किसी भी व्यक्ति को अपमानित करने का कोई अवसर नहीं चूकते थे।
जो भी हो, वह प्रसन्न थी कि युयुधान के पिता ने उसके पिता के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। रूपवान और वीर होने पर भी वह उसके प्रति सत्या का झुकाव नहीं था। वह वासुदेव के पुत्र कृष्ण से विवाह करना चाहती थी, जो अत्यन्त प्रभावशाली यादव नायक थे।

उसमें अपने पिता अथवा विमाता से अपना आशय प्रकट करने का साहस नहीं था। वह जानती थी कि वे उसे कृष्ण को सौंपने का सपना भी नहीं देखेंगे। उसके पिता उनको यादवों के प्रत्येक दुर्भाग्य का कारण मानते थे।
उसनें प्रायः प्रतिदिन इस समस्या पर विचार किया था। उसने अपने पिता के इस रुख को उचित ही माना था। द्वारका में वे सबसे अधिक धनवान् थे; उनका भवन अत्यन्त वैभवशाली था; उनके घोड़े और उनकी गायें सर्वोत्तम थीं। सबसे बड़ी बात, उसके पिता पर प्रभास तीर्थ के देवता भगवान सूर्य की सभी यादवों की अपेक्षा अधिक कृपा थी। अपनी विशेष कृपा के चिह्न स्वरूप उन्होंने उसके पिता को स्यमन्तक मणि दी थी। यह एक ऐसा चमत्कारिक रत्न था, जिसकी समुचित पूजा करने पर, वह निकृष्ट धातुओं को भी स्वर्ण में परिवर्तित कर देता था।
पिता के लिए उसके मन में बड़ा प्रेम था। वह पिता की अत्यन्त प्रिय पुत्री थी। फिर भी वह कृष्ण को भूल नहीं पाती थी, न उनको देखने का कोई अवसर ही खोती थी।

जब वह छह वर्ष की थी और मथुरा में उसने कृष्ण को अपने मामा कंस से लड़ते देखा था, तभी से उसने निर्णय कर लिया था। बचपन में उनके प्रति उसका झुकाव इतना अधिक हो गया था कि अपनी सखियों के साथ खेलती हुई वह सदैव अपने को कृष्ण वासुदेव कहती थी।
कृष्ण उस पर छाये हुए थे। प्रायः वह उसके सपनों में आते और पत्नी मानकर उससे प्रणय-निवेदन किया करते थे। कभी-कभी वे सपने इतने उत्कट रूप से जीवन्त होते थे कि उसे इस बात से लज्जा का अनुभव होता था कि उसके समान कुलीन कन्या ऐसे बुरे स्वप्न देखे; किन्तु फिर भी हर रात वह यह प्रार्थना करने से नहीं चूकती थी कि कृष्ण फिर उसके सपनों में आयें।
जब वह बड़ी हुई तो कृष्ण से विवाह करने का उसका निश्चय और दृढ़ हो गया। उसे इस बात का विश्वास हो गया कि कृष्ण उसे बिना कभी सुखी नहीं हो सकते; केवल वहीं उनके लिए आदर्श पत्नी हो सकती है, वही उनकी महत्ता की सहभागिनी बन सकती है और उन्हें ऐसे आनन्द दे सकती है, जो और किसी स्त्री के लिए संभव नहीं है।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, कृष्ण के साथ उसके विवाह की संभावनाएँ क्षीण होती गयीं। उसके पिता और प्रमुख यादव नायकों में मनमुटाव बढ़ता गया।

उसने अपने बड़े भाई भंगकर को अपना भेद बतलाया। अपने पिता और प्रमुख नायकों के बीच जैसा सम्बन्ध था, उसे जानने के कारण उन्होंने ऐसा मूर्खतापूर्ण सपना पालने की खिल्ली उड़ायी। किन्तु सत्या सुदृढ़ विचारोंवाली थी। उसे अपने निर्णय से डिगना नहीं था। अपने परिवार के सदस्यों की सहायता के बिना ही उसने कृष्ण को प्राप्त करने का एक उपाय सोच निकाला।
कृष्ण ने जब हस्तिनापुर से आये युधिष्ठिर के निमंत्रण को स्वीकार किया और अधिकांश अतिथियों के साथ उत्तर की ओर जाने का निश्चय किया तो उसने उस उपाय को काम में लाने का निश्चय किया।
अपनी मौसी के पुत्र और कृष्ण के घनिष्ठ मित्र कृतवर्मा को उसने अपना भेद बतलाया। उन्हीं के द्वारा उसने अश्वों और आयुधों से कृष्ण की सहायता की, यद्यपि उन्हें इसका पता नहीं था। उसके पिता की घुड़साल और उनका शस्त्रागार इतना विशाल था कि चोरी-छिपे पर्याप्त घोड़े और अस्त्र-शस्त्र निकाल लेना कठिन नहीं था।

अनन्तर भाग्य ने उसका साथ दिया। उसे पता चला कि उसके पिता ने जयसेन के नेतृत्व में कुछ तरुण नायकों को इसलिए नियुक्त किया है कि वे उसके चाचा प्रसेन के साथ रहकर जुआ खेलें, मदिरापान करें और उसके पिता के खर्चे पर मौज-मस्ती का जीवन बितायें तथा कृष्ण के साथ लम्बी यात्रा पर जाने के पहले ही सात्यकि का वध कर दें।
सात्यकि कृष्ण के सर्वोत्तम सहायक थे। उनकी हत्या कराने में उसके पिता का क्या उद्देश्य था, इसे समझने में उसे कठिनाई नहीं हुई। एक तो वह इस बात का बदला लेना चाहते थे कि सात्यकि ने उनकी कन्या से विवाह करना अस्वीकार कर दिया था, साथ ही वह कृष्ण की योजना को विफल बना देना चाहते थे।

उसने एक उल्टी चाल चली। उसने अपने विश्वस्त अनुचरों से कहा कि जयसेन और उसके मित्रों के द्वारा सात्यकि की हत्या से पहले ही वे उनका अपहरण कर लें। वह नहीं चाहती थी कि कृष्ण जिन साहसिक कार्यों में लग रहे हैं, उसमें वह सात्यकि की सेवाओं से वंचित हों। अपने पिता की अनुमति के बिना ही उसने उन्हें घोड़े, रथ और साज-सामान दिये। बदले में उसने सात्यकि से यह वचन लिया कि वह कृष्ण को प्राप्त करने की उसकी महत्वाकांक्षा की पूर्ति में सहायक होंगे। अब कृष्ण के दो घनिष्ठ मित्र उसे वचन दे चुके थे कि वे उसकी सहायता करेंगे।

बहुत प्रयत्न करके भी वह कृष्ण की पत्नियों से बहुत घनिष्ठ नहीं हो सकी थी। विदर्भ-राजकुमारी रुक्मणि उसके साथ संयत दूरी बनाये रखकर सौहार्द बरतती थीं। दूसरी पत्नी, करवीरपुर की राजकुमारी शैव्या उसके साथ छोटी बच्ची-जैसा व्यवहार करती थीं। कृष्ण की माता को अनुकूल बनाने के उसके प्रयत्न भी सफल नहीं हुए थे। उसके मित्र के रूप में स्वीकार करने में सदा यह बाधा आ खड़ी होती थी कि सत्राजित की कन्या है।

सत्या हार माननेवाली नहीं थी। उसने कृष्ण की छोटी बहन सुभद्रा से सख्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली। वह एक स्पष्टवादिनी, प्रसन्नचित्त और जीवन्त लड़की थी। आयु में अपने से बड़ी एक लड़की की भावभीनी सख्यता से उसे बड़ा सन्तोष हुआ। इससे सत्या को, कृष्ण के परिवार में क्या कुछ हो रहा है, इसे जानने की सुविधा मिल गयी।


   


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