लोग भूल गये हैं - रघुवीर सहाय Log Bhool Gaye Hain - Hindi book by - Raghuvir Sahay
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लोग भूल गये हैं

रघुवीर सहाय

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :103
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2479
आईएसबीएन :9788126706006

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आज के पतनशील समाज के प्रति कवि की दृष्टि विरोध की है परन्तु वह अपने काव्यानुभव से जानता है कि वह रचना जो पाठक के मन में पतन का विकल्प जाग्रत नहीं करती, न साहित्य की उपलब्धि होती है न समाज की।

Log bhool gaye hain

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

रघुवीर सहाय की कविताओं में हम एक ऐसे आधुनिक मानव को देख पाते हैं जो बौद्धिक रागात्मक अनुभूतियों से सन्तुष्ट होकर अपने लिए एक सुरक्षित संसार की सृष्टि नहीं कर लेता : उसमें रहने लगना कवि के लिए एक भयावह कल्पना है। आज के पतनशील समाज में ऐसे अनेक सुरक्षित संसार विविध कार्य-क्षेत्रों में बन गये हैं-साहित्य में भी-और इनमें बूड़ जाने का खतरा पिछले बीस वर्षों में बढ़ता-बढ़ता तीव्रतम हो गया है। परन्तु (बातचीत में रघुवीर सहाय कहते हैं कि) समाज कविताओं से भरा पड़ा है : सड़क पर चलते ही हम उनसे टकराएँगे और कविता एक नया परिचय कराएगी। इस संग्रह की रचनाएँ कवि के निरन्तर बढ़ते हुए परिचयों के पीछे उसकी सामाजिक चेतना के विकास का भी संकेत देती है : कवि की चिन्ता है कि उस विकास के बिना कविता लिखते जाने का कोई मतलब ही नहीं होगा।

आज के पतनशील समाज के प्रति कवि की दृष्टि विरोध की है परन्तु वह अपने काव्यानुभव से जानता है कि वह रचना जो पाठक के मन में पतन का विकल्प जाग्रत नहीं करती, न साहित्य की उपलब्धि होती है न समाज की। ‘आत्म हत्या के विरुद्ध’ की परम्परा में वह उस शक्ति को बचाकर रखने को आतुर है जो उसने ‘दूसरा सप्तक’ और ‘सीढ़ियों पर धूप में’ पायी थी और जिस पर आये हुए खतरों को उसने ‘हँसो हँसो जल्दी हँसो’ में दिखाया था। वह मानता है कि यही खोज नये समाज मे न्याय और बराबरी की सच्ची लोकतंत्रीय समझ और आकांक्षा जगाती है और ऐसे समाज की रचना के लिए साहित्यिक और साहित्येतर क्षेत्रों में संघर्ष का आधार बनती हैं। जहाँ कहीं जन की यह शक्ति पतनोन्मुख संस्कृति के माध्यमों द्वारा भृष्ट की जा रही हो वहाँ वह चेतावनी देता है और जहाँ वह बची रहने पर भी देखी नहीं जा रही हो, उसकी पहचान कराता है। वह बचाने के लिए तोड़ता है और तोड़ने के लिए व्यवसायिक उद्देश्य का विरोध करता है। पीड़ा को पहचाने की कोशिश वह ऐसे करता है कि उसी समय पीड़ा का सामाजिक अर्थ भी प्रकट हो जाए-वह मानता है कि सामाजिक चेतना का कोई अक्षर भंडार नहीं हो सकता, उसकी समृद्धि लोकतंत्र के पक्ष में संघर्ष से करती रहनी पड़ती है और इसी तरह सामाजिक नैतिकता की भी। ये कविताएँ इसी परम्परा की आज के दौर की अभिव्यक्तियाँ हैं।


निवेदन

 

इस संग्रह की रचनाएँ मेरे काव्य जीवन के जिस दौर में लिखी गयी हैं वह अभी हाल में शुरु हुआ और अभी निबटा नहीं है; दिखता है कि वह अभी चलेगा। मँझधार से या कहें कि बीच भँवर से लिखी हुई कविता प्रकाशित कर देने का यह मेरा पहला अवसर है। इसके पूर्व आत्महत्या के विरुद्ध और ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसो दोनों एक एक निष्कृति के सूचक थे। उसके पहले सीढ़ियों पर धूप में कविता के एक से अधिक पड़ावों तक सहेजकर ले जायी गयी उपलब्धियों का संचय था। उसके भी पहले दूसरा सप्तक में आकलित रचनाएँ अत्यन्त प्राथमिक कविताओं के अभ्यासमूलक दौर से निकलते ही अपनी दुनिया में पैर रखने के समय की कविताएँ थीं। अलबत्तता जैसा ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसों’ में हुआ था, प्रत्येक संग्रह में कुछ रचनाएँ कहीं तो एक दिशा में चलने की तैयारी करके वह रास्ता छोड़ देने की निशानियाँ थीं कहीं भविष्य में उस रास्ते को फिर पकड़ने के लिए पहचानें थीं।

अपनी कविता के वर्तमान दौर में से एक बार बाहर आकर अपना अधूरापन पाठकों को दिखाने के पीछे समाज के वर्तमान दौर पर एक दबाव है जो कवि पर पड़ रहा है। अपने को पूरा करना अपने अधूरेपन को समाज के सामने परीक्षा और पड़ताल के वास्ते लाये बिना आज सम्भव नहीं रह गया है। ऐसा न करूँ तो मुझे दो बड़े खतरे खड़े होते दीखते हैं जो वास्तव में एक ही के दो रूप हैं : कवि कहीं क्रान्ति का पुजारी और मसीहा एक साथ बनकर दिखाने में अपने कर्त्तव्य से भागने का रास्ता न निकालने लगे, या कहीं आत्मदया के आत्मपीड़क भाव में लिप्त होकर लोगों से वैसी सहानुभूति न माँगने लगे जो न केवल लोगों की रागात्क शक्ति का शोषण करेगी बल्कि उन्हें स्वयं अपनी वेदना पहचानने में भटकायेगी। जिस एक खतरे के रूप में दोनों हैं वह अहंवाद का ही खतरा है। अहंवाद को पहले के आलोचकों ने शाहद पूरी तरह नहीं पहचाना था। जिस कवि को उन्होंने अपने बारे में कुछ भी ऐसा कहते पाया जो सतही तौर पर दूसरों के बारे में न हो, उसे अहंवादी कहकर दुत्कार दिया।

 वास्तव में अहं खुलेआम जनसाधारण के बारे में लिखने का अहंकार करनेवाले कवियों में भी हो सकता है, यह आज ही प्रकट होकर दिख रहा है। जैसे राजनीति में वैसे ही कविता में भी जन के साथ कानूनी रिश्ते तो बने हुए हैं, लेकिन एक इंसानी रिश्ता रह नहीं गया है। इससे कवि भी राजनीतिक की तरह आत्मरहित बनता जा रहा है।
आज के कवि का अपनी परीक्षा के लिए समाज के सामने आना, विशेष रूप से तब जबकि उसे समाज में अपने अस्तित्व को अर्थात् समाज से अपने रिश्ते को समझने में संशय हो रहा हो, उसे अहं का रचना विरोधी खतरे से बचायेगा। क्या उसकी रचना सचमुच कहीं झूठे विश्वासों को झूठा बताती है ? और जो नया विश्वास देती है वह लोगों के मन में क्या स्वयं उनकी एक नयी पहचान पैदा करता है ? लोक कवि की रचना में क्या उस नये विश्वास को पहचानकर देख पाते हैं कि अवश्य ही यह कविता उन्हें बता रही है कि खुद उनमें नया क्या है ? पाठक का पुनरुज्जीवन कर सकना आदेश या उपदेश देनेवाले अहं का विसर्जन करके ही सम्भव है और इसी की परीक्षा के लिए कवि को बारबार अपनी रचनाएँ प्रकाशित करनी होती हैं। आज अन्याय और दासतार की पोषक और समर्थक शक्तियों ने मानवीय रिश्तों को बिगाड़ने की प्रक्रिया में वह स्थिति पैदा कर दी है कि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले जन मानवीय अधिकार की अपनी हर लड़ाई को एक पराजय बनता हुआ पा रहे हैं।

संघर्ष की रणनीतियाँ उन्हीं के आदर्शों की पूर्ति करती दिखायी दे रही हैं जिनके विरुद्ध संघर्ष है क्योंकि संघर्ष का आधार नये मानवीय रिश्तों की खोज नहीं रह गया। न्याय और बराबरी के लिए हम जिस समाज की कल्पना करते हैं उसमें मानवीय रिश्तों की शक्ल क्या होगी यह उस समाज के लिए संघर्ष के दौरान ही तय होना चाहिए।
कवि इस संघर्ष में बार- बार मानवीय रिश्तों की खोज करेगा और उनको जाँचेगा, सुधारेगा, बनायेगा और फैलायेगा। ये संबंध हृदय परिवर्तन से नहीं बनेंगे, संघर्ष के नतीजों की बार-बार जाँच से बनेंगे। जबाँ हृदय का सवाल है, कम से कम मुझे दृढ़ आस्था है कि लोग न्याय और बराबरी के जन्मजात आदर्श को नहीं भूलते : इतिहास के किसी दौर में कुछ लोग अवश्य इन्हें भूल जाते हैं पर इन्हें याद कराने के लिए उनसे कहीं बड़ी संख्या में मनुष्य जीवित रहते हैं। इन्हीं के सामने अपने आंतरिक संघर्ष की जांच के लिए कवि अपनी रचना लाता है चाहे रचने के एकान्त के बीच में से उठकर ही क्यों न आना पड़े।

 

मकर संक्रांति
14 जनवरी, 82, नयी दिल्ली
रघुवीर सहाय


यह संस्करण

 


लोग भूल गये हैं के दूसरे संस्करण की भूमिका लिखते हुए मैं पहले संस्करण की भूमिका के ये वाक्य दोहराना चाहता हूँ कि लोग न्याय और बराबरी के जन्मजात आदर्श को नहीं भूलते : इतिहास के किसी दौर में कुछ लोग इन्हें अवश्य भूल जाते हैं पर इन्हें याद कराने के लिए उनसे कहीं बड़ी संख्या में मनुष्य जीवित रहते हैं।

संभव है कि विस्मृति का यह दौर अपने साथ एक मक्कारी और चालाकी ले आए और इतिहास को तोड़ मरोड़कर वर्तमान के पतन का गुणवान करे जैसा आज कर रहा है; पर यही समय है कि निराशा में अपने कर्तव्य को न खोज कर, झूठी आशा या खोखले शब्द को कविता बनाकर उस आदमी को धोखा न दे, जो आज चाहे निरक्षर हो पर कल हर कविता पढ़कर उससे एक नयी कविता बनायेगा और वर्तमान कविता से ज्यादा बड़ी और सच्ची होगी।

कविता शब्द का निरा संस्कार नहीं है। न वह वर्तमान की निरी व्याख्या है, न इतिहास का निरा पनुरवलोकन ओर न अतीत से भविष्य के निरे अंतरालवलंबन का औचित्य। इन सबके समेत वह कुछ भी है तो साहस है जो हमारे जाने बिना दूसरे को मिलता है बशर्ते कि वह दूसरा हमारी कविता में हो।

 

9 जनवरी 1989
रघुवीर सहाय


कला क्या है

 


कितना दुःख वह शरीर जज़्ब कर सकता है ?
वह शरीर जिसके भीतर खुद शरीर की टूटन हो
मन की कितनी कचोट कुण्ठा के अर्थ समझ उनके द्वारा अमीर होता जा सकता है ?

अनुभव से समृद्ध होने की बात तुम मत करो
वह तो सिर्फ अद्वितीय जन ही हो सकते हैं
अद्वितीय याने जो मस्ती में रहते हैं चार पहर
केवल कभी चौंककर
अपने कुएँ में से झाँक लिया करते हैं
वह कुआँ जिसको हम लोग बुर्ज कहते हैं

अद्वितीय हर व्यक्ति जन्म से होता है
किन्तु जन्म के पीछे जीवन में जाने कितनों से यह
अद्वितीय होने का अधिकार
छीन लिया जाता है
और अद्वितीय फिर वे ही कहलाते हैं
जो जन के जीवन से अनजाने रहने में ही
रक्षित रहते हैं

अद्वितीय हर एक है मनुष्य
और उसका अधिकार अद्वितीय होने का छीनकर जो खुद को अद्वितीय कहते हैं
उनकी रचनाएँ हों या उनके हों विचार
पीड़ा के एक रसभीने अवलेह में लपेटकर
परसे जाते हैं तो उसे कला कहते हैं !

कला और क्या है सिवाय इस देह मन आत्मा के
बाकी समाज है
जिसको हम जानकर समझकर
बताते हैं औरो को, वे हमें बताते हैं

वे, जो प्रत्येक दिन चक्की में पिसने से करते हैं शुरू
और सोने को जाते हैं
क्योंकि यह व्यवस्था उन्हें मार ड़ालना नहीं चाहती
वे तीन तकलीफ़ों को जानकर
उनका वर्णन नहीं करते हैं
वही है कला उनकी
कम से कम कला है वह
और दूसरी जो है बहुत सी कला है वह

कला बदल सकती है क्या समाज ?
नहीं, जहाँ बहुत कला होगी, परिवर्तन नहीं होगा।




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