वही बात - कमलेश्वर Vahi Bat - Hindi book by - Kamleshwar
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स्त्री-पुरुष संबंध >> वही बात

वही बात

कमलेश्वर

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :87
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2470
आईएसबीएन :81-267-0889-1

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इस उपन्यास में एक नये दृष्टिकोण से कहानी को उठाया गया है। उपन्यास के केन्द्र में महत्वाकांक्षी पति और उसकी पत्नी का द्वन्द्व है।

Wahi baat

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इस उपन्यास में एक नये दृष्टिकोण से कहानी को उठाया गया है। उपन्यास के केन्द्र में महत्वाकांक्षी पति और उसकी पत्नी का द्वन्द्व है। वह पत्नी लगातार दमित महसूस करती है। पति के तबादले के बाद पत्नी का एकान्त निरन्तर गहरा होता जाता है। ऐसी अवस्था में भावनावश वह पत्नी अपने उस एकान्त को खत्म कर लेती है। और एक साहसिक फैसला लेती है, और फिर तलाक हो जाता है। उसके बाद वह दोबारा विवाह करती है और पहला पति अपनी महत्वाकांक्षाओं की दुनिया में लौट जाता है।

इस कथा-सूत्र को लेकर चलने वाले इस उपन्यास में स्त्री की इच्छा-शक्ति और पुरुष की महत्वाकांक्षा के द्वन्द्व को बड़ी गहराई से पहचाना गया है। कथा की परिणति में जो दूसरा रास्ता पत्नी ने निकाला है, उसे एक नवीन नारी-क्रान्ति की संज्ञा दी जा सकती है। यहाँ स्त्री की भावना को दमित न करने का एक कोण भी सामने आता है। यदि वह उपेक्षित और अकेलापन महसूस करती है तो इसकी दोषी निश्चित तौर पर पुरुष की महत्वाकांक्षा ही है, ऐसी हालत में स्त्री को क्या अपना खालीपन भर लेने की आजादी नहीं होनी चाहिए ?

वही बात

मीलों तक पहाड़ियों, घाटियों और छोटी-सी पहाड़ी नदियों का विस्तार...आसमान से देखने पर इलाक़ा बिलकुल नक़्शानुमा लगता होगा।
एक सपाट-सी पहाड़ी की कगार को साफ़ करके वहाँ इंस्पेक्शन बँगला बना दिया गया था। सड़क भी थी। सामने की दो पहाड़ियों को कैंची की तरह चीरती हुई पानी की दो धाराएँ थीं। धाराओं के बीच में खाली टापू पर, आदिम युग के दैत्याकार जानवरों की तरह क्रेनें खड़ी थीं—आसमान की तरफ़ अपनी तनी हुई गर्दनें उठाए, धरती के वासियों के लिए अजब-सी हिकारत लिए। फिर भी इन्सान की गुलाम।

क्रेनों के अलावा बुलडोज़र थे, अर्थ-रिमूवर्स थे, ट्रालियाँ थीं, पटरियाँ थीं, पाइप थे...मिट्टी के पहाड़नुमा ढेर थे।
दाहिने हाथ पर पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे सूरज धीरे-धीरे डूबता जा रहा था और हर पल चारों ओर सन्नटा और भी गहरा होता जा रहा था।
गोदाम बन्द। मशीनें खामोश। ट्रक सुस्ता रहे थे। जंगली लकड़े के खंभों से बंदनवार की तरह लटके बिजली के तारों में यहाँ-वहाँ चमकते हुए पीली मरियल रोशनी के बल्ब जैसे जिन्दगी के अहसास को ज़िन्दा रखे हुए थे।

इंस्पेक्शन बँगले में ज़रूर अर्दली खड़ा था—और खानसामा भी। डिप्टी-इंजीनियर साहब बता गए थे कि चीफ़ इंजीनियर साहब कभी भी आ सकते हैं इसीलिए हर चीज़ तैयार रहनी चाहिए। मेज़ लगी हुई थी। चीफ़ साहब का कमरा सजा दिया गया था। बँगले के लॉन में लगे गेंदे के फूलों का गुलदस्ता बनाकर मेज़ पर रख दिया गया था। डबल बेड की चादर भी बदल दी गई थी। मसहरी चाँदनी की तरह ऊपर सजी थी।
अर्दली और ख़ानसामें की आँखें पहाड़ी कगार तक आती कंकड़ की सड़क पर लगी थीं। दोनों व्यक्ति फौरन मुस्तैदी से खड़े थे कि दूर से आती कार की बत्तियों को फ़ौरन देख सकें—ऐसा न हो कि कार सीधे बँगले तक आ पहुँचे और स्वागत के लिए अपने-आपको पूरी तरह तैयार ही न कर सकें।

तभी कंस्ट्रक्शन कॉलोनी के बैरियर के पास एक कार की बत्तियाँ चमकीं। बैरियर पर लट्ठा सलामी देती तोप की तरह उठा और अर्दली फौरन डिप्टी साहब के बँगले की ओर दौड़ पड़ा। बड़ी हड़बड़ाहट में उसने दस्तक दी और दरवाज़ा खोलने से पहले ही ऊँची आवाज में बोल उठा-डिप्टी साहब ! चीफ़ साहब आ गए।..
डिप्टी साहब ने जब तक आकर दरवाज़ा खोला, अर्दली वापस इंस्पेक्शन बँगले में पहुँच चुका था। ओठों पर मुस्कुराहट लिए डिप्टी साहब भी इंस्पेक्शन बँगले की ओर चल दिए।

चीफ़ साहब की गाड़ी कॉलोनी के भीतर आयी तो गोदाम का चौकीदार भी अँधेरे में सलाम मार कर खड़ा हो गया। एकाउंटेंट साहब का कुत्ता भौंकता हुआ अपने घर में चला गया। ख़ज़ांची बाबू टार्च लिए लपकते हुए गाड़ी के पीछे-पीछे चले आए। उनके पीछे-पीछे उनका प्यारा और वफ़ादार कुत्ता भी। कार आकर बँगले में रुक गई।
डिप्टी साहब ने चीफ़ साहब का स्वागत किया —कोई तक़लीफ़ तो नहीं हुई, सर ?

—नहीं, रास्ता अच्छा था।
-हम लोग तीन बजे से ही आपका इन्तज़ार कर रहे हैं।
-रास्ता बहुत ख़ूबसूरत था, इसलिए देर लग गई....क्यों समीरा ?
चीफ़ ने कहा, और कार की तरफ़ देखा। डिप्टी की निगाहें भी घूम गईं। चीफ़ की पत्नी समीरा कार से उतर रही थी।
-जी...नमस्ते ! डिप्टी ने समीरा की ओर देखते हुए हाथ जोड़ दिए। समीरा ने हल्के से मुस्कुरा कर गरदन हिला दी।
तभी लपकते हुए खजांची बाबू भी पहुंच गए। पीछे-पीछे उनका कुत्ता भी।
मेम साहब ने देखा। साहब ने भी देखा। ख़ज़ांची बाबू ने टार्च पकड़े-पकड़े हाथ जोड़कर नमस्ते किया तो डिप्टी साहब ने परिचय दे दिया—जी....ये ...ख़ज़ांची बाबू हैं...।

ख़ज़ांची बाबू ने फिर एक बार हाथ जोड़ दिए।
-यह कुत्ता आपका है ? मेम साहब ने पूछ लिया।
ख़ज़ांची बाबू थोड़ा-सा सकुचा गए। फिर बोले—जी, यह कुत्ता नहीं, हमारा सिपाही और पहरेदार भी है।
और रहनुमा भी। डिप्टी साहब ने जोड़ दिया।
-वह कैसे ? मेम साहब ने पूछ लिया।
-जंगली इलाक़ा है।...डिप्टी साहब ने ही जवाब दिया-रास्ते हैं नहीं। ख़ज़ांची बाबू को टहलने का शौक है। टहलते-टहलते दूर निकल जाते हैं तो यह कुत्ता ही इन्हें घर तक ले आता है।
डिप्टी साहब की बात पर सब एकाएक हंस पड़े। मेम साब भी। मगर ख़ज़ाची बाबू ने अपनी हँसी को रोककर एकाएक यह भी जोड़ दिया—डिप्टी साहब ठीक फ़रमाते हैं। आदमी घर का रास्ता भूल सकता है, कुत्ता नहीं.....।

औरत और आदमी में सही प्यार हो तो आदमी घर का रास्ता कभी नहीं भूलता, ख़ज़ांची साहब।...कहते चीफ़ साहब अपनी पत्नी की तरफ़ देखकर मुस्करा दिये थे। मेम साहब सकुचा गई थीं और बँगले के भीतर की ओर देखने लगी थीं।
अब अपनी वफ़ादारी का सबूत देने की बारी अर्दली की थी। बोला-सर, खाना तैयार है।

ठीक है, सर ! डिप्टी साहब बोले-आप हाथ मुँह धोइए। फ्रेश हो जाइए। सामान ये लोग निकाल लेंगे। फ़िक्र की कोई बात नहीं। और फिर मेम साब की ओर घूमते हुए बोले—आपको कुछ चाहिए मैडम ? यहां तो जंगल है...वैसे आपका बँगला कल शाम तक तैयार हो जाएगा....आज की रात आप इंस्पेक्शन के बँगले में गुज़ार लें....और किसी तरह की दिक्कत हो तो मेरा बँगला हाज़िर है...।

एकाएक समीरा को लगा कि यह आदमी कुछ ज़्यादा ही बोलता है। ज़्यादा बोलनेवाले लोग दूसरों की ज़्यादा परवाह नहीं करते। आत्मकेंन्द्रित होते हैं। शायद स्वार्थी। उसे कुछ अच्छा नहीं लगा। भीतर से कुछ चिढ़ कर, अपने शब्दों में शालीनता का आभास देते हुए उसने कह दिया—कोई दिक़्क़त नहीं है। वैसे भी मुझे दूसरों के घर में नींद नहीं आती....।
चीफ़ साहब और समीरा इंस्पेक्शन बँगले के भीतर की ओर बढ़े, तो डिप्टी साहब और ख़ज़ांची बाबू ने नमस्ते कहकर उनसे विदा ले ली।

हाथ-मुँह धोकर, तरो-ताज़ा होकर, कपड़े बदलकर चीफ़ साहब और मेम साब ने खाया-खाना उन्हें पसन्द आया था। अर्दली और ख़ानसामा, दोनों खुश हो गए थे।
फिर चीफ़ साहब मेम साब के साथ लॉन में चले गए थे।
समीरा एकाएक अह्लाद से भर उठी। हर तरफ़ दूधिया चाँदनी छिटकी हुई थी। हर चीज़ जैसे दूध की झरती नदी में नहा उठी थी...नीचे घाटी दूधिया रोशनी में झिलमिला रही थी।

एकदम साँस रोके समीरा हर ओर देखती रह गई-मुग्ध-सी। उसने अनजाने ही अपने पति के सीने से पीठ टिका दी थी।
-समी...!
-प्रशान्त...! वह बुदबुदाई थी।
-क्या हुआ, समी ?...कहते हुए प्रशान्त ने समीरा को अपनी बाँहों में भर लिया। समीरा बेसुध हो गई। इतना सौंदर्य ! हे प्रभु ! मैं कहीं मर न जाऊँ।
समीरा ने धीरे से अपने-आपको प्रशान्त की बाँहों से मुक्त कर लिया—मुक्त नहीं, केवल इतना कि वह उसके चेहरे को देख सके। बड़े प्यार से बोली यह तो स्वर्ग है, प्रशान्त ! मैंने तो सोचा भी नहीं था, यह जगह इतनी खूबसूरत होगी ...!
-सच ! प्रशान्त मुस्कुरा दिया।

-हाँ, प्रशान्त, एकदम सच...!
तभी कहीं पास ही बड़े ज़ोर का धमाका हुआ। दूधिया चाँदनी में नहाई प्रकृति हिल गई। समीरा ने घबराकर प्रशान्त की बाँह थाम ली। प्रशान्त ने बड़ी सहजता से कहा—क्यों डर गईं ?
लगता है जैसे बम फटा हो...।
-हाँ, और क्या...फिर मुस्कुराते हुए वह बताने लगा—उधर स्टोन-क्वेरी है न...वहाँ ब्लास्टिंग चल रही है। प्रोजेक्ट तैयार करते वक़्त यह सब सोचना पड़ता है। सीमेंट कहाँ से आएगा...कंकड़ कहाँ से मिलेंगे....रेत कहाँ से आएगी ...पत्थर कहाँ से खोदा जाएगा...।
एकाएक समीरा छिटककर अलग खड़ी हो गई। बड़ी शोखी से-और ये सुन्दरता कहाँ मिलेगी...और इस सुन्दरता में कितने सपने कहाँ से आएँगे !

प्रशान्त की मुस्कुराहट पहले से भी ज्यादा खिल उठी। आँखों में चमक लिए उसने समीरा की बाँह को फिर पकड़ लिया।
-सारे सपने शायद यहीं आएँगे...इस छाँह में....। कहते हुए समीरा ने प्रशान्त को पास के एक पेड़ की छाया में घसीट लिया। उसकी आँखों में देखते हुए प्रशान्त ने धीरे से कहा—हाँ, समीरा !
फिर भी वह धीरे से बोली-यह छाया हमारी है प्रशान्त....।
कुछ ही पल बाद समीरा प्रशान्त की बाँहों से खिंचती हुई नीचे घाटी में उतरती चली गई। उसकी हँसी पूरी घाटी में झरनों की आवाज़ की तरह गूँजती चली गई...।

सुबह प्रशान्त और समीरा काफ़ी देर तक सोते रहे। प्रशान्त की आँखे खुली तो खिड़की के बाहर से धूप आती हुई दिखाई दी। उसने पास ही सोई समीरा की ओर देखा। एक बार मन में आया कि उसे जगा दे, लेकिन उसने विचार बदल दिया।
बाहर बरमादे से कुछ आवाजें आ रही थीं। प्रशान्त ने पैरे में स्लीपर डाले और जम्हाई लेता हुआ बाहर आ गया।
डिप्टी और ख़ज़ांची बाबू बरामदे में पड़ी गार्डन चेयर्स पर बैठे थे और ख़ानसामा उन्हें चाय दे रहा था।
-अरे ! आप लोग तो तैयार होकर भी आ गए। प्रशान्त ने हैरानी से कहा। यहाँ सुबह बहुत जल्दी होती है।
-जी साब, यहाँ रात भी बहुत जल्दी होती है। ख़ज़ांची बाबू ने कहा और साथ ही उन्होंने ख़ानसामे को इशारा कर दिया—साब की चाय।
-मेम साब उठ गई होंगी....डिप्टी नकुल ने ख़ानसामा से कहा।
-नहीं। वह अभी सो रही हैं...दस मिनट बाद...प्रशान्त ने कहा।

 


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